यमुनोत्री की खड़ी चढाई में पस्त

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सन्नाटे में सुबह

कल रात बिरला हाउस में पहले टेंट और फिर बाकायदा कमरे का मिलना वरदान साबित हुआ। खाली कमरे में गद्दे और रजाई पहले से मौजूद थी।

जिसे बिछाकर सो गया था। दोनों बड़े बैग बड़ी सी खिड़की के पास की मेज़ के ऊपर ही रख दिए थे। आंख खुल चुकी है। बेहतर यही रहेगा कि फटाफट तैयार हो कर निकल लिया जाए यमुनोत्री मार्ग पर।

दरवाज़ा खोल कर बाहर निकला ही एक सज्जन बाहर इंतजार करते मिले। दरवाज़े के पास ही रखा मोटर जैसी दिखने वाली वस्तु को चालू किया और चले भी गए। मैं हाँथ में टूथब्रश लिए खड़ा ये सब देखता रहा।

दांतों को घिसते हुए बाहर निकला तो यहाँ पाया की एक माली खाली पड़े छोटे से मैदान की घास छीलने में जुटा हुआ है। अकारण ही हाँथ जोड़ कर नमस्ते करने लगा।

मैंने भी सिर हिलाकर उनके नमस्ते का जवाब दिया। बाहर नल्के से कल रात वाले भैया पानी भरते नजर आए। मैं तैयार होता इससे पहले देखा कि पुलिस की वर्दी में कुछ महिला हवलदार टीप टाप होकर हाँथ में आधा पराठा लिए निकल पड़ी हैं ड्यूटी पर।

तो कोई पानी भर कर नहाने की व्यवस्था करने लगा है। यहाँ दुसलखाना और बाथरूम अगल बगल ही सटे हुए हैं। जो फिलहाल व्यस्त मालूम दिखाई पड़ते हैं।

मुझे अपनी बारी का इंतजार तो करना ही पड़ेगा। नल्के का पानी गरम है। जिसे और गरम किए बिना भी नहाया जा सकता है। कुल्ला कर के वापस चल दिया साथी घुमक्कड़ को उठाने।

साथी घुमक्कड़ को उठा बाहर भेजा तैयार होने। तब तक के लिए बैग से जरूरी सामान ले जाने लायक अलग करने लगा। साथी घुमक्कड़ को थोड़ी देर लगी लेकिन वो सब निपटा कर आ गया।

बिरला हाउस की व्यवस्था

मैं अपनी तौलिया ले कर आ गया दुसलखाने के पास। अब तक भीड़ काफी छट चुकी है। जो मैडम बाल्टी भर कर कपड़े धो रही थीं अब वो ड्रेस पहन कर निकल पड़ी हैं देश सेवा के लिए।

बस बगल वाले बाथरूम में पानी गिरने की आवाज़ आ रही है। नित्य क्रिया के बाद झटपट बाथरूम में घुस गया। पानी उतना भी गरम नहीं है।

पर फिर भी मैंने नहाना जरूरी समझा। पटिया पर साबुन की जमात लगी हुई है। पर मैं अपना साबुन भी साथ ले कर आया हूँ।

इतनी ठंड में खुला बदन घूमना भी बीमारी को दावत देने जैसा है। फटाफट कपड़े फैला गीली चप्पल में ही जा घुसा कमरे में जो बाथरूम से पचास मीटर दूर है।

मुझे नहाया हुआ देख साथी घुमक्कड़ आश्चर्य में पड़ गया। उसके आश्चर्य से मैं समझ रहा हूँ ये लीचड़ आदमी आज स्नान नहीं लेगा। सीधा यमुनोत्री के कुंड में ही डुबकी मरेगा।

बैग से साफ सुद्व शर्ट निकाल कर डाल ली बदन पर। ठंड तो नहीं है पर गर्मी भी नहीं है। इस खाली पड़े कमरे ने बैग ऐसा पड़ा रहेगा तो वो भी खतरा है।

बाहर आ कर लवली जी को इस बारे में बताया तो उन्होंने बैग अपने कमरे में रखवा देने को कहा। यही बेहतर रहेगा। फ़ौरन तैयार हो कर छोटे बैग को बड़े बैग से अलग कर उसमे कैमरा, तौलिया और बोतल डाल ली।

और बड़ा बैग ले कर बाहर आ गया। सीधा लवली जी के कमरे में रखने की तैयारी करने लगा। कमरा सिर्फ और सिर्फ कैमरों से भरा पड़ा है। जिससे यमुनोत्री के मार्ग पर कड़ी नजर रखी जा रही है।

कमरे का माहौल देख लग रहा है खाना बनाने की तैयारी है। अगल बगल के सभी क्वॉर्टर खाली हो चुके हैं। अब मेरी भी बारी है समय रहते निकल जाऊं।

शुरू हुई यात्रा

घड़ी में साढ़े आठ हो चला है। और मैं बिरला हाउस से बाहर निकल रहा हूँ। सुबह सवेरे भीड़ तो कम है। लेकिन जाने वालों की कमी नहीं है।

बच्चे, बूढ़े, जवान सब जोश के साथ आगे बढ़ रहे हैं। बिरला हाउस काफी आगे होने के कारण, बस अड्डे की तरफ से काफी भीड़ आती दिखाई पड़ रही है।

कोई घोड़े पर तो कोई खच्चर, तो कोई पिट्ठू पर लद कर तो कोई ढोली पर सवार हो कर। कोई पूरी पलटन के साथ चल रहा है। तो किसी की अम्मा पीछे छूट गई हैं।

फिलहाल तो आगे बढ़ा तो चाय की दुकान से इलायची वाली खुशबू आईं। साथी घुमक्कड़ का भी मन डोल गया एक पल के लिए। और ये तय हुआ कि चाय से ही दिन कि शुरुआत करी जाए।

कुछ पल का इंतजार और हाँथ में गरमा गरम चाय। कुल्लढ़ में चाय का स्वाद ही पूरा बदल जाता है। मानो होंठो से मिट्टी का गिलास लगाते ही ताजगी आ गई हो।

किफायती चाय के बाद उसी पुलिस स्टेशन के सामने से गुज़रा जहाँ से कल कुछ मदद के संकेत मिले थे। जैसे जैसे समय गुजर रहा है वैसे वैसे भीड़ में भी इजाफा हो रहा है।

शुरू में रास्ता थोड़ा भीगा हुआ है और गन्दा भी। एक तरफ नीचे यमुनोत्री की तेज़ धारा प्रवाहित हो रही है। दूसरी तरफ सड़क के इस ओर पतली धार। जो ऊपर पहाड़ी सी गिर रही है।

लगे हाँथ मैंने भी अपने जूते भिगों ले रहा हूँ जो कुछ गंदे से हो गए हैं। अब भीड़ छ्ट जाने के कारण कम दिखाई पड़ रही है। कुछ थक कर सड़क किनारे लगी दुकान में सस्ता रहे है। तो कुछ नींबू पानी का मज़ा ले रहे हैं।

मेरे में तो अभी जान बाकी है तो चले जा रहा हूँ। जब लगेगा तो बैठ कर सस्ता भी लूंगा। हालांकि जिस खड़ी चढ़ाई के बारे में सुना था वो अभी तक नहीं आई है। सामने बर्फ से ढकी कालिंदी पहाड़ी मानो अपनी ओर आकर्षित कर रही हो।

जानकीचट्टी से यमञोत्री जाने का मार्ग

पांच किमी के इस रास्ते को खड़ी चढ़ाई के लिए भी जाना जाता है। रोचक बात तो ये है कि आजतक कोई गिरने गिराने का हादसा नहीं हुआ है।

मेरे आगे आगे चल रहा एक पिट्ठू वाला पीठ पर दादी को बैठाए लिए चला जा रहा है। दादी और इस पिट्ठू का मेल खूब जम रहा है। दोनों मस्तमौला की तरह गपशप करते रास्ता नाप रहे हैं।

चढ़ाई के बाद अब ढलान पर आते ही मैं नदी किनारे आ कर कुछ तस्वीरें निकालने लगा। बड़े बड़े पत्थरों के आगे से गुजरती नदी को देखना आश्चर्यजनक है।

दुर्गम खड़ी चढ़ाई

ढलान के बाद वो दुर्गम चढ़ाई अब शुरू होगी। एक बच्ची रोती हुई एक जगह पर आ खड़ी हुई। उसे रोता देख हर कोई यही आकलन कर रहा है कि वह अपने परिवार से अलग हो गई है।

जहाँ अभी तक रास्ता बहुत ही शानदार था अब उबड़ खाबड़ सड़क पर चलने को मजबूर हूँ। शायद खड़ी चढ़ाई से अब सामना जल्द होने वाला है।

धूमिल रास्ते पर से होते हुए आगे बढ़ता जा रहा हूँ। ये चढ़ाई इतनी खतरनाक है कि किसी वृद्ध के बस की बात नहीं है। बहुतेरे लोग हाफने भी लगे हैं।

वृद्ध तो छोड़िए जनाब यहाँ अच्छे खासे नौजवानों के पसीने छूट रहे हैं। शॉर्ट कट के नाम पर खतरनाक सीढ़ियां। ऊपर से ये थके घोड़े और खच्चर।

ये इतने थके हैं कि इनसे खुद का वजन नहीं संभाला जा रहा। पर मलिक जोर जबदस्ती करते हुए इनको गिरने से भी बचा रहा है और आगे भी घासीट रहा है।

धार्मिक स्थलों पर इन जानवरों के साथ बहुत ही बदसलूकी होती है। आखिरकार खड़ी चढ़ाई के बाद मैं भी खुद को थका महसूस कर रहा हूँ।

आ गया एक दुकान में सुस्ताने। मेरे अलावा कुछ लोग पहले से ही चाय या नींबू पानी का चस्कारा ले रहे हैं। चाय से तो धमनी धीमी पड़ जाती है चढ़ाई के दौरान।

बेहतर रहेगा या तो काफी पी लूं या फिर नींबू पानी। काफी के दाम तो आसमान छू रहे है। नींबू पानी से ही काम चलाना पड़ेगा। यहाँ ऊंचाई पर खाने पीने की कोई सामग्री लो तो वो एमआरपी से अधिक दाम में ही बिकता है।

और लोग खरीदते भी हैं। पर इनकी दुकान में चाय नाश्ता कुछ भी नहीं। कह रहे हैं कि लड़का अभी माल लेके नहीं आया है। क्या ही मुनाफा कमाते होंगे ये लोग!

चाय की दुकान के सामने का नज़ारा

तभी सामने से एक लड़का पीठ पर पेटी लादे आगे बढ़ता जा रहा है। ये देखने में इतनी वजनदार है कि शायद ही मैं इसे अकेले ऊपर खींच पाऊं।

नींबू पानी पीते ही जैसे शरीर में बिजली दौड़ गई हो। पैसे दिए और वापस यात्रा मार्ग पर और यात्रियों से जुड़ चल पड़ा यमुनोत्री धाम।

घोड़े खच्चरों के बीच से होते हुए बढ़ रहा हूँ आगे। अभी जून का महीना है तो शुक्र है, बारिश के मौसम में यहाँ भी वैष्णो देवी की तरह पत्थर गिरते ही होंगे।

यमुनोत्री माता का जयकारा लगाते हुए दीवाने भक्तगण मंदिर की ओर बढ़ रहे हैं। रास्ते में एक तरफ तो पहाड़ी है लेकिन कई पड़ाव ऐसे भी आए जहाँ दूसरी ओर रेलिंग तक नहीं है दूसरी ओर। जो सुरक्षा की नजर से खतरनाक साबित हो सकता है।

जब अभी इतना भीगा भीगा है तो बारिश में जाने क्या ही हाल होता होगा। जगह जगह यात्रियों के सुस्ताने के लिए टीन की रेली पड़ी है। जो थके, अधेड़ उम्र के यात्रियों के सुस्ताने के लिए बढ़िया है। बेंच पर ही बैठ कर वो अपनी थकान उतार लेते हैं।

बस कुछ किमी और, और मैं पहुंच जाऊंगा यमुनोत्री धाम। चढ़ाई कई कई जगह इतनी ऊंची मिली जिस पर चढ़ पाना आसान नहीं था।

पर बड़ी ही आसानी से लोग चढ़ उतर रहे हैं। जाने क्या चमत्कार है। सामने दिख रहे बंद पड़े पुल के पीछे यमुनोत्री मंदिर है।

भीड़ भड़क्का

जिसे यहाँ से देखने पर मालूम पड़ रहा है किस कदर लोगों का हुजूम जमा हुआ है। पर अभी तक रास्ते में जो भीड़ नहीं मिली थी वो अब इस सकरे रास्ते में मिल रही है।

इसका कारण है यहाँ पर बना बदबूदार अस्तबल। जितने घोड़े खच्चर नीचे से ऊपर आए हुए हैं सबको यही बांध दिया गया है। कुछ तो वापसी यात्रियों का इंतजार कर रहे हैं। कुछ नई सवारी तलाश रहे हैं।

घोड़ों खच्चरों के इस अस्तबल के सामने से निकलने में बड़ी मशक्कत का सामना करना पड़ रहा है। मैंने तो एहतियातन अपनी सांस रोक ली है।

पर ज्यादा देर तक सांस ना रोक सका और दुर्गन्ध का प्रवेश हो ही गया। जी तो चाह रहा है भाग जाऊं। पर घोड़ों के मालिक ऐसा करने नहीं देंगे।

सामने से आने वाले जाने वालों का रास्ता रोके खड़े हैं। जैसे तैसे करके भागते हुए इस नरक से बाहर निकला। कुछ राहत है अब। बंद पड़े पुल के पास आया तो आगे एक और पुल दिखा जिसपर से अधिकतर लोग गुजर रहे हैं।

नीचे की ओर जाने वालों की भी तादाद अच्छी खासी है। और उनसे ज्यादा आने वालों की। तेज़ धूप होने के कारण ठंड का आभास ही नहीं हो रहा। मगर अगर यहीं धूप कुछ पल के लिए नदारद हो जाए तो शायद हड्डियां ठिठुर जाएं।

यमुनोत्री से पहले पडता अस्तबल के बाहर जमा भीड़

मंदिर में आगमन

भीगे रास्ते से होते हुए मंदिर के मुहाने तक पहुंचा। पर यहाँ नीचे की ओर स्तिथ औरतों को स्नान कुंड है और ऊपर वाले माले पर पुरुषों के लिए व्यवस्था बनी हुई है।

भीगी सीढ़ियों से होते हुए ऊपर आ गया। यहाँ मजे की भीड़ है। कुछ लोग तप कुंड में स्नान कर रहे हैं तो उनके साथी बाहर उनके कपड़े लिए खड़े हैं।

ऐसी मान्यता है कि यमुनोत्री देवी के दर्शन से पहले यहाँ स्नान करना जरूरी है। मेरे से पहले साथी घुमक्कड़ कूद पड़ा कुंड में। इसी विचार को ध्यान में रखते हुए मैं भी सारे कपड़े उतार कर उतरता की इससे पहले कपड़ों का ये पुलिंदा लोगों की पहुंच से बाहर रखना पड़ेगा।

कपड़ों के इस पुलिंदे में दोनों कैमरे और मोबाइल लपिटे हुए हैं। जूतों को पहले ही बाहर छुपा दिया है। बारी है कपड़ों की तो वो भी कुंड के पास ही ऊंचाई पर अन्दर दबा कर रख दिया है।

शायद ही कोई यात्री इतना खतरा मोल लेता अपने सामान के साथ जितना मैं ले रहा हूँ।

तप कुंड में स्नान

उतर पड़ा गरमा गरम कुंड में। पानी में पैर रखते ही आत्मा थरथरा गई।

मेरे से पहले जो कुंड में हैं वो पहले से ही कुंड में डुबकी लगा रहे हैं। उनको देख मुझमें भी थोड़ी हिम्मत आई। और धीरे धीरे कर मैं भ पूरा उतर गया कुंड में।

पानी वाकई इतना गर्म है कि यात्रा की सारी थकान एक झ्टके में उतर गई। और पीठ का दर्द भी जो इतने दिनों से मेरा पीछा नहीं छोड़ रहा है।

ऐसी भी मान्यता है कि इस तप कुंड में नहाने से सारे शारीरिक रोग मिट जाते हैं। अब ऐसा जिनके साथ हुआ होगा वो ही बेहतर जानते होंगे।

कुंड में एक सज्जन अपना भारी भरकम शरीर लिए ज्ञान बखार रहे हैं। वो हमसे पहले से आए हुए हैं और अभी भी जाने का नाम नहीं ले रहे।

कोई धोती सहित ही कुंड में उतर आया है। वो महाशय अलग तैर रहे हैं और उनकी धोती अलग। कुंड के सामने वाले हिस्से में आ कर जूतों पर भी नजर बनाए रखे हैं हम। और कुंड के अंत में कपड़ों पर भी।

कुंड में जहाँ से गरम पानी की धारा शुरू हो रही है कुछ लोग बारी बारी से यहाँ खड़े हो कर पीठ की सिकाई ले रहे हैं। मैं भी उत्सुकतावश आया मगर जगह ही ना मिल रही है।

यमुनोत्री का तप कुंड

फिर भी अंकल को किनारे कर गुज़ारिश करते हुए आ खड़ा हुआ। पहली बार में तो लगा किसी ने खौलता हुआ पानी फेंक दिया है।

पर जब काफी देर खड़ा रहा तो कुंड के पानी की तरह ये पानी भी कम गरम लगने लगा।

तकरीबन आधे घंटे कुंड में बिताने के बाद अब लगा काफी थकान मिट चुकी है। अब निकलना चाहिए। मगर वो भारी भरकम वाले महाशय आज इसी कुंड में सोएंगे और अभी और वक्त बिताएंगे।

मंदिर का गर्भगृह

स्नान ले कर बाहर आया और एक एक कर सामान बटोरने लगा। शरीर पोंछा और एक किनारे खड़े होकर कपड़े पहनने लगा।

भीड़ इतनी है कि सुकून से कपड़ा भी नहीं पहना जा रहा इस गीले जीने पर। फिसलन का डर अलग बना हुआ है। धक्का मुक्की के बीच तैयार हुआ और चल पड़ा हाँथ में जूता लिए ऊपर वाले माले में जहाँ मुख्य मंदिर है।

नीचे के मुकाबले यहाँ भीड़ कम है। बारी बारी से हम दर्शन को आए। पहले मैं आया। मंदिर में ज्यादा भीड़ नहीं है। सभी देवियों के दर्शन अच्छे से हो रहे हैं।

कहा जाता है कि यमराज की बहन यमुनोत्री ने इसी जगह पर तप करके भू लोक पर आईं थीं। और ठीक उसी जगह मंदिर बना दिया गया है।

मंदिर के बाहर निकल कर साथी घुमक्कड़ को दर्शन के लिए भेजा ही है कि फोटो खीचने की फरमाइश आ गई। बैग और जूते एक किनारे रख फोटो खींचने लगा।

यमुनोत्री मंदिर के सामने लेखक

और उनको अपना कैमरा पकड़ा कर अपनी खिचा ली। ऐसी सांठ गांठ तो चलती रहती है। साथी घुमक्कड़ के बाहर आने के बाद मैं चल पड़ा उस ओर जहाँ हिमनद(ग्लेशियर) है।

नजर पड़ी एक साधु महाराज पर को बिल्कुल भी देसी नहीं लग रहे। फिर भी उनके पीछे अच्छी खासी भीड़ चल रही है। कोई कैमरा पकड़े कोई बैग।

ये विदेशी साधु को देख लगता है इसने अपना धर्म त्याग कर हिंदुत्व अपना लिया है। आज के पश्चिम सभ्यता के आधिर हो चुके लोगों के लिए ये बाबा अच्छा उदाहरण हैं।

हिमनद(ग्लेशियर)

मंदिर के बाद लगभग हर कोई हिमनद के लिए ही रवाना हो रहा है। बगल मे बे रही यमुनोत्री में कचरा तो नहीं मगर लोगों के त्यागे हुए वस्त्र जरूर दिखाई पड़ रहे हैं।

जो यमुनोत्री की गरिमा पर बट्टा लगा रहे हैं। किसी की धोती तो किसी की जींस या लंगोट। हद है प्रकृति को गंदा करने की सीमा लांघ दी है मानव ने।

नदी को पार करने के लिए छोटा सा पटरा पड़ा है। जिसके उस तरफ एक लम्बी भीड़ है। और इस तरफ मेरे पीछे भी कई लोग हैं।

स्नान के बाद हल्की हरारत महसूस हो रही है। और तेज़ धूप होने के कारण ये और बढ़ रही है। नदी पार करने के इंतजार में काफी वक्त बीत रहा है।

जब सामने से सब लोग आ गए तब मैं भी इस पार से उस पार आ गया। ये पटरा इतना सकरा है कि एक वक्त में दो तरफ से लोग नहीं आ सकते।

आश्चर्यजनक बात है कि लोग हाँथ पैर जमा देने वाले पानी में नहा रहे हैं। खैर ये तो उनकी श्रद्धा है। आगे बढ़ा तो बर्फ की मोटी चादर देखने को मिली।

हल्के बुखार के चलते मैं यहीं तक रहना ठीक समझा और साथी घुमक्कड़ और आगे चला गया। नदी का उदगम देखने है। यहाँ मोटी बर्फ की चादर के नीचे से पानी निकल रहा है।

जिसे देखना बहुत ही आनंदमय लग रहा है। मगर पानी बहुत ठंडा है। मैंने सोचा क्यों ना आगे पत्थर पर बैठ कुछ देर के लिए खुद को अकेला कर लूं। हालांकि आगे नदी की तेज़ धारा बे रही है फिर भी मैं आगे आ गया।

नदी पार करने के लिए इंतज़ार करती भीड़

साथी घुमक्कड़ के वापस आ जाने के बाद तय हुआ अब वापस चलना चाहिए। साथी घुमक्कड़ का और आगे जाने का भी अनुभव शानदार रहा। वापस उसी पटरे से गुजर कर मंदिर की सीढ़ियों से होते हुए बाहर आ गया।

जानकीचट्टी से यमुनोत्री और वापसी की कुल यात्रा 18km

यमुनोत्री कैसे पहुंचे?

दिल्ली से देहरादून तक ट्रेन का सफर।

देहरादून से बरकोट बस का सफर।

बरकोट से जानकीचट्टी का जीप से सफर।

जानकीचट्टी से यमुनोत्री पैदल यात्रा या फिर घोडा/खच्चर पिट्ठू के द्वारा जिनकी कीमत 2000 से 4000 के बीच में होता है, पालकी का 7000 ।

 

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One Comment

  1. Amazing content bhai.. aapki likhne ki kala ko mera salaam.. aisa laga jaise mai aapke sath hi ghum rha hu.. keep writing 😍👏
    Panku 😎

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