चितकुल, स्टोरीज ऑफ इंडिया, स्पीति वैली, हिमाचल प्रदेश
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विश्वप्रसिद्ध नाको झील

भगदड़ वाली सुबह

रात तो मानो चुटकी बजाते बीत गई। पर सोते समय दिमाग में ये बैठा लिया था अगर समय से नहीं उठा तो बस छूटने का खतरा ज्यादा होगा।

समय रहते आंख खुल गई है पर उठने का मन नहीं हो रहा है। पर घुमक्कड़ी का ये उसूल है। या तो आराम कर लो या तो घुमक्कड़ी।

अभी मेरे पास दो विकल्प हैं या तो सोता रह जाऊं या फिर या फिर वाहन में सवार होकर अगली मंज़िल पर निकल जाऊं।

ऐसा ना पहली मर्तबा हुआ है और ना ही आखिरी। ऐसे बहुत से मौके आयेंगे जब नींद का बलिदान देना होगा। बस छूटने के डर से दोबारा नींद कहाँ आनी थी।

इतनी ठंड में रजाई फेकना अपने आप में बहुत बहादुरी का काम किया मैंने। बस को निकालने में अभी पैंतालीस मिनट हैं।

वैसे भी हिमाचल प्रदेश में रोडवेज बसें अपने निर्धारित समय पर प्रस्थान करने के लिए मशहूर हैं। पर मुझे आधा घंटा लगा तैयार होने में।

ना जाने क्या सूझी की समय रहते नहा भी लिया। उधर अजय बाथरूम का दरवाज़ा ही खटकाता रह गया। जब समय हाँथ से फिसलता हुआ मालूम पड़ने लगा तब ये तय हुआ कि मैं फटाफट बैग लेकर निकल भागूं बस अड्डे की ओर।

ताकि एक आदमी जा कर बस रुकवा ले और दूसरा मकान मलिक को पेमेंट कर के चला आए। अब समय सिर्फ पांच मिनट ही हैं हाँथ में।

यही तय हुआ और बैग लेके मैं ऐसे भागने लगा जैसे मिल्खा ओलंपिक में। अंधेरी गलियों में नालो को पार करते हुए काफी देर ऐसे ही भागता रहा।

लग रहा है अगर बस छूट गई तो यहाँ एक दिन और रुक कर क्या करूंगा। यही सोच कर रफ्तार में थोड़ी और गती भरी।

बस अड्डे पर पसरा सन्नाटा

जब भागते दौड़ते मैदान के पास आया तब थोड़ी रफ्तार धीमी पड़ गई। क्यूंकि बस बाहर ही खड़ी है। अब या तो बस निकल चुकी है या फिर ये कोई खराब बस को यात्रियों को धोखे में रखने के लिए रखा है।

धीमी रफ्तार में बस अड्डे की टूटी दीवार को पार करते हुए जब अन्दर आया तब पास में बनी बिल्डिंग का शटर गिरा पाया।

मतलब साफ है यही वो बस है जो जाएगी। बस का दरवाज़ा तो बंद मालूम पड़ा। बस के इर्द गिर्द घूमने के बाद कुछ सूझ ना रहा है कि आखिर हुआ क्या?

तभी इमारत की दुकान वाला शटर उठता हुआ दिखाई दिया। जिसमे से अंगड़ाई लेते हुए कंडक्टर बाबू निकले। पूछने पर जम्हाई लेते हुए बताने लगे अभी निकलने में पंद्रह मिनट तक लग जाएगा।

पहले पता होता तो शायद मैं भी इत्मीनान से निकलता घर से। खामखा इतनी हड़बड़ी मचाई। पीछे के गेट से ड्राइवर साहब लोटा लेके शौचालय की ओर प्रस्थान करते दिखे।

एक और सवारी आ गई है। भारी भरकम बैग अब और नहीं लादा जा रहा है। दरख्वास्त करने पर मोटी सी चाभी हाँथ में लिए कंडक्टर साहब ने बस की डिक्की खोली।

धूल से लबालब भरी डिक्की में बैग झोंक देने को कहा। हिम्मत तो नहीं पड़ रही है। पर सुकर है दूसरी सवारी के पास सामान थोड़ा ज्यादा है।

उसने अपनी बोरी बक्सा इसी में धांस दिया। अब मेरे लिए बैग रखने में सहुलियत है। इसी बोरी के ऊपर मैंने भी अपना बैग फिट कर ही रहा था कि कंडक्टर ने किनारे करते हुए अपने तरीके से डिक्की बंद की।

सबका कुल्ला मंजन चल ही रहा था कि इतनी देर में अजय भी आ गया। पांच बज चुके हैं मगर बस का निकलना अभी ना हुआ है।

उधर अजय ने बताया कि फटाफट पेमेंट कर के जैसे वहाँ से भागा है उसे बेहतर कोई नहीं जानता होगा। मूह पोछते हुए ड्राइवर साहब जब बस की ओर आने लगे तब लगा अब तो निकल पड़ेगी।

उधर वो आंटी अंकल गायब हैं जो कल शाम को सुबह ताबो से निकलने की बात कर रहे थे। क्या पता कहाँ हैं?

ताबो से रेकोंग पियो

बस धड़धड़ाते हुए चालू हुई और निकल पड़ी रेकोंग पियो कि ओर। और चालकों की तरह ये ड्राइवर साहब भी बस में लगी महादेव की मूर्ति के आगे नमस्तक हुए।

एक दुक्का सवारियों के साथ ताबो से अलविदा लेने का समय आ गया है। हालांकि मुझे खेद इस बात का भी है कि पर्याप्त साधन के चलते ज्यादा वक्त ना बीता सका मैं यहाँ।

शायद कभी भविष्य में दोबारा आगमन हो तब जरूर बिताऊंगा। और वो एनआरआई वाले चाचा को कैसे भूल सकता है कोई। अजय को बहुत याद करने वाले हैं वो जनाब।

उनके मुताबिक देश दुनिया में नौकरी करने के बाद अपने बीवी बच्चों को त्याग कर यहाँ चले आए। पूछा भगवान के कितना करीब पहुंचे तो इसमें में भी अपनी पढ़ाई घुसेड़ते हुए प्रतिशत में तौल दिया।

उनके हिसाब से तो 75% हो गया है बाकी आने वाले समय में पूर्ण हो जाएगा। अजब खेल है पढ़े लिखे लोगों का, इतने विद्वान लोग कहाँ से आए हैं?

शांत खड़ी पहाड़ियां का शोर

शायद शत प्रतिशत होने पर भगवान को ही ना प्यारे हो चलें। खैर उछलते कूदते बस सुमदो आ पहुंची है। यहाँ एक मिलिट्री कैंप के पास से कुछ जवान अपने साथी को अलविदा कहने आए हैं।

एक जवान अपने परिवार के साथ छुट्टियां मनाने घर जा रहा है। देख कर तो ऐसा ही लग रहा है कि वीर जवान की मैडम साहिबा उन्हें घर ले जाने आईं हैं।

शायद ये जवान देश की सेवा में इतना मशगूल हो गया है कि वो भूल ही गया है की उसका एक और भी घर है। देश की सेवा में कौन ना भूल जाए!

लेकिन शायद मैडम भी स्पीति घाटी को नजदीक से देखने के बहाने आ गई हों। ये घाटी है ही इतनी लोकप्रिय जिसका कोई जवाब नहीं।

जैसे जैसे बस आगे बढ़ रही है वैसे वैसे सवारियां बढ़ती जा रही हैं, और गर्मी भी। अब जी तो चाह रहा है जैकेट उतार कर निकाल दूं।

नाको झील

अभी नाको गांव भी नहीं आया है। जिसकी झील मशहूर है। जहां लोग आते अपनी मर्ज़ी से हैं पर जाते कुदरत की मर्ज़ी से। जैसे डॉक्टर कपिल नाको आए तो थे दो दिन के लिए पर रुक गए हफ्ते भर के लिए।

वैसे जैसे वो इस्राइलियों का वो झुंड तीन चार दिनों तक तो यही डेरा डाले रहा। और तय समय को भी पार करने के बाद काजा पहुंचे थे।

ये तो वो लोगों के किस्से हैं जिनसे मैं मिला हूँ। ना मिलने वाले तो जाने कितने होंगे। अनुमान के मुताबिक बारह बजे तक पहुंचना तय है।

कुछ मील का सफर और हम नाको आ पहुंचे। शायद नाको और स्पेलो स्पीति घाटी आने जाने वालों का मुख्य स्टॉपेज है। पिछली बार की तरह इस बार तबीयत काफी बेहतर है।

वरना पिछली बार जो हाल हुआ था उसको बयां करना ठीक नहीं। नाको में एकमात्र ढाबे में मज़े कि भीड़ है। खासकर आम और गांव के लोगों से ज्यादा आईटीबीपी के जवान ज्यादा मौजूद हैं।

खाने पीने की ऐसी तो कोई लालसा नहीं है। पर आसपास जवानों से खुद को घिरा पा कर गौरवानवित महसूस कर रहा हूँ।

जिनके पेट में चूहे कूद रहे थे वो सीधा बस से उतर कर ढाबे में जा घूसे। जरा मैं भी तो देखूं ऐसा क्या है आज ढाबे में। झांका तो भूंखे शेर ज्यादा नजर आ रहे हैं।

चाय की एक प्याली बहुत होगी मेरे लिए। ठंड में कुछ गरम। मेरा बोलना था कि ढाबे वाले ने कुल्लड में गरमा गरम चाय छान कर पकड़ा दी।

कुल्लड़ में जो मिट्टी का स्वाद चाय के साथ आता है वो डिस्पोजल या गिलास में फीका लगता है। कुल्लड़ लेके जब ढाबे के बाहर निकला तो जाने क्यों कदम अपने आप ही ढाबे के पीछे वाले हिस्से में गए।

किन्नौर जिले में स्तिथ नाको झील

जहां गया तो पाया वो नाकों झील जिसके प्यार में लोग यहाँ अर्सा बिताने को तैयार हैं। गणित के हिसाब से बात करू तो इसका रेडियस काफी घट गया है।

यह झील लगभग 4300 मीटर की ऊंचाई पर है। नाको झील के पास कुछ एक बौद्ध मंदिर भी हैं। इस झील का सम्बन्ध पद्मसंभव से जोड़ा जाता है, कहा जाता है कि उन्होंने इस झील के पास तपस्या की थी।

नाको झील किन्नौर में एक छोटे से पुराने जमाने के नाको गांव में है। यह प्रसिद्ध हंगरंग घाटी से 2 किमी की दूरी पर स्थित है।

इस झील के महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक यह है की वर्ष के अधिकांश भाग के लिए यह बर्फ से ढका रहता है। यह झील चार सुंदर मंदिर और कई पेड़ों से घिरा हुआ है, जो इसके सुंदरता को और बढ़ाता है।

साफ देखा जा सकता है की पहले ये झील कितनी बड़ी रही होगी और अब कितनी घट गई है। पास में खड़े जवान ने बताया कि पूरा गांव इस झील पर टिका है।

जिस दिन ये झील सूखेगी उस दिन से ही लोग यहाँ से पलायन करना चालू कर देंगे। झील के आसपास और बेहद नजदीक बने घर को देख पहले तो आश्चर्य हुआ।

पर बाद में समझ आया कि झील सूखने का कारण। बस का हॉर्न बजा और ये संकेत मिला अब निकलने का वक्त हो चला है।

जिंदगी ‘खाब’ है

मानवों को कितना भी प्राकृतिक संसाधन मुहैया करा दो वो काम ही लगेगा जब तक उसे सही तरीके से इस्तेमाल करने का सलीका नहीं आ जाता।

जगह जगह सड़क बनने का कार्य जारी है। कुछ आधा एक घंटा लगेगा की हम खाब पहुंच जाएंगे।

घाटी में ऐसी बंजारन ज़मीन को देख कर यही लग रहा है जैसे अभी कोई युद्ध लड़ा जाना है इस मैदान पर। जैसा फिल्मों में दृश्य दिखाते हैं बिल्कुल वैसा ही।

वैसे ऐतिहासिक तौर पर यहाँ युद्ध लड़े भी जा चुके हैं। जब अंग्रेज़ और अफगानियों में तनातनी का माहौल हुआ करता था। तब अफगानी लद्दाख के रास्ते यहाँ आने की कोशिश में रहते थे।

लाखों के सेना को भी अगर यहाँ खड़ा करदे तो भी शायद जगह बच जाएगी और सैनिकों के लिए। शायद ही इतना बड़ा सपाट मैदान देखा हो इतनी ऊंचाई से।

वैसे अब शहरीकरण के बाद मैदान बचे ही कहाँ हैं। अरबों की तादाद में हम भारतीय बरगद के पेड़ कि तरह फैलते ही जा रहे हैं। अनियंत्रित!

खाब से चाइना बॉर्डर ज्यादा दूर नहीं है। बस कुछ किमी के बाद चाइना के द्वारा कब्जाई जमीन पर आप पहुंच सकते हैं। कितना बेहतर होता यदि भारत 1962 का युद्ध जीत लेता।

या युद्ध ही ना होता। तो ना जाने कहाँ कहाँ बिना चाइना का विसा लिए ही घूम लेते। खाब का पुल पार करने के बाद कुछ एक ट्रेवलर x गाडियां दिख रही हैं।

जो रेक्कोंग पियो की ओर रुखसत हो रही हैं इस बस की तरह। आगे बढ़ी है थी बस की तभी एक मोटरसाइकिल का बड़ा दल सायं सांय करते हुए निकला।

बस में जो से रहे थे वो भी जाग उठे। की आखिर ये हुआ क्या? एक पल के लिए तो आश्चर्य मैं भी हुआ कि आखिर इतना बड़ा दल आया किधर से।

bikers की टोली

उनके निकल जाने के बाद पूरी बस में ऐसा धूल का गुब्बार भर गया जो काफी देर तक बना रहा। रास्ते भर जवानों का चढ़ने उतरने का सिलसिला जारी रहा।

जाहिर है इनमें से कई अपने घर को जा रहे हैं। उनकी साजो सज्जा देख कर ही अनुमान लगाया जा सकता है।

बैठे बैठे कमर टूट गई है। जाने कब स्पैलो आएगा और कब अंगड़ाई लेके थोड़ा शरीर को तसल्ली दूंगा।

वाकई मे ये लंबे लंबे सफर शारीरिक और मानसिक रूप से दोनों थका देने वाले होते हैं। कहीं को जाना तो अच्छा लगता है पर कहीं से कहीं को वापसी करना बहुत खराब।

आज भी कुछ ऐसा ही महसूस कर रहा हूँ। मानो दूसरा घर छोड़ कर कहीं और को निकल पड़ा हूँ। सुबह सुबह सड़क पर आईटीबीपी के जवानों की परेड देखने को मिल रही है।

जगह की कमी होने के कारण यहाँ शायद सड़क पर ही सारी गतिविधियां होती है। अब पहाड़ों मे तो ये मुमकिन नहीं।

बीच रस्ते में गपशप

गर्मी ऐसी पड़ने लगी है कि पसीना छूटा जा रहा है मेरा। रिक्कोंग पियो से काजा को बस जाते हुए देखीं जा सकती हैं। पर यहाँ पहाड़ियों मे तो चालकों को मौका चाहिए बस रोक कर कुछ देर बाते करने का।

कभी कभी ये ज्यादा वक्त खा जाते हैं। एक दो बार तो मैं भी सोच में पड़ गया आखिर ऐसी क्या बातें करते होंगे ये लोग।

हद तो तब हो जाती है जब ये भूल जाते हैं कि ये यात्रियों से भरी बस लेके पहाड़ी सड़क पर खड़े हैं। जबतक पीछे से कोई दूसरा गाड़ी वाला हॉर्न बजा कर इनको याद ना दिला दे तब तक।

जैसे दो औरतें बीच डिवाइडर पर खड़े हो कर गपशप करती हैं वैसे ये भी खो जाते है किसी और ही दुनिया में।

चलते चलते कब सपेलो आ गए पता ही नहीं चला। अब यहाँ से रिककोंग पियो दूर नहीं। फिर वहाँ से चिटकुल। सब कुछ ठीक रहा तो शायद रात होने से पहले चिटकुल पहुंच जाऊंगा।

बस का रुकना हुआ और सवारियों का भड़भड़ा के उतारना। बैठे बैठे शरीर में झनझनाहट होने लगी थी। ऊपर से पानी भी खत्म था।

बस का रुकना मानो वरदान साबित होने वाला है। शरीर में इतना आलस भर चुका है कि पूरी बस खाली हो जाने के बाद भी उतरने को जी नहीं चाह रहा।

खाली बोतल ले कर उतर ही गया। बोतल रिफिल वाला सिस्टम कहीं नजर नहीं आ रहा। बेहतर यही रहेगा नई खरीद ली जाए। खिलखिलाती धूप अब अच्छी लग रही है।

बैठे बैठे कमर टेढ़ी हो चुकी है। लंबे सफर में यही हाल होता है। ड्राइवर और कंडक्टर तो शायद बगल के ढाबे में निकल गए हैं पेट पूजा के लिए।

मैंने फल खाना ज्यादा लाभकारी समझा। कहते हैं सुबह केला खाने से पेट स्वस्थ रहता है। पेट के खातिर आधा दर्जन बहुत है।

उधर ड्राइवर साहब आज कुछ जल्दी ही खा पी कर बस में सवार हो गए। दो चार बार भोंपू बजा कर सबको बुला लिया। जब तक सब आते तब तक बस से उतर कर भाग गए लघुशंका करने।

आखिरी पड़ाव रेकोंग पियो के लिए

इधर बस भरते ही चल पड़ी दोबारा से अपनी मंज़िल की ओर। ऊंची ऊंची पहाड़ियों पर खुदाई का काम चालू है। हम मानव जितना हो सकता है उतना कुदरत से लेने का सोचते हैं और जब देने की बारी आती है तो कदम पीछे हट जाते हैं।

दिन के डेढ़ बज रहे हैं। घुमावदार रास्ते से होकर बस रेकोग पियो की ओर बढ रही है। यहाँ खामियाजा भुगतना पड़ा जब सामने से आती हुई एक बस जो चितकुल को रवाना हो रही है, उसमे चढ़ने में आलस दिखा दिया।

कंडक्टर बाबू ने पूछा भी पर मेरे से ज्यादा अजय के ऊपर इस कदर आलस छाया हुआ है कि शरीर के आराम को ज्यादा मेहेत्व देना जरूरी समझा बजाय बस पकड़ने के।

आसपास बैठी सवारियों से जब पूछा तो मालूम पड़ा चितकुल तो नहीं मगर चितकुल की ओर जाने वाली बस ढाई बजे तक मिल जाएगी।

खैर रेकोंग पियो बस समय से पहुंच गई। कुछ देर का इंतजार और अगली बस से चितकुल। बस अड्डे के उसी कमरे में जा पहुंचा जिसको कब्ज़ा लिया था जब पहली दफा रेकोंग पियो आया था।

अन्दर घुसता हूँ तो देखता हूँ कि वही अंकल आंटी बैठे मिले जिन्होंने कल रात में हमें ताबो में कमरा दिलवाया था और भोर में साथ में आने वालीं थी।

पर वो हमसे पहले कैसे आ धमकीं? उन्हे देख कर इसी बात का आश्चर्य हो रहा है। आखिरकार उनसे पूछ ही डाला तब उन्होंने बताया वो भोर के साढ़े चार बजे ही बस अड्डे पहुंच गईं थीं पर बस तो खड़ी की खड़ी रह गई।

वहाँ से उन्होंने वेन कर ली। किराया उतना ही पड़ा और समय भी कम लगा। शायद अगर आज सुबह मैं भी साढ़े चार बजे पहुंच जाता तो इन्हीं के साथ आता।

बातों बातों में उन्होंने भी पिछली रात का ठिकाना पूछ ही लिया। जब बताया उन्हीं की बताई हुई जगह पर रुका था तब और भी ज्यादा संतुष्ट दिखीं।

हालांकि उनके द्वारा बताए हुए घर में रुकने से पहले मैंने और भी घरों को तलाशा था। पर यही सबसे सहूलियत भरा और किफायती लगा। मगर ये बात आंटी को नहीं बताई। जरूरी भी नहीं है। इतनी देर में बस आ गई।

करछम के रस्ते चितकुल

आंटी अंकल से विदा ले कर निकल पड़ा चितकुल की ओर।

चितकुल तो नहीं पर उसी रास्ते से गुजरते हुए जाएगी ये बस। क्यूंकि चितकुल को जाने वाली आखिरी बस तो निकल चुकी है। अंदाजा लग पा रहा है कि बिना बस के सफर थोड़ा कठिन होने वाला है।

टिकट कटा करचम तक का। बाकी वहाँ से कैसे जाना होगा वो तो करचम पर ही पहुंच कर पता चलेगा। आधी खाली आधी भरी बस निकल पड़ी। और महेज आधे घंटे के भीतर मैं आ पहुंचा करचम।

बस रूकी और बेगानों की तरह उतर गया। उतरते ही एक आधे जीप वालों ने घेर लिया। पर मैं बैग ले कर दूसरी तरफ आ खड़ा हुआ। ऐसे दिखाने लगा जैसे चितकुल जाना ही नहीं है।

भारत रोड आर्गेनाइजेशन द्वारा निर्मित सड़क

ये जीप वाले दिमाग की बत्ती बुझा देते हैं जब दिमाग की सबसे अधिक उपयोगिता होती है। इधर चाय की दुकान पर पता किया तो मालूम पड़ा अभी तो कोई भी बस नहीं मिलेगी चितकुल के लिए।

बेहतर होगा अगर आप संगला निकल जाएं और वहाँ से चितकुल। यही करना सही लगा। अब यहाँ सूरज भी ढलने को है। सांगला तक के लिए जीप से जाना ज्यादा ठीक लगा।

इस जीप से तो नहीं बल्कि दूसरी जीप आने का इंतजार किया। यहाँ भी सतलुज नदी को पार करने के बाद दो रास्ते हैं। एक तो दाहिने हाथ पर और दूसरा बाएं।

मुझे लगा गाड़ी दाएं हाँथ वाले रास्ते पर निकलेगी पर हुआ उल्टा। गाड़ी पूरी खचाखच भरी है। कुछ लोग काम कर के अपने घर को लौट रहे हैं।

कुछ मिस्त्री मजदूर भी हैं। सड़क तो इतनी उबड़ खाबड़ है कि दिमाग खुल जाए। इस सड़क की खस्ता हालत को देख आखिर पूछ ही लिया कि सांगला तक कब तक पहुंचेंगे।

अंपायर की तरह उंगली ऊपर उठाते हुए एक घंटे का इशारा किया। इस एक घंटे में तो बेहतरीन मालिश हो जाएगी शरीर की।

जबतक गाड़ी चली सवारियां सिर्फ उतरती ही गई। शायद ही कोई बीच रास्ते में सांगला तक के लिए चढ़ा हो। सतलुज नदी के समांतर काफी दूर तक रास्ता गया है। खैर उछलते कूदते पहुंच ही गया सांगला।

₹5० किराया थमाया और बस अड्डे से थोड़ा दूरी पर बने इंतजार घर में आ गया। अब निश्चिंत हो चला हूँ की बस तो कुछ देर में आ ही जायेगी।

सांगला में जद्दोजेहाद

आसपास बनी दुकानों में भी बस की सारिणी पूछने पर यही पता चला। की कुछ ही देर में बस आती होगी। पूरे आश्वाशन के बाद लगा कुछ पेट पूजा हो जाए।

एक माले ऊपर बने समोसे की दुकान से चाय समोसा मंगवा लिया। मौसम अब बिगड़ने लगा है। बादल बेवजह गरजने लगे हैं।

पश्चिम की ओर से घने बादलों को देख ऐसा ही प्रतीत हो रहा है मानो यहीं बादल फट जाएगा। हल्की बूंदबांदी से तेज़ बारिश होने लगी है।

संगळा का सुहाना मौसम

चाय कब सुड़क गया होश ही नहीं है। जाने की उम्मीद कम होती दिख रही है। सड़कों से भीड़ भी कम हो गई है। बस तो मानो आने का नाम ही नहीं ले रही।

गश्त पर आईं पुलिस की गाड़ी से पूछा तो उनको कोई इल्म नहीं है कि कब आयेगी बस। उल्टा बस अड्डे पर जा कर पता करने को ही बोल पड़े।

सोचा क्यों ना इन्हीं से पूछ लूं कि क्या ये हमें छोड़ सकते हैं चितकुल तक। जवाब में मुस्कराहट मिली और बोले अरे नहीं सिर। शायद यूपी मे होते तो पुलिस वाले छोड़ भी आते।

हार कर मुझे पैदल बस अड्डे की ओर जाना पड़ रहा है। सिर्फ ये पूछने की बस आयेगी भी या नहीं। हल्की बूंदबांदी में भीगते हुए बस अड्डे पहुंचा तो सबका यही कहना है इंतजार करते रहिए बस जरूर आयेगी।

इंतजार करते करते घंटाभर बीत गया है। पर बस का कोई ठिकाना नहीं है। उधर कोई भी गाड़ी चितकुल की ओर जाती हुई दिखती तो पूछ ही लेता।

“हमें ले चलोगे क्या भैया” जवाब में ना ही सुनने को मिलता। एक दो बार तो एक ही गाड़ी वाले से दो मर्तबा पूछ डाला चलने को।

भीगते हुए इंतजार करने वाली जगह पर आ गया। अंधेरा घना हो चुका है। एक कार वाला आया जिससे लगभग सौदा होता हुआ दिख रहा है।

मगर थोड़े ज्यादा ही दाम बता रहा है। खैर वो बस अड्डे की और से होते हुए वापस सांगला की तरफ चला गया।

अब मुश्किल लग रहा है कि आज चितकुल पहुंच पाऊंगा। बेहतर यही होगा कि यहीं किसी होटल में कमरा ले लिया जाए और सुबह निकला जाए।

अगर ऐसा होता है तो कल बहुत भागम भाग हो जाएगी। सामने दिख रहे होटल में कमरे खाली तो नजर आ ही रहे हैं। सबसे पहले यहीं पूछा जाए क्या रेट है?

दूसरी योजना

भीगते हुए होटल पहुंचा और बेवजह जोरदार स्वागत हुआ। बैग और अजय वहीं इंतजार घर में हैं। मेरी शकल देख कर शायद होटल के मलिक को लगा मालदार पार्टी आयी है।

कमरा खाली होने की बात कही और ऊपर वाले माले में कमरे देखने आ पहुंचा। होटल के मलिक कमरे की चाभी लाना ही भूल गए। विचित्र आदमी है ये तो। उल्टा हमसे ही बोल पड़ा क्या आप चाभी ला सकते हैं?

शायद मैं नीचे उतर आता तो वापस कमरा देखने भी ना आता कि इससे पहले टोपा लगाए एक लड़का हाँथ में चाभी लेके आए गया।

कमरा दिखाया गया। और जब रेट की बात हुई तो मुझे कुछ ज्यादा ही लगा। जब बहुत मान मनौव्वल के बाद भी कमरा लेने की इच्छा जाहिर नहीं हुई।

तब मलिक ने कमरा आधे दाम में देने को तैयार हो गया। अजब खेल है। इतनी ज्यादा जरूरत भी नहीं है और इतने सस्ते में कमरा मिलने को तैयार है।

खैर अगर आज नहीं निकल पाया तो यहीं रुक जाऊंगा। सारे संसाधन निकट ही हैं। वापस से इंतजार घर में जबतक आता तब तक देखा की नेल्सन और गुलशन अपनी गाड़ी में लादे बाहर खड़े मिल गए।

बातचीत हुई तो पता लगा ये दोनों आज यहीं रुकेंगे। काश मेरे पास भी गाड़ी होती इतनी लफ्फदर ही ना होती। सामने से अजय भी दौड़ता हुआ आ गया मिलने।

कुछ देर की मुलाकात में ही खुले आसमान के नीचे ऐसा भीगा की ठंड लगने लगी है। लग रहा है यहीं बर्फ बन कर जम ना जाऊं। अपने अपने रास्ते निकल मैं आ गया वापस इंतजार घर में।

मूसलाधार बारिश में डरा देने वाला सफर

जहां एक बार फिर वही गाड़ी वाला आया जो अपने दाम पर जाने को अडा था।

कहने लगा ये तो सबसे न्यूनतम दाम बता रहा हूँ आपको। कोई और 8०० से नीचे नहीं सुनेगा। खैर समय की बचत और स्तिथि को देखते हुए साथ चलने की हामी भर ही दी। ₹250 बुरे नहीं हैं इतनी रात में।

ऊपर से ये बारिश और बाध्य कर रही है आगे बढ़ने को। पीछे वाली सीट पर दोनों बैग लाद दिए और खुद भी यहीं बैठ गया। अंतिम समय में ड्राइवर साहब को कुछ लेने का होश आया।

गाड़ी से बाहर उतर कर निकल गए लेने और भाग कर आ भी गए। गाड़ी स्टार्ट हुई और सांगला को अलविदा। बड़ा संगर्ष कराया इस जगह ने।

एक समय तो ये लगने लगा था कि शायद इसी बस अड्डे के इंतजार घर ले नीचे पड़ी बेंच पर सोना पड़ेगा। साथ मे एक और अनजान साहब बैठें हैं। जो कुछ दूरी पर उतर जाएंगे।

कार जैसे जैसे आगे बढ़ रही है जंगली इलाका आता जा रहा है। घोर अंधेरे में ऐसी जोरदार बारिश और बादल की गर्जना हो रही है। की मानो या तो बादल यहीं फट पड़ेगा या सिर पर कोई पहाड़ गिर पड़ेगा।

कुछ दूरी के बाद वो अनजान दोस्त बीच रास्ते में उतर गया और अजय आगे जा बैठा। बारिश कम होने को बजाय तेज़ और तेज़ हो गई। ड्राइवर को कुछ भी ठीक से दिखाई नहीं दे रहा है।

शीशे में लगे वायपर अपनी फुल स्पीड में भी फेल नजर आ रहे हैं कुदरत के केहर के आगे। गाड़ी में हीटर चलने से थोड़ा शरीर तो सुख गया है और भयानक रास्ता देख मन भी कांप गया है।

यही होगा या तो चितकुल पहुंच जाऊंगा सही सलामत या खबर छपेगी अखबार में। ऐसी भीषण बारिश का समना वो भी गाड़ी के अंदर से इन पहाड़ियों में।

सांगला से चितकुल जाते वक़्त का रास्ता

पैदल यात्री के तो जान के लाले पड़ जाएं ऐसे रास्ते में चलने से। ड्राइवर भी सलामती की दुआ करते हुए ही गाड़ी चला रहा है। गनीमत है रही है अबतक की गाड़ी नहीं बंद हुई कहीं भी अबतक।

अगर ऐसा होता तो और बड़ी मुसीबत क्या होती! हल्की बारिश कम होने लगी है अब। सलामती से पहुंचने की उम्मीद भी जगी है।

कुछ आधे घंटे में चितकुल में आ पहुंचा। ड्राइवर ने गाड़ी किनारे लगाई और पहुंचने के संकेत दिए। ये जनाब जितनी सरलता से गाड़ी चला कर लाएं हैं वो कर पाना आम आदमी या किसी शहरी के लिए उतने ही गुना कठिन होगा।

उतरा और बैग निकाल कर पैसे थमा दिए। अब पहुंचने की समस्या से तो निजात मिल चुका है। पर रुकने की समस्या आने वाली है।

अंधेरे में बाएं हाँथ पर कुछ रेस्त्रां दिख रहे हैं मगर इंतजामात देख कर ही इनके दाम का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

रात के आठ बज रहे हैं। सामने चौराहे पर एक दुकान दिख रही है। जिसका शटर लगभग गिरने ही वाला है। रहने का तो पता नहीं खाने का कुछ प्रबंध जरूर हो सकता है यहाँ से।

न कोई घर न कोई ठिकाना

भागते हुए आ पहुंचा इससे पहले पूरा शटर गिरता। कुछ बिस्कुट और नमकीन के सिवाय कुछ नहीं है। जो दिख रहा है उसी से काम चल जाएगा।

जाते जाते ये भी पूछ ही लिया कि यहाँ कहाँ होमस्टे मिलेगा। अंधेरे की तरफ इशारा करते हुए बोले सामने वाले घर में पूछ लें।

जिस ओर इशारा किया वहाँ आ तो गया मगर यहाँ खेत के सिवाय कुछ नहीं। बाएं तरह एक बहुत बड़ा सा लकड़ी का घर है।

मूसलाधार बारिश फिर से होने लगी। पर पता नहीं ये अपने घर में रुकने देंगे या नहीं। फिर भी पूछने में क्या जाता है। अब इस बारिश में पूरा भीग जाऊं कहीं ठीकाना ढूंढना पड़ेगा।

लकड़ी के बड़े से घर में पूछने को गया तो बाहर खड़ी आंटी जी भड़क गईं। ऊपर से मुस्तैद हो गईं कि यहाँ ना ये लड़के रुक जाएं।

अंधेरे में एक तो इनकी शकल भी ठीक से नहीं दिखाई पड़ रही ऊपर से अकडू स्वभाव। शुक्र है ये खेत खुला है। यहीं तंबू गाड़ कर रात गुजारी जा सकती है।

खेत के ठीक बगल के घर से रोशनी तो आ मगर पता नहीं ये खेत किसका हो? मूसलाधार बारिश के बीच एक अंतिम आस में परमिशन तो ले ही लूं।

पता चला आधी रात में आ जाए कोई जगाने और पहलवानी दिखाने। बगल वाले घर में खटकाया तो एक आंटी जी निकलीं। उनसे पूछना है हुआ की उन्होंने अपने यहाँ पनाह दे दी।

आज तो लगा जान बच गई वरना पता नहीं कैसे और कहाँ रात गुजरती?

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