विश्व शांति स्तूप राजगीर

बिहार | भारत | राजगीर

मखमली सुबह

सबसे पहले मैं ही उठा। साथी घुमक्कड तो घोड़े बेंच कर सो रहा है। मेरी कल्पना से परे राजगीर एक छोटा सा कस्बा है। सुबह का नज़ारा ही अलग है।

सड़क पर स्कूली बच्चे कुछ दौड़ते भागते, तो कुछ रिक्शे में सवार, कुछ अपने स्कूल नन्हे क़दमों से अपनी मंज़िल की ओर बढ़ रहे हैं। उधर चाय की टपरी में कुछ बूढ़े बुगुर्ज सरकार की नाकामियों पर चर्चा में व्यस्त हैं।

इधर होटल की खिड़की से अंगड़ाई लेते हुए यह सारे नजारे एक टूक देख रहा हूँ। रात में जितनी बिजली उपकरण चार्जिंग पर लगाए हुए थे सब एक एक कर के बैग में डालता गया। 

साथी घुमक्कड की गहरी निद्रा पानी की छींटों से भंग की। पेट सफा करने की बारी अब साथी घुमक्कड की है। एक एक कर सारा सामान बैग में समेटा कर भरने लगा।

जरूरी कपड़े निकाल कर नहाने निकल गया। एक तो स्नान दूसरा खान पान बहुत अहम हो जाता है रोजमर्रा की घुमक्कड़ी में। दोनो में से एक छूटा तो दिन बुरा भी जा सकता है।

साथी घुमक्कड के नहाने के बाद हम कमरे में ताल डाल कर कमरा खाली कर निकल से। नौ बजे तक होटल खाली तो कर दिया परन्तु इतना बड़ा बैग लेके घूमना संभव नहीं दिख रहा।

पहाड़ी इलाके में शांति स्तूप देखने जाना है। अगर बैग लेके चढ़ूंगा तो एवरेस्ट की चढ़ाई चढ़ने जैसा हो जाएगा। होटल मालिक से बात करके बैग को होटल के रिसेप्शन काउंटर के पास रखवा दिया। जहाँ अंधेरे में पहले से ही दो मुस्टंडे सो रहे हैं।

कोई भी बैग रखवाने से पहले पैसे, कैमरा इत्यादि ना हो इस बात की पुष्टि कर लेता है जो की आम बात है। इस तरह की चीजें निकाल कर छोटे बैग में डाल ली। जो जरूरत भी पड़ेंगी रास्ते भर। छोटा बैग छोटे मोटे सामान के लिए आवश्यक है।

होटल से निकल कर उसी ढाबे पर आ रुका जहाँ कल रात को चाय का स्वाद लिया था। दो चाय का ऑर्डर दिया उतनी जल्दी चाय भी प्रस्तुत हो गई। कुल गणित लगाते हुए ये चर्चा है की स्तूप के अलावा क्या अजातशत्रु जेल भी जाया जा सकता है?

यात्रा

सुबह की चाय के बाद निमल चौराहे से टेंपो में बैठ के निकल पड़ा शांति स्तूप के लिए जो यहाँ से तीन किमी दूर है। टेम्पो वाले ने समय से स्तूप के बड़े से गेट पर उतार दिया। लेकिन अब बाकी का रास्ता पैदल यात्रा करने का है। उसके बाद पहाड़ी पर चढ़ाई चढ़ने की भी।

विश्व शांति स्तूप पर आँख मीचे वानर

सूर्य देवता भी अपने जलवे दिखा रहे हैं। सर पर कभी अंगौछा तो कभी बैग से खुद को धूप से बचाने की कोशिश कर रहा हूँ। कुछ स्कूली बच्चे घोड़ागाड़ी से जा रहे है तो कुछ पैदल। तपती धूप में तकरीबन एक किमी चलने के बाद चढ़ाई मार्ग आ चुका है।

चूंकि कुछ लोग उड़न खटोला से भी जाने के इच्छुक दिख रहे हैं। लेकिन अफसोस उड़न खटोला की मरम्मत का कार्य पिछले कुछ दिनों से चल रहा है। कब तक चलेगा यह भी सुनिश्चित नहीं है। इससे स्कूली बच्चे ज्यादा हताश और निराश हैं।

मैं पैदल चलने वाला इंसान, इन खटोला में भरोसा नहीं करता। निकल पड़ा जैसा की मैं यही करता अगर उड़ान खटोला चालू भी होता तो। क्योंकि अभी बहुत लंबा सफर तय करना है उछल कूद भी जरूरी है, आंतरिक बल भी बढ़ेगा।

चढ़ाई कई जगह आसान भी है और उस जगह दुर्गम है जहाँ से जंगल से गुजरा जा रहा है। या यूं कहें कि शोरकुट रास्ता खतरनाक भी है पथरीला भी। वहीं सड़क वाला मार्ग लंबा है पर सुरक्षित है।

स्कूली बच्चे भी हल्ला मचाते हुए ऊपर की ओर भाग रहे हैं। दमखम जोश में ये बच्चे थक हार कर बैठ भी जा रहे हैं। कई तो पीछे रास्ते में ही छूट गए। इनके साथ आए शिक्षकों का तो कोई अता पता नहीं है।

शायद कुछ नीचे ही रुक गए हैं ऊपर ना चढ़ पाने के बहाने से। खासतौर पर औरतें। स्कूली छात्राएं भी जोश से लबरेज ठिठोली करती हुई आगे बढ़ रही हैं। भूंखे प्यासे बच्चे सड़क किनारे दुकान लगाए सेवकों को आमदनी भी कराते जा रहे हैं।

मुझे याद है स्कूली दिनों में हम भी साल में एक बार किसी बाहरी दुनिया में जाते थे। कभी सिनेमा हाल कभी किसी फैक्ट्री या वाटर पार्क।

विश्व शांति स्तूप

चढ़ाई चढ़ते चढ़ते एक घंटे के भीतर स्तूप तक आ पहुंचा। स्तूप के दाखिल होने के लिए दरवाजा तो है पर कोई गेट नहीं है। ये स्तूप इसी का प्रतीक है। यहाँ हर वर्ग के आदमी का स्वागत है।

स्तूप तक पहुंचने के लिए सीढ़ियां है। स्तूप के पास भी कुछ लोग पहले से ही मौजूद हैं। साथ ही हैं यहाँ बंदर जो अपने खाने पीने में मस्त हैं। आम भाषा में इन्हे लंगूर कह कर पुकारते हैं। वानर और मानव दोनो की अच्छी खासी भीड़ है।

स्तूप से आगे चल कर खाई से पहले बनी एक इमारत के नजदीक आया। इमारत में किसी को भी जाने की इजाजत नहीं है। जो गलती से जा भी रहे हैं उन्हें उल्टा रास्ता दिखा कर लौटा दिया जा रहा है।

यहाँ झाड़ झंगड़ के आगे सिर्फ खाई है। पहाड़ के निचले भाग में बने पेड़ के तने पर बंदर खुद उछल कूद रहे हैं।बड़े बड़े पहाड़ भी। यहाँ से राजगीर की एक अलग ही छवि दिखाई पड़ती है, चारों ओर पहाड़, हरियाली। वाह क्या नज़ारा है! मन तो कर रहा है यहीं बैठा रहूँ।

विश्व शांति स्तूप राजगीर से कुछ इस तरह का नज़ारा दिखा

हिरोशिमा और नागासाकी परमाणु हमले के बाद जापान ने कुल अस्सी स्तूप बनवाए हैं। इस तरह के सात शान्ति स्तूप भारत में भी बनवाए हैं। स्कूली बच्चे हुड़दंग और हल्ला करते हुए अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रहे हैं।

वापस स्तूप की तरफ आने लगा जहाँ सफाई कर्मचारी पतझड़ को एक किनारे लगा रहा है। यहाँ लंगूर इतनी ज्यादा संख्या में हैं जिससे मानुष असेहेज महसूस करने लगता है कभी कभार।

अचानक दो मरकटो में भीषण मारपीट होने लगी, ये देख सबसे पहले वहाँ का सफाई कर्मी अपनी झाड़ू लेके भगा। लंगूर अपनी पूछ का एक दूसरे के ऊपर बेल्ट कि तरह इस्तेमाल कर रहे हैं।

दोनों ने एक दूसरे की जमकर सुताई कि। अब बात परिवार की आ गई है, दो वानर की ये लड़ाई दो गुटों में परिवर्तित होने को ही थी तभी वहाँ प्रशाशन हरकत में आ गया। डंडा लेें कर खदेड़ा गया।

शांति स्टूपा में फिर से शांति बहाल हुई। जैसे ये शांति स्तूप विश्व युद्ध के बाद जापान द्वारा निर्मित करवाए गए हैं ठीक वैसे। मौसम भी मिजाज दिखा रहा है। हमने तय किया की बारी बारी से स्तूप के पास जायेंगे।

साथी घुमक्कड से शुरुआत करते हुए। उसके जूतों की तकवाही मैं कर रहा हूँ। उसके आने के बाद मैं जाऊंगा। इधर रेलिंग के ऊपर एक बंदर का बच्चा सोते हुए इतना प्यारा लग रहा है की मैंने उसकी तस्वीर कैमरे में कैद कर ली।

स्तूप की सीढ़ियों पर दो शेरों के स्तंभ भी हैं। साथी घुमक्कड के आने के बाद मैं जूते निकाल कर चढ़ गया ऊपर। तेज धूप के कारण फर्श पर पांव तक रखना दुश्वार हो रहा है।

स्तूप के पास कुछ चांद ही लोग हैं। पास में जल रही हैं अगरबत्ती। शायद स्तूप में किसी की मंजूषा रखी हो शांति बहाली के लिए। जेब ढीली करने के लिए दानपात्र की पेटी भी मौजूद है।

वैशाली के स्तूप जैसा यहाँ भगवान बुद्ध लेटने, बैठे या खड़े होने जैसी अवस्था में नहीं है। बल्कि ध्यान मुद्रा में हैं। जो भिन्न हैं।

स्तूप के पास घूमने के बाद नीचे उतर कर कुछ तस्वीरें लेने लगा। लंगूर भी अब सुस्त पड़ गए हैं और मैं भी।

कच्चे रास्ते

घंटा भर स्तूप में बिताने के बाद बाहर निकल आया। यहाँ बाजार लगी है जहाँ स्कूली बच्चे खरीददारी कर रहे हैं। दाएं हांथ पर चल रहे खटोले की मरम्मत को देखने आया। विकास पटरी पर है पर इस विकास में गति की कमी है।

सड़क वाले मार्ग से ना जा कर पहाड़ी के कच्चे रास्ते से नीचे उतरने लगा। जिसमे काफी समय बचेगा।

बीच सफर में एक अन्य रास्ते पर चल पड़ा जहाँ पर कुछ लोगों को स्तूप से, खड़े देखा था। कच्ची मिट्टी पर आगे एक स्थानीय मंदिर बना है। इधर से पीछे जाने के भी दो रास्ते हैं।

पहला सीधा सीढ़ी के रास्ते दूसरा गुफा के अंदर से होते हुए जो छोटा ही है। सीढी के रास्ते को चुनते हुए आगे बड़ा। पर एक दो बड़े पत्थरों के सिवाय कुछ भी नहीं है। हा एक तरह का दार्शनिक केंद्र जरूर है जहाँ से कमाल का नजारा दिख रहा है। ईंट से कुछ ऊंची दीवारें हैं जहाँ पर पूजा पाठ होती होगी और कोई यहाँ पर फूल माला चढ़ा गया है।

भीषण गर्मी में ज्यादा देर रुका भी नहीं जा रहा है। गुफा के अगले रास्ते से तो नहीं पर पिछले रास्ते का निरीक्षण कर लिया है। सीढियां बहुत सक्रिली और ऊंच नीच हैं। जैसे यहाँ कोई ऊंच नीच ही खेलता हो।

मुड़ कर वापस चल पड़ा नीचे के रास्ते। शायद धूप न होती तो कुछ समय यहाँ जरूर गुजरता। पत्थर तो ऐसा लग रहा था की वर्षों पहले पहाड़ी से गिरे होंगे जो अभी तक यहीं टिके हैं।

कुशलता से नीचे आते ही नजर पड़ी बाजार पर को सिर्फ खाने की है। यहाँ भीड़ भी है जिसमें स्कूली छात्र और उनके अध्यापक ज्यादा हैं। मन तो हो रहा है पेट पूजा का पर सोचा बोधगया पहुंच कर करा जाएगा।

दार्शनिक केंद्र

सोने की गुफा

कुछ देेर तो प्रतीक्षा की किसी वाहन या घोड़ागाड़ी से लदकर निकलने की। जब काफी देर ना मिला तो मार्ग पर पैदल ही चलना शुरू कर दिया। सर पर अंगौछे से खुद को तपती धूप से बचाते हुए। कुछ आगे चलने पर एक घोड़ागाड़ी नजर आई जो पीछे से ही चली आ रही थी।

मैं आगे आगे चल रहा हूँ और साथी घुमक्कड पीछे पीछे। जिसमे बैठ कर वो आया और रुकने पर मैं लद कर निमल की और बढ़ा। वापसी में थकान इस कदर हो गई है की पैदल यात्रा करना भारी पड़ सकता है।

वापस आते हुए मूूह में मसाला भरे घोड़ा चालक ने बताया कि इस स्तूप के आलावा राजगीर में सोनभंडार गुफा भी है। देश में ऐसे कई मंदिर और गुफाएं हैं जिनमें सोना छिपे होने की संभावना है।

घोड़ागाड़ी में बैठी एक सवारी चौंकाने वाले अंदाज़ में बोली कि इस गुफा में अपार सोना छिपा हुआ है, लेकिन इस गुफा में जाने का रास्ता किसी को नहीं मालूम। इसीलिए तो नहीं मालूम जब वहाँ कुछ है ही नहीं ऐसा मैंने सोचा।

जिस हक से ये भाईसाहब बता रहे हैं उससे लग नहीं रहा ये सोने वाली गुफा में जाने देंगे। बोले गुुुफा की बनावट ही लाखों टन सोने के खजाने की सुरक्षा करती है। ये महाशय इस धोखे में हैं की कहीं मेरे हांथ ना लग जाए ये सोना।

इन गुफाओं में छिपे खजाने तक जाने का रास्ता एक बड़े प्राचीन पत्थर के पीछे से होकर जाता है। एक बूढ़ी काकी बोली कि खजाने तक पहुंचने का रास्ता वैभरगिरी पर्वत सागर से होकर सप्तपर्णी गुफाओं तक जाता है। जो सोन भंडार गुफा के दूसरी तरफ तक पहुंचता है।

इस पर वो पहली बात काटते हुए वो पहली सवारी बोली नहीं भैया वहाँ से कौनो रास्ता नाही है। का करोगे जा कर। कुछ का मानना है कि यह खजाना पूर्व मगध सम्राट जरासंध का है तो कुछ का मानना है कि यह खजाना मौर्य शासक बिम्बिसार का था। अमूमन अब यहाँ की जनता पिकनिक मनाने जाती है।

घूमने के लिए बिम्बिसार कारागृह भी है। जो उतना विशेष नहीं है। बिम्बिसार कारागृह जिसमे राजा बिम्बिसार को सत्ता की लालच के भूंखे उन्हीं के पुत्र अजातशत्रु द्वारा आजीवन कारावास दे दिया गया था। कारागृह दो पर्वत महावीर और बुद्ध के पास स्थित है।

खैर इनकी चककलस सुन के मुझे लगा कहीं नहीं जाना चाहिए और घोड़ागाड़ी से निमल जाने से पहले ही उतर गया।

गया को गया

उतरकर निमल चौराहे तक जाने के लिए वाहन देख रहा था और साथ ही इस सोने की गुफा में भी। क्या पता सोना मेरे ही हांथ लग जाए।

फुटपाथ पर एक किनारे से रेस्त्रां हैं। भूख भी जोरों पर है। ऐसे ही एक रेस्तरां में पेट में लगी भूख की आग ठंडी करने आ गया। जरा सी जगह में एक किनारे ही हम बैठ गए। गर्मी भीषण है। यहाँ भर पेट स्वादिष्ट खाने का आनंद लिया।

इस बार घोड़ागाड़ी ना पकड़ते हुए टेंपो में सवार हुआ क्योंकि अब जल्दी पहुंचना है। ठीक दो बजे तक निमल चौराहे पर पहुंचा। कान खड़े हो गए जब आवाज पड़ी गया जाने की।

गया जाने के लिए एक बस निकलने ही वाली है। जिसमे सीटें तो पर्याप्त उपलब्ध हैं पर ये फौरन रवाना होनी है। मैंने कंडक्टर बाबू को पांच मिनट रुकने को कहा। फटाफट होटल पहुंच कर इस अंधेरी नगरी से बैग उठाया और बस की ओर भागा।

यहाँ कंडक्टर ने अपनी द्वारा दी गई जबान रखी और अभी भी रुका हुआ है। यह सुपरफास्ट बस मात्र दो घंटे में पहुंचने का दावा कर रही है। ढाई बजे तक बस में लद कर गया की ओर निकल पड़ा।

निमल से स्तूप तक की कुल यात्रा 12km

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