विश्व की सबसे बड़ी इस्पात(स्टील) मूर्ति अदियोगी

कोयंबटूर | तमिलनाडु | भारत

पूसरीपल्यम से पूलुवापट्टी

कल स्टेशन दर स्टेशन घनचक्कर होने के बाद दिन में लंबी नींद से काफी हद तक आराम मिला। आज सुबह कोयंबटूर में ही दूसरे सामुदायिक मित्र के घर निकल रहा हूँ।

यहाँ नमन के घर पर तैयार हो कर बैग को भी तैयार कर कमर कस ली है। कल शाम को मौका मिला था तब कुछ कपड़े लगे हाथ धो डाले थे। जिससे बस्ते में अब साफ कपड़ों की संख्या ज्यादा है।

इधर बैग ले कर बाहर निकलने लगा उधर नमन की माता जी ने नाश्ता तैयार कर लिया। लगभग घर के बाहर निकल ही चुका हूँ पर हमें वापस बुला लिया गया है।

शायद उनकी माता जी नाश्ता कराना चाह रही हैं पर नमन कुछ अजीब ही बर्ताव कर रहा है। बाहर बैग रखकर दोबारा जूते खोल कर भीतर कमरे में आ गया।

इधर आंटी जी पोहा परस कर तस्तरी में ले आई। साथ में सुबह की चाय भी है। आखिरकार नाश्ता करा कर ही आंटी जी मानी।

नाश्ता करने के बाद नमन से अलविदा लेते हुए घर से निकल पड़ा। उधर दूसरी सामुदायिक मित्र मीरा जी ने वॉट्सएप के जरिए ये तक बता दिया है की घर किस बस से आना है।

गली से होते हुए पूसरीपल्यम चौराहे की बस पकड़ने चल पड़ा। नमन घर के बाहर भी ना आ सका व्यस्तता के चलते। दस मिनट में बस अड्डे आ पहुंचा।

बस अड्डे पर बस ढूंढने लगा, जिसमे ज्यादा समय नहीं लग रहा है। कुछ ही देर में संख्या क्रमांक 14 बस लेते हुए दूसरे सामुदायिक मित्र के घर निकल पड़ा। जो कोयंबटूर से बाहर रहती हैं।

आंटी जी पेशे से जो बैंक में कार्यत थीं। पूलुवापट्टी यहाँ से करीब बीस किमी दूर है। कल अगर ट्रेन का घनचक्कर ना हुआ होता तो शायद आज कोयंबटूर में एक और दिन ना गुजार रहा होता।

समय से अदियोगी शिव की स्टील की मूर्ति भी देख लेता। समय रहते निकल गया होता किसी दूसरे स्थान पर। शायद मैसूर। आधे घंटे के भीतर आ पहुंचा पूलुवापट्टी।

सध्गुरु का ज्ञान

नया स्थान

बस से उतरते ही आंटी जी को अवगत कर दिया अपने पहुंचने का। यहीं रुकने को बोला है। कुछ ही देर में एक बूढ़ा आदमी बुलेट वाहन पर सवार हो कर मुख्य सड़क की ओर आता दिख रहा है।

शायद यही है मीरा आंटी के पति। दो बड़े बैग देख कर भी विचलित नहीं हुए। एक बैग टंकी पर और दूसरा मैं लादकर सवार हो गया बुलेट पर।

गांव की गलियों से गुजरते हुए फटफटिया से घर आ पहुंचा। घर में प्रवेश करते ही आंटी जी और उनके दो वफादार कुत्ते दिखाई पड़ रहे हैं।

स्वागत और सुरक्षा के लिए दोनो खूंखार कुत्ते अपने मालिक से साथ मुझे देख कर लिपटने लगे। कुत्तों से जल्दी घुल मिल नहीं पाता हूँ मैं। ज्यादातर खूंखार कुत्तों से तो डर ही लगता है जाने कब सनक जाएं।

घर पर आंटी जी का खुद का बगीचा भी है। सुबह ग्यारह बजे आने का फायदा उठाऊंगा मैं। इधर आंटी जी अपने विषय में बताने लगीं की कैसे उन्होंने मुंबई में एक अच्छी सरकारी नौकरी को लात मारकर यहाँ शांतचित गांव में शरण ले ली।

कुछ देर सुस्ता लेने के बाद आंटी जी हमें अपना बगीचा दिखाने लगीं। यहाँ लगे है खूब सारे आयुर्वेदिक पेड़ जिनकी मदद से हां अपना शरीर स्वस्थ कर सकते हैं।

साथी घुमक्कड और मीरा आंटी और उनके जीवनसाथी के साथ लेखक

नयी दुनिया

बगीचा काफी बड़ा है और दूर तक फैला है। जिसमे फल फूल सब्जी के अलावा औषधियां देने वाले पेड़ भी लगे हुए हैं। कुदरत को ले कर उनका प्रेम जाहिर हो रहा है।

मिलावटी और रासायनिक उत्पादकों का त्याग कर अब उन्होंने अपने परिवार सहित कुदरती जीवन को अपना लिया है। यही पेड़ पौधे पत्तियां और फल फूल खा कर अपने आप को स्वस्थ बनाए हुए हैं।

पीछे तक बगीचा देखने के बाद हम घर में आ गए। अब चाची जी चाचा के साथ मिल कर खाना बनाने की तैयारी कर रहे हैं। हालांकि दोनों जाने शायद ही कभी महीने में कभी खाना खाते हों।

यही कच्चे फल और सब्जी ही उनका भोजन है। खेत में ही लगे नारियल को तुड़वाकर मुझे एक पकड़ाया गया पीने के लिए। जिसमे भरपूर पानी है।

शहर की चीखम चिल्ली और प्रदूषण से दूर इस गांव में बहुत ही शांत माहौल है। घर के दाईं तरफ है विशालकाय पहाड़ जिसे देख देख कर मन को बहुत ही शांति का आभास हो रहा है।

आंटी जी ने बताया कैसे एक इंजीनियर अपनी नौकरी छोड़कर गांव में आ बसा और खेती से करोड़ों का मालिक बन गया। अब उसे सुकून भी है और शांति भी।

स्वादिष्ट भोजन कुछ ही देर में तैयार हो गया। जमीन पर सब साथ बैठकर खाना गृहण करने लगे। घर पर खान पान के बाद तीन बजे तक निकल पड़ा अदियोगी शिव की मूर्ति देखने जिसके लिए कोयंबटूर आया हूँ।

आंटी के कहने पर अंकल ने अपनी बुलेट गाड़ी तैयार कर ली मुझे बस अड्डे तक छोड़ने के लिए। गांव की गलियों से होते हुए बस अड्डे पर पहुंचने पर भी मुझे बस अड्डा कहीं नजर नहीं आया।

पास की दुकान में ही बैठ कर बस संख्या 14 इंतजार करने लगा। उधर अंकल जी निकल पड़े अपने घर। यहाँ मैं बस के इंतजार में समय बिता रहा हूँ।

एक के बाद एक बसें निकल रही है पर बस संख्या14 कहीं भी नहीं। दो तीन बसें निकल जाने के बाद बूलुवंपट्टी जाने के लिए बस आ रही है।

लगा रुकेगी ही नहीं। पर कुछ आगे जा कर रुकी। चढ़ा और बैठ कर निकल पड़ा खाली सीट पर। आधे घंटे से भी कम समय में अदियोगी केंद्र आ पहुंचा।

बस घूम कर वापस जाने के लिए खड़ी हो गई। मैं उतरकर मूर्ति की ओर निकल पड़ा ईशा केंद्र के सामने से।

एक लाख रुद्राक्ष से निर्मित माला

आदियोगी शिव मूर्ति

लगभग आधा किमी चलने के बाद अदियोगी शिव इस्पात(स्टील) की बनी मूर्ति के समीप आ गया।

मुझे ध्यान था किसी जगह पर मैं काले कपड़े पहन कर पहुंच गया था जिसके बाद तस्वीर में मैं नजर ही नहीं आया। इसलिए उस बात को ध्यान में रखते हुए मैं सफेद टी शर्ट में आया हूँ ताकि तस्वीर में मैं भी चमकूं।

परिसर में जूते पहन कर नहीं जा सकते इसलिए जूते जमा करवाने के लिए किनारे व्यवस्था है। यहाँ झोले रखे हुए हैं। जिसमे जूते भर कर टांगा जा रहा है। मैं भी अपने जूते झोले में टांग कर चल पड़ा।

यह स्थान चारों ओर से पहाड़ियों से घिरा हुआ है। जो शिव जी की इस मूर्ति को और भी खूबसूरत बना रहा है। जनता जनार्दन अपनी चिंता छोड़ यहाँ मग्न घूम रही है।

शिव की इस मूर्ति के पास लोग झूमते हुए नज़र आ रहे हैं। बस कमी है तो यहाँ भजन या हिंदी शिवभक्ति के गानों की। अन्यथा पल भर में यहाँ माहौल बदल जाए।

अधिकांश में होड़ है शिव की इस मूर्ति के साथ तस्वीर लेने में। मैं दूर खड़ा ये सब निहार रहा हूँ। एकदम आखिर में। यहाँ अंत में घेराव है जिसके उस पार नहीं जा सकते।

शाम के अँधेरे में चमचमाती मूर्ती

थोड़ी ही दूर वाहन खड़ा करने की सुविधा भी है जहाँ सैकड़ों वाहन पहले से ही मौजूद हैं। परिसर भर में टहलने के बाद मूर्ति के पास बने मंदिर की ओर चल पड़ा।

इस मंदिर में निरंतर पूजन चल रहा है। शायद यहाँ रुद्राभिषेक की कराने आते हों भक्त। कुछ सीढ़ी चढ़ ऊपर ज्योतिदान भी रखा हुआ है। जहाँ भक्त दीप जला रहे हैं।

शिव की इस शांत मूर्ति के साथ चलचित्र और तस्वीरें निकलवा रहा हूँ। सिर पर चांद लिए मुस्कराती हुई इस मूर्ति को देखना बहुत ही आनंदमय लग रहा है।

पास खड़े सुरक्षाकर्मी ने बताया की मूर्ति में जो माला पड़ी हुई है वो एक लाख रुद्राक्ष की मालाओं से निर्मित है। मूर्ति के आगे भी घेराव है ताकि मूर्ति को लोग छूकर दूषित ना करें।

हर सीढी पर कुछ खंबे बने हुए हैं जिस पर नाग या सांप का चित्र बना हुआ है। सबसे बेहतरीन बात वो है की आसपास बने जंगलों को क्षति नहीं पहुंचाई गई है। घने जंगल ऐसे के ऐसे ही खड़े हैं।

बुलुवामपती की पहाड़ियों का नज़ारा
गांधीपुरा से पुलवापट्टी से बूल्वामपट्टी तक कुल सफर 45किमी

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