स्टोरीज ऑफ इंडिया, स्पीति वैली, हिमाचल प्रदेश
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कैसे चूका विश्व के सबसे ऊँचे पोस्ट ऑफिस में जाने से

समय से पहले उठना

थकान बहुत है शरीर में। पर उठना भी है और निकालना भी है। शुरू में तो अलास हुआ उठने में पर जब ये खयाल आया कि अगर ये बस निकल गई या छूट गई तो पूरा दिन यहीं बिताना पड़ेगा और यथास्थिति कल भी वही दोहरेगा।

फिर क्या था जैसे नींद गायब ही हो गई हो मानो। ज़ेहन में समय सारिणी छह बजे की है। पर जब मंजन करने बाहर आया तब मकान मालिक ने बताया कि छह नहीं बल्कि सात बजे बस निकलेगी।

कुल्ला मंजन तो हो गया। पर जब हल्के होने की बात आईं तो मकान मालिक ने बाहर का रास्ता दिखाया। दिशा कौन सी होगी, तब उन्होंने उत्तर दिशा की ओर इशारा करते हुए वहाँ जाने की हिदायत दी।

ये मेरे जीवन का शायद दूसरा या तीसरा ऐसा अनुभव होने जा रहा है जब मुझे लोटा ले कर बाहर जाना पड़ रहा है। इसमें आश्चर्य की बात नहीं कि इनके घर में शौंचालय की व्यवस्था नहीं है।

भाईसाहब ने भरी बोतल पकड़ाई और सीढ़ी से रास्ता दिखाया। बस इतनी रियायत बरती की चप्पल उनकी पहन जाओ।

जबतक जूते पहनता तबतक शायद अनर्थ हो जाता। अभी उजाला हो चुका है। पर सूरज कहीं नजर नहीं आ रहा है। हाँथ में लोटे की जगह बोतल लेके उत्तर दिशा की और चलने लगा।

घरों में लोगो कि हलचल ना के है बराबर है। मैं वो इलाका खोज रहा हूँ जहां कोई मुझे क्रिया करते समय ना देख सके। और ऐसा इलाका काफी दूर है।

थोड़ा ऊपर चढ़ते हुए पहाड़ियों में जाने लगा। कुछ एक घर की खिड़कियां खुलने से मुझे एक दफा फिर जगह के बारे में सोचना पड़ेगा।

सुबह की हलचल

हलचल का ये अंजाम रहा की मुझे और आगे बंजर ज़मीन की ओर रुखसत करना पड़ेगा। दाएं बाएं आगे पीछे चारों दिशाओं को अच्छी तरह से निहारने के बाद हल्का होना सही लगा।

इतनी ठंड में ये किसी सजा से कम नहीं। पर मजबूरी क्या ना करवाए। थोड़ी और सुबह होती या और खिड़की दरवाजे खुलते उससे पहले बोतल लेके निकलना उचित समझा।

घर आते आते आसपास लोगों के घरों की लाइटें जलने लगीं हैं। अब इधर घोड़ा है कि अन्दर जाने नहीं दे रहा। पर थोड़ी सी जगह बना कर ऊपर आ गया।

मेरे आ जाने के बाद अजय निकल गया। पर शायद वहाँ नहीं जहां मैं गया था।

बस की समय सारिणी पता चलने के बाद थोड़ा आहिस्ता हाँथ पैर चलने लगे। हड़बड़ी का कोई सवाल ही नहीं। उठा पांच बजे यही सोच कर कि छह बजे तक हर हाल में बस अड्डे पहुंच जाना है।

फटाफट बैग पैक किया और आसपास बिखरा सामान बैग में उड़ेला। सोने की व्यवस्था काफी शानदार रही। लकड़ी के बने इस कमरे के ज़मीन पर मखमली बिस्तर पर क्या नींद आईं।

खरा सौदा

इधर मैं तैयार होकर खड़ा हो गया और उधर चाय। हालांकि चाय पीने के कारण कहीं बस छूटी तो बहुत अफसोस होगा।

पर मकान मालिक ने बताया कि उनके बेटी और पत्नी भी उसी बस से जाएंगी तो बस छूट उसकी चिंता छोड़ दे आप।

कल घी और आज दूध की चाय के स्वाद में काफी अंतर है। हालांकि दोनों पीने में सर्वश्रेष्ठ। इधर चाय खत्म होने से पहले ही मकान मालिक ने पहले से ही हमारा बैग कमरे से बाहर निकाल कर रख दिया।

जैसे कल स्वतः ही बैग कमरे में रखा मिला था। जूते वहीं बकरी के संरक्षण में नीचे रखे हुए हैं। देखते देखते छह चालीस हो चला है।

सकरी सीढ़ी से उतरते वक्त सिर जरूर टकराया। पर सीढ़ी ने याद भी दिलाया कुछ भूले तो नहीं। याद आया तो वापस कमरे में पहुंचा जहां अपना सफेद रुमाल रखा पाया।

दोबारा सीढ़ी उतर कर जब एक बार फिर बकरी के पास आया। तो अंधेरे में जूते ढूंढने की कोशिश करने लगा। पर हाँथ तब लगा जब पीछे से मकान मालिक ने बल्ब जलाया।

गोबर के लेप से बनी फर्श ठंडी तो ना के बराबर है। पर इसका मतलब ये नहीं कि बहुत गरम भी है। जूते पहन कर अस्तबल के बगल मे बने गेट को मकान मालिक ने खोला और बाहर जाने का रास्ता दिखाया।

कल जब मुद की सैर करने के बाद वापस आया तो गलती से दूसरे दरवाज़ा खुल गया था। जहां अनेकों भेड़ बकरियां थीं।

बाहर तो अब सौदा ही होना था। कल रात के रुकने का। ₹25० तय राशि पकड़ाई जिसमे मकान मलिक संतुष्ट दिखे।

बस के लिए दौड़

अब भागम भाग करने की बारी है। पीछे पीछे मैं आगे आगे मकान मलिक की बेटी और पत्नी। सभी बस पकड़ने की कवायद में हैं।

थोड़ी संतुष्टि है मन में कि बस छूटेगी तो नहीं। क्यूंकि ना सिर्फ मैं या वो दो महिलाएं बल्कि गांव के अलग अलग हिस्सों से लोग बस पकड़ने के लिए भाग रहे हैं।

इनमे वो लोग भी हैं जिनसे कल रात मुलाकात हुई थी। वो हरयाणवी लड़का और आकाश और उनके साथी सचिन भी।

ऐसी भागम भाग तो स्कूल जाते समय होती थी। जब देरी हो जाया करती थी और स्कूल गेट बंद होने के डर से बीच रास्ते से ही भागने लगता था।

आज भी कुछ वैसा ही है बस अंतर ये है यहाँ विद्यार्थी की जगह यात्री हैं। उधर सामने बस चालू हो चुकी है। और मुड़ने भी लगी है।

ये संकेत है कि अब भागना शुरू करना होगा अन्यथा बस के चालक मेरे रिश्तेदार नहीं जो रुक जाएं। मां बेटी ने हल्का जोर लगाया और तेज़ क़दमों के साथ बस के भीतर

मैं थोड़ा दूरी पर हूँ। खैर ये है कि बस वाला भी उत्साहित है के जने को शायद इसीलिए हॉर्न पे हॉर्न बजाने पर तुला हुआ है।

रोचक किस्से

दो कदम की दूरी और बस के पिछले दरवाजे से मैं अंदर और अजय भी। अन्दर पहुंच कर चैन कि सांस ली। अब नहीं दौड़ना।

बस के भीतर वो कुछ लोग मौजूद दिखे जिनसे कल मुखातिब हुआ था। उन्ही मे से हरयाणवी बालक ने बताया कि वो उस पहाड़ी पर भी गया था जिसे उसे चढ़ने में काफी मशक्कत करनी पड़ी और काफी वक्त भी देना पड़ा।

टीले की तरफ इशारा करते हुए पत्थरों का छोटा टिला भी दिखाया। उधर कंडक्टर साहब आ गए अपनी टिकट मशीन लेके।

आज किसी प्रकार का डिस्काउंट देने के विचार में नजर नहीं आ रहे हैं। टिकट कटा काजा तक। फिर वहाँ से अरुण के साथ हिक्किम।

हसीं वादियां

इधर ख्वाब देख रहा था। आगे सीट पर नजर पड़ी एक गूरे चिट्टे आदमी पर। जिसकी बेहेस होती चली जा रही है कंडक्टर बाबू से।

बात कुछ अटपटा सी है। पीछे से तो ऐसा लग रहा है ये आदमी अकेला है, पर जब आगे झांका तो देखा उसके साथ कुत्ता भी है।

इसी कुत्ते को लेकर बहस हो गई। एक बोल रहा है इसका भी टिकट कटेगा दूसरा टिकट ना देने पर अड गया। दोनों का बीच बचाव करते हुए अजय ने सलाह कराई।

और बात यहाँ आकर सहमति बनी की कुत्ते का आधा टिकट लगेगा। बातचीत से मालूम पड़ा ये गोरा छोरा स्पेन से है। जो दुनिया के कई कोनों में अपने कुत्ते को साथ लेके घूमता है।

फिर चाहें वो रेलवे, बस या हवाई जहाज ही क्यों ना हो। भले ही भुगतान ज्यादा करना पड़ा हो पर इसने किया है।

बस अपने कल वाले रूट पर ही चलते हुए एक गांव से दूसरे गांव में भ्रमण कर रही है। कुछ दूरी के बाद लोगों के खेत आने लगे।

मकान मालिक की पत्नी और बेटी भी कुछ दूरी के बाद अपने खेत के समीप उतर लिए। पहाड़ों में खेती करना बहुत चुनौतपूर्ण होता है।

अरुण का इंतज़ार

हर एक ज़र्रे पर सवारियां चढ़ती गईं और बस आगे बढ़ती गई। हिक्किम जाने की मनोदशा के तहत अरुण को कई बार फोन मिलाया।

पर हर बार नेटवर्क मिला ही नहीं की उसके फोन कि घंटी बज सके। उम्मीद कम होती नजर आ रही है हिक्किम साथ जाने की।

उधर स्पीति नदी को पार करते हुए काजा के इलाके में बस दाखिल होने लगी है। समय साढ़े आठ से ज्यादा हो चला है।

बस कुछ ही देर में काजा आ पहुंची। फटाफट बस्ता उठा कर हम पेट्रोल पंप की तरफ निकल लिए। जैसा कि अरुण से वायदा किया था।

भारी भरकम बैग लेके पेट्रोल पंप पहुंच गया। अरुण को फोन लगाया पर हाल वही का वही। बाहर लगी जाली से अन्दर झांका तो देखा अरुण की गाड़ी तो नदारद है।

अन्दर बैठे कोई दिख रहा है तो बड़ी सी तोंद निकले एक सज्जन। पहुंच गया अन्दर। पूछताछ की तो मालूम पड़ा अरुण तो साढ़े आठ बजे ही आईस क्रीम की डिलीवरी करने निकल गया।

अंकल ने ये भी सूचना दी की हिक्किम ने बौद्ध अनुनैयों का कोई बहुत बड़ा उत्सव है जिसके चलते उसे समय से पहुंचना अनिवार्य हो गया था।

उनकी बात का तर्क भी सही लगा। पर अब क्या किया जाए?

कोई लिफ्ट करा दे

जवाब में अंकल ने बस से निकल जाने का सुझाव दिया। बस मिलेगी पेट्रोल पंप के बाहर बनी मुख्य सड़क से। बात हो ही रही है कि सांय से एक बस हिक्किम की तरफ निकल ली।

जबतक बैग उठा कर पहुंचता पहुंचता तब तक वो बस बहुत आगे को जा चुकी थी। अब बहुत मुश्किल ही है कोई बस मिले।

इसलिए पेट्रोल पंप के किनारे खड़ा है सोचने लगा कि कोई लोडर या ट्रॉली ऊपर जा रही हो तो उसी में लद के निकल जाऊंगा।

काम शुरू हो गया। कोई गाड़ी ताबो गांव को जा रही तो कोई चिचाम को। पर हिक्किम जाने के लिए कोई भी तैयार नहीं था।

ऐसा इसलिए भी क्योंकि हिक्किम बहुत ऊंचाई पर बसा है और दूसरा वहाँ पहुंचना इतना आसान भी नहीं। तीसरा ये भी की वहाँ से लोगो को कुछ खास लेना देना नहीं है।

लगभग हथियार डाल ही दिए थे। बैग उठा कर चल दिया। दूसरी लिफ्ट की राह देख ही रहा था कि इतने में दूर से एक बस आती दिखी।

भागते हुए उसी स्थान की और दौड़ने लगा जहां बस का इंतजार कर रहा था। एक पल के लिए लगा ये बस भी निकल गई।

पर चालक समझदार निकला। ऐसा ब्रेक मारा कि गाड़ी जहां की तंहा खड़ी हो गई। लगा आगे खड़ी सवारी के लिए रूकी है।

भ्रम तो तब दूर हुआ जब खिड़की के बाहर मुंडी निकालते हुए कंडक्टर ने इशारे में जल्दी आने को कहा। भागते दौड़ते बस की और पहुंचा।

और लद गया। हिक्किम तक जाने और वापस काजा आने का टिकट ले लिया। ताकि बस वापस आते समय भी हमे लेती चले।

टेडी मेडी पहाड़ियां चढ़ने लगी तब जा कर रास्ता समझ आया जो कितना सीधा और दुर्गम है। बिल्कुल कोण बनाता हुआ।

जिसकी दूर से देखने पर लगेगा की चढ़ाई कितनी मुश्किल है। घड़ी में दस बज चुका है। और बस आगे बढ़ रही है। कंडक्टर साहब ने बताया आज हिक्किम में उत्सव होने के कारण बसों कि सेवा लगाई गई है।

अन्यथा हिक्किम की ओर जाने वाली बसे दो चार दिन में ही जाती हैं। ये दूसरी बस इसलिए क्योंकि पहली बस भी खचाखच भर गई थी।

हिक्किम में दुनिया का सबसे ऊंचाई पर बसे पोस्ट ऑफिस भी है। जहां से लोग अपने प्रियजनों को चिठ्ठी या संदेश भेजते हैं।

कंडक्टर के माथे पर लगे चंदन के तिलक और बड़ी मोटी मूछ देख कर साफ प्रतीत हो रहा है कि इससे भ्रष्ट कर्मचारी पूरे स्टाफ में कोई ना होगा।

भारी भरकम समस्या

तभी आगे चल रही बस के ड्राइवर का फोन आया और किसी अनहोनी घटना का जिक्र किया। इसके बाद तो चालक और कंडक्टर ने बातें छिड़ गई कि आखिर ऐसा क्या हुआ जो बस को लगाम लगाने की नौबत आ गई।

मसले पर चर्चा के दौरान धुप सेकते यात्री

कुछ दस पांच मिनट में ये बस भी पहुंची। तो देखा अगली बस एक जगह खड़ी है और जनता बाहर टेहेल रही है। मसला जानने के लिए बस से उतरे तो मालूम हुआ कि बस आगे नहीं जा सकती।

दोनों बस के चालकों ने चर्चा हुई। गुना भाग लगाया जाने लगा। एक दूसरे सरकारी विभाग को कोसा जाने लगा। यहाँ जो परिस्थिति है उसमे एक पहाड़ी का भाग इतना ज्यादा निकला हुआ है।

की अगर जुर्रत करके गाड़ी निकालने का भी प्रयास किया जाएगा तो बाएं तरफ के सारे शीशे टूट जायेंगे। और ये भी मुमकिन है की ऐसा करने पर सड़क धंस जाए और पूरी बस खाई में।

हालांकि कुछ गांव वालों का मानना है कि बस निकल सकती है। दोनों ओर से तीखी बेहेज हुई पर जब ड्राइवर ने हामी भरी बस निकालने पर तो सब उसकी शर्त सुनकर पीछे हट गए।

शर्त ये ये थी कि बस निकाली जाएगी पर सभी सवारियों को बस में बैठना होगा। चालक की ये शर्त सुनकर सब पीछे हट गए।

कोई भी राजी नहीं हुआ ये जोखिम लेने को। जब बात जान पर बन गई तो सबने अपने पैर खींच लिए। दोनों चालकों में गुना भाग हुआ और ये तय हुआ कि बस को आगे निकालना मूर्खतपूर्ण साबित हो सकता है।

गांव वालो के पुरजोर विरोध में बावजूद भी बस को आगे ना ले जाने का फैसला किया गया। सबके हितों को ध्यान में रखते हुए बस चालू हुई। सवारियों को वापस बैठने का आदेश दिया गया। बस पीछे की तरफ चलने लगी।

जोखिम हिक्किम जाने का

दोनों ही बसों की कुछ सवारियां उतर उतर कर या तो हिक्किम की ओर निकल गईं या पहाड़ियों के रास्ते वापस काजा।

हिक्किम घाटी

सुंदर घाटी का लुत्फ यहाँ से भी लिया जा सकता है। मगर जो बात हिक्किम पहुंच के होती वो ना हो सकी। एक पल को खयाल भी आया बैग लेके पैदल जाने का।

इस विचार से अजय राजी ना हुआ। यहाँ मैं बाध्य होगया। इच्छा होने के बावजूद भी ना जाने को मिला।

बस तब तक रिवर्स में चलती रही जब तक मोड़ ना आया। यहाँ से बस को मोड़ना सुविधाजनक हुआ। की थोड़ी दूर चल कर बस का रुकना फिर हुआ।

शायद किसी आदेश की वजह से ऐसा हुआ। काफी वक्त ऐसे ही बीत गया। बस से उतर कर आसपास निकलना बेहतर समझा।

जब कोई भी गतिविधि होती नहीं दिख रही थी तब आसपास टहलने लगा। मैं कुछ मुट्ठी भर जनता के साथ नीचे की ओर जाने लगा। बैग बस में ही विराजमान हैं। और बस जहां की तहाँ खड़ी है।

शायद फिर कोई आदेश आया जिसके कारण बस दोबारा चल पड़ी। लेकिन इसमें खुश होने वाली कोई बात ही नहीं। क्यूंकि ये हिक्किम नहीं वापस काजा के लिए निकल रही है।

उम्मीद ना में बराबर है। क्यूंकि किसी भी हालत में बस आगे जा ही नहीं सकती। तो कुछ भी आश्चर्य कर देने वाला नहीं था इसमें।

निराशाजनक वापसी

जिन पहाड़ियों से मुझे जूतों मे उतरने भी फूंक फूंक कर कदम रखने पड़ रहे हैं। वहीं ये गांव के निवासी फिर चाहे वो महिला हो या पुरुष चप्पलों में इतने फटाफट पहाड़िया उतर रहे हैं जिसका कोई जवाब नहीं।

बस हमारा इंतजार कर रही है। हिक्किम के बजाय काजा के लिए। इस तरह आज मेरे हिक्किम जाने का सपना अधूरा ही रह गया।

जब हिक्किम जाना नहीं हुआ तो पैसा वापस होना चाहिए? जब इस विषय पर कंडक्टर से जवाब मांगा गया तो उन्होंने मुख फेर लिया।

कंडक्टर को आढ़े हाँथों लेते हुए अजय की बहस होने लगी। जिसका जवाब उसने बस अड्डे पहुंच कर शिकायत दर्ज करा कर देने को कहा।

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नमस्ते, मैं ऐश्वर्य तिवारी हूं। ये उन दिनों की बात है जब मैं अपने जुनून का पालन करने के लिए अपने कॉर्पोरेट जीवन को पीछे छोड़ दिया।भारत को जानने के मेरे अंदर हमेशा एक जिज्ञासा थी क्योंकि इस देश में हर कुछ मील के बाद विविधता, विभिन्न संस्कृति है। हर दिन मेरे लिए एक नए शहर में एक नई प्राणी के साथ एक नया दिन है। मैं एक घुमक्कड़ हूं जो के विभिन्न हिस्सों में घूमना पसंद करता है और जल्द ही भारत से बाहर हो सकता है।

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