विश्व का सबसे ऊँचा दरवाज़ा

उत्तर प्रदेश | फतेहपुर सीकरी | भारत

सिकंदरा से सीकरी

सिकंदरा से निकल कर करीब चार से पांच मोटर गाड़ी के जरिए फतेहपुर सीकरी आ गया। इसमें सबसे चुनौतीपूर्ण रहा आगरा से बाहर निकलना।

फिर दो वाहन ऐसे मिले जिसके जरिए मैं आधी आधी दूरी तय करने में कामयाब रहा। इसमें पहले वाले में सफर करने के बाद समोसे की दुकान पर कुछ देर सुस्ताया।

तीन समोसे बंधवाए और निकल पड़ा सीकरी। सीकरी के द्वार से दाखिल होने पर नजर आ रहा है किले की दीवार। कभी इस शहर का नाम विजयपुर सीकरी हुआ करता था जो मुगल के आने के बाद फतेहपुर पड़ा।

मोटर गाड़ी से बुलंद दरवाजा की ओर जा रहे मार्ग पर उतर गया जो की कुछ ऊपर है। बैग सहित भीतर आना हुआ की एक नौजवान गाइड पीछे लग गया।

इससे पिंड छुड़ाने के लिए बैग से समोसा निकाल कर खाने लगा। भूख भी लगी है और इससे दूरी बनाने का भी सही विकल्प है। पर ढीठ की तरह कुछ ही कदम आगे खड़ा रहा।

तीन में से एक ही समोसा खाया गया। बाकी वापस बैग में डाल कर चल पड़ा आगे दरवाजे की ओर। छुटपन में यहाँ आया था। तब शायद दरवाजा भी नहीं देखा था।

फतेहपुर सीकरी में महल देखे थे जो कुछ कुछ याद हैं। पर इस बार मैं विशेष रूप से बुलंद दरवाजा ही देखने आया हूँ। आगे चल कर दो तरफ रास्ता जा रहा है। एक सीधा दरवाजे की ओर दूसरा महल की ओर। पर मैं दरवाजे की ओर बढ़ता गया। धूप जो सुबह तेज थी अब कम लग रही है।

दरवाज़े का भीतरी हिस्सा

बुलंद दरवाज़ा

दरवाजे के ठीक सामने पहुंच कर कोण की तलाश कर रहा हूँ की सबसे उम्दा तस्वीर किधर से आएगी।

बैग से कैमरा निकाल कर नीचे से ही तस्वीरें लेना शुरू कर दिया। फूल वाले ने इशारा करते हुए बताया इधर से पूरा दरवाजा आएगा। सौ उसकी बताई हुई जगह पर आ कर फोटो निकालने लगा।

दरवाजा बड़ा इतना है की इसकी ऊंचाई ही ठीक से देख ले तो शायद चक्कर खा कर गिर जाए। किसी के ना आने के इंतजार में कई तस्वीरें निकाल डाली।

लोगों का ऊपर सीढ़ी से उतरना शुरू हुआ तो थमने का नाम ही नहीं ले रहा। इसलिए मैं खुद चढ़ते हुए ऊपर की ओर निकल पड़ा। बीच सीढ़ियों से भी दरवाजा बहुत ही सुंदर लग रहा है।

बुलंद दरवाजा को दुनिया का सबसे बड़ा द्वार कहा जाता है। मजेदार बात ये है की जितनी सीढियां है उतनी ही ऊंचाई है बुलंद दरवाजे की यानी 52।

दरवाजे पर फारसी में कुरान की आयते लिखी हुई हैं। इसे बनाने में ही बारह साल का समय लगा था।

लाल बलुआ पत्थर से बने दरवाजे पर सफेद और काले संगमरमर की नक्काशी की गई है। दरवाजे के अंदर आंगन जामा मस्जिद की ओर खुलता है।

अकबर ने गुजरात के राजा पर जीत हासिल करने के बाद उसकी खुशी में जामा मस्जिद में इस दरवाजे का निर्माण 1602ई में कराया था। सुन के आश्चर्य होता है की इसे बनने में बारह वर्षों का समय लगा था।

पर पुरानी जितनी भी वास्तुकला हैं उनको बनने में समय काफी लगता था। इस वजह से आज तक वो जमीन पर खड़े हो कर आसमान छू रही हैं।

दरवाजा गुंबदों और मीनारों से सजा हुआ है। इस द्वार का इस्तेमाल दक्षिणी पूर्वी प्रदेश पर सुरक्षाकर्मी तैनात करने के लिए किया जाता था।

आज इसके आसपास लोगों का बसेरा है। घर हैं। तब तो घना जंगल रहा होगा। बुलंद दरवाजे के बाईं ओर अकबरी कैदखाना भी है।

जहाँ कैदियों को कारागार में रखा जाता था। उसके कुछ ही आगे बौली भी है। जो अकबर द्वारा पंद्रह फीट टंकी बनवाई गई थी। उस काल में पानी का संरक्षण करने के लिए।

चार सौ साल पुराने दरवाजे आज भी लगे हुए हैं। मैं इन्हीं दरवाजों से कुछ पहले तक आ कर खड़ा हो गया। यहाँ से दाहिनी ओर पर किले की दीवार निहारने लगा।

सीढ़ियों से उतरते ही नीचे किनारे पर पहुंच जाएगा। किनारे लगी छतरी की एकांत में तस्वीर ले अंदर की ओर बढ़ने लगा। तभी दरवाजे यानी प्रवेश द्वार पर एक लड़का फूल माला लेने का अनुरोध करने लगा।

साथ ही जूते उसी के यहाँ जमा कराने का आग्रह भी। अचानक हुई इस घटना से मुझे कुछ भी समझ पाना मुश्किल हो रहा है। तब कहीं जा कर बालक ने विस्तार में बताया की अंदर सलीम चिस्टी की दरगाह पर फूल माला चढ़ाने के लिए फूल ले जाओ और बदलने में जूते भी इन्हीं के यहाँ रखवा दो।

अब जा कर ये माजरा समझ आने लगा। पर बिलकुल भी इच्छा नहीं है फूल माला ले कर जाने की। और ना ही ये जनाब तैयार हुए दस रुपए में जूते रखवाने को।

दरवाजे को लांघने लगा तो कोई लोग शोर शराबा करने लगे। पर अंदर बैठे कुछ लोगों सोने जूतों के साथ ही हैं। उनको नजर अंदाज करते हुए चौखट पर बैठे भाई साहब ने जूते बगल के काउंटर पर जमा कराने की हिदायत दी।

बताने लगे की दूसरे दरवाजे की ओर जाने के लिए हाथ में पकड़ कर ले जा सकते हैं। पर अंदर पहन कर नहीं जाना है। जूते बगल के काउंटर में जमा करा कर भीतर आ गया।

मुझे लगा बोरी में डाल कर जमा करेगा जैसे औरों के कर रहा है पर एक किनारे ही रखवा लिए। कहीं वापसी में जूते ना मिले तो। ऐसा तो नहीं होना चाहिए जब पैसे ले रहा है तो।

चिस्टी दरगाह

खैर मैं अब अंदर हूँ और सफेद इमारत की ओर बढ़ रहा हूँ जो की सलीम चिस्टी की दरगाह है। उसके पहले है एक तालाब जिसके पास पेड़ के नीचे तस्वीर लेने वालों और भक्तों की भीड़ है।

प्रवेश शुल्क कुछ भी नहीं है जिस कारण यहाँ गैर जरूरतमंद लोगों की संख्या काफी है। बस्ता टांगे टांगे ही मैं दरगाह में प्रवेश कर गया। द्वार के बाहर ही तमाम तस्वीर लेने वाले बैठे हैं।

भीतर महिलाओं का हुजूम है। अंदर है दरगाह जिसके आसपास लोग मिन्नते करते दिखाई पड़ रहे हैं। उसके भी पहले मिलें मौलवी जो कुछ भेंट करने या चढ़ाने को कह रहे हैं।

मत्था टेका और आगे बढ़ गया। प्रार्थना कर बाहर की ओर आ गया। केमरेवालों के पास बैठ कर कुछ देर सुस्ताने लगा। एक बच्ची थर्माकोल की तस्तरी में प्रशाद ले कर सबको बांटने लगी।

मुझे लग रह है इसमें मांस मिला हुआ है। पूछने पर पता चला मीठा चावल है जिसमे कुछ भी मांसाहारी नहीं है। बच्ची ने खुद अपने हाथों से प्रशाद दिया और चली गई।

सलीम चिश्ती दरगाह

लगा भगवान के रूप में कोई बच्ची आई हो और प्रशाद थमा कर कह गई हो “प्रार्थना होगी स्वीकार”।

दरगाह के बाईं तरफ कई कब्र बनी हैं। जो की सलीम के रिश्तेदारों को कब्रें हैं। इधर भी कुछ फूलवाले फूल बेचने देखे जा सकते हैं। एक पुलिसवाला भी इन्ही के पास खड़ा है जाने किस मंशा से।

1478 से 1572 तक सूफी संत सलीम चिस्टी जीवित रहे। उनके मरणोपरांत यहाँ उनका मकबरा बना दिया गया।

काफी देर सुस्ताने के बाद और धूप के कम होने के बाद अब लग रहा है तस्वीरें लेने का क्रम शुरू कर देना चाहिए। कैमरा ले कर तालाब के आगे आ कर खींचना शुरू कर दिया।

इधर हर पर्यटक को कोई ना कोई बालक गाइड बता कर पीछे लग रहा है। ना इनका कोई पहचान पत्र है ना ही सरकार द्वार नियुक्त किए गए हैं।

कहीं से कुछ कहानी सुन लेते हैं और उसी कहानी को अपने अनुसार पर्यटकों को बताना शुरू करते हैं। पर्यटक भी सुन कर दंग होते हैं और पैसा भी देते हैं।

पेड़ के नीचे आ कर यहाँ के बारे में कैमरे वालों से जानना चाहा तो वो अपना बिस्तर ले कर ही भाग निकले मुझे गाइड के हवाले कर। जो मैं बिलकुल नहीं चाहता।

मस्जिद की ओर चलते हुए हर कोण से तस्वीर लेने की मंशा से चल पड़ा। यहाँ बच्चों का एक झुंड मुझे आकर्षित कर रहा है। पहुंचते ही हाथ मांग कर खाने को मांगने लगे। शायद पैसे!

खयाल बस्ते पड़े दो समोसे इन चार लोगों ने बांट दूं। चार से पांच हो गए। समोसे भी इनमे ही बंट गए। इनके साथ भी तस्वीर ली और इनमे से एक को चुन कर अपनी तस्वीर निकालने को कहा।

ठीक ठाक तस्वीर खींची। पीछे खड़े दो सभ्य बालक जो तस्वीर लेने को बेताब दिख रहे हैं उनको पकड़ते हुए कुछ तस्वीरें निकलवाई।

मन के सच्चे बच्चे

इनका पेट भर गया तो अपना मन भरने के लिए ये बच्चे बारी बारी से मुझे अपनी रटी हुई कविता सुनाने लगे। पहली कन्या ने तोतली भाषा में दूसरी ने वही कविता साफ भाषा में फर्राटे से।

डर इस बात का था की कहीं ये दोनो बालक मोबाइल ले कर ही अंधेरी मस्जिद में कहीं भाग ना जाएं। पर ऐसा हुआ नहीं। मोबाइल के बाद कैमरा थमा कर भी खूब तस्वीरें निकलवाई।

बच्चों का समोसे में भी पेट नहीं भरा। बताने लगे की ये सभी भाई बहन है एक ही माता पिता की संतान। यहीं झुग्गी बस्ती के रहने वाले, इनकी माता चमड़ा कटती हैं और इन्हें यहाँ पैसे मांगने के लिए भेज देती हैं।

पैसे मांगने के बजाए विद्यालय जाते तो बेहतर होता। पर बताने लगे की कोरोना के कारण सब बंद है। पर फिर भी इन्हे यहाँ भीख तो नहीं ही मांगनी चाहिए।

और अधिक खाने के लालच में ये बच्चे पीछे पीछे चल पड़े। मुझे भी घूमते समय साथ मिल गया जिसका आनद उठा रहा हूँ। अकेले घूमते घूमते इंसान ऊब जाता है और थक उससे भी ज्यादा जाता है।

तस्वीर निकलते हुए दूसरे दरवाजे की तरफ आ गया। यहाँ दरवाजे से भीतर और भी पर्यटकों ने प्रवेश किया। जिनके साथ हैं मार्गदर्शक। जिनसे कुछ इस्तिहास जानने को मिल रहा है।

1610 आते आते फतेहपुर सीकरी वीरान हो चला था। अकबर के छोड़ने के बाद यहाँ रहने वाले लोग भी भाग गए थे जिसके बाद शहर भूतिया हो चला था।

बाद में अंग्रेजों ने दोबारा इस जगह को बसाया था। गाइड और लोगों को भी बता रहा है जो जानकारी मैं भी सुन रहा हूँ। मालूम पड़ा की अनारकली को यहीं चुनवाया गया था।

जिसे बाद में अकबर ने सुरंग के रास्ते दिल्ली और फिर दिल्ली से लाहौर भेज दिया था। चुनवाई हुई दीवार आगे है। जहाँगीर और अनारकली दोनो की ही कब्र लाहौर में स्थित है।

बच्चे अभी भी पीछे पीछे चल रहे हैं इस आस में की इन्हे और भी कुछ खाने मिल सकता है। मैं दरवाजे के पीछे वाले हिस्से में हूँ जहाँ कब्र ही कब्र बनी हैं।

मन के सच्चे बच्चे

यहाँ ना जाने लोग क्या कर रहे हैं बैठे बैठे! इनको पार कर दूसरी तरफ आ निकला। यहाँ सिर्फ कब्र ही कब्र हैं संत सलीम के रिश्तेदारों की।

लगा दोबारा फिर से जाना चाहिए दरगाह पर। बच्चे लगातार मेरे साथ साथ चल रहे हैं। बाहर बने तालाब के बारे में बताने लगे की बहुत ही शुद्ध पानी है। जिससे ये पानी पी भी लेते हैं।

मैं पी तो नहीं सकता। अंदर से पानी निकाल कर बाहर की ओर पैर धोने लगा। देखादेखी बच्चे भी ऐसा करने लगे। शुद्ध हो कर दरगाह की ओर दोबारा आ गया।

फिर से निकल आया। इस बार ना महिलाओं का हुजूम था ना ही तस्वीर लेने वालों का।

दरगाह पर भी एक दो लोग। प्रार्थना कर बाहर निकल कर भीतर ही चक्कर लगाने लगा। पीछे हिस्से में एक महिला प्रार्थना करती नजर आई।

बाहर से भीतर मजार पर झांकने पर एक आदमी दिख रहा है जो रो धो कर प्रार्थना कर रहा है। मोर का पंख लिए आदमी जो कोई भी भीतर आता उसके सिर पर झड़ता।

कुछ वक्त बिताने के बाद मैं बाहर निकल आया। और तस्वीर लेने के इरादे से दरवाजे की ओर बढ़ा। यहाँ एक महाशय कुछ सामान बेचते दिखाई दे रहे हैं।

जिनको अपना कैमरा थमा कुछ तस्वीरें निकलवाई। इस लालच में की मैं इनसे कुछ खरीद दारी करूंगा मुझे तरह तरह के हार दिखाने लगे।

पर हार लूं भी तो किसके लिए। ना ही इतनी जल्दी वापस घर जाना है। पर ये जनाब मानने को तैयार ही नहीं है। बुलंद दरवाजा पर निकल कर काउंटर से लावारिस पड़े जूते उठाए और तस्वीर लेने के लिए सीढ़ी की ओर आ गया।

यहाँ भी ये भाईसाहब तस्वीर लेने को तैयार हो गए लालचवश। तस्वीर तो खूब बेहतरीन निकाली पर मुझे फिर भी समान लेना ही नहीं है।

सीकरी किले का रास्ता पूछते हुए हाथ में जूते लिए भीतर से होते हुए दूसरे दरवाजे पर आ पहुंचा। पर ना तो बच्चों ने पीछा छोड़ा ना ही इन महाशय ने।

सलीम चिश्ती के रिश्तेदारों की कब्र

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