विश्व का सबसे अमीर मंदिर पदभमस्वामी मंदिर

केरेल | थिरुवनंतपुरम | भारत

रवानगी

तिरुवनंतपुरम में दो दिन गुजर जाने के बाद भी तिरुवनंतपुरम नहीं घुम सका हूँ अभी तक। पहला दिन शहर के आगमन में निकल गया और दूसरा दिन वरकला में भरपूर आनंद के साथ व्यतीत किया।

आज तीसरे और अंतिम दिन में मैं दुनिया के सबसे अमीर मंदिर जाना चाहूँगा। जो है पद्मनाभ स्वामी मंदिर। अखिल जी सुबह सवेरे निकल गए।

अपने कार्यालय के लिए और कल की तरह घर की चाभी मुझे थमा गए हैं। नित्यक्रिया और स्नान कर मैं नौ बजे तक घर से निकल पड़ा मंदिर के लिए।

क्वार्टर से कुछ ही दूर स्तिथ बस अड्डे से बस भी समय से मिल गई। मंदिर जाने के लिए स्टेशन के पास वाले बस अड्डे तक जाना होगा। वहाँ से पैदल दूरी पर ही मंदिर स्तिथ है।

स्टेशन पहुंचने में मामूली समय लगा। हालांकि बस में बैठने की जगह ना मिली पर ऐसी कोई समस्या नहीं हुई। बस अड्डे से पैदल ही निकल पड़ा मंदिर की ओर।

रेलवे क्वाटर से रवानगी

विश्व का सबसे अमीर मंदिर

दस बजने से पहले मंदिर आ पहुंचा। बाहर ही तमाम तरह के काउंटर उपलब्ध हैं। फूल, धोती से ले कर साड़ी तक के।

यहाँ पर पुरुषों के लिए कमर के ऊपर निर्वस्त्र हो कर ही प्रवेश की अनुमति है वो भी तब जब आप धोती धारण किए हों। किसी भी प्रकार का कोई भी यंत्र मंदिर के भीतर नहीं जा सकता।

मोबाइल, घड़ी, बटुआ, बैग जमा करने के काउंटर बने हुए हैं। जो धोती नहीं लाए हैं वो काउंटर पर से खरीद कर पहनते देखे जा सकते हैं।

वही हाल महिलाओं का है। वो भी साड़ी खरीद ऊपर से ही लपेट कर काम चला रही हैं। मैंने भी बैग से धोती निकाल कर धारण कर ली।

सारा सामान काउंटर पर जमा करवा कर मंदिर में प्रवेश करने लगा। यहाँ सुरक्षा व्यवस्था बहुत जोरदार है और हो भी क्यों ना आखिर दुनिया का सबसे अमीर मंदिर जो है।

बकायदा कमांडो तैनात है। निजी संगठन के सुरक्षाकर्मी नहीं हैं यहाँ जैसे अन्य जगहों पर होते हैं। भीतर प्रवेश करते हुए कतार की ओर बढ़ चला।

फिलहाल तो शायद मंदिर के कपाट बंद ही नजर आ रहे हैं। इसलिए भी कतार लंबी होती जा रही है। सब एक समान धोती में नजर आ रहे हैं भक्त।

मैं घूमते घूमते पीछे की ओर जा लगा कतार में। कई लोग अपनी बारी का इंतजार करते करते जमीन पर ही विराजमान हो गए हैं।

पद्मनाभस्वामी मंदिर इतिहास

इस मंदिर का इतिहास काफी पुराना है। महाभारत के अनुसार श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम इस मंदिर में आकर पूजा-अर्चना की थी। मान्यता है कि मंदिर की स्थापना 5000 साल पहले हुई थी।

लेकिन 1733 में इस मंदिर का पुनर्निर्माण त्रावनकोर के महाराजा मार्तड वर्मा ने करवाया। यहाँ विष्णु जी का श्रृंगार शुद्ध सोने के आभूषणों से किया जाता है।

कहते हैं कि इसी स्थान पर विष्णु भगवान की प्रतिमा मिली थी। जिसके बाद यहाँ मंदिर का निर्माण किया गया। मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु की विशाल मूर्ति विराजमान है।

प्रतिमा में भगवान विष्णु शेषनाग पर शयन मुद्रा में विराजमान हैं। इस मंदिर का संबंध तिरुअनंतपुरम के नाम से भी है। स्‍थानीय लोगों का मानना है कि भगवान के ‘अनंत’ नामक नाग पर ही इस शहर का नाम रखा गया है।

यहाँ पर मौजूद भगवान की विश्राम अवस्था को ‘पद्मनाभ’ कहा जाता है और इसीलिए ये मंदिर पद्मनाभ स्वामी के मंदिर के नाम से विख्यात है।

इस मंदिर में केवल हिन्दू ही प्रवेश कर सकते हैं। साथ ही दुनिया के कुछ रहस्यमय जगहों में इसकी गिनती होती है। ये मंदिर तब से अधिक सुर्खियों में है जब से इसमें छह दरवाजों में खजाना पाया गया है। सातवां दरवाजा हर किसी के लिए एक पहेली बना हुआ है।

इस मंदिर के तहखाने सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में खोले गए थे। जिसमें एक लाख करोड़ रुपये के हीरे जवाहरात निकले थे। इसके बाद सातवां दरवाजे की खोलने की शुरुआत की, तो दरवाजे पर बने सांप के चित्र को देखकर काम रोक दिया गया।

कई लोगों की मान्यता थी कि इस दरवाजे को खोलना अशुभ होगा। मान्यताओं के अनुसार, त्रावणकोर के महाराज ने बेशकीमती खजाने को इस मंदिर के तहखाने और मोटी दीवारों के पीछे छुपाया था।

जिसके बाद हजारों सालों तक किसी ने इन दरवाजो खोलने की हिमाकत नहीं की। कुछ कहते हैं की मंदिर में महाभारत के काल के अस्त्र शस्त्र रखे हुए हैं जिस कारण ये दरवाजा नहीं खोला जा सकता।

इस दरवाजे को सिर्फ कुछ मंत्रों के उच्चारण से ही खोला जा सकता है। इस दरवाजे को किसी भी तरह खोला गया तो मंदिर नष्ट हो सकता है, जिससे भारी प्रलय तक आ सकती है।

कहा जाता है कि इस दरवाजे को ‘नाग बंधम’ या ‘नाग पाशम’ मंत्रों का प्रयोग कर बंद किया है। इसे केवल ‘गरुड़ मंत्र’ का स्पष्ट और सटीक मंत्रोच्चार करके ही खोला जा सकता है।

अगर इसमें कोई गलती हो गई तो मृत्यु निश्चित मानी जाती है। कहा जाता है कि इस मंदिर के खजाने में दो लाख करोड़ का सोना है। मगर इतिहासकारों के अनुसार, असल में इसकी अनुमानित राशि इससे कहीं दस गुना ज्यादा होगी।

इस खजाने में सोने-चांदी के चेन, हीरा, पन्ना, रूबी, दूसरे कीमती पत्थर, सोने की मूर्तियां, रूबी जैसी कई बेशकीमती चीजें हैं, जिनकी असली कीमत आंकना बेहद मुश्किल है।

मेरे आगे बैठे गुजराती परिवार का एका बहुत ही प्रभावित कर रहा है। भारत के हर राज्य के लोगों से कुछ ना कुछ सीखने को मिलता है। गुजरातियों से एकता।

मंदिर कितना पुराना है ये आसपास की चीजों को देख कर पता चल रहा है। पुराने बर्तन, संगीत तंत्र और वाद्य और मंदिर में उपयोग होने वाली सामग्री के बर्तन भी।

पदभानस्वामी मंदिर में दर्शन

पद्मनाभस्वामी मंदिर में दर्शन

दो घंटे बीत जाने के बाद बारह बजते ही धीरे धीरे कतार आगे बढ़ने लगी। शायद दर्शन के लिए कपाट खोल दिए गए हैं। आगे बढ़ते बढ़ते प्रांगण की ओर आ पहुंचा।

कुछ ही क्षणों में मुख्य प्रांगण के सामने आ खड़ा हुआ। जहाँ से पद्मनाभ को देखा जा सकता है। जो लेटी हुई मुद्रा में हैं। जिनका दाहिना हाथ शिवलिंग पर और नाभि से ब्रम्हा की उत्पत्ति हो रही है।

भीड़ यहीं की यहीं खड़ी हुई जा रही है। कुछ लोग तो सीढ़ी पर चढ़ कर उचक उचक कर देखने की कोशिश कर रहे हैं। जो खड़े हो रह जा रहे हैं।

मैं भी दर्शन करने के लिए थोड़ा उचक रहा हूँ। जिसके बाद ही मुझे दिखाई दिए। साथ ही खोज रहा हूँ un खजांची दरवाजों को भी। पर कहीं दिख नहीं रहे।

पद्मनाभ के पास इतने पुजारी हैं की उसी पर दृष्टि बनाए रखना संभव नहीं है। शायद भक्तो की भांति पुजारियों में भी होड़ है पद्मनाभ की सेवा करने की।

दर्शन कर मैं बाहर की ओर निकलने लगा। नजर एक और कतार पर पड़ी सो मैं भी लग गया कतार में। कुछ देर बाद मालूम चला की यह भोजन वाली कतार हैं।

इस मंदिर में रोजाना 200 लोगो को भोजन कराया जाता है। शायद मैं अंतिम अल्पहारी हूँ। बाहर रखे बर्तन में से थाली उठाकर कक्ष में प्रवेश कर गया।

भोजन में दाल चावल के अलावा मीठा भी उपलब्ध है। भोजन के पश्चात मैं परिसर के बाहर निकल आया। बाहर सामने की ओर एक छोटा मंदिर है जिसमें काफी पुरानी मूर्ति स्थापित है।

पद्मनाभस्वामी मंदिर में खरीदारी

मंदिर के भीतर बाहर ही चौखट पर दुकान भी हैं। जो मंदिर का ही ट्रस्ट है। यहाँ पर विभिन्न प्रकार की मूर्ति फोटो, पोस्टर आदि बिक रहे हैं।

पद्मनाभ की तस्वीर इतनी लुभावनी है की इसको लिए बगैर तो शायद मैं यहाँ से ना जाऊं। कुछ रुपए में मैंने भगवान विष्णु की एक तस्वीर ली। हालांकि मूल्य ज्यादा चुकाया है पर ठीक है।

महिला कर्मचारी ने कागज़ में लपेट कर पकड़ा दी। मंदिर से अंतिम भक्त की तौर पर निकल रहा हूँ। अभी तक सुरक्षाकर्मी भी इतनी जल्दी कर रहे थे मंदिर खाली कराने के लिए।

जिन्होंने अंतिम दम तक नाक में दम किया। वो तो दुकान पर खरीदारी करने लगा तो थोड़ा शांत हो चले थे। वरना तो जाने क्या ही करते।

अब धूप और भी तेज हो गई है। बाहर पैर रखने का भी मन नहीं कर रहा। काउंटर से बैग इत्यादि सामान लिया। धोती में ही कुछ तस्वीर मंदिर के साथ निकलवाई।

भीड़ जा चुकी है इसलिए अब सिर्फ सन्नाटा पसरा है। आश्चर्यचकित हूँ की मैं सबसे आखिरी में कैसे हो गया! दुकानों पर इक्का दुक्का लोग दिख रहे हैं जो शायद खरीदारी कर रहे हैं।

धोती उतरतकर बैग में डाल वापस शर्ट धारण कर ली। अब कोची के लिए कुछ ही देर में निकल जाऊंगा।

ध्यान आया की सुबह मंदिर की ओर आते हुए नजर एक दुकान पर नजर पड़ी थी जहाँ अच्छे कपड़े दिखाई पड़ रहे थे। सोच रहा हूँ उसी दुकान पर जाऊं।

बस अड्डे से बस में लदकर निकल पड़ा। रास्ते में जैसे ही वो दुकान दिखी उतरकर उस दुकान पर पहुंच गया। यहाँ आ कर भरी टी शर्ट का भंडार दिख रहा है।

दुकानदार ने कुछ टी शर्ट दिखाईं। जिसमे से मैने कुछ टी शर्टें खरीद लीं। हालांकि काफी सामान मैने बैंगलोर में ही छोड़ दिया है। जिसके बाद कपड़ो को काफी किल्लत हो चली है।

पर अब बैंगलोर पहुंचने के बाद और भी ज्यादा कपड़े हो जायेंगे। खरीदारी कर क्वार्टर की ओर चल पड़ा। घर पहुंचकर भारी भरकम तैयार किए और निकल पड़ा कोच्चि के लिए।

इसी कैंटीन में बनकर आती है जेल में कैदियों द्वारा बनाई रोटी

कोच्ची/एर्नाकुलम

घर की चाभी बताई हुई जगह पर रख दी और अखिल जी को सूचित भी कर दिया अपने प्रस्थान करने के समय का। बस अड्डे से क्वार्टर के पास एक रेस्तरां से दिन का खाना पैक करवा लिया।

शाम की साढ़े पांच बजे की ट्रेन से निकल गया। ट्रेन का सफ़र आनंदमय रहा। रात के दस बजे तक कोच्चि आ गया। यहाँ सामुदायिक मित्र रघु के घर आज कि शाम बीतेगी।

देर रात कोई वाहन ना मिलने की वजह से वह मुझे लेने खुद स्टेशन तक लेने आ पहुंचे अपने दुपहिया वाहन से। अधिक रात्रि के कारण कई दुकानें बंद हो गईं हैं।

शायद आज भूखे ही सोना पड़े। रघु के घर पहुंचकर उनके घर में मौजूद लोगों से ठीक से मुलाकात भी नहीं हुई और बैग रख कर निकल पड़ा खाने की तलाश में।

साथ में रघु भी हैं। जो बतियाते हुए हमारी यात्रा और भारत भ्रमण के बारे ने पूछ रहे हैं जो भी उनके मन में प्रश्न आ रहे हैं। उनके मोहल्ले से बाहर निकल कर हाईवे पर पहुंच गया।

नाउम्मीदी में किरण दिखी। कुछ दूर एक ढाबा खुला हुआ दिख रहा है। आखिरकार खाना नसीब होगा आज। रात के बारह बजे इसी ढाबे पर रात्रि भोज करके वापस घर आ गया।

साथी घुमक्कड़ तो बाहर वाले कमरे में रघु और उनके साथियों के साथ बटिया रहा है। रघु ने सोने के लिए अंदर कमरे में इंतजाम कर दिया है। मैं भीतर कमरे में चुपके से निकल आया। इतना थक चुका हूँ की कब सो गया मालूम ही नहीं पड़ा।

थिरुवनंतपुरम से कोच्ची तक का कुल सफर 225किमी

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