विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मैंग्रोव जंगल पिच्चावरम

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दीपावली के दिन सैर

आज दीपावली है। प्रेम भाई ने बताया की उनके घर पर या तमिल में दीवाली मनाने का तरीका ही निराला है। जहाँ लोग पहले यहाँ कड़वे तेल का स्नान करते हैं तत्त पश्चात सामान्य स्नान कर नवीन कपड़े धारण करके अन्न ग्रहण करते है।

ना तो मेरी कोई तेल से नहाने की इच्छा है ना ही मेरे पास नए कपड़े हैं। जो थे भी वो बैग से निकाल कर बैंगलोर में रख आया हूँ।

हां नहाने के बाद स्वादिष्ट दक्षिण भारतीय खाना जरूर चख सकता हुं। स्नान ध्यान कर तैयार होने लगा। आज योजना है पिच्चावरम के मैंग्रोव जंगल जाने की है।

प्रेम अपनी दिवाली की तैयारी में व्यस्त है। पूरे परिजन सहित स्नान के बाद हमें भी नीचे बुला लिया गया। देखा तो मेरे लिए सुबह का दिवाली विशेष नाश्ता केले के पत्ते में परसा रखा है।

प्रेम और उनके परिजन पहले ही खा पी कर विश्राम मुद्रा में हैं। अब नाश्ता करके बस निकलना है। इडली खा खा कर जैसे मेरी पसंदीदा होने लगी है।

तबियत से कोई इडली खा ले तो शायद दिन भर के लिए उसका काम हो जाए। सबसे विदा लेते हुए आज इस शुभ अवसर पर मैं निकल पड़ा पिच्चावरम के सदाबहार जंगलों में।

बस का कोई अता पता नहीं

इस बात पर संशय है कि आज त्योहार के दिन जंगल खुला भी होगा या नहीं। थोड़ी देर में प्रेम भाई मुझे बस डिपो तक छोड़ने आए। अपनी भाषा में पता करने लगे की कितने बजे बस है। उनको रवाना कर ये जिम्मा मैंने उठाया।

पिच्चावरम यहाँ से तीस किलोमीटर दूर स्थित है जिसे पैदल करना तो संभव नहीं जान पड़ता। बस स्टेशन पर पता करने पर हर कोई अलग अलग समय बता रहा है।

किसी के अनुसार बारह बजे तक तो कोई कह रहा है आएगी ही नहीं। छांव में बैठ कर इंतजार करने लगा। जब उत्तर भारत में दिवाली आते ही ठंड शुरू हो जाती है। यहाँ भीषण गर्मी है। तेज धूप से लग ही नहीं रहा अक्टूबर का अंत होने वाला है। खैर मुझे याद रखना होगा की मैं दक्षिण में हूँ।

घड़ी में बारह बज रहे हैं। इसके बावजूद भी बस का कोई अता पता नहीं है। पूछने पर कुछ दुकानदार बस आने की बात कर रहे हैं। कुछ दीपावली के कारण बस बंद होने की बात कर रहे हैं।

अतः अंत में यह पता चला कि बस ना आने की संभावना ज्यादा है। सोच रहा हूँ क्यों ना लिफ्ट मांगते हुए पहुंचा जाए। वापस घर तो जाना नहीं है।

पिच्चावरम बंद भी होगा तो भी जाना बेहतर ही रहेगा। त्योहार पर क्यों किसी के घर रुक कर अपने घर को याद करूं। हालांकि ये मेरी दूसरी दिवाली है जिसमे मैं घर से बाहर हूँ।

यहीं अंतिम निर्णय रहा की बस का मोह छोड़ लिफ्ट मांगते हुए चलना है। बस अड्डे से बाहर निकल कर सड़क पर पधारने पर अलग ही सन्नाटा पसरा दिख रहा है।

ना तो यहाँ बस चल रही है और ना ही खाली सड़कों पर ऑटो दिख रहे हैं। चलते चलते नटराज मंदिर पर करते हुए पुल तक आ गया। गाड़ी रुकवाने की प्रथा प्रारंभ हुई।

कभी किसी की गाड़ी में बैठ कर कुछ दूर उतर जाता कभी किसी की। कोई कुछ दूरी तक छोड़ देता कोई लंबा सफर पार करा देता। मुख्य सड़क से पिच्चावरम की तरफ मुड़ते हुए एक भाईसाहब तो गलत ही रास्ते पर लिए जा रहे थे।

चाँद किमी दूर पिच्चावरम जंगल

गूगल नक्शे की सहायता से सही दिशा में वापस आया। गांव के भीतर आते आते लड़कों के एक दल ने वहाँ तक पहुंचा दिया जहाँ से पिच्चावरम महज डेढ़ किमी दूर है।

कुछ इसी अंदाज में साथी घुमक्कड़ भी आ रहा है। डेढ़ किमी पैदल ही निकल आया। यहाँ मैं पहले पहुंच कर साथी का इंतजार करने लगा।

पिच्चावरम आगमन

इस तरह चार पांच वाहन बदल कर पिच्चावरम पहुंच गया। यहाँ लोग काफी मददगार हैं इतने सन्नाटे में भी कुछ लोगों का आवागमन जारी है।

पिचावरम सदाबहार वन, इस स्‍थान का सबसे बड़ा आकर्षण स्‍थल है। आइस क्रीम की दुकान के ठीक सामने टिकट काउंटर है। इतनी दूर तक तेज धूप में आने के बाद हुआ को कुछ ठंडा हो जाए।

पेड़ की छांव में दो कुल्फी लीं। इनकी दुकान पर बिक्री भी बहुत हो रही है। कुल्फी से तरोताजा होने के बाद जानकारी और सूचना के लिए टिकट काउंटर की तरफ बढ़ा।

यहाँ काउंटर के बाहर लगे लकड़ी के पटल पर सभी तरह के दाम लिखे हैं। एक नाव पर सवार होने के लिए कम से कम चार लोगों का होना अनिवार्य है। इससे कम कुछ भी नहीं।

इनकी ये शर्त भी मंजूर है। मैने तलाश जारी की ऐसे दो लोगों की जिनको भी दो लोग ही चाहिए। इसके लिए काउंटर सबसे उपयुक्त स्थान है। कुछ देर इधर उधर टहलने पर मुझे दो नव युवक दिखाई पड़े।

वो भी शायद किन्हीं दो लोगो की तलाश कर रहे हैं जो एक नाव में ही सवार हो सकें। उनसे आगे बढ़कर बात हुई और बात बनती नजर आई।

टिकट काउंटर पर चार लोगों का एक टिकट लिया और हम चारो अपनी बारी का इंतजार करने लगे। खुले कमरे के नीचे बैठे कई लोगों को उनके टोकन से बुलाया जाता।

अपना नाम सुनकर लोग नाव में सवार होने चल देते। यहाँ बैठ कर सिर्फ बाहर का पानी नजर आ रहा है और कुछ भी नहीं।

करीब एक घंटे बाद हमारा नंबर आया। हम चारो लोग कमरे के चार कोने में बैठे थे जो अब इक्कठा हुए।

पूरी सुरक्षा के साथ हमें नाव पर बिठाया गया। बकायदा जीवन रक्षक जैकेट पहनाई गई। जिनके बिना नाव में सवार होने ही नहीं दिया जाएगा।

पानी के बहाव को ध्यान में रखते हुए एक बार में सिर्फ दो नाव को ही निकलने दिया जा रहा है। क्षेत्र में समानता बनी रहे इसलिए नावों का संतुलन बहुत जरूरी हो जाता है।

मूल्य पटल जिसमे घंटे और संख्या के हिसाब चलता है

विशेषता

इन वनों को नियंत्रित करने वाला मुख्य कारक यहाँ के वातावरण का तापमान है। यहाँ मैंग्रोव वनस्पतियों की लगभग सभी प्रजातियां पायी जाती हैं।

मैंग्रोव वनस्पति विश्व के लगभग 112 देशों में पायी जाती हैं। यह जंगल दुनिया के सबसे बड़े सदाबहारों वनों में से एक है और यह काफी स्‍वाथ्‍यकारी भी है। दुनिया भर में पिच्चावरम जंगल विश्व का दूसरा सबसे बड़ा जंगल है

यहाँ एक झील स्थित है जिसके पानी में कई छोटे – छोटे द्वीप है। जिन पर हजारों प्रजातियों के पक्षी रहते है, यह सभी पक्षी स्‍थानीय और प्रवासी होते है।

सितम्‍बर से जनवरी माह के दौरान इस जंगल में सैर के लिए भारी मात्रा में लोग आते हैं। मैं भी इसी तरह अक्टूबर में आया हूँ वो भी तब जब असमंजस था की पिच्चावरम खुला भी होगा या नहीं।

सावधानी के साथ नाव चल पड़ी। नाविक पूछ रहे हैं की कहाँ ले चालू। जवाब है जंगल। अभी यहाँ से सिर्फ पानी दिख रहा है और कुछ पेड़।

नाविक हमें जंगल में ले जाने लगे। बताते हैं की जब सुनामी आई थी तब यहाँ का पानी का रंग बदल कर बालू के जैसा हो गया था। उस समय तो समझना मुश्किल था ये क्या हुआ पर बाद ने मालूम पड़ा आखिर क्या चीज थी सुनामी।

मल्लाह बताने लगे की यहाँ पर मछलियां या और पानी के जीव इस जंगल में अंडे देने आते हैं और फिर चले भी जाते हैं। ताकि उनके बच्चों को एक स्थान मिल सके।

जंगल में जाने का दृश्य

पानी पर सफर

नाव सुरक्षित जंगल में भी आ गई। बारी बारी से मैने भी चप्पू चलाया। मल्लाह भाईसाहब बहुत ही बढ़िया आदमी साबित जो रहे हैं।

डर है की कहीं मोबाइल पानी में ना गिर जाए। इसलिए बहुत ही संभाल कर इस्तेमाल कर रहा हूँ। चप्पू चलाने में दम लग रही है। ये ऐसा है जैसे सड़क पर और भी वाहन हैं वैसे ही और भी नव चल रही हैं।

जिनसे टक्कर भी हो रही है। यहाँ से दूसरे गांव को भी रास्ता जाता है। इसी प्रकार मल्लाह हमें दूसरे गांव के सिरहने पर ले आए। ये भाईसाहब अगर छोड़ के चले जाएं तो वापस निकालना यहाँ से मुश्किल हो जाएगा।

इतने मोड़ होते हुए ऐसे घने जंगल में ले आएं है जिसका कोई पता नहीं। चलचित्र बनाते समय खोपड़ी पर मैंगरूव के पेड़ का डंडा पड़ा। वो इसलिए क्योंकि मैं खड़ा था।

अंतरजाल पर कहा गया है की ११०० हेक्टेयर है पर इन गांव वालों का मानना है की ६६०० हेक्टेयर में फैला है ये जंगल। यहाँ भी पानी का स्तर घटता बढ़ता रहता है।

कच्ची मिट्टी दिख रही है पेड़ के बीच जो की है दलदल। धोखे से अगर उतार भी जाए इस पर तो उसका वापस आना संभव नहीं।

लगातार कीट पतंगों को आवाज सुनाई पड़ रही है। मल्लाह यहाँ के चप्पे चप्पे से वाकिफ हैं। दूसरे हिस्से में भी नाव जा रही हैं पर वो मोटर गाड़ी हैं।

मल्लाह हमें काफी दूर तक ले गया और एक बार तो दूसरे छोर पर के पार ले आया जहाँ जमीन स्तर पर काम चल रहा था।

घनी झाड़ियों के बीच से निकलते वक़्त तो एक बार डंडल सर पर भी लगी, जिससे मैं वापस बैठ गया। इनमे इतनी गहराई है जिसका अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल है।

अगर कोई भी बिजली संबंधित उपकरण गिर जाए तो उसे भूल जाना ज्यादा बेहतर होगा। 2003 की आई सुनामी त्रासदी में इन वनों ने कई गावों को तबाह होने से बचाया था।

मल्लाह ने बताया की तब से लोग इन वनों की पूजा करते हैं। मल्लाह ने दो किलोमीटर अतिरिक्त घुमाया और उसका पैसा अपनी जेब में डाला। खैर आनंद बहुत आया।

फर्राटा भरती नाव पल भर में मिलों दूर पहुंच गई। जितने पैसे उतना सफर। शायद मैं यहाँ पानी में जंगल के भीतर पांच किमी का सफर तो आराम से तय कर ही आया होऊंगा।

मल्लाह के संग घुमक्कड

मल्लाह बना चालक

मेरी नाव की सवारी काफी मजेदार रही। दो जने जो अनजान थे लगा ही नहीं किसी प्रकार का अंजानापन। जो जीवन रक्षक जैकेट हमने बीच रास्ते में उतार दी थीं वो वापस से पहन ली हैं। जो की नहीं उतरनी चाहिए।

नाव घुमा कर वापस चल पड़े थे हम। अब समय भी हो चला है बंद होने के। यहाँ एक घोषणा घर भी है। जो शायद दूर चली गई नावों को बुलाने के लिए या किसी आपातकाल स्तिथि को संभालने के लिए।

नाव से बाहर आने के बाद काउंटर के सामने सबके साथ कुछ तस्वीरें निकलवाई। हमारे कप्तान मल्लाह के साथ भी।

कुछ ही पल पहले यहाँ से चौराहे तक के लिए बस निकली है। बाहर निकल कर फिर वही हाल। जैसा कि सारे साधन बंद होने के कारण मैं फिर से जाते हुए वाहनों से लिफ्ट मांगने लगा।

तभी मल्लाह अपनी मोटरसाइकिल से यहाँ आ पहुंचा। उसने खुद बखुद गाड़ी रोक कर हमें अपनी गाड़ी में बैठा लिया। जो शक्श कुछ देर पहले मल्लाह था अब वो चालक बन गया है। पानी से सड़क तक हरफनमौला।

हमें मुख्य सड़क तक छोड़ कर वो अपनी राह चल पड़े। थोड़ी दूर पैदल चलने के बाद मुझे एक सज्जन अपने दुपहिया वाहन पर मिले जिन्होंने बाकी का सफर तय करवाया।

बैठे बैठे उनसे काफी बातें होने लगीं। शुरुआत परिचय से हुई। मालूम पड़ा की यहाँ लोग क्यों कतराते हैं मुसाफिर को लिफ्ट देने से।

यहाँ काफी समय से बच्चा चोरी होने के कई वारदात हो चुकी हैं। जिस वजह से स्थानीय लोग मुसाफिरों को शंका की नजर से देखते हैं।

इसी कारण बहुत कम लोग किसी अनजान शक्श को अपनी गाड़ी में बैठाने का जोखिम लेते हैं। अब मैं समझा क्यों यहाँ लोग सुबह से नहीं बैठा रहे थे अपने वाहन में।

चिदंबरम में दीपावली

शाम तक चिदंबरम पहुंच गया। अब तक अंधेरा हो चुका है। मंदिर जाते समय पुल के नीचे से रेल फाटक से होते हुए उस तरफ जाने लगा। तभी एक पुलिस वाला आ धमका। लगा पूछने यहाँ खड़े होने का कारण।

चिदंबरम से मैं फिर नटराज मंदिर निकल आया। इस मंदिर में चार द्वार हैं जिसका लोग प्रयोग करते है आवागमन के लिए बिना चप्पल जूते के। हाथ में ले कर एक दरवाजे से दूसरे दरवाजे तक जाए हैं। चाहें वो फिर हिंदू हो या मुस्लिम।

दक्षिण द्वार से बाहर निकल कर बाजार में आ गया। रास्ते गलियों में हर जगह पटाखे फोड़े जा रहे हैं। लस्सी की दुकान में लस्सी पीने लगा।

लोगों के लिए दिवाली है पर मैं दशहरा मना रहा हूँ। भूख जोरों पर है। पास ही एक गुजराती होटल दिख रहा है। यहाँ पर रोटी भी मिल रही है। यह आश्चर्यजनक है।

गुजराती रेस्त्रां तमिलनाडु में? उत्तर भारत का होने के कारण हमें भोजन में कुछ छूट मिली। पेट पूजन करने के बाद निकल पड़ा घर की ओर।

हर गली मोहल्ले में पटाखे फोड़े जा रहे हैं। इससे मेरा यह भ्रम भी दूर हो गया कि दक्षिण भारत में लोग दीवाली नहीं मनाते हैं।

जब तक घर पहुंचा यहाँ प्रेम भाई के मोहल्ले में फूटे हुए पटाखों के चीथड़े पड़े दिख रहे हैं। कल सुबह मुझे तंजावुर निकालना है और प्रेम भाई को दिल्ली।

चिदंबरम से पिचवरम तक कुल यात्रा 52किमी

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