विशालकाय रांची झील, रहस्यमयी झिरी झील

झारखण्ड | भारत | रांची

कपडा धुलाई

टैगोर हिल में उछल कूद से हुई थकान बरकरार है। जोश अभी तक फूट फूट कर उमड़ रहा है। सो कर उठने में देरी जरूर हुई।

चर्चा छिड़ी की आज कहाँ घूमने जाया जाए। बड़े दिनों बाद सूर्य के दर्शन हुए वो भी बहुत कम समय के लिए। जब से घर से निकला हूँ तब से एक दिन भी कपड़े धोने का मौका नहीं मिला है।

आज इस मौके का फायदा जरूर उठाना चाहूँगा। वक़्त भी है और जगह भी अच्छी है। बैग से ढेर सारे मैले कुचैले कपड़े निकाले। साबुन की एक मोटी टिकिया समेट ले कर घुस गया।

आज मिशन कपड़ा धुलाई हो कर रहेगा। पेंट, पैजामा, शर्ट, मोज़े, रुमाल, टीशर्ट धोने में घंटा भर से भी ज्यादा समय लग गया। पर सिलसिला अभी यहीं नहीं रुकेगा।

अभी साथी घुमक्कड़ को भी लगभग इतने ही कपड़े धोने हैं। मेरे स्नान करने के बाद साथी घुमक्कड़ गंदे कपड़ों का गट्ठर ले कर घुस गया। हाल दोनों लोगों का एक जैसा है जब घर से एक साथ निकले है।

इसी में काफी वक़्त बीत गया। कपड़े धोने के बाद फ़ैलाने और फैलने के बाद चलते वक़्त उठाने की लफ्फादर। पहले कपडे फैलाए। फिर उठाए जो सूख चुके हैं वो भी जो गिले हैं वो भी।

सूखने वाली श्रेणी में रुमाल ही है बस। गीले वाले श्रेणी में बाकि सभी वजनी या लम्बे कपडे। कैंप से निकलने का समय जो निर्धारित कर रखा है वो बारह बजे का है।

पर अब उससे भी ज्यादा हो गया है। बाहर की रस्सी पर कपडे फैलाने में कोई गुरेज़ नहीं है। पर बारिश का कोई भरोसा नहीं कब टूट पड़े।

साथी घुमक्कड़ और कदीर के तैयार होने का इंतज़ार था जो पूरा हुआ। सारा सामान अंदर डाल कर। कमरे में ताला जड़ा और निकल पड़े।

रविवार का दिन है सो कैंप में आर्मी स्कूल समेत सभी कार्यालय बंद दिखाई पड़ रहे हैं। बस इक्का दुक्का अफसर जो रविवार को भी आते है वो ही नज़र आ रहे है अपने कार्यालय में।

बारिश के बादल तो हैं लेकिन बदरा अभी नहीं बरस रहे। जब बादलों को पता लगेगा मैं बाहर हूँ वो मौका पा कर जरूर बरसेंगे।

चाय पर चर्चा

कैंप से निकल कर बाहर एक मस्त चाय की दुकान पर पर आए। चाय की प्याली पर ये तय हुआ कि आज निकला जाए रांची झील के लिए?

चाय के दौरान कादिर के दफ्तर के दो अधिकारी दिख गए। इससे पहले वो कादिर को देखते हम सब छिप गए।

अगर वो देख लेंगे कादिर घूमने जा रहा है। तो क्या पता कोई काम ही पकड़ा दें। जब तक वो दूसरी दुकान से निकल नहीं गए। तब तक हम ऐसे ही सर झुकाए खड़े रहे। उनके रवाना होते ही हम इधर से नौ दो ग्यारह हो लिए।

थोड़ा देर से ही सही लेकिन आज के दिन को पूर्णतः उपयोग में लाने के लिए हम निकल लिए ताकि एक से ज्यादा जगह जा सकें।

दीपाटोली से रांची झील दस किमी दूर है। टेंपो से इस दूरी को तय करने ने घंटा भर लगा गया। यही अगर खुद का वाहन होता तो यही दूरी आधे घंटे में तय हो जाती।

रास्ते में किसी फुटपाथ किनारे मुझे रेंटल साइकिल दिखीं। रेंटल साइकिल? इस तरह की संकल्पना ना तो दिल्ली के किसी शहर में देखने को मिली और ना ही यूपी में।

यूपी में इस तरह की सेवा देना भी खुद में जोखिम उठाने जैसा है। यहाँ घर के अंदर से गाडियां निकल जाती हैं फिर ना जाने इस तरह की साइकिल का क्या ही होगा।

कादिर ने बताया ये आम साइकिल नहीं है जिसे कहीं से कोई भी उठा के कहीं भी पटक दे। इसकी एक निर्धारित जगह है, जिसे चलाने के लिए भी उस पर लगे कोड को स्कैन करना होगा।

जिसके बाद ही इसका ताला खुलेगा। इन्हें मोबाइल से स्कैन करके किसी भी जगह तक एक निर्धारित समय के लिए ही घूमा जा सकता है।

ये एक बहुत बेहतरीन विकल्प है पर्यटन और स्वास्थ्य के लिहाज से। उनके लिए भी जिनको समय पर साधन ना मिल रहा हो और कुछ दूरी के लिए इसे उपयोग में कर सकते हैं। 

सबसे बिंदास तो घुमक्कड़ों के लिए जिनसे अपने राज्य के बाहर मनमाने दामों पर वसूली की जाती है। वो इस साइकिल का उपयोग कर सकते हैं। टेंपो से उतरते ही नुक्कड़ के बीच से होते हुए झील पहुंचा।

रांची झील

प्रवेश द्वार के बाहर ही टिकट काउंटर है। इसकी उम्मीद कम ही थी मुझे।

लेकिन एक लिहाज से ठीक भी है। जब जनता को फोकट की चीज़ मिल जाती है तब वो ज्यादा लापरवाही से उसका इस्तेमाल करती है।

विशेषकर जब वो उसकी अपनी ना हो। टिकट काउंटर से तीन टिकट कटाए। कादिर ने बताया कि 2015 तक यह तालाब काफी सूख चुका था।

रांची झील पर सुस्ताते लेखक

जिसके बाद सरकार हरकत में अाई और इसकी साफ सफाई के काम को अंजाम दिया। फिलहाल इस सुंदर झील का संरक्षण सरकार द्वारा किया जा रहा है।

इसके पिछले हिस्से पर काफी बड़ी पहाड़ी है जिसकी चोटी पर झील की सुंदरता देखने का स्टैंड बनाया गया है।

आज जो थोड़ी बहुत हलचल है वह कुछ कॉलेज के छात्र छात्राओं से बनी हुई हैं। देखने पर यही लगता है कि ये सब पिकनिक मनाने आए हैं।

वस्त्र से तो बस्ती में रहने वाले मासूम मालूम पड़ते हैं। कोई पेप्सी चिप्स कुरकरे खा कर आनंद ले रहे हैं तो वहीं कुछ अपनी फोटो खींचने की कला का प्रदर्शन।

झील का पूरा एक चक्कर लगाना तो मुश्किल दिख रहा है क्योंकि प्रवेश द्वार से बाहरी द्वार एक ही सीध में हैं।

पूरा चक्कर लगाने का मतलब है इससे बाहर जाना। बाहर जाते ही टिकट अमान्य। फिर अन्दर आकर दूसरे छोर से ऑटो पकड़ना भी मुश्किल भरा होगा।

बेहतर यही है की पहले द्वार से अंतिम द्वार तक ही चक्कर लगा कर वापस निकलना। थोड़ा आगे बढ़ते हुए खुले तालाब की तरफ आ गए।

यहाँ के एक किनारे बैठने का स्थान है लेकिन असुरक्षित। जिस पर कुछ देर तो बैठा लेकिन दुर्गंध के कारण वहां से निकलना बेहतर लगा।

इतने पुराने तालाब की गहराई का अंदाज़ा लगाना मुश्किल है। मैं यहीं अनुमान लगा रहा हूँ कि अगर इसमें कोई यंत्र गिरा तो उसके दोबारा मिलने के क्या अवसर हैं? नहीं

तालाब में ही दो नौका दिखाई दे रहीं हैं जो शायद मछली पकड़ने गए थे। अब वापस आते दिख रहे हैं। बालक बालिकाएं इधर भी तस्वीर खिचाने से खुद को रोक ना पाए।

अब यहाँ से वापस निकलने का समय आ गया है। जाते जाते मैंने खुद को एक मगरमच्छ के मूह में समा गया। लेकिन चिंता वाली कोई बात नहीं है।

ये मगरमच्छ भी इंसानों की तरह नकली है। अच्छा समय व्यतीत करने के बाद झील के प्रवेश द्वार से बाहर निकले।

नुक्कड़ के बाहर, सड़क किनारे दुकान पर चाय की चुस्की ली। हम विचार करने लगे अब कहा के लिए निकलना चाहिए। 

झिरी झील

कई विकल्प देखे इंटरनेट पर। शाम के चार बज रहे हैं। समय को मद्देनजर रखते हुए विचार बना झिरी झील जाने का।

गूगल पर चित्र के अनुसार यह काफी आकर्षक लग रहा है। लेकिन वहां पहुंचने के लिए थोड़ा लंबा सफर तय करना होगा।

हजारीबाग रोड से कामरे रोड का रास्ता तय करने में घंटा भर लग गया ऊपर से ये बारिश। बारिश ने अपनी दस्तक दे दी है।

वो जान गई है मुझे समय लगेगा घर पहुंचने में तो बरसना शुरू। कामरे रोड पर खड़े खड़े काफी देर ऑटो के इंतजार में भीगते रहा।

बमुश्किल एक ऑटो वाला मिला जिसमे लद के निकल लिए। ऑटो से उतरते ही सड़क के पल्ली तरफ जा कर झिरी झील का मार्ग प्रारंभ होगा।

कुछ बच्चे क्रिकेट खेल रहे। उनको खेलता देख मेरे मन में भी ये लालसा उठी की भाढ़ में गई झील कुछ देर खेल ही लू। लेकिन मन को मार के सीधे रस्ते निकल लिया।

गूगल नक्शे में गलत मार्ग दिखा रहा है। बारिश धीरे धीरे तेज हो रही है। मार्ग के प्रारंभ में ही एक सज्जन झीरी झील का मार्ग पूछा।

जो माचिस की तिली से अपना मूह साफ करते हुए बोले भैया सीधे रस्ते निकल लो मिल जयगा। एक हद तक तो नक्शे में भी ठीक दिखा रहा है। उसके बाद तो वह भी बौरा गया। कुछ दूरी पर चल कर मार्ग समाप्त हो गया।

नक्शे के मुताबिक झिरी यहीं है असलियत में जहाँ मैं खड़ा हूँ वहां बरगद जा एक बड़ा पेड़ है। पेड़ से बाईं ओर घूम कर दो तीन गली पार करके आगे निकला।

एक खुदी हुई विचित्र काली पहाड़ी, नजर आने लगी है। बारिश और भी तेज हो चुकी है। सारे कपड़े तर बतर भीग चुके हैं।

एहतियातन मेरे पास रेनकोट है जिसमें से ऊपरी हिस्सा कादिर को दिया और निचला खुद चढ़ा लिया। इससे भी कुछ खास फर्क नहीं पड़ा।

मैं रास्ते बाहर भीगता रहा, किसी तरह कैमरा, ओर मोबाइल फोन पानी से बचाने के प्रयास जारी हैं। यह झील की गहराई इसकी सुंदरता में चार चांद लगा रही है।

मैं अभी पहाड़ी के ऊपर खड़ा हूँ, पहले कादिर नीचे उतरा फिर आहिस्ता मैं भी नीचे आ गया। जगह तो खुफिया मालूम पड़ती है। शायद ही कोई आता होगा।

झील कम कोयले की खदान ज्यादा लगती है। नीचे आने के बाद कुछ देर इधर उधर घूमते रहे। आगे के रास्ते से दूसरी पहाड़ी पर एक एक कर चढ़े।

यहाँ देख के तो यही लगता है कि समय समय पर विस्फोट किए जाते हैं इन पहाड़ियों पर और इनसे किसी तत्व का उत्पादन किया जाता है।

यहाँ से साथी घुमक्कड़ ने एक भरी भरकम चट्टान गिराई जो धरती पर गिरते ही सौ टुकड़ों में बिखर गई। जैसे जैसे अंधेरा होता जा रहा है बारिश अपने चरम पर पहुंच रही है।

कुछ ही देर में अचानक से कम हो गई। जिस रास्ते से आए थे उस रास्ते से ना जा कर वापसी में नीचे से ही दूसरी पहाड़ी से चढ़कर गांव में निकले।

गांव में हम तितर बितर हो गए और एक प्वाइंट पर आ कर मिले। जगह जगह पानी भरे होने के कारण कभी किसी से लिफ्ट मांग कर कोई गली पार की, कभी उछलते कूदते।

कैसे भी करके बीस मिनट में गांव से बाहर मुख्य सड़क तक आ गए। यहाँ से ऑटो मिलने में जरा भी समय ना लगा।

रहस्यमय झील जिसके बारे में गांव के लोग भी चर्चा करने से घबराते हैं

कैंप वापसी

झिरी से कामरे रोड फिर दूसरे टेंपो में कामरे रोड से दीपाटोली आर्मी कैंप की तरफ वापस चल दिए। झिरी झील में बारिश के वक़्त। कादिर के फोन में पानी घुस गया। उसका फोन धुल चुका है।

दीपाटोली पहुंच कर मोबाइल रिपेयरंग की दुकान पर फटाफट मोबाइल ठीक करने को दिया। ऐसा लग रहा है किसी मरीज को अस्पताल लेके उसके परिजन आए हैं।

आज दौड़ भाग भरे इस जीवन में फोन को कुछ हो जाए तो प्राण पखेरु हो जाते हैं। दुकानदार ने मोबाइल सुखा कर वापस दे दिया। इधर मेरे जूतों में पानी भर गया था।

उसे सुखाने के लिए तो बड़े हीटर ही काम आएंगे। जैसे ही कैंप के प्रवेश द्वार पर पहुंचा वहां खड़े सिपाही ने आग्रह किया। 

कैसे भी हों लेकिन आप नंगे पैर अन्दर ना ही जाएं तो बेहतर होगा। अन्यथा किसी अफसर ने देख लिया तो फटकार उन्हीं को सुननी पड़ेगी।

मैंने भीगे जूते पैरों में तो डाल लिए, लेकिन वहां से क्वार्टर तक रेंगते हुए गया हूँ। बारिश में तेज़ हवाओं से सर्दी महसूस होने लगी।

क्वार्टर पर पहुंचते ही कादिर अगल बगल से हीटर का जुगाड कर लाया। जिसके बाद खुद के साथ कपड़ों को भी सुखाया। आज के लिए इतनी भाग दौड़ काफी है।

कल रात तक कोलकात्ता निकल जाना चाहिए। रात्रि तक भोजन के बाद कब निद्रा लग गई पता ही नहीं चला।

रांची में कुल 50km की यात्रा की

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