कटरा, जम्मू कश्मीर, धार्मिक स्थल, स्टोरीज ऑफ इंडिया
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आधी रात में वैष्णो देवी की चढ़ाई

पठानकोट से कटरा

तीन घंटे के भीतर पठानकोट से कटरा पहुंच गया। बस में ज्यादा सवारी नहीं है, जो थी भी वो फुटकर में पहले ही उतरती गईं।

लेकिन ये एक डेढ़ घंटे का सफर बड़ा मजेदार रहा। इन हरी भरी पहाड़ियों के बीच से गुजरना अच्छा अनुभव है। ऐसी पहाड़िया हो और तन्हा गाने बजते रहें तो मनुष्य एक अलग ही संसार में पहुंच जाता है।

बगल में रखे बैग में छोटे बैग को जोड़ा और खुद को तैयार करने लगा आज की रात एक लंबी चढ़ाई के लिए।

कंडक्टर बाबू हल्ला मचाते हुए अलार्म घड़ी का काम कर गए। जो बची कुची सवारियां सो गईं थीं वो भड़भड़ा के जाग उठीं।

चलती बस में मैं डगमगाते हुए अपना बैग लेकर दरवाज़े तक आ गया। ना तो बस अभी रूकी है ना ही मैं नीचे उतरा हूं।

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दलालों में मची होड़

चौराहे से बस मुड़ती है और कुछ लड़के मुझे रिसिव करने के लिए दौड़ लगा देते हैं। दरवाजे का सहारा लिए मैं खड़ा सोच में पड़ गया, क्या मैं इन्हे जनता हूं?

हद्द तो तब हो गई जब उनमें से एक बस में चढ़ आया। कंडक्टर बाबू ने डांट डपट कर उसे नीचे उतारा।

एक दफा फिर पूरी सेलेब्रिटी वाली अनुभूति हुई। चलती बस से सामने कुछ होटलों पर नजर पड़ी तब माथा ठनका, दलाल।

ये अपने होटल भरने के लिए सवारी को गोद में उठाने में भी नहीं हिचकिचाएंगे। चौराहे से कुछ दूरी पर बस रूकी। उतरा ही हूं कि खींच तान मचने लगी।

ऐसे घिर गया हूं जैसे मंत्री पत्रकारों से, कलाकार प्रशंसकों से, सरकार सवालों से, कैदी पुलिसवालों से। कोई इधर पूछता कोई उधर से। ऐसा ही कुछ अमृतसर में भी हुआ था।

मैं सोच में पड़ गया वाह भाई वाह करें तो करें क्या बोलें तो बोलें क्या? सवालों की चिंघाड़ के बीच मैंने सबको नकारते हुए भीड़ से छुटकारा पाने के लिए ये कहना पड़ा कि मेरा यह रूम पहले से बुक है।

फिर तो मानो ना वो मुझे जानते हो ना मैं उन्हें। अब किसी को मुझसे कोई लेना देना नहीं। दुखी निराश भाव के साथ सब तितर बितर हो गए।

एक को तो जैसे गहरा सदमा लगा ये सुनते ही और उसने मुझसे सुनिश्चित करने के लिए दो दफा पूछा “बुक है पहले से?” अर यू शोर?

चाय पर चर्चा

जम्मू के बाद द्रास, कारगिल होते हुए कई और इलाकों में भी जाना रहेगा ऐसी योजना है। फिलहाल तो मैं चाय का ठेला देख रहा हूं।

चाय पीते ही दिमाग की बुझी बत्ती बड़ी रफ्तार से खुल जाती है, फिर तो मानो दिमाग रॉकेट से भी तेज काम करता है। ठीक सामने अपने छोटे से ठेले पर जनाब स्टोव को भरते हुए अपना दम भर रहे हैं।

आसपास गिलास लिए कुछ लोग सुड़सुड़ते हुए चाय पी रहे हैं। उनकी सुड़सुड़हट से सुनिश्चित हो गया कि चाय यहीं नसीब होगी।

आसपास काफी दुकानें बंद पड़ी हैं, पता नहीं क्या वजह है। मैं मस्ती में स्टोव वाले ठेले के पास आ चाय का ऑर्डर दे दिया।

बंद पड़े मोबाइल की तरफ नजर पड़ी तो याद आया सिम भी लेना है। जब कुछ दिन बिताने ही हैं जम्मू कश्मीर में तो बेहतर यही है की यहां का सिम ले लिया जाए।

सम्पूर्ण भारत के नेटवर्क यहां आकर ख़तम हो जाते हैं। चाय पर चर्चा के बाद जनाब से ही मोबाइल दुकान का पता पूछ लिया।

चुटुर पुटुर दिख रहीं सामने की दुकानों की तरफ इशारा करके बोले वहां चले जाएं आपको सिम मिल जाएगा जम्मू का।

सिम का झंझट

चाय खतम हुई और मैं सामने लाइन से लगी दुकान के सामने खड़ा हो गया। दुकानें तो तीन चार हैं सिम किस दुकान से लिया जाए ये मुझ पर निर्भर करता है।

सभी दुकानों में बीच की उस दुकान में जा घुसा जहां भीड़ ज्यादा है। इसी मानसिकता के साथ की भीड़ जहां ज्यादा भरोसा वहां ज्यादा। बैग एक किनारे रख दुकान में जा पहुंचा।

भीड़ तो है पर दुकानदार कहां है ये नजर नहीं आ रहा। उचक कर, झांक कर देखने के बाद एक भाई साहब दिखे जिनसे सिम की जानकारी विस्तार से जाननी चाही लेकिन इनका ध्यान ही कहीं और है।

छप्पर की इस दुकान से बाहर निकलते वक़्त यही सोचा शायद अब रोक लेे। लेकिन दुकानदार इतना व्यस्त की उसने ने आवाज़ तक देना मुनासिफ नहीं समझा।

मैं वापस उस स्थान पर आ गया जहां बैग रखा है, फिर चल दिया लेकिन दूसरी दुकान कि तरफ जो ठीक इसी दुकान के बगल में है।

सन्नाटा तो नहीं थोड़ी बहुत हलचल तो है यहां जिससे दुकान वाले पर भी भरोसा करना लाजमी हो गया है।

यहां दुकानदार भैया ने बड़े इत्मीनान से सभी जानकारी दी जिसपे ये निर्णय लिया कि एयरटेल का सिम लेना ज्यादा सही रहेगा।

एयरटेल इसलिए क्योंकि वोडाफोन और जिओ तो पहले से ही है(हालांकि उनका कोई काम नहीं)। फटाफट उन्होंने एक पहचान पत्र और दो फोटो मांगी।

बगल में ही रखी फोटोकॉपी मशीन चालू की पहचान पत्र रखा, बटन दबाया। पीली बत्ती से स्कैन हुआ और हो गई फोटो कॉपी।

सिम अपने मोबाइल में डाल कुछ पंजीकरण करने में जुट गए। अब तक सूरज भी ढल चुका है।

जम्मू के हालात

एक सवाल जो मेरे दिमाग में तब से उमड़ रहा है जबसे जम्मू में दाखिल हुआ हूं वो ये क्या जम्मू भी कश्मीर की तरह ही अतांक से ग्रसित है या नहीं। सो दुकानदार भैया से पूछ ही डाला।

उनका भी संतुष्टि भरा जवाब आया। “जम्मू में ऐसा ना के बराबर ही है क्योंकि यहां कडी सुरक्षा और चौतरफा कैमरे होने के कारण कोई भी आदमी कांड करने के बाद बच नहीं सकता।

जैसे हाल ही में कुछ दिन पहले बम फटने के चौबीस घंटे के भीतर ही अपराधी धर दबोचा गया था।”

दूसरा कारण उन्होंने हिन्दुओं की ज्यादा संख्या होना भी बताया और अवाम की जम्मू के प्रति वफादारी और जागरूकता। बात चल ही रही थी कि इतने में सिम तैयार हो गया।

एक महीने वाला किफायती रिचार्ज करवा लिया, लेकिन चालू होने में इसे आधा घंटा तो लगेगा ही।

भैया जी ने ऐसा ना होने पर आधे घंटे बाद उन्हें तत्काल फोन करने को बताया और नंबर सिम की किट के पीछे लिख दिया।

मैं सिम लेे चल दिया इसी मंशा से की आज के आज ही वैष्णो देवी चढ़ाई भी करनी है। बैग ले भक्ति भाव में चूर होकर निकल पड़ा वैष्णो देवी दरबार के लिए। अंधेरे में कटरा थोड़ा बहुत जगमगा उठा।

दुकान से चौराहे तक कई यात्री दिखे सिम खरीदते हुए। सड़क मार्ग पर यात्रियों का काफिला कटरा आते देखा जा सकता है।

बच्चे बूढ़े नौजवान का जत्था, गरीब अमीर हर कोई माता के दर्शन को आतुर दिखाई पड़ रहा है।

पेट पूजा

इससे पहले बैग जमा करके आगे बढ़ता तिराहे के पास कई ढाबे दिखे। भूख तो लगी है और समय भी हो चला है, जब ये तय है चढ़ाई करनी ही है तो क्यों ना पेट पूजा करके ही आगे बढ़ा जाए।

तीन चार भोजनालय एक सिरे से हैं, उनमें से किनारे वाले रेस्तरां में दाखिल हुआ। सीट पर विराजमान हुआ भी नहीं की ऑर्डर लेने के लिए भाई साहब आ गए।

मेनू कार्ड के अनुकूल ऑर्डर दे दिया। लजीज भोजन के आते ही टूट पड़ा।

दिनभर की थकान और लंबी बस यात्रा के बाद कहीं अब जा कर अन्न की शक्ल देखने को मिल रही है। भूख ज्यादा है भी नहीं और चढ़ाई को ध्यान में रखते हुए भोजन भी हल्का फुल्का ही किया।

दीवार से सटा बैग उठाया और काउंटर पर धन्ना सेठ को पेमेंट करने आ खड़ा हुआ। देखा तो ऑनलाइन पेमेंट की सुविधा उपलब्ध है।

मोबाइल निकाला तो नजर पड़ी नेटवर्क की कटी हुई डंडी पर। मतलब अभी समय लगेगा सिम चालू होने में। मजबूरन नकद देना पड़ा।

किसी भी रेस्तरां से भुगतान करते वक़्त अगर थोड़ी सौंफ का स्वाद ना लिया तो पेमेंट भी अधूरा सा लगता है।

अमानती घर की खोज

अब ये बैग किसी एक जगह रख कर चढ़ाई के लिए प्रस्थान करना है। बैग को सुरक्षित रखा भी एक ही जगह जा सकता है, वो है अमानती घर। बैग टांगें टांगे कंधे भी दुखने लगे हैं।

अमानती घर की खोज करते करते चौराहे से बाएं मुड़ने पर एक बड़ी सी इमारत दिखीं, जिसके बाहर भीड़ जमा है।

पास में सादे लिबास में खड़े सज्जन से मुखातिब हुआ। पूछा तो मसाला चबाते हुए अपने भरे मूह से बोले यही है अमानती घर।

उनका बोला हुआ तो ज्यादा समझ ना आया लेकिन जब जब हांथ हिलाते हुए इशारा किया तो पता चला। बैग टांगे योद्धा की तरह दाखिल हुआ, दरवाज़े पर से ही लोगों का जमावड़ा दिख रहा है।

जनता जनार्दन में से कुछ बैग हाथ में लिए ज़मीन पर बैठे अपने साथियों का इंतजार कर रहे है तो कोई बैग जमा होने का। मैं भी बैग लेके एक जगह बैठ गया।

कुछ कदम पर काउंटर है, उठा तो देखा एक अधेड़ उम्र का आदमी सारी कार्यवाही कर रहा है।

अमूमन हमें अक्सर ऐसी जगह चिड़चिड़े लोग ही मिलते है, पर ये जमाकर्ता बेहद ही सरल स्वभाव और शांति के साथ अपना काम कर रहे हैं।

चाहें भीड़ का तांता लगा हो या काउंटर खाली हो। काउंटर पर जमाकर्ता से सारा विवरण लिया, बड़े इत्मीनान से एक सांस में सारी सुविधाएं गिना डालीं। मैंने हामी भर रजिस्टर पर एंट्री करवा दी।

जमाकर्ता ने बैग सहित मुझे अन्दर बुलाया और बताई हुई जगह पर बैग रखवा दिया।

मैंने दोनों बड़े बैग को चैन से बांध कर ताला लगा दिया। छोटे बैग अलग कर उसमे कैमरा मोबाइल बटुआ रख लिया। एक पर्ची बैग में घुसिडवा दी और एक मुझे थमा दी।

जाते जाते जमाकर्ता ने सीधे शब्दों में सूचित किया की रात के दस से सुबह छह बजे तक कोई सेवा नहीं हो सकेगी। ये बात मैंने दिमाग में बैठा ली।

बैग जमा की प्रक्रिया पूरी करने के बाद अब बारी है यात्रा पास लेने की।

परसों की गलती का खामियाजा अभी तक चुकाना पड़ रहा है। स्विमिंग पूल में नहाते वक़्त नाक में घुसे पानी के कारण हल्का हल्का बुखार चढ़ने लगा है। मालूम पड़ा यात्रा पास सिर्फ रात के दस बजे तक ही मिलता है।

वैष्णो देवी यात्रा पास

अमानती घर से कुछ ही दूरी पर सटी इमारत में यात्रा पास लेने के लिए घुसा। रस्सी रेलिंग पुलिस से साजी इमारत में जाने से पहले टुनटुनाते उपकरण से जांच हुई। जो सिर्फ बजने के लिए ही बना है।

अन्दर आने के बाद देखा सुकून मिला कि ज्यादा भीड़ नहीं है। रात के समय अधिकांश लोग चढ़ाई को प्राथमिकता नहीं देते हैं। यही कारण है दिन में जोरदार भीड़ होती है और रात में कम।

चलते चलते कंपाउंड में पहुंचा जहां यात्रा पास बंट रहे हैं।

यात्रा पास के लिए चार खिड़कियां बनी हैं जिससे काम तेज़ी से होता दिख रहा है। किसी भी यात्री को ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ रहा है।

पता चला आधार कार्ड का होना बहुत ज़रूरी है, जिसके बिना यात्रा कार्ड बनेगा ही नहीं। आधार कार्ड तो मैं साथ लाया नहीं, दो चार युवक के पीछे खड़ा इसी सोच में पड़ गया।

याद आया अगर आधार कार्ड की कॉपी मोबाइल में निकल आईं तो बात बन जाएगी।

मोबाइल का हर एक फोल्डर छान मारा और आधार कार्ड की कॉपी समय से मिल भी गई। अब जब मेरा नंबर आया तब खिड़की के उस पार बैठी मैडम जी से मैंने मोबाइल आधार कार्ड की पुष्टि कर ली।

उनके हामी भरने पर ही मैंने मोबाइल आगे बढ़ा कर आधार कार्ड दिखाया। इधर कार्ड दिखना था उधर ऑनलाइन यात्रा पास बन गया। इतनी तेज़ प्रक्रिया की उम्मीद कम ही थी।

निशुल्क यात्रा पास और अमानती बैग की पर्ची इन दो जिम्मेदारियों के साथ इमारत से बाहर निकल चौराहे पर आया।

वैष्णो देवी की चढ़ाई: पूर्ण तैयारी

चौराहे पर काफी भक्ति भाव में डूबी भीड़ है। कुछ चढ़ाई की दिशा तरफ बढ़ते दिखे कुछ होटल के बाहर खाना पचाते हुए, बच्चे अपनी मौज मस्ती में दिखाई पड़े।

इससे पहले चढ़ाई का श्री गणेश किया जाए। एहतियातन अंग्रेजी दवाखाने से बुखार की दवा लेने पहुंच गया।

अब तक मोबाइल भी चालू हो गया है, वॉट्सएप पर डॉ मित्र की सलाह से उसके द्वार बताई हुई दवा मेडिकल स्टोर से लेलीं।

हो ना हो यदि यात्रा के दरमियान बुखार बढ़ता है तो उसे काबू किया जा सके। कदम बढ़ चले दर्शनी दरवाज़ा की ओर। मन उत्साह से भर उठा है।

चमचमाती दुकानें के सामने से बड़ें चौराहे से एकदम बाईं ओर चल ही कि अचानक बत्ती चली गई। डूब गया कटरा अंधेरे में।

इस घनघोर अंधकार में भी रिक्शा ऑटो चालक वैष्णो दरबार के गेट तक छोड़ने को तैयार हैं, जाहिर है बिना पैसे के तो नहीं।

महज एक किमी के लिए क्या ही ऑटो करूं! मौज मस्ती में एक किमी का सफर ऐसे ही काट गया।

दर्शनी दरवाज़ा

दर्शनी दरवाज़ा पहुंचा तो वहां छोटी छोटी लाइन बनी दिखीं। मैं भी झट से कतार में आ खड़ा हुआ। बस ये आखिरी जांच प्रक्रिया है उसके बाद पावन स्थान तक कोई जांच नहीं है शायद।

कतार में एक दद्दू इतनी जल्दी में है की उनसे ठीक से खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा। उतावलेपन में उछलते हुए वो तीन चार लोगों से आगे निकल गए।

दुबक कर फिर से आगे बढ़ ही रहे हैं कि पुलिस पतली लाठी जमीन पर और दद्दू जहां के तहां खड़े हो गए। घबराहट में यात्रा पास भी गिरा दिया। सुरक्षा जांच में बिना यात्रा कार्ड धारक को अन्दर जाने ही नहीं दे रहे हैं।

कडी जांच से गुजरते हुए रात के बज गए दस। दर्शनी दरवाज़े पर घोड़ों खच्चरों के अस्तबल से स्वागत हुआ। दाएं बाएं हर जगह गोबर करते घोड़ों के मालिक उन्हें सहला रहे हैं।

कुछ अपने घोड़ों की पीठ पर हांथ फेरते हुए भवन तक जाने के इच्छुक हैं। सब अपना अपना पेट पाल रहे हैं। फिलहाल जिस रास्ते से चल के मैं जा रहा हूं वो पुराना रास्ता कहलाता है।

अब यहीं से खड़े खड़े हाल फिलहाल बने नए मार्ग को भी देखा जा सकता है। सुना है नया रास्ता थोड़ा लम्बा जरूर है लेकिन तरोताजा है।

ना किसी घोड़े या खच्चर का दखल ना ज्यादा मानव। जाने का मन तो उधर से ही कर रहा है पर क्या करूं। बीस बरस पहले जब आया था तब इसी रस्ते पर इक्का दुक्का दुकानें हुआ करती थीं।

आज सैकड़ों की तादाद में भरमार है। इधर बुखार अपने चरम पर है, हालात ये हैं कि बुखार हावी हो रहा है जिसके कारण शरीर कमजोर पड़ रहा है। किसी तरह चलता चला गया।

दुकान और ग्राहक की भीड़ भाड़ होने के कारण रास्ता पता ही नहीं चल रहा है। हालांकि रास्ते में रोशनी की कोई कमी नहीं है।

बाण गंगा

बाण गंगा तक आते आते देखा कि लाठी और जय माता दी वाली पट्टी हर दुकान में मिल जाएगी। बाण गंगा वही स्थान है जहां माता ने अपने बाण से गंगा को उजागर किया था और अपने केश धोए थे।

इसलिए दिन में यहां अनेकों लोग डुबकी लगाते हैं। रात का माहौल है इसलिए कोई इतने ठंडे पानी शरीर तो क्या मूह भी धोने की जुर्रत नहीं करेगा।

एक दुकान पर बातचीत हुई तो मालूम पडा लाठी और पट्टी की कीमत इतनी कम की लेते वक़्त सोचना भी ना पड़े।

मेरा मानना है कि किसी भी यात्रा में जितना कम बोझ हो उतना अच्छा। मेरे लिए तो एक बोझ सामान हो जाएगी ये लाठी। अजय ने सहारे के लिए दुकान से अपने लिए दो लाठी खरीद ली।

दुकानों की चाकचौध के बीच चढ़ाई चालू हुई। तकरीबन एक किमी की चढ़ाई तक इन सुसज्जित दुकानों को देख मैं हैरान हूं।

इतनी ज्यादा बेरोजगारी और आस्था के इस केंद्र में इन दुकानों का होना एक तरह से भक्तों को परेशानी में डालने जैसा है।

जैसे ही आगे बढ़ता कोई ना कोई दुकानदार अपनी दुकान में आने का प्रस्ताव देता। मैं एक पल को सुनता और नज़रंदाज़ करते हुए आगे बढ़ जाता।

मौज मस्ती करते हुऐ चढते लेखक

कभी कभार उलझन भी होने लगती, जब मैं अपने सीधे रस्ते चलता और कोई दुकानदार बीच में आ खड़ा हो अपनी दुकान पर चलने को कहता। उन्हें ये समझना चाहिए श्रद्धालु हूं सौदागर नहीं।

आखिरकार वो रास्ता भी आ गया जहां से अब कोई दुकान नहीं। सुकून मिला इस भीड़ भाड़ से। अंधेरे में चमकता कटरा देखा जा सकता है। घुमावदार रास्तों से मैं बतियते हुए बढ रहा हूं।

साथ में चल रही बूढ़ी काकी और काका जो उम्रदराज जरूर हैं लेकिन उम्र को मात देते हुए बढ़े जा रहे हैं।

उन सभी को चुनौती देते दिख रहे हैं जो चढ़ने में सक्षम नहीं हैं। समय की बचत को देखते हुए भक्तों के लिए सीढ़ियां बनाई गई है जिससे ज्यादा चलना नहीं पड़ता।

कोई ढाई सौ सीढ़ी तो कोई पांच सौ। इन सभी में से सबसे लंबी सीढ़ी अाई जो 740 कदमों वाली है। जिसकी चढ़ाई चढ़ते ही चरण पादुका स्थल आ जाता है।

चरण पादुका

कहा जाता है यहां माता कुछ देर के लिए रूकी थी और पीछे मुड़कर देखा था कि कहीं भैरों नाथ पीछा तो नहीं कर रहे।

फिलहाल तो मैं पिछड़ गया हूं, हालत इतनी खराब है कि और आगे चला भी नहीं जा रहा। खैर मैंने निश्चय किया कि बाकी की सीढ़ियों की तरह इस सीढ़ियों पर भी बीच में कहीं नहीं रुकना है।

कोशिश भी यही रही, भी वही दनदनाते हुए चढ़ता चला गया।

सीढ़ी पर जितने लोग साथ चल रहे हैं वो एक पल के लिए ठहर गए, लेकिन मैं तब तक नहीं रुका जब तलक सीढ़ियों का अंत ना हो जाए।

हांफते हांफते 740 सीढ़ियां चढ़ तो लीं उसके बाद शरीर का तापमान बढ़ चला है। पसीने से लथपथ लाल चेहरा लेके मैं एक किनारे बैठ गया।

ऐसा लग रहा है मानो किसी युद्ध में हिस्सा ले जा रहा हूं। सीढ़ी होती तो सुविधा के लिए है लेकिन चढ़ते चढ़ते सांस फूल गई।

जो डेढ़ किमी का घुमावदार रास्ता बचाया है वो अब सुस्ताने में निकल रहा है। हालत इतनी खराब है कि जितना समय चढ़ने में लगा है उससे ज्यादा चढ़ने के बाद आराम में।

लेकिन शरीर को जितना ज्यादा आराम उतना ज्यादा आलस। नेहरू जी ने कहा है आराम हराम है। एक बार ठंडे हो गए तो मामला बेकार। उठकर वाटर कूलर से खाली बोतल में पानी भरा और चल पड़ा फिर से।

आर्धकुमारी

दो घंटे की नॉन स्टॉप चढ़ाई के बाद आर्धकुमारी आ पहुंचा।

लाउडस्पीकर पर निरंतर कभी किसी के बच्चा गुम हो जाने की घोषणा होती तो कभी किसी के मोबाइल या बटुआ मिलने की।

अर्धकुमारी पहुंच कर एक पल को लगा कि यही वैष्णो देवी है लेकिन जब आस पास खड़े लोगों से पूछा तब भ्रम मिटा।

इतनी भीड़ जिसका कोई हिसाब नहीं। आधी रात बीत जाने के बाद भी मंदिर में भजन कीर्तन और जगराता चालू है।

कोई इधर को भाग रहा किसी को नीचे जाने की होड़ है। अर्धकुमारी वो स्थान है जहां माता ने गुफा में नौ महीने तक घोर तपस्या की थी।

गुफा में जाने से पहले लोग एक बार को संशय में रहते हैं, पर सब बड़े ही आराम से गुफा के भीतर से निकल जाते हैं।

जमीन पर लेटे लेटे सोचा आज रात यहीं रुक जाना बेहतर होगा। मुझसे अब और आगे जाने की तपस्या नहीं होगी ये तो तय है। जमीन पर धड़ाम हो गया। हर हाल में दवा की जरूरत है।

मार्ग से गुजर रहे भक्तगड़ों ने सचेत किया कि यहां रुकना मतलब रातों रात जेब खाली कराना।

चोरी चाकरी जम के होती है। ये सुनना ही था जैसे तपते शरीर के साथ जमीन पर से उठ मैं नौ दो ग्यारह हो चला। हिम्मत बांधी और आगे बढ़ा।

जगह जगह कॉफी की छोटी छोटी स्टॉल लगी हैं।

कॉफ़ी का चमत्कार

On the way to Bhavan

यात्रा की शुरुआत

आखिरकार कारवां थमा और कॉफी की दुकान पर एक कप कॉफी पी। कॉफी के बाद तो जैसे मैं शक्तिमान हो गया।

सिर से लेके पांव तक जो शक्ति का संचार हुआ, बुखार को बुखार हो गया। अबतक मुख से बोलने में पीड़ा हो रही थी, अब चुप कराए भी नहीं चुप हो रहा।

बिना रुके बिना थके चलता चला जा रहा हूं। जिस लाठी को मैं बेकार समझ रहा था उसी लाठी में दोनों छोटे बैग लटका कर एक ओर से मैंने और दूसरे छोर से अजय ने पकड़ कर मीलों का रास्ता नापने लगा।

मैं इन पहाड़ियों से इतना प्रभावित हूं कि मुझे कारगिल की लड़ाई के वो दिन याद आने लगे जब युद्ध हुआ था।

फौज में रुचि बचपन से ही रही है यही कारण है कि मुझे फौज की अधिकतर लड़ाइयों के बारे में विस्तृत जानकारी हमेशा सुनने और सुनाने में दिलचस्पी रही है।

कारगिल के वीरों की शौर्य गाथाओं को बड़बड़ाते हुए ना जाने कितने किमी का सफ़र तय कर दिया। एक कप कॉफी इतना असर करेगी पता नहीं था। हर उस वीर के बारे में जिसने कुर्बानी दी।

फौज हमें जीवन में बहुत कुछ करने को सिखाती है, बहानेबाजी फौज का हिस्सा नहीं। त्रिकुटा पर्वत पर भी फौज तैनात है, जो यहां की देखरेख करती है।

पूरा रास्ता टीन से ढाका हुआ है ताकि कोई पत्थर गिरे भी तो टीन पर ना कि किसी भक्त पर।

भूतकाल में पत्थर गिरने से अनेकों श्रद्धालुओं को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है।

बीस साल पहले भी जब आया था तब पत्थर गिरने से एक बच्चे की मौके पर ही मौत हो गई थी। कुछ टीने दबी, पचकी और टेडी भी है जिनसे साफ झलकता है कि पत्थर अभी भी गिरते हैं।

हिमकोटी

टीन पर नजर पड़ी तो देखा बंदर अपने बच्चों को लेके जाली में हाथ पांव फसा सो रहे है।

बंदरों को सोते हुए पहली बार देख रहा हूं और सोते में ये कितने प्यारे लग रहे है। जब नहीं सोते हैं तो ना दूसरों को सोने देते हैं और ना तो प्यारे लगते हैं।

जो साथी साथ चल रहे है वो थक कर बैठ जा रहे हैं। इक्का दुक्का ही हैं जो कुछ दूरी तक साथ आए लेकिन एक बिंदु पर आ कर वो भी बैठ गए।

मुझे उम्मीद थी कि वो फिर से आगे मिलेंगे पर ऐसा ना हुआ। हिमकोटी से कटरा का नज़ारा देखते तो बनता है।

इतनी ऊंचाई से झिलमिल सितारों जैसा आंगन प्रतीत हो रहा है। कुछ तस्वीरें कैमरे में कैद करते करते निकल गया।

अन्य स्थलों की तरह यहां भी चिकित्सा, दवाइयां से जुड़ी सभी मुख्य चीजें उपलब्ध हैं जो उनके लिए बड़ी लाभकारी हैं जो वृद्ध हैं या फिर कोई अन्य शारीरिक समस्या।

श्राइन बोर्ड की मदद से यहां श्रद्धालुओं के लिए हर एक सुविधा उपलब्ध है, सुरक्षा से लेके चिकित्सा तक। मेरे साथ में चल रहा है डोली दल जो माता जी को साथ में लिए कदम से कदम मिलाते हुए आगे बढ़ रहा है।

रोजाना काम करने वालों का जोश और स्फूर्ति अलग ही स्तर पर होती है। इनको देख मैंने भी अपनी रफ़्तार कुछ तेज़ की।

लोग एक टुक निगाहों से देखे जा रहे है कि कैसे मैं एक लाठी में दोनों बैग लटकाए बिना रुके आगे बढ़ता जा रहा हूं।

कुछ की वो सस्ती लाठी टूटी पड़ी हैं तो किसी से दीमक निकल रहा है। सड़ी हुई लकड़ी की बनी ये लाठियां और चलेंगी भी कितनी देर।

पिट्ठू दल भी माता का जयकारा लगाते हुए अपनी होने की उपस्थिति दर्ज करा रहा है।

जोश भी सातवे आसमान पर है और जो साथ चल रहे हैं उनकी भी होसलाफजई करते नहीं थकते ये पिट्ठू।

रास्ते भर शायद ही मुझे कहीं घोड़ा दल दिखा होगा। अंधेरी रात में को घोड़े पर सवार होने का जोखिम कौन ही उठाएगा।

विश्राम करती वानर सेना

मुख्य भवन में दर्शन

बिना थके बिना रुके बतियाते हुए रात के दो बजे तक भवन आ पहुंचा। लाठी से बैग उतार कर खड़ा हुआ एक जगह। यहां भक्तों के ठहरने की व्यवस्था से लेकर सब कुछ मौजूद है।

कुल साढ़े पांच घंटे के सफ़र में दर्शानी दरवाज़े से भवन तक चढ़ाई तय हो गई।

समय का तो पता ही नहीं चला, खासतौर से अर्धकुमारी के बाद का सफर ज्यादा मजेदार रहा। नज़र पड़ी तो देखा एंट्री गेट से पहले दाईं ओर दुसलखाना बना है।

ठंडे ठंडे पानी से शुद्धिकरण किया। मैं अकेला नहीं यहां, देर रात कुछ लोग तो इस आधी रात में जमा देने वाले पानी में स्नान कर रहे हैं।

उनका इस तरह नहाना अपने आप में सलामी देने के बराबर है। कड़ाके कि ठंड पड़ रही है। बदन पर सिवाय एक टीशर्ट के और कुछ भी नहीं।

शुद्धिकरण के बाद तैयार हो गया और निकल पड़ा एंट्री प्वाइंट की तरफ, जहां सुरक्षा के लिए फौज तैनात है। लग गया कतार में।

कतार वाली रेलिंग बहुत दूर तक है लेकिन उसके मुकाबले भीड़ एक तिहाई भी नहीं है। चौंकाने वाली बात ये है कि इतनी घोर रात में भी भक्तों का जमावड़ा कम नहीं है।

हालांकि कोई स्थाई कतार नहीं है लेकिन चलती फिरती भीड़ बरकरार है। औरों की तरह मैं भी कडी सुरक्षा के दौर से जांचा जाने लगा।

तगड़ी जांच प्रक्रिया और जय माता दी के नारों के बीच से गुजरते हुए वैष्णो माता के दरबार कक्ष के सामने आ खड़ा हुआ जहां माँ काली, माँ लक्ष्मी, माँ सरस्वती का वास है। द्वार को रेलिंग के माध्यम से दो हिस्सों में बांटा गया है।

बाईं तरफ से अन्दर दाईं तरफ से बाहर। धक्का मुक्की के बीच मैं अन्दर जा पहुंचा। यहां तैनात पुलिसवाले किसी को भी इससे ज्यादा रुकने का मौका ही नहीं दे रहे हैं।

कोई रुक जाता तो उसकी पीठ पर थपकी मार कर उसे आगे बढ़ा देते। मेरे साथ भी यही हुआ। अन्दर पहुंचा, पंडित जी ने टिका लगाया और प्रसाद दिया।

जब हाथ जोड़कर आंख बंद करी तो माता के सामने था आंख खुली तब तक धक्का पड़ते हुए आगे खिसक आया। पूरे एक सेकंड दर्शन हुए।

दर्शन के बाद बहुत ही सुकून मिला। मेरा तो फिर से जाने का मन कर रहा है पर क्या करूं फौजी भाई भी बोलेंगे कितनी बार करोगे दर्शन।

सोने की व्यवस्था

दरबार से बाहर आ कर भवन के लिए सोने की व्यवस्था देखने निकल पड़ा। तीन इमारतें है जिनमे से एक में माता विराजमान हैं, एक में भक्तों के रहने खाने सोने की व्यवस्था है।

यहां पहुंचा तो देखा बहुत बड़े से बरामदे में चारो तरफ लोग कम्बल ओढ़े सो रहे हैं।

सामने एक बड़ा सा काउंटर है जहां कम्बल वितरण हो रहे हैं। मैं भी काउंटर पर जा पहुंचा। चार कम्बल की पर्ची कटा ली।

दुकानदार ने बताया “कुछ देर पहले तक तो अकाल पडा था कंबलों का।

आप कम्बल खरीदो और बिछा कर सो जाओ जब नींद पूरी हो जाए तब वापस करदो सो पैसे भी वापस हो जाएंगे”।

वाह क्या सिस्टम है सिर्फ गारंटी का पैसा वो भी इसलिए की ग्राहक कम्बल लेकर ना भाग जाए। भारत में अमूमन सामान लेके भागना आम बात है।

जब बड़े बड़े उद्योगपति कर्जा लेके भाग जाते हैं तो कम्बल क्या चीज है। कम्बल और गद्दे खरीद तो लिए लेकिन सोने की उपयुक्त जगह कहीं ना दिख रही।

हालांकि कुछ लोगों के लिए ये सुबह हो गई है। उठ कर जाने लगे, पर जो आसपास सो रहे होते वो और चौंडे होकर सो जाते। मुश्किल से खुले बरामदे में दो लोगों की सोने लायक जगह दिखीं।

दौड़कर उस जगह पर कब्ज़ा किया और यहीं कम्बल और गद्दे बिछाए बैग छाती से लगा कर लेट गया।

लेकिन सोने से पहले दवा खा ली। चूंकि तबीयत नासाज है तो जितनी लम्बी नींद होगी उतना लाभकारी। सोते सोते साढ़े तीन बज गए। कब नींद लग गई पता ही नहीं चला।

निद्रा हुई भंग

सुबह सवेरे आठ बजे हड़बड़ी में अजय ने उठा दिया। एक घंटा अधिक नींद लेने की इच्छा है जिसके बाद मेरी थकान और बुखार दोनों पूरी तरह से मिट जाएगा।

लेकिन भाईसाहब का मानना है कि आज ही शिवखोड़ी के लिए निकल लिया जाएगा। शिवखोड़ी गुफाएं यहां से अस्सी किमी दूर हैं और हो ना हो उसका एक निर्धारित समय होगा।

फिलहाल तो फटाफट उठ कर बिस्तर समेटा।

समेटकर वापस काउंटर में थमा दिया। कम्बल की पर्ची दिखाई और वापस पैसा हांथ में। वैष्णो देवी में भैरों बाबा के दर्शन नहीं किए तो यात्रा अधूरी मानी जाती है।

जाने के लिए आंगनवाड़ी से बाहर निकला। एक बात तो माननी पड़ेगी यहां किसी भी प्रकार से किसी भी व्यवस्था में कोई कमी नहीं है। लाखों लोग आते हैं लेकिन खयाल सबका रखा जाता है।

शुद्धिकरण

इसी प्रकार मैं दुसलखाने की ओर बढ़ा जहां साफ सफाई में कोई कोताही नहीं। बराबर कर्मचारी लगे हुए हैं सेवा भाव से।

स्नान वगैरह करके एक किनारे आ खड़ा हुआ कि तभी मेरी नजर पड़ी उड़न खटोला पर। भैरव बाबा के दर्शन के लिए उड़नखटोले हर 10 मिनट में उड़ान भर रहे हैं।

उड़न खटोला के पास इतनी भीड़, जैसे सब जाएंगे तो उड़ कर ही जाएंगे वरना नहीं। एक हरी पत्ती और मिनटों में ऊपर। पर मैंने सोचा दो किमी की चढ़ाई के लिए क्या ही उड़न खटोला में जाऊं।

यात्रा शुरू की भवन से निकल कर दरबार की ओर आया तो आंखे फटी की फटी रह गईं।

रात में जहां भीड़ नदारद थी सुबह भीड़ इतनी है कि रेलिंग के बाहर भी लंबी लाइन लगी है। इसमें किसी भी प्राणी को कम से कम चार घंटे का समय तो लगेगा ही दर्शन करते करते।

पलक झपकते ही भीड़ की संख्या में भी इजाफा हो रहा है। ये भीड़ रात की भीड़ की तिगुनी है।

इतनी की भैरो बाबा के मार्ग तक कतार आ पहुंची है। भीड़ कर तो यही लगता है कि रात में ही दर्शन करना सही है।

इत्मीनान से हो भी गए, अभी तो धक्का मुक्की में देवियां देखने तक को नहीं मिलेंगी। लेकिन भक्तिभाव देखने लायक है।

एक हाथ में टोकरी एक में बच्ची लिए खड़े अंकल जोर से बोलो जय माता दी का जयघोष लगाने में कोई आलस नहीं दिखा रहे।

परीक्षा

सुकून की सांस लेते हुए शुरू कि पैदल यात्रा भैरों नाथ के लिए। चढ़ाई शुरू ही की है नजर पड़ी आठ मजदूरों पर जो बड़ी ताकत और ज़ोर लगा के भारी भरकम ट्रॉली को ऊपर लेे जाने में लगे पड़े हैं।

उनके ज़ोर लगाने के बाद भी ट्रॉली नीचे को खिसक रही है। मैं और अजय दौड़ कर भागे उनकी ट्रॉली को धक्का लगाने।

थोड़ा ज़ोर लगाया, पीछे से धक्का दे रहे दो आदमियों को आगे से घसीटने को भेजा। अब ट्रॉली नीचे जाने के बजाए कुछ ऊपर जा रही है।

तपते शरीर के साथ उसपे और ज़ोर लगाया, सबने अपनी ताकत झोंक दी। पहिया घूमा, हौसला बढ़ा, थोड़ा और ज़ोर लगाते हुए रेंगते हुए जैसे तैसे सब मिलकर ऊपर की ओर ले आए।

जब आठ से दस हुए तब कहीं जाकर ट्रॉली आगे बढ़ी और एक छोर तक अाई। सफलता मिली।

दयनीय स्थिति तो तब पैदा हो गई थी जब ट्रॉली नीचे की ओर जाने लगी थी। अगर नीचे ढकील जाती तो कतार में खड़े श्रद्धालुओं का क्या होता।

मन यही कह रहा है एक बड़ी दुर्घटना टल गई। सभी मजदूरों ने हृदय से धन्यवाद दिया, उनसे विदा लेे आगे की चढ़ाई के लिए बढ़ गया।

यात्रा की भैरों नाथ

मार्ग में इक्का दुक्का लोग दिखे उनके अलावा लगता है सब उड़न खटोला से पहुंच रहे हैं। मैं इधर सीढ़ी चढ़ रहा इधर ऊपर से दनादन उड़न खटोला उड़न तस्तरी की भांति निकल रहे।

हर दस मिनट में सिर के ऊपर से एक निकलता। गिने चुने लोग ही पैदल मार्ग से जा रहे हैं।

पैदल मार्ग से आते भक्त

इतना खाली मार्ग मेरे अलावा कोई है ही नहीं। पैंतालीस मिनट में भैरव बाबा मंदिर पहुंचा। कदम रखा ही है कि नया बवाल देखने को मिला। हड़कंप मच गया।

उड़नखटोले से उतरी एक नौजवान महिला की आंखो के सामने से उसका पति ओझल हो गया। हल्ला मचाते हुए वो इधर उधर हर जगह अपने पति को ढूंढने लगी।

लेकिन वो कहीं ना मिला। मेरी तरह हर कोई उसे दया दृष्टि से देखने लगा। लेकिन वो नहीं मिला। महिला ढूंढ़ते हुए नीचे की ओर चल दी।

कुछ देर में सब वापस अपने काम में लग गए। इधर दो लड़ाई करते बंदरों दिखे। एक केले के लिए कटाझुज्झ हो गई।

नोच डाला एक दूसरे को। इनका बस चले तो अपनी पूछ से सूताई कर दे एक दूसरे की। यहां मानव से ज्यादा मात्रा में वानर हैं।  ये हांथ में किसी भी वस्तु को झपटने में निपुड़ हैं।

इससे पहले ये मेरे हांथ से कैमरा झटके मैंने तुरंत कैमरा छोटे बैग में डाल कर बैग सीने से लगा लिया।

भैरों नाथ दर्शन

दर्शन करने की बारी अाई तो पहले अजय को भेजा ताकि कुछ वक़्त थोड़ा सुस्ता लूं। इसी बीच एक वानर पड़ोस में बैठी अम्मा जी के हांथ से केला झपट कर भाग गया।

अम्मा जी की वो हालत पतली हुई है कि वो बाकी केले भी छोड़ कर भाग खड़ी हुईं। मैंने दोनों बैग और जूते कसकर जकड़ लिए, ताकि अगर बंदर झप्पटा भी मारे तो उसके साथ मैं भी घसीटता चला जाऊं।

अजय के आने के बाद मैंने उसे सारा किस्सा सुनाया और सभी चीज़ों को जकड़कर पकड़ने को बताया। प्रवेश द्वार की रेलिंग पर चार पांच बंदर बैठे पहरा दे रहे हैं, मेरा स्वागत करने के लिए तत्पर हैं।

अब मुसीबत ये है कि मैं यहां से निकलूं कैसे। किसी ने मेरे बाल पकड़ कर झकझोर दिया तो मेरा तो सारा बुखार उतर जाएगा। हांथ में डंडा लिए भगवा धारी अंकल दौड़ते हुए बंदरों को भगाने आए और अचानक झुंड के झुंड गायब।

मैं आराम से निकलता चला गया और गर्भ गृह में दर्शन प्राप्त हुए। बेहद छोटे से मंदिर में दर्शन के बाद बाहर आया। देखा तो सामने बहुत बड़ा बरामदा।

यहां भी भीड़ कम नहीं है। ये वो हैं जिन्होंने रात में माता के दर्शन कर लिए हैं। बहुत बड़े चबूतरे में सभी की तरह मैं भी टेहेलने लगा।

यहां से जो पहाड़ियों की चोटी दिख रही हैं वो अद्भुद हैं। पहाड़ी के समांतर खड़े होकर उसको निहारने का अपना अलग ही मज़ा है। जैसे घर में आई नई दुल्हन। धूप भी मज़े की है।

कटरा वापसी

इधर उधर फोटो लेने और पर्याप्त समय गुजारने के बाद ग्यारह मैं वापस कटरा के लिए उतरने लगा।

इस मर्तबा दूसरे रास्ते से। उतरते वक्त नज़र पड़ी वानर सेना पर। तकरीबन एक किमी तक वानर सेना तैनात है इसलिए कुछ भी निकाल के गुपचुप तरीके इनकी नज़रों से बचा कर नहीं खा सकते।

इन्हें भी सिर्फ खाने से मतलब है, मानव को हानि या पीड़ा नहीं पहुंचाएंगे।

मानव तो सिर्फ पीड़ा ही पहुंचता है। थोड़ी आगे चल कर किनारे स्टॉल और दुकानें लगीं हुई दिखीं। सोचा कुछ पेट पूजा कर ली जाए फिर यात्रा को जारी रखा जाए तो ज्यादा बेहतर होगा।

पहुंचा और दुकान पर चाय का आर्डर दिया। यहां भी बंदर कम नहीं। चाय की चुस्की ली और सुबह के नाश्ते के तौर पर कुछ सामान खरीद के बैग में डाल लिया।

टूट चुके शरीर में खुराक डालते रहना आवश्यक है। समय रहते चल दिया वापस अपने सफर पर।

बाबा भैरव नाथ के बाहर बना बरमदा

रास्ते भर मुझे जगह जगह बंदर तो दिख ही रहे हैं साथ में दिखने लगे हेलीकॉप्टर।

जो बूढ़े बुज़ुर्ग चढ़ाई चढ़ने में कतराते है या असमर्थ होते हैं वो इस सेवा का लाभ उठाते हैं। एक लिहाज से अच्छा भी है, अब कोई ये नहीं के सकेगा भगवान उसी को बुलाते है जिसके ऊपर कृपा है।

कुल मिला कर सारा दोष भगवान पर डालने की हमारी पुरानी आदत है। कॉरिडोर से नीचे जाते वक़्त हेलीकॉप्टर लॉन्च पैड बड़े आराम से देखा जा सकता है।

संझिछत

थोड़ा और नीचे आया तो हेलीकॉप्टर समांतर हो गए। पहुंच गया संझिछत यहां से हेलीकॉप्टर सर्सारेट हुए लैंड करते दिखे।

अभी तक भीड़ कम ही जगह पर दिखी पर अब चप्पे चप्पे पर भीड़ नजर आ रही है। घुमावदार रास्ते से जाने के बजाय मैंने सीढ़ी वाला रास्ता ही हर बार चुना उतरने के लिए।

शुरुआत में तो खाली सीढ़ियां मिली पर जैसे जैसे नीचे उतरता गया वैसे वैसे थके मांदे लोग सीढ़ी पर जगह घेरे बैठे दिखे।

सांझीछत हेली पैड

कुछ एक जगह बच्चे हाथ में कटोरा लेे भीख मांगते भी नज़र आए। बहुतेरे तो उतरने में ही थक गए। तेज धूप होने के कारण शरीर का भी तापमान बढ़ रहा है। खुद को अंगौछे से लपेट कर धूप से बचाने की पूरी कोशिश जारी है मेरी।

अर्धकुमारी से कब गुजर गया मालूम ही नहीं पड़ा। बड़ी तेज़ी से नीचे उतरता जा रहा हूं, कोशिश यही है जितनी जल्दी नीचे पहुंच कर किसी होटल में विश्राम करने का।

कोई कमांडो पुकारता तो रास्ते में मिला एक छोटे बालक को मुझमें उसे अपना सुपरमैन नजर आया। पर यहां इस मैन कि हालत बैडमैन जैसी हो गई है।

चरण पादुका, बाण गंगा से गुजरते हुए दुकानों के उस बाज़ार में आ खड़ा हुआ जहां से निकलना आसान नहीं है। ऐसा लग रहा है दुकानों से ही गुजर रहा हूं।

दर्शानी दरवाज़े पर आया लेकिन अब हालत बची नहीं है किसी मन्दिर के दर्शन करने लायक। अब तक पारा सौ के पार जा चुका है जिसे मैं महसूस कर सकता हूं।

कहीं भी जाने की क्षमता नहीं बची है। इधर अजय ने छोटे बच्चों की तरह जिद्द छेड़ दी है शिवखोड़ी निकलने की। इसी

मुद्दे पर गरमा गर्म बेहेस छिड़ गई। काफी देर की गरमा गर्मी के बाद मेरा ये तय हुआ कि मैं अपनी वर्तमान स्तिथि देखते हुए शिवखोड़ी तो नहीं जाऊंगा और कटरा के किसी होटल में विश्राम करूंगा।

उधर अजय अपनी जिद्द में बस अड्डे जा पहुंचा जहां मालूम पड़ा कि शिवखोड़ी के लिए अंतिम बस सुबह के ग्यारह बजे मिलती है, फिलहाल आधा से ज्यादा दिन बीत चुका है।

चूंकि अब कोई बस उपलब्ध नहीं है तो भाईसाहब भी मेरे साथ किसी होटल में ही रुकना चाहेंगे। कटरा के अमानती घर से बैग उठाया।

अमानती घर के ऊपर वाले हिस्से में काफी बड़ा हॉस्टल है। रिसेप्शन पर पूछने पर पता चला कि कमरे तो खाली हैं लेकिन इनकी एक दिन की कीमत बहुत अधिक। मन बना लिया कहीं बाहर ही होटल में ठहरूंगा।

बाहर निकल कर मैं बैग लेकर एक जगह खड़ा हो गया, उतनी देर में अजय होटल वालों से बातचीत करने लगा। मालूम पड़ा एक होटल में किफायती रेट में कमरा खाली है।

अयज उसकी जांच पड़ताल करके आया, जब उसे ठीक लगा तब मैंने भी देखा और वो कमरा एक दिन के लिए बुक कर लिया।

रूम में बैग पटक कर मैं निकल पड़ा दवाखाने से अंग्रेजी दवा लेने। वापस आया लेकिन बगैर खाना खाएं ही ऐसा सोया की फिर नींद टूटी रात में।

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नमस्ते, मैं ऐश्वर्य तिवारी हूं। ये उन दिनों की बात है जब मैं अपने जुनून का पालन करने के लिए अपने कॉर्पोरेट जीवन को पीछे छोड़ दिया।भारत को जानने के मेरे अंदर हमेशा एक जिज्ञासा थी क्योंकि इस देश में हर कुछ मील के बाद विविधता, विभिन्न संस्कृति है। हर दिन मेरे लिए एक नए शहर में एक नई प्राणी के साथ एक नया दिन है। मैं एक घुमक्कड़ हूं जो के विभिन्न हिस्सों में घूमना पसंद करता है और जल्द ही भारत से बाहर हो सकता है।

2 Comments

  1. Swati Mishra says:

    Dalal godi main utha ke le jaane main bhi nahi hichkichaenge padh ke itni hasi aayi na.. And fever hote hue bhi by foot pura journey cover Kia yrr.. pat on the back 👏

  2. Swati Mishra says:

    I felt like experiencing it myself. Too good.💓💓

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