उनाकोटी, त्रिपुरा, स्टोरीज ऑफ इंडिया
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उनाकोटी 99 लाख 99 हजार 999 मूर्तियां

आश्चर्य यात्रा

परसों रात से कल शाम तक के लगातार सफर ने बुरी तरह थका दिया था। जिस वजह से कल अगरतला पहुचनें के बाद भी कोई प्रमुख जगह जाना ना हो सका सिवाय विभान सभा भवन के।

घुमक्कड़ी समुदाय से उत्पल जी ने काफी मदद की अब तक। आज उन्होंने मेरे और अजय के लिए उनाकोटी जाने का प्रबंध किया है।

उनाकोटी पूर्वोत्तर भारत का बहुत ही जाना माना नाम है। हालांकि कुछ दिनों पहले तक मैं भी इसके बारे में नहीं जानता था। जाना तब जब बंगलौर के एक आर्मी कैंप में एक लड़के ने इस जगह का जिक्र किया।

आज उसी जिक्र की हुई जगह पर उत्पल जी हमें भेज रहे हैं। जिसकी ना मैंने कोई योजना बनाई थी ना सोचा था। कल ही उस रास्ते से गुजरते हुए आया हूं।

कल रात में ही सुबह के आठ बजे तक तैयार हो जाने का इशारा कर दिया था। ध्यान में थी ये बात और इसलिए अपने हिसाब से समय पर ही तैयार हो कर निकला।

सुबह सुबह अपने घर से चल कर उत्पल भाई जी खुद हमें छोड़ने आए हैं। हालांकि समय कुछ ऊपर नीचे हो ही गया है, कितना भी जल्दी कर लिया फिर भी।

उनाकोटी तक हमें ले जाने की जिम्मेदारी रूपक को दी गई है। जो पेशे से एक चालक हैं। सुबह की खिलखिलाती धूप के बीच मैं उत्पल जी से विदा लेते हुए निकल पड़ा।

अगरतला से उनाकोटी का सफर लगभग 123 किमी है। गूगल नक्शे पर समय कुछ पौने चार घंटे का बता रहा है। पर रूपक जी के अनुसार ये सफर तय होगा चार घंटे के आसपास।

भूख बहुत जोरों की लगी है ना सिर्फ मुझे बल्कि रूपक जी को भी। सुबह इतनी जल्दी निकलना हुआ की सिर्फ पानी के सिवाय कुछ भी नहीं गया पेट में।

शहर से बाहर निकलने के बाद तय हुआ इत्मीनान से एक जगह गाड़ी रोक कर पहले कुछ खाया पिया जाएगा फिर आगे बढ़ा जाएगा। शहर के अंदर करना तो ये संभव नहीं दिख रहा क्यूंकि इतनी भीड़ ऊपर से छोटी छोटी सड़कें।

ये वाहन कहीं रुका तो जाम लगना तो तय है। कुछ बीस मिनट में शहर के बाहर आ गए। शहर के बाहर आते रूपक ने एक ढाबे के किनारे गाड़ी लगाई।

जो यहां का बहुचर्चित ढाबा भी है। रूपक ने अपनी बंगाली भाषा में गरमा गरम जलेबी समोसा का ऑर्डर दिया। अगरतला या त्रिपुरा कह लें। यहां चाय में दूध पड़ता ही नहीं है।

यह मुझे तब पता चला जब अगरतला के लिए धर्मानगर से बस बदलने के पहले चाय का स्वाद चखा। जिसे दूध पाउडर से बनाया गया था।

और तो और उत्तर भारत के मुकाबले आबादी भी बहुत ही न्यूनतम स्तर पर है। यही कारण है कि दूर दूर तक बस्ती ही नहीं दिखती है। और चौड़ी सड़कें।

हांथ धो कर गरमा गरम नाश्ते का स्वाद चखा। जिसे खाने के बाद आत्मा तृप्त हो गई। अब कुछ घंटे नहीं भी खाऊंगा तो चलेगा। पर सुबह का नाश्ता चाय के बिना अधूरा है फिर चाहे वो दूध की बनी हो या पाउडर की।

पर समय को ध्यान में रखते हुए आज चाय रहने दी। गाड़ी में लदे और निकल पड़े उनाकोटी। जहां एक ओर उनाकोटी के बारे में बहुत ही सीमित जानकारी है मुझे वहीं दूसरी ओर रूपक को उनाकोटी बहुत ही पसंद है।

और उससे जुड़ी जानकारी से भी भरपूर हैं। अब सफर भी कैसे बीतेगा तो रूपक ने अपने ज्ञान का पिटारा खोलते हुए कई ऐसी बातें बताने लगे जो सिर्फ यहां का निवासी ही जानता होगा।

उनाकोटी का रहस्य

उनाकोटी का मतलब है एक करोड़ में एक कम। यहां कुल 99 लाख 99 हजार 999 पत्थर की मूर्तियां हैं।

यहां के स्थानीय लोगों का मानना है कि कालू नाम का एक शिल्पकार जिसकी कैलाश जाने की ज़िद्द थी। माता पार्वती और भोलेनाथ के साथ। जो बिल्कुल भी संभव नहीं था।

भक्त की ज़िद्द के आगे भगवान को झुकना पड़ा और तब शिव जी ने एक शर्त रखी जिसमे उन्होंने एक रात में एक करोड़ देवी देवताओं की मूर्ति बनाने का प्रस्ताव रखा।

जिसे शिल्पकार मान गया। अगर वह एक करोड़ मूर्तियां रात भर में बना के तैयार करता है तो वह कैलाश जाने योग्य होगा अथवा नहीं।

बस शिल्पकार को यह सुनना था और वो जुट गया मूर्तियां बनाने में। पूरी ताकत झोंक दी रात भर मूर्तियां बनाने में। पर जब सूर्योदय के बाद गिनती की गई तो उसमें से एक करोड़ मे से एक कम मूर्ति निकली।

और शिल्पकार के कैलाश जाने का सपना अधूरा रह गया। तभी से यहां मूर्तियों की स्थापना हुई और इस जगह को पूजा जाने लगा। माना जाता है समय के साथ काफी मूर्तियां गांव के निवासी उठा उठा कर ले गए।

जिस कारण नाममात्र की ही मूर्तियां बची हुई हैं। रही सही कसर भूकंप ने पूरी कर दी। जिससे काफी मूर्तियां नष्ट हो गई या नदी में ही बह गईं।

उनाकोटी को इसलिए भी रहस्यमई माना जाता है क्यूंकि ये एक पहाड़ी इलाका है। जो घने जंगलों से घिरा हुआ है। और ना सिर्फ जंगल बल्कि दलदली इलाके से भी।

अब प्रश्न ये उठता है कि अगर यहां कोई मूर्तियां बनता भी तो उसे दशकों लग जाते। फिर इस शिल्पकार ने आखिर एक रात में कैसे इतनी मूर्तियां बना दी जो सौ शिल्पकार मिलकर भी पूरी ज़िन्दगी नहीं कर सकते?

दूसरी कहानी ये भी है कि भगवान शिव एक करोड़ देवी देवताओं के साथ काशी जा रहे थे। थकान और अंधेरा हो जाने के कारण सभी देवी देवताओं ने शिव जी आग्रह कर उनाकोटी में ही रुकने की अनुमति मांगी। उस समय उनाकोटी को रघुनंदन पहाड़ के नाम से जाना जाता था।

जिसपर भोलेनाथ राज़ी हो गए। साथ में ये भी कहा कि सूर्योदय होने से पहले ये स्थान छोड़ देना होगा। जब सूर्योदय हुआ तब सिर्फ शिव जी ही समय से जाग पाए और बाकी सोते रह गए।

ये देख कर शिव जी ने क्रोध में आकर सभी को पत्थर का बना दिया। इसी कारण 99 लाख 99 हजार 999 मूर्तियां ही हैं। यानी एक करोड़ में एक कम।

इसलिए ये भी कहा जाने लगा कि उनाकोटी के पत्थरों में खुद भगवान वास करते हैं। शायद इसलिए भी त्रिपुरा की धरती को भगवान की धरती कही गई है।

हर साल यहां अशोकास्टमी मेला लगता है। कामाख्या देवी मंदिर के बाद इस जगह को भी तांत्रिक गतिविधि को गढ़ माना जाता है।

पहाड़ पर दो तरह की मूर्तियां पाई गई हैं। एक जो उकेरी गई है दूसरी जो पत्थरों से बनाई गई है। माना जाता है कि 8वी से 9वी सदी तक उनाकोटी प्रमुख धार्मिक स्थल हुआ करता था।

यहां तमाम किस्म के वैज्ञानिक और शोधकर्ता आए पर कोई भी इस रहस्य को सुलझा ना सका। ये भी बताया जाता है कि कई साल बीत जाने के बाद भी लोगों को इस जगह के बारे में जानकारी नहीं थी। हालांकि अभी भी खास वर्ग में प्रचलित नहीं है।

99 लाख 99 हजार 999 मूर्तियां

आखिरकार चार घंटे के सफर को पूरा करके मैं आ पहुंचा उनाकोटी। रास्ते भर जो कहानियां सुनते आया हूं अब उसको साक्षात देखने की बारी है।

मजेदार बात ये है कि यहां किसी भी तरह की कोई एंट्री फीस नहीं है। रूपक ने बताया ये बड़े बड़े दरवाजे कुछ ही साल पहले लगे हैं। उसके पहले तो सब ऐसे ही खुला पड़ा रहा है।

जिस कारण हजारों की संख्या में मूर्तियां चोरी हुई हैं। भीड़भाड़ भी है और सैलानी भी खूब नजर आ रहे हैं। मगर शायद जितनी दूर से मैं यहां तक आया हूं शायद ही और कोई आया होगा।

रूपक ने अपना चार पहिया वाहन किनारे लगा कर चल पड़ा ऐतिहासिक उनाकोटी की ओर। जैसा उनाकोटी है वैसे ही चाबिमुरा की पहाड़ियां हैं।

जहां पहाड़ियों पर देवी देवताओं की मूर्तियां उकेरी हुई हैं। बस गेट से जैसे ही अंदर की ओर दाखिल हुआ एक अलग ही संसार में प्रवेश कर गया।

जिसकी तुलना अंकोरवट से कि जाती है। यहां ज्यादातर हिन्दू धर्म से जुड़ी प्रतिमाएं हैं, जिनमें भगवान शिव, देवी दुर्गा, भगवान विष्णु, और गणेश भगवान आदि की मूर्तियां स्थित है। इस स्थान के मध्य में भगवान शिव के एक विशाल प्रतिमा मौजूद है, जिन्हें उनाकोटेश्वर के नाम से जाना जाता है।

भगवान शिव की यह मूर्ति लगभग 30 फीट ऊंची बनी हुई है। इसके अलावा भगवान शिव की विशाल प्रतिमा का साथ दो अन्य मूर्तियां भी मौजूद हैं, जिनमें से एक मां दुर्गा की मूर्ति है।
साथ ही यहां तीन नंदी मूर्तियां भी दिखीं हैं। इसके अलावा यहां और भी ढेर सारी मूर्तियां बनी हुई हैं।

भगवान गणेश की दुर्लभ मूर्ति

इस स्थान के मुख्य आकर्षणों में भगवान गणेश की अद्भुत मूर्तियां भी हैं। जिसमें गणेश की चार भुजाएं और बाहर की तरफ निकले तीन दांत को दर्शाया गया है।

भगवान गणेश की दुर्लभ मूर्ति

भगवान गणेश की ऐसी मूर्ति बहुत ही कम देखी गई हैं। इसके अलावा यहां भगवान गणेश की चार दांत और आठ भुजाओं वाली दो और मूर्तियां भी हैं।

इन अद्भुत मुर्तियों के कारण यह स्थान काफी काफी रोमांच पैदा करता है। आगे जानिए इस स्थान से जुड़ी पौराणिक मान्यताएं।

कैसे पहुंचे उनाकोटी

उनाकोटि त्रिपुरा के राजधानी शहर अगरतला से लगभग 125 किमी की दूरी पर स्थित है। आप उनाकोटि सड़क मार्ग के द्वारा पहुंच सकते हैं। त्रिपुरा के बड़े शहरों से यहां तक के लिए बस सेवा उपलब्ध है।

यहां का नजदीकी हवाई अड्डा अगरतला/कमलपुर एयरपोर्ट है। रेल मार्ग के लिए आप कुमारघाट रेलवे स्टेशन का सहारा ले सकते हैं।

यह स्थान अब एक प्रसिद्ध पर्यटन गंतव्य बन चुका है। यहां की अद्भुत मूर्तियों को देखने के लिए अब देश-विदेश के लोग आते हैं।

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नमस्ते, मैं ऐश्वर्य तिवारी हूं। ये उन दिनों की बात है जब मैं अपने जुनून का पालन करने के लिए अपने कॉर्पोरेट जीवन को पीछे छोड़ दिया।भारत को जानने के मेरे अंदर हमेशा एक जिज्ञासा थी क्योंकि इस देश में हर कुछ मील के बाद विविधता, विभिन्न संस्कृति है। हर दिन मेरे लिए एक नए शहर में एक नई प्राणी के साथ एक नया दिन है। मैं एक घुमक्कड़ हूं जो के विभिन्न हिस्सों में घूमना पसंद करता है और जल्द ही भारत से बाहर हो सकता है।

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