त्रिवेणी संगम कन्याकुमारी

कन्याकुमारी | तमिलनाडु | भारत दर्शन

रामेश्वरम से उथलपुथल

कहते हैं कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक भारत एक है। कश्मीर भारत माता का सर है तो कन्याकुमारी चरण। उसी कन्याकुमारी के लिए रामेश्वरम से रात दस बजे की ट्रेन से निकल पड़ा।

ट्रेन अपने निर्धारित समय से डेढ़ घंटा देरी के कारण रात्रि के ढाई बजे तक मदुरई पहुंची। मदुरई एक बड़ा जंक्शन है। दूसरी ट्रेन में चढ़ने के लिए विभाजित स्टेशन के दूसरी तरफ प्लेटफॉर्म संख्या पांच पर आया।

स्टेशन पर प्लेटफार्म पर हर जगह लोग बेसुध सो रहे हैं। जी कर रहा है मैं भी यहीं कहीं सो जाऊं। पर निकलना जो है। अभी नहीं तो सुबह। देर से बेहतर है अभी निकल चलूं।

नींद भगाने के लिए परिसर में लगी दुकान से एक कप कड़क चाय ली। बैठता हूँ तो नींद आती है इसलिए चाय के बाद यहीं टहलने लगा परिसर में।

मेरे अलावा स्टेशन पर जो हैं या तो वो सो रहे हैं या दुकान में चाय बेंच रहे हैं। पीछे मुड़ के देखने पर ट्रेन आती दिखी।

पता नहीं था मदुरई वापसी इतनी जल्दी हो जाएगी मेरी। कन्याकुमारी जाने के लिए ट्रेन से कुछ ही उतरे और मैं चढ़ गया। किसी तरह सोने की जगह भी बना ली।

ऊपर कोने वाली एक सीट पकड़ ली जिसमे बैग बीच में रख लिया। साथी उधर सो गया और मैं अपना स्लीपिंग बैग निकाल कर इधर। थकान इस कदर है की लेटते ही आंख लग गई।

नींद अच्छी और गहरी थी। सुबह पांच बजे कोई कांधे पर हाथ मार कर जगाने की कोशिश करने लगा। नींद तब भी नहीं खुली। नींद तो तब टूटी सब सामने वाले ने बोला टिकट मांग रहे हैं टिकट दिखाओ।

ध्यान से देखा तो काले पैंटऔर सफेद कमीज में टिकट जांचकर्ता कागज़ कलम लिए खड़े हैं। चूंकि टिकट मेरे मोबाइल में आरक्षित है।

मैने टिकट दिखाने से पहले साथी को हिला कर उठाया। मुझे लग रहा है टिकट उसके पास है। पर वो बोल रहा है की टिकट मेरे ही पास है। इतनी देर टीटी किसी और सवारी का टिकट जांचने लगे।

टिकट दिखाने पर बिना टीटी की वर्दी वाला टीटी टिकट को गलत ठहरा दिया। सीधा इसका हर्जाना मांगने लगे। बात कुछ समझ नहीं आई।

गलत टिकट कैसे हो सकता है जब टिकट रामेश्वरम से कन्याकुमारी तक का है। आंखो में नींद इस कदर हावी है की इस वक़्त इन जनाब को हर्जाना दे कर सोना ही ठीक लग रहा है।

जेब से पैसे निकाल कर इनको चलता किया। ना बहस की ना बात। इत्मीनान से दोबारा सोने की कोशिश करने लगा।

हर्जाना भरने के बाद जैसे नींद आंखो से उड़ गई हो। जब तक जागता रहा यही सोचता रहा पैसे क्यों दिए। आंखों में अब नींद नहीं रह गई है।

कन्याकुमारी तक के रास्ते कुछ ऐसा दिखा दृश्य

नागरकोइल

सीट पर बैठे कुछ लोग बोलने लगे की मुझे हर्जाना देना ही नहीं चाहिए था। दूसरे सज्जन बताने लगे की उसने ऐसा इसलिए किया क्योंकि मैं उत्तर भारत से हूँ।

पर हर्जाना ना देता तो क्या होता इस पर समाधान देते हुए कहने लगे की ज्यादा से ज्यादा ट्रेन से उतार देता। पर टिकट तो मान्य था ना। दूसरी ट्रेन से आ जाता। पर जब ऐसी आपदा आती है तो सही हो कर भी दूसरे प्रदेश में खुद को गलत ही साबित हुआ लगता है।

बिस्तर छोड़ नीचे उतर आया। बिस्तर ताहा कर बैग में रख लिया और बैग में नीचे खींच लिया। ट्रेन अब रात के मुकाबले बहुत ही खाली हो गई है।

खिड़की वाली सीट पर बैठ बाहर के नजारे देख कर मन को शांत करने लगा। बहुत ही शुद्ध और स्वच्छ वातावरण देखने को मिल रहा है।

बिजली की उत्पत्ति के लिए पहाड़ों और गांव ने पवन चक्की भी लगी हुई हैं। पता नही था की यहाँ समुद्र के पास पहाड़ी भी होंगी। मालूम पड़ा की ये ट्रेन या कोई भी ट्रेन सीधे कन्याकुमारी नहीं जाती।

हर ट्रेन नागरकोइल तक ही आती है। यहाँ से दूसरी ट्रेन का आगमन होगा जिससे की यात्री कन्याकुमारी जा सकेंगे।

दस बजे तक नागरकोइल आ पहुंचा। खाली ट्रेन और भी खाली हो गई। सवारियां उतर कर चली गई मैं यहाँ दूसरी ट्रेन के आने का इंतजार करने लगा।

स्टेशन पर कार्य प्रगति पर है। प्लेटफार्म पर भी मजदूर डटे हुए हैं नया बनाने में। बदन और मू्ह बहुत चिपचिपा रहा है ट्रेन को भी आने में अभी समय है।

बैग से साबुन निकाल कर पास में लगे नल्के में धोने लगा। अब तरोताजा महसूस हो रहा है। दूसरी तरफ से खाली ट्रेन ठीक ग्यारह चालीस पर आ गई।

नगरकोइल से कन्याकुमारी के लिए ग्यारह चालीस पर दूसरी ट्रेन रवाना हो चली। कन्याकुमारी ज्यादा दूर नहीं है। सामुदायिक मित्र से भी संपर्क में हूँ जो मिलना चाह रह हैं।

पर कुछ ही वक्त बाद उनका संदेश आया की वो अस्पताल में भर्ती हो गए हैं जिसके कारण मुलाकात ना हो सकेगी। रास्ते भर नारियल के पेड़ घने बादलों के बीच सीना ताने खड़े पहाड़, दरिया सब देखने को है यहाँ।

कन्याकुमारी स्टेशन परिसर

कन्याकुमारी

बारह बजे तक मैं कन्याकुमारी आ पहुंचा जो भारत का अंतिम छोर है। कन्याकुमारी में तीन समुद्रों-बंगाल की खाड़ी, अरब सागर और हिन्द महासागर का मिलन होता है। इसलिए इस स्थान को त्रिवेणी संगम भी कहा जाता है।

भीषण गर्मी के साथ साथ शरीर को गला देने लायक उमस भी है। इतनी, की सही नहीं जा रही। स्टेशन ज्यादा बड़ा तो नहीं है लेकिन भीड़ काफी तादाद में है।

ट्रेन से उतरकर वापस पीछे की तरफ आ गया कन्याकुमारी की नाम तालिका के साथ तस्वीर लेने। अब तक तो सारी जनता निकल चुकी है स्टेशन के बाहर सिवाय मुझे छोड़ कर।

देख रहा हूँ स्टेशन पर ट्रेन कब तक खड़ी रहेगी। पेट बहुत भारी हो रहा है। हल्का होने का समय आ गया है। बाहर निकल कर मालूम नहीं कहाँ व्यवस्था मिले।

मौका लगा कर साथी को बैग थमा कर ट्रेन में ही चढ़ आया किसी शुद्ध सौंचालय में। काम तमाम कर अब बेहतर लग रहा है।

एक बार हर्जाना दे कर अब दोबारा तो नहीं कटवाना चाहूँगा। दाएं बाएं हो कर बाहर आ गया जहां अमानती घर है।

स्टेशन के अंदर बने अमानती घर में जमा करवाने की प्रक्रिया शुरू कर दी। छोटे बैग में जरूरी समान पलटा और बड़ा बैग अमानती घर में।

जमाकर्ता ने बताया की यहाँ पर अमानती घर कुछ दर के लिए बंद हो जाता है ट्रेन की आवाजाही के अनुरूप। रसीद कटवा कर निकल पड़ा शहर की ओर।

कन्याकुमारी स्टेशन

दिन का पेट पूजन

बाहर से देखने पर रेल स्टेशन एक विशाल इमारत जैसी दिख रही है। जैसे बहुत ज्यादा जगह खाली हो। टेंपो ऑटो वाले भी दूर से ही आते दिख रहे हैं।

चूंकि अब सवारियां जा चुकी हैं तो ये भी नदारद है। भीषण गर्मी में जिसकी नवंबर में महीने में उम्मीद कम ही थी मुझे तलाशने लगा बढ़िया रेस्त्रां। जहां ऊर्जा पाने लायक जितना अच्छा खाना मिल जाए।

भोजन की व्यवस्था देखने सड़क तक आ पहुंचा हूँ। कुछ रेस्त्रां दिख तो रहे हैं। ऐसे ही कोने में दिख रहे रेस्त्रां में प्रवेश कर गया। यहाँ उचित मूल्य पर अच्छा खाना मिल रहा है।

हालांकि दिन के एक बज रहे हैं इसलिए हर रेस्त्रां में खाना खत्म होने की कगार पर है। सो हाल यहाँ भी है। पर इतना है कि दो लोगों का पेट भर जाए।

ताजा गरमा गर्म रोटी और चावल पूरा उत्तर भारतीयों का खाना खाने को मिल रहा है। बहुत ही स्वादिष्ट। भोजन कर भुगतान करके निकलने लगा और रेस्त्रां के मालिक से शाम को दोबारा आने का भी वादा किया जिसे सुन वो और प्रसन्न हो गए।

अब भारत के इस अंतिम छोर पर जो खास है वो है स्वामी विवेकानंद स्मारक। गूगल नक्शे पर देखते देखते निकल पड़ा उसी दिशा में।

गलियों में घूमते घूमते आ पहुंच उस जगह जहां से स्मारक जाने का टिकट और नाव मिलेगी। तैर कर जाने ये देते नहीं किसी को।

रेलिंग से जनता जनार्दन का विभाजन होता होगा जिससे संभालने में आसानी होती होगी। सागर तट से कुछ दूरी पर मध्य में दो चट्टानें नज़र आती हैं।

स्वामी विवेकानंद के संदेशों को साकार रूप देने के लिए ही 1970 में शिला पर एक भव्य स्मृति भवन का निर्माण किया गया। समुद्रतल से सत्रह मीटर की ऊँचाई पर एक पत्थर के टापू की चोटी पर बना दूर से ही दिखाई पड़ता है।

टिकट लेने के बाद मुझे उस स्वचालित नौका में बैठाला जा रहा है जो उस टीले तक ले जाएगी। नाव में बैठने के बाद हर यात्री को जीवन रक्षक जैकेट पहना दी गई है।

यात्रियों में उत्साह है। देख कर लग रहा है सब पहली बार जा रहे हैं। जिसे हम बचपन से पढ़ते सुनते आ रहे हैं वो स्मारक के समीप आना ही  अद्भुद है।

दूर से आती मोटर नाव

विवेकानंद   स्मारक

कुछ ही मिनटों में मैं इस टीले के भव्य प्रवेश द्वार पर आ खड़ा हुआ। इसका मुख्य द्वार अत्यंत सुंदर है। इसका वास्तुशिल्प अजंता-एलोरा की गुफाओं के शिल्पों से लिया गया लगता है।

नाव खाली हो गई। पहले से इंतजार कर रहे सैलानी को बैठाल कर ले गई वापस जहां से आई थी।

बाहर ही सबको कतार में खड़ा कर के एक एक कर जाने दे रहे हैं। मैं अपनी बारी का इंतजार कर रहा हूँ। बारी आई तो पाया पास में ही एकनाथ जी के बारे में उल्लेख किया हुआ है।

जिनके प्रयास से ये स्मारक यहाँ बन पाया। उन्हीं की जीवनी यहाँ लिखी है। एकनाथ जी ने विवेकानंद के ऊपर अध्यन करने के बाद पुस्तक लिखी थी जो दो महीने के भीतर ही बिक गई।

आगे कुछ कुछ मूल्य पर कार्यशाला होने वाली है जिसकी टिकट बिक्री हो रही है। मैं किसी कार्यशाला में जाने का इच्छुक नहीं हूँ। आगे चल पड़ा स्मारक की ओर।

यहाँ मालूम पड़ रहा है की लोग नंगे पांव ही भीतर जा रहे हैं। पास आया तो देखा की यहाँ नग्न पैरों के साथ ही प्रवेश करना अनिवार्य है।

पास की रैक में जूते उतार कर भीतर आ गया। यहाँ से पूरा का पूरा शहर दिखाई पड़ रहा है। पहाड़, चर्च और शहर में बसे घर भी।

विवेकानन्द पत्थर स्मारक रामकृष्ण परमहंस के परम शिष्य स्वामी विवेकानन्द को समर्पित है। यह स्मारक दो पत्थरों पर स्थित है और मुख्य द्वीप से आधे किमी दूरी पर है।

ऐसा कहा जाता है कि 1893 में विश्व धर्म सभा में शामिल होने से पहले 1892 विवेकानंद कन्याकुमारी आए थे। एक दिन वे तैरकर इस विशाल शिला पर पहुंच गए।

इस स्थान पर साधना के बाद उन्हें जीवन का लक्ष्य एवं लक्ष्य प्राप्ति हेतु मार्ग दर्शन प्राप्त हुआ था। इसके बाद उन्होंने अपने आप को देश की सेवा के प्रति समर्पित करने और वेन्दान्त संदेश को सारे विश्व में प्रसारित करने का निश्चय किया।

1883 में शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में वे उपस्थित थे। विवेकानन्द पत्थर स्मारक परिसर के अन्दर पर्यटक विवेकानन्द की प्रतिमा देख सकते हैं।

भारत ही नहीं पूरी दुनिया से लोग समुद्र की लहरों से घिरी इस विरासत को देखने के लिए आए हैं। विवेकानंद जयंती पर बहुत से लोग यहाँ आते हैं। अप्रैल में पड़ने वाली पूर्णिमा पर यहाँ चन्द्रमा और सूर्य दोनों आमने-सामने दिखाई देते हैं।

सीढियां चढ़ कर ऊपर आ गया। यहाँ बकायदा एक कमरा भी है ध्यान करने के लिए। हल्ला गुल्ला करना मना है। मैं भी कुछ देर के लिए मोबाइल बंद कर के इसी कक्ष में प्रवेश कर गया ध्यान केंद्रित करने के लिए।

बाहर बने बड़े से चबूतरे में निकल कर समुद्र बहुत ही सुंदर प्रतीत होता हैसमुद्र की लहरें और उसका शोर खुद में ध्वनि उत्पन्न कर रही हैं।

कुछ देर बाद बाहर भी निकल गया। सुकून मिल रहा था। पर समय के बाध्य हूँ। बाहर खड़े हो कर विशालकाय समुद्र निहारने लगा। जिसका कोई अंत ही नहीं।

लहरें स्मारक तक आ रही हैं पर नुकसान नहीं पहुंचा पा रहीं। 2003 में आई सुनामी भी यहाँ कुछ नहीं बिगाड़ पाई थी।

विवेकानंद मेमोरियल के बाहर

नीचे उतरने पर मंडप भी बना दिखा जहां तस्वीरें लेना मना है। इसी मंडप के सामने जमीन पर गड़ा दिशा सूचक यंत्र भी। पर समझ नही पा रहा हूँ कुछ भी। साथी से बोल कर यहाँ की तस्वीर जरूर निकलवाई।

कुछ घंटे यहाँ बिताते हुए देर शाम तक एक ही टीले पर रहा। अब दूसरे टीले की ओर जाने के लिए नौका की प्रतीक्षा में स्मारक के बाहर निकल आया।

जूते पहन करने लगा इंतजार तिरुवल्लुवर प्रतिमा तक पहुंचने की। यह प्रतिमा प्रसिद्ध तमिल संत कवि तिरुवल्लुवर की है। वह आधुनिक मूर्तिशिल्प 5000 शिल्पकारों की मेहनत से बन कर तैयार हुआ था।

इसकी ऊंचाई 133 फुट है, जो कि तिरुवल्लुवर द्वारा रचित काव्य ग्रंथ तिरुवकुरल के 133 अध्यायों का प्रतीक है।

धीरे धीरे कर भीड़ बढ़ने लगी। यहाँ समुद्र की लहरे चट्टान तक टकरा कर वापस निकल जाती। छोड़ जाती तो ढेर सारी मछलियां। जो छटपटाते हुए वापस पानी की तरफ भागतीं।

जो ना भाग पातीं वो अगली लहर में निकल जातीं पर जाती जरूर। रुक कर आत्महत्या करना कोई पसंद नहीं करेगा। इंसान थोड़ी हैं! पास बैठा कीट मछलियों के इंतजार में है। धीरे धीरे वो भी अपने शिकार की तरफ बढ़ रहा है।

यही जीवन है कोई शिकार बनता है तो कोई शिकारी। सामने से खाली नाव आ पड़ी। जिसमें सभी प्रतीक्षा करने वाले एक एक कर सभी यात्री नाव में सवार हो गए। सबको उनकी जीवन रक्षक जैकेट थमा दी गईं।

रह गया वंचित

रैक में जब एक भी जैकेट नहीं बचती है तब इसका मतलब है कि नाव पूर्णतः भर चुकी है।

मैं तिरुवल्लुवर स्मारक पर उतर कर कुछ देर यहाँ भी समय व्यतीत करना चाहूँगा। दूसरे टीले पर नौका रुकी पर यहाँ मैं भ्रम का शिकार हो गया।

मुझे लग रहा है सभी यात्री यहीं उतरेंगे। मैं प्रतीक्षा करने लगा अपनी सीट पर बैठे लोगों के उठने का। खिड़की की तरफ बैठा मैं, सीट के अंत छोर पर बैठी महिला ने विनती की मूर्ति की फोटो लेने का।

साथ में बैठा साथी घुमक्कड़ तस्वीर लेने लगा। मुझे लगा इसके बाद मेरी सीट के लोग उठेंगे। लेकिन ऐसा कुछ भी होता नहीं दिख रहा है।

एकाएक नाव चल पड़ी और हड़बड़ी में सबको लांघते हुए बाहर तो निकल आया लेकिन तब तक मोटर नाव कुछ आगे बढ़ चुकी है। मैंने कूदने का प्रयास किया, की कूद कर टीले पर पहुंच जाऊंगा।

लेकिन साथी ने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे पीछे घसीट लिया। इस मुद्दे पर नौका चालकों से चर्चा होने पर उन्होंने अब नाव ना आने की जानकारी दी।

मुझे झल्लाहट मचने लगी। उस महिला पर जो तस्वीर लेने को आतुर थी। खामोशी से खड़े खड़े छोर पर आ गया। यहाँ उतरने के बाद भी उस दूसरे टीले पर जाने की ऐसी जिद्द है।

ख्याल आया एक योजना रचने की। मुख्य संचालक से मैंने अपना बटुआ उसी टीले पर खोने का बहाना बनाने लगा। बात सुन कर वे राज़ी हो गए।

पर कुछ ही देर बाद उनका ह्रदय परिवर्तन हो गया। उन्ही के साथियों ने तमिल में उनसे कुछ बोला मैं समझ गया अब बात नहीं बनने वाली।

हताश निराश दूर से दिख रहे उस मूर्ति को निहारते हुए उस छह एकड़ के क्षेत्र से बाहर आ गया। मन को सांत्वना देने के लिए दूर से ही तिरुवल्लुवर स्मारक के साथ चलचित्र और तस्वीर ले ली।

रात के अँधेरे में कुछ ऐसा दिखा नज़ारा

स्मारक से दूर

दिमाग कुछ शांत हुआ तो आसपास का नजारा देखने लगा। सोच रहा हूँ की कल फिर आऊं सुबह सूर्योदय देखने के लिए। भारत के अंतिम छोर से सूर्योदय देखना बहुत लाजवाब रहेगा।

बाहर निकल कर बाजार की तरफ बढ़ चला। मन बहलाने के लिए कुछ दुकानों पर कपड़े देखने लगा। पर कपड़े मन मुताबिक ना हैं।

चलते फिरते कन्याकुमारी मंदिर के बाहर आकर बैठ गया। थोड़ी देर में चाय की चुस्की के बाद मेरे पास एक माला बेचने वाला आया और एक माला का दाम ₹100 बताया।

मैं इतना इच्छुक नहीं हूँ माला लेने का लेकिन उसके बार बार चक्कर काटने पर मैंने वही माला मोलभाव करके ₹10 तक करा ली जिसे वो बड़ा चढ़ाकर और को बेंच रहा है।

आज निश्चय किया कन्याकुमारी में ही रुकने का। पहले योजना अनुसार कन्याकुमारी से निकलना था।

रात्रि भोजन वहीं से करना चाहूँगा जहां से दिन में भोजन किया। परन्तु मार्ग में ही एक बढ़िया ढाबा दिखा जहां डोसा अत्यंत स्वादिष्ट रहा।

कुछ ही देर में स्टेशन पहुंच कर वहां सोने की व्यवस्था देखी लेकिन पहले माले पर डोरमेट्री पर पूछने पर पता चला कि वहां एक भी कमरा खाली नहीं है।

प्लेटफॉर्म पर किसी को भी ठहरने की अनुमति नहीं है। वापस डोरमेट्री के बाहर की छत पर घूमने आ गया। यहाँ काफी खाली जगह पड़ी है। साफ सुथरी सोने लायक।

अतः यहीं डेरा डाल लिया। अमानती घर से स्लीपिंग बैग निकलवा लिए और पास में पड़ी चटाई पर शरीर बिछा दिए। लेटा ही था की कुछ देर में मूसलाधार वर्षा होने लगी।

जिससे छींटे बाद में पानी बिस्तर की ओर आने लगा। इससे मुझे स्थान बदलना पड़ा। और थोड़ा सा अन्दर जाकर बिछा लिया जहां तनिक भी पानी नहीं आ रहा हो।

रामेश्वरम से कन्याकुमारी तक का कुल सफर 402किमी

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