त्रिशूल पर टिका काशी

उत्तर प्रदेश | ज्योतिर्लिंग | धार्मिक स्थल | पवित्र स्थल | भारत | वाराणसी

भादौंचूंगी से मैदागिन

सांयकाल का समय हो चला है और मैं भादौंचूंगी से निकल पड़ा हूँ बाबा विश्वनाथ के दर्शन के लिए। घर से निकल कर पैदल दूरी पर मुख्य सड़क है।

यहाँ से ई रिक्शा में बैठ कर मैदागिन के लिए निकल पड़ा। दस मिनट के भीतर आ पहुंचा। अब यहाँ से ज्योतिर्लिंग महज एक किमी के पैदल रास्ते पर है।

कुछ दस वर्ष पहले आया था तब यहाँ पतली गालियां हुआ करती थीं अब ऐसा कुछ भी नहीं है। सड़के चौड़ी इतनी की आमने सामने से दो ट्रक बड़ी आसानी से निकल जाएं।

यहाँ जो कुछ भी पहले हुआ करता था उनको सरकार द्वारा मोटी रकम दे कर यहाँ से रफा दफा कर दिया गया। घर खाली करवा कर हटा दिए गए और बाबा विश्वनाथ तक जाने का सुगम मार्ग बना दिया गया है।

जो बरसात में पहले कीचड़ से भर जाया करता था। जहाँ भीड़ से कोतूहल मच जाता था। अब वैसा बिलकुल भी नहीं है। चौड़ी सड़कें मार्ग आसान बना रही हैं मंदिर जाने के लिए।

एक किमी का सफर तय करते हुए मैं मुहाने तक आ गया। यहाँ पर भीतर तभी प्रवेश हुआ जा सकता है जब मोबाइल या बिजली उपकार जमा हो।

पुलिसकर्मी से जमा करने का स्थान पूछने पर कुछ आगे जाने का इशारा मिला। वैसे यहाँ और भी दुकानें है सामान जमा कराने की पर वो सब निजी हैं। ये सरकारी है।

दोनो मोबाइल जमा करवा कर लॉकर की चाभी अपने हाथ में ले ली। निकल पड़ा सुरक्षा दायरे की ओर। यहाँ कड़ी जांच से गुजरने के बाद भीतर निकलने लगा।

खुदाई और निर्माण कार्य देख कर यह अंदाजा लगाया जा सकता है कितने भव्य मंदिर का निर्माण हो रहा है। जो कुछ ही सालों में पूरा हो जाएगा।

सुरक्षाकर्मियों का जोरदार पहरा है। इसी बीच मैं इस घेराव से होते हुए निर्माण हो रहे मंदिर में दाखिल हो चला। अंदर भी पुलिसकर्मी तैनात हैं।

मुख्य प्रांगण के बाहर भी। यहाँ घेराव बना है जिसके पास से अंदर ज्योतिर्लिंग के दर्शन किए जा सकते हैं। काफी देर लोग यहीं खड़े हैं। जिनको पुलिसवाला खदेड़ रहा है।

ध्यान से चप्पल एक बेंच के नीचे और दूसरी किसी और दिशा में उतारकर कर बाबा विश्वनाथ की ओर बढ़ने लगा।

बाबा विश्वनाथ के दर्शन

कुछ भीड़ के हट जाने के बाद मैं यहीं आ खड़ा हुआ। यहाँ से बाबा विश्वनाथ के दर्शन करने लगा। इस समय यहाँ पूजन चल रहा है और बाबा को फूलों से सजाया जा रहा है। श्रंगार हो रहा है।

ईशान कोण में शिवलिंग बहुत ही सुंदर दिख रही है। भीतर एक से बढ़कर एक पुजारी बैठे हुए हैं। साथ ही कुछ परिवार जन जो शिवलिंग का श्रंगार करवा रहे हैं।

काशी विश्वनाथ मंदिर आदिकाल से काशी में स्तिथ है। शिव और पार्वती का आदि स्थान होने के कारण अविमुक्तेश्वर को ही प्रथम ज्योतिर्लिंग माना गया है।

हरिश्चंद्र के बाद विक्रमादित्य ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। जिसे मोहम्मद गोरी ने 1194 में लूटने के बाद तुड़वा दिया। मंदिर को अनेकों बार ध्वस्त किया गया। शाहजहाँ और अंग्रेजों द्वारा भी।

हर बार मंदिर उठ खड़ा हुआ। फिलहाल जो आज मंदिर है उसका निर्माण 1780 में इंदौर की रानी अहिल्याबाई होलकर ने कराया था। जिसके ठीक बगल में मस्जिद सटी हुई है।

बाहर घेराव से दर्शन कर अंदर निकल पड़ा। पर भीतर प्रवेश करने को नहीं मिल रहा। बाहर ही देवी देवताओं के दर्शन कर वापस निकलने लगा।

यहाँ एक विदेशी महिला केसरिया वस्त्रों में जाप करती हुई नजर आ रही है। जिसे ना तो पुलिसकर्मी कुछ कह रहे हैं ना ही पंडित।

देवी के दर्शन कर बाहर निकल आया। मंदिर के ठीक सामने दूसरे मंदिर में। काशी मंदिर और ज्योतिर्लिंग के बारे में तो बहुत सुना है पर इसका इतिहास कभी नहीं।

काशी में शिव जी का वास

पौराणिक कथा

मंदिर में बैठे पंडित जी इतिहास ही बता रहे हैं की मैं भी आ पहुंचा सुनने। बताने लगे की

एक बार भगवान विष्णु और ब्रम्हा में बहस छिड़ गई की कौन अधिक शक्तिशाली और महत्वपूर्ण है। विवाद की मध्यस्थता के बीच भगवान शिव शिवलिंग के रूप प्रकट हुए।

शिवलिंग के भीतर से ही इसकी ऊंचाई और स्त्रोत पता लगाने को कहा। ब्रम्हा जी अपने हंस पर सवार हो आसमान में उड़ गए वहीं विष्णु जी शूकर(सुअर) का रूप धारण कर पृथ्वी में खुदाई करने लगे।

कई युगों तक भी जूझने के बाद भी कुछ हाथ ना लगा। विष्णु जी ने आ कर अपनी हार स्वीकार कर ली पर ब्रम्हा जी झूठ बोल पड़े की उन्होंने पता लगा लिया है।

ब्रम्हा के इस झूठ पर उनकी कहीं भी पूजा अर्चना ना होने का श्राप मिला। इस स्तंभ के कारण जिस जिस स्थान से प्रकाश अर्जित हुआ वहां वहां ज्योतिर्लिंग कहलाया।

एक कथा यह भी है की जब की जब माता पार्वती का विवाह भगवान शिव से होने के बाद भगवान शिव कैलाश पर और माता अपने पिता के घर रहने लगीं।

जब माता ने शिव जी से उन्हें अपने घर ले जाने को कहा तब शिव जी माता पार्वती को काशी ले आए और इसी स्थान पर बस गए।

ऐसा माना जाता है की काशी भगवान शिव के त्रिशूल पर टिका हुआ है। यह भी कहा जाता है की जब पृथ्वी का निर्माण हुआ था तब सूर्य की पहली किरण काशी पर ही पड़ी थी।

पंडित जी से टिका लगवा कर आगे कुएं में बने शिवलिंग को देखने लगा। इधर ही पीछे रास्ते पर आ गया जहाँ बंद पड़ी मस्जिद है।

परिक्रमा करते हुए दूसरे द्वार के पास बने मंदिर में आ गया। यहाँ पर हनुमान जी और दूसरे कक्ष में काली जी का मूर्ति मुख्य है।

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *