फटाफट हुए तिरुपति बालाजी के दर्शन

आंध्रप्रदेश व तेलंगाना | तिरुपति | भारत

तडिपत्रि से तिरुपति

तड़के सुबह तीन बजे तिरुपति रेलवे स्टेशन आ पहुंचा। स्टेशन पर ऐसा सन्नाटा पसरा है जिसकी उम्मीद नहीं थी इस धार्मिक स्थल पर। दुकानें भी बंद, आवाजाही भी बंद। लोग सीट पर या फिर दुकान के बाहर सोते हुए देखे जा सकते हैं।

दूर कहीं एक दुकान खुली दिख रही है। बैग लेके यहीं आ गया। आंखों में हल्की नींद है पर सोना भी नहीं है। साथी घुमक्कड़ को अब कॉफी पीने की प्यास लग आई है।

खुली दुकान में दो लोग बतिया रहे हैं पर पता नहीं चल रहा दुकानदार कौन है। कॉफी का ऑर्डर सुनते ही लाल कमीज में भाईसाहब एक कप भरकर कॉफी देने लगे।

कॉफी के बाद बाहर की ओर निकल पड़ा। हर सीढी पर स्वच्छ भारत हरित भारत के संदेश लिखे हैं। तेलुगु और अंग्रेजी में नीली पीली पट्टी पर।

रेल परिसर के बाहर आने के बाद तिरुपति जाने का साधन तलाशने लगा। खाली खड़ी सरकारी बसों में से दो चालकों में बातें होने लगीं की कौन पहले जाएगा!

दूसरे ने पहले निकलने का वादा करके अपनी बस में बैठाया। कुछ एक सवारी बैठाने के बाद चल पड़ा तिरुमला जहाँ से तिरुपति बालाजी के लिए सीधा साधन प्राप्त होगा।

स्वच्छता का सन्देश

पास है अनिवार्य

अंधेरे में कुछ भी नजर नहीं आ रहा। बस चलने का आभास हो रहा है। कुछ दस मिनट में मैं तिरूमाला बस अड्डा आ पहुंचा। बड़े से अड्डे पर नीचे उतर कर आगे की प्रक्रिया समझने के लिए पूछताछ काउंटर पर आ गया।

ज्ञात हुआ की तिरुपति जाने के लिए पहले पास बनवाना पड़ेगा। जिसके लिए अनिवार्य तौर पर आधार कार्ड की कॉपी जमा होगी। मेरे पास तो आधार कार्ड सिर्फ मोबाइल पर है।

पास ही में सारी व्यवस्था है, फोटोकॉपी से ले कर प्रिंटआउट तक की। मएक किनारे बैग रख कर मैने अपने मोबाइल से आधार कार्ड का छापा निकलवाया। मेरी तरह और लोग भी छापा निकलवा रहे हैं। भीड़ भी कम है।

छापा निकलवाने के बाद काउंटर पर आ कर पास बनवाने लगा। कम भीड़ होने के कारण भी कार्य में कोई बाधा नहीं आ रही। बस आ रही है तो निद्रा वो भी जोरदार।

ये सब प्रक्रिया होने में मामूली समय गुजर रहा है। तिरुपति जाने का पास ले कर झटपट बस स्टैंड आ गया। सरकारी साधन के अलावा यहाँ से कई निजी गाड़ी भी जा रही हैं। छोटी ट्रेवलेक्स गाड़ी में दो जनों की सीट आरक्षित करा कर बैठ गया।

कुछ ही देर में गाड़ी चल पड़ी। देखा आगे सुरक्षा जांच हो रही है। जिसमे सभी यात्रियों का सामान जांचा जा रहा है। हमारी गाड़ी भी यहीं आ कर खड़ी हो गई। गाड़ी से सभी यात्रियों की तरह मैं भी नीचे उतरा बैग लेके और साथी घुमक्कड़ भी।

चप्पे चप्पे पर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम देखने को मिलते है। साथ ही भक्तजनों के लिए उपयुक्त सुविधाएं हैं।

सबके समान की जांच के बाद बाकी सबको तो जाने की अनुमति मिल गई सिवाय साथी घुमक्कड़ के। साथी दौड़ कर मुझे बताने आया की इसके पास टेंट है इसलिए उसे जाने नही दे रहे। तंबू अलग से यहीं तिरुमाला ने जमा कराना होगा। तब तक के लिए गाड़ी यहीं रुकवा लूं।

पर हालत कुछ ऐसे बने की गाड़ी आगे बढ़ गई। कंडक्टर ने एक दफा पूछा तो पर साथी के आने में कितना वक्त लगेगा इसका अंदाजा न था। रुकने पर बाकी सवारियों को परेशानी होगी। बेहतर रहेगा चल दिया जाए।

बैग से चद्दर निकाल कर सीट पर ही सो गया। अंधेरी पहाड़ों में कहाँ हूँ कुछ खबर नहीं। आधे घंटे बाद फोन बजा तो देखा साथी घुमक्कड़ का है। उससे ऊपर तिरुपति में ही मिलने को बोला।

भगवान वेंकटेश्वर बालाजी सात पहाड़ियों के बीचों बीच बसे हैं। कुल चालीस मिनट में तिरूमाला से ऊपर पहाड़ी पर बस से पहुंचने में लग गए।

तिरुमाला बस अड्डा

नींद टूटी तो पता चला अब उतरना भी है। बैग ले कर नीचे उतर आया बस अड्डे पर। उजाला हो चुका है। बस अड्डे पर भी भीड़ इस कदर है जिसका कोई जोड़ नहीं।1

यहाँ तिरुपति में एक कोने चाय, धुग्ध और भी खाने पीने के स्टॉल लगे हुए हैं। यह सभी स्टॉल बालाजी ट्रस्ट की तरफ से स्वचालित हैं आम जनता की सेवा में बिलकुल मुफ्त। यहाँ रहने की भी उचित व्यवस्था बहुत ही कम मूल्य में उपलब्ध है। फ्री बस सेवा भी चालू है।

हल्की बूंदबांदी के बीच एक दुकान के पास मैं अपना भारी भरकम बैग लेकर खड़ा यह सब टक टकी लगाए देख रहा हूँ। कुछ ही देर में साथी घुमक्कड़ भी आ पधारा।

पास में ही स्नानघर होने के कारण सुविधा भी हो गई। एक एक कर स्नान ध्यान करने के बाद यहाँ बट रहे दूध का स्वाद चखा जो बहुत ही स्वादिष्ट है।

बस सेवा चालू है और इसी बस सेवा का लाभ उठाने के लिए स्थानीय लोगों से मंदिर तक पहुंचने वाली बस का इंतजार कर रहा हूँ। कभी सड़क के इस पार कभी उस।

इस पार आ कर हलवा खाने लगा। साथ ही साथी घुमक्कड़ को भी इधर ही बुला लिया। हलवा निपटने के बाद निकल पड़ा मंदिर की ओर। बारिश थमने का नाम ही नहीं ले रही। इसी बहाने मैंने नहा लिया।

दर्शन के द्धार

बस सेवा से मैं तिरुपति बालाजी के मुख्य दर्शन द्वार पर आ गया। यहाँ कुछ समझ नहीं आ रहा है करना क्या है? बारिश भी तेज़ होने लगी है।

पास में लगी दुकान पर पूछने पर पता चला कि भीतर जाने का रास्ता आगे से है। जिस द्वार पर मैं खड़ा हूँ यहाँ से सिर्फ भुगतान करने वालों को अंदर जाने दिया जा रहा है।

ये कैसा भेदभाव है! को जितना ज्यादा पैसा देगा उसको उतनी ही जल्दी दर्शन करने को प्राप्त होंगे।

ये भी पता चला की बैग, जूते सब अंदर ही जमा हो जाएगा। भीगते हुए आगे बढ़ गया। कतार की रेलिंग देखने पर यह अनुमान लगाया जा सकता है की यहाँ कितनी भीषण कतार लगती होगी।

रेलिंग का पीछा करते करते आखिरकार द्वार मिल ही गया जो सामान्य बिना भुगतान वालों के लिए खुला है। एक टीन से दूसरे टीन को पार करते हुए, कर्मचारियों से पूछते हुए एक बड़े से हॉल में पधार गया।

ऐसी जोरदार बारिश हुई की पूरा स्नान हो गया। काउंटर पर खड़े कर्मचारी ने छोटा सामना रखने के लिए एक प्लास्टिक की टोकरी पकड़ाई जिसमे बैग, जूता मोबाइल, घड़ी रख दिया।

बड़ा समान यानी बैग दूसरे काउंटर पर जमा हो रहा है। सो दूसरे काउंटर पर आ कर जमा करा दिया। सब का सब बैग सहित समान जमा हो गया। टोकन बहुत ही संभाल कर रख लिया।

व्यवस्था बहुत ही तगड़ी है। किसी भी भक्त का एक भी समान इधर उधर नहीं हो सकता। साथ ही प्रशाद का पैसा भी जमा करवा रहे हैं। न्यूनतम दो लड्डू तो लेने ही होंगे। अधिक लेने पर थोड़ा ज्यादा भुगतान करना होगा। पर मेरा दो से ही काम चल जाएगा। दो से ज्यादा लड्डू सस्ते भी हैं।

बारिश के कारण भीड़ कम है। सामान से मुक्त हो कर मैं भी कतार में लग गया। काफी अंदर तक आने को मिल गया। सिर्फ इसलिए की भक्त बहुत ही कम हैं।

जगह जगह बड़े बड़े हॉल बने हुए हैं। ताकि भक्तों को बैठा कर दर्शन कराया जा सके। हॉल में मनोरंजन के लिए लगे टीवी। बकायदा सीट और बेंच की व्यवस्था है।

ऐसे करते करते मैं भी हॉल में बैठाया गया। एक जगह पास की जांच हुई और फिर सबको आगे बढ़ाया गया।

ज्यादा समय ना लेते हुए कुछ ही देर में मैं मुख्य मंदिर के सामने आ गया। यहाँ भगवान वेंकटेश्वर मंदिर को सोने से बनाया गया है। शायद जो भुगतान करने वाले भक्त हैं उन्हें नीचे बैठाया जा रहा है अंदर के कमरे में।

लोगों के बीच में से गुजरते हुए आखिरकार मैं मुख्य स्थल तक आ पहुंचा। सुरक्षाकर्मी हर जगह तैनात है। बाहर परिसर से ले कर मुख्य प्रांगण तक।

मेरे आगे दो लोग और चल रहे हैं। इनके दर्शन करने के बाद मेरा नंबर आएगा। दाएं बाएं से मैं भी वेंकटेश भगवान को झांक रहा हूँ। प्रांगण में पंडित अपना कार्य विधि विधान से पूजा पाठ करते दिख रहे हैं।

मैने भी अच्छे तरीके से दर्शन किए। अच्छी बात ये है की भक्तों को यहाँ से भगा नहीं रहे। उन्हें पांच सेकंड दर्शन करने का मौका दे रहे हैं। शायद आज भीड़ कम है इसलिए भी।

कुल डेढ़ घंटे के भीतर दर्शन करके बाहर निकल आया। बाहर लोग इधर उधर मंदिर के पास बैठे हैं। जैसे अब यहाँ से जायेंगे ही नहीं।

सजा धजा रथ

दानपात्र और प्रशाद

पीछे की ओर पुराने कमरे में बड़े बड़े बर्तन और पुराना सामान देखने को मिल रहा है। कई कमरों में तो ताला जड़ा हुआ है। मंदिर का चक्कर लगा कर दान पेटी में मैने भी कुछ मूल्य दान कर दिए।

कई लोग तो यहाँ पर लाखों करोड़ों का दान दे जाते हैं। दानपात्र के आगे ही प्रशाद बट रहा है। प्रशाद ले कर एक किनारे बैठ बाकियों की तरह गृहण करने लगा।

दर्शन करने के बाद बहुत ही आनंद आ रहा है। पर दोबारा प्रशाद नहीं लिया जा सकता। सीधा बाहर का रास्ता। यहाँ रास्ते बिलकुल समझ से परे हैं। पता ही नहीं चलता कौनसा रास्ता किधर को जा रहा है।

रास्ता पूछते पूछते निकल पड़ा प्रशाद लेने। यहाँ टोकन पर लिखे हुए ही काउंटर से लड्डू लेने हैं। अन्यथा लड्डू मिलेंगे ही नहीं। मैं भी टोकन अनुसार आ गया पहली मंजिल पर अपने निर्धारित काउंटर के सामने।

लड्डू की महक सूंघ कर लग रहा है और लड्डू ले लिया जाए। पर अब यहाँ से लड्डू लेने महंगा पड़ेगा।

बाहर आ जाने के बाद स्नानघर दिखाई पड़ रहा है। पूछते पूछते बैग मिलने वाली इमारत में आ गया। यहाँ से अपना सामान उठाया और स्नानघर की ओर आ गया।

बरगद के पेड़ के नीचे बैग रख कर कपड़े निकल लिए। स्नान ध्यान कर निकल पड़ा बाजार की ओर।

किसी के माध्यम से पता चला की मंदिर से बाहर थोड़ा दूर एक अलग भवन में भोजन का आयोजन किया जाता। यहाँ से कोई भी भूंखा नहीं जाता। भोजन अत्यंत स्वादिष्ट होता है।

ढूढते हुए मैं आ गया इस भवन के पास। अपना बैग और जूते जैसे अन्य सामग्री जमा कराई और ऊपर की ओर निकल पड़ा। एक बड़ी सी थाली में भोजन परसा गया।

भोजन गृहण के बाद कुछ देर मंदिर के सामने बैठ बिताने लगा। यहाँ एक रथ खड़ा है। जिसमे यात्रा होती होगी। कुछ एक तस्वीर लेने के बाद निकल पड़ा तिरुमालाकी ओर।

तिरुपति मंदिर के बहार लेखक

तिरुपति में पाया खोया मोबाइल

बाजार से निकलते हुए मुख्य बस अड्डे पहुंचा। यहाँ से सीधा नीचे की ओर जाने वाली बस में बैठ गया। बाकि सवारियों का भी इंतज़ार हो रहा है।  ऊपर आते समय ही दो तरफ़ा टिकट बनवा लिया था इसलिए अब कोई टिकट नहीं लगेगा।

तिरुमाला तिरुपति पर्वत आते समय सुरक्षाकर्मियों ने सुरक्षा के मद्देनजर तंबू निकलवा के अपने पास रखवा लिया था।

वही तंबू लेने साथी घुमक्कड़ उतर जाएगा और उसका बैग लेके मैं बस स्टैंड निकल जाऊंगा योजनानुसार।

बस स्टेशन पर उतरते वक्त जेब टटोलने पर मेरा मोबाइल नदारद मिला। जैसे मेरे पैरो तले जमीन खिसक गई। दो महीने पहले ही मोबाइल लिया है और इस समय गायब।

बस से उतरते ही मैंने तुरंत बस ड्राइवर से तुरंत बस रोकने को कहा और उसे मोबाइल के बारे में बताया। दोनों बड़े बैग बस के सामने रख कर बस में चढ़ा मोबाइल देखने।

पीछे अपनी सीट पर मोबाइल देखा तो भी नदारद था। पास बैठे यात्री से कॉल करने को कहा। मोबाइल बंद बता रहा है।

एकाएक यह विचार आया कि मोबाइल चोरी हो चुका है और चोर ने बंद कर दिया है।

फिर कंडक्टर ने मुझे बुलाकर बोला कि एक मोबाइल बस के दरवाज़े पर पड़ा है। पहुंचा और मैंने मोबाइल पड़ा पाया। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है आखिर हुआ क्या?

लेकिन अंत अच्छा हुआ। मैं बस स्टैंड पहुंच गया वहाँ कुछ देर बाद साथी आ गया। सारा किस्सा बताया। साथी स्तब्ध रह गया क्यों की अभी महीना भर ही हुआ है घर से निकले और घूमने को काफी कुछ है।

साथी रेलवे स्टेशन से चेन्नई और मैं बैंगलोर निकल जाऊंगा अपने भरी भरकम बैग का वजन कम करने।

अनेक द्वारों में से एक द्वार

रोचक तथ्य

  • भगवान बालाजी के मंदिर से 23 किमी दूर एक गांव है। जहाँ बाहरी व्‍यक्तियों का प्रवेश वर्जित है। यहाँ पर लोग बहुत ही नियम और संयम के साथ रहते हैं।
  •  मान्‍यता है कि बालाजी को चढ़ाने के लिए फल, फूल, दूध, दही और घी सब यहीं से आते हैं। इस गांव में महिलाएं सिले हुए कपड़े धारण नहीं करती हैं।
  • कहा जाता है कि मंदिर भगवान वेंकटेश्‍वर स्‍वामी की मूर्ति पर लगे बाल असली हैं। ये कभी उलझते नहीं हैं और हमेशा मुलायम रहते हैं।
  • यहाँ जाने वाले बताते हैं कि भगवान वेंकटेश की मूर्ति पर कान लगाकर सुनने पर समुद्र की लहरों की ध्‍वनि सुनाई देती है। यही कारण है कि मंदिर में मूर्ति हमेशा नम रहती है।
  • मंदिर में मुख्‍य द्वार पर दरवाजे के दाईं ओर एक छड़ी है। बाल्‍यावस्‍था में इस छड़ी से ही भगवान बालाजी की पिटाई की गई थी। इस कारण उनकी ठुड्डी पर चोट लग गई थी। इस कारणवश तब से आज तक उनकी ठुड्डी पर शुक्रवार को चंदन का लेप लगाया जाता है। ताकि उनका घाव भर जाए।
  • भगवान बालाजी के मंदिर में एक दीया सदैव जलता रहता है। इस दीए में न ही कभी तेल डाला जाता है और न ही कभी घी। कोई नहीं जानता कि वर्षों से जल रहे इस दीपक को कब और किसने जलाया था?
  • भगवान बालाजी की प्रतिमा पर खास तरह का पचाई कपूर लगाया जाता है। वैज्ञानिक मत है कि इसे किसी भी पत्‍थर पर लगाया जाता है तो वह कुछ समय के बाद ही चटक जाता है। लेकिन भगवान की प्रतिमा पर कोई असर नहीं होता।
  • भगवान की प्रतिमा को प्रतिदिन नीचे धोती और ऊपर साड़ी से सजाया जाता है। मान्‍यता है कि बालाजी में ही माता लक्ष्‍मी का रूप समाहित है। इस कारण ऐसा किया जाता है।

बालाजी होने की कहानी

वैंकटेश भगवान को कलियुग में बालाजी नाम से भी जाना गया है। प्रसिद्ध पौराणिक सागर-मंथन की गाथा के अनुसार जब सागर मंथन किया गया था तब कालकूट विष के अलावा चौदह रत्‍‌न निकले थे। इन रत्‍‌नों में से एक देवी लक्ष्मी भी थीं।

लक्ष्मी के भव्य रूप और आकर्षण के फलस्वरूप सारे देवता, दैत्य और मनुष्य उनसे विवाह करने हेतु लालायित थे, किन्तु देवी लक्ष्मी को उन सबमें कोई न कोई कमी लगी। अत: उन्होंने समीप निरपेक्ष भाव से खड़े हुए विष्णुजी के गले में वरमाला पहना दी। विष्णु जी ने लक्ष्मी जी को अपने वक्ष(सीने) पर स्थान दिया।

एक बार धरती पर विश्व कल्याण हेतु यज्ञ का आयोजन किया गया। तब समस्या उठी कि यज्ञ का फल ब्रम्हा, विष्णु, महेश में से किसे अर्पित किया जाए। ऋषि भृगु ने पहले तो भगावन ब्रह्मा का दरवाजा खटखटाया, लेकिन भगवान ब्रह्मा उस समय विष्णु का नाम जपने में इतना लीन थे कि उन्‍हें ऋषि भृगु की आवाज नहीं सुनाई दी।

ब्रह्मा के इस व्‍यवहार पर गुस्‍साए ऋषि भृगु ने ब्रह्मा को शापित कर दिया कि इस पृथ्वी पर अब कोई उन्‍हें नहीं पूजेगा। उसके बाद ऋषि भृगु शिवा के पास गए। उस समय भगवान शिव माता पार्वती से बाते करने में इतने डूबे हुए थे कि उन्‍होने ऋषि की बात पर ध्‍यान नहीं दिया। तब गुस्‍साए ऋषि ने भगवान शिव को श्राप दिया कि अब से केवल उनके लिंग की पूजा होगी।

अंत में वे विष्णुलोक पहुंचे। विष्णुजी शेष शय्या पर लेटे हुए थे और उनकी दृष्टि भृगु पर नहीं जा पाई। ऋषि भृगु ने आवेश में आकर विष्णु जी के छाती पर लात मार दी। अपेक्षा के विपरीत विष्णु जी ने अत्यंत विनम्र होकर उनका पांव पक़ड लिया और और उसे आहिस्‍ता से दबाने लगे।

विष्णुजी के व्यवहार से प्रसन्न भृगु ऋषि ने यज्ञफल का सर्वाधिक उपयुक्त पात्र विष्णुजी को घोषित किया। उस घटना की साक्षी विष्णुजी की पत्‍‌नी लक्ष्मीजी रुस्ट हो गई। उन्हें विष्णुजी पर भी क्रोध आया कि उन्होंने भृगु को दंडित करने की बजाए उनसे उल्टी माफी क्यों मांगी? परिणामस्वरूप लक्ष्मीजी विष्णुजी को त्याग कर चली गई। विष्णुजी ने उन्हें बहुत ढूंढा किन्तु वे नहीं मिलीं।

अंतत: विष्णुजी ने लक्ष्मी को ढूंढते हुए धरती पर श्रीनिवास के नाम से जन्म लिया और संयोग से लक्ष्मी ने भी पद्मावती के रूप में जन्म लिया। घटनाचक्र ने उन दोनों का अंतत: परस्पर विवाह करवा दिया। सब देवताओं ने इस विवाह में भाग लिया और भृगु ऋषि ने आकर एक ओर लक्ष्मीजी से क्षमा मांगी तो साथ ही उन दोनों को आशीर्वाद प्रदान किया।

लक्ष्मीजी ने भृगु ऋषि को क्षमा कर दिया भगवान विष्‍णु ने अपनी शादी का खर्चा उठाने के लिये धन के देव कुबेर से पैसे उधार लिए। तब जा कर दोनों की शादी हुई और तब से माता लक्ष्‍मी फिर से भगवान विष्‍णु के सीने में समा गईं। लोग इस मंदिर में आ कर शादी इसलिये करते हैं, जिससे वह जन्म जन्मांतर साथ रह सकें।

ऐसी मान्यता है कि जब भी कोई भक्त तिरूपति बालाजी के दर्शनार्थ जाकर कुछ चढ़ाता है तो वह न केवल अपनी श्रद्धा भक्ति अथवा आर्त प्रार्थना प्रस्तुत करता है अपितु भगवान विष्णु के ऊपर कुबेर के ऋण को चुकाने में सहायता भी करता है। अत: विष्णुजी अपने ऐसे भक्त को खाली हाथ वापस नहीं जाने देते हैं।

जिस नगर में यह मंदिर बना है उसका नाम तिरूपति है और नगर की जिस पहाड़ी पर मंदिर बना है उसे तिरूमला कहते हैं। तिरूमला को वैंकट पहाड़ी अथवा शेषांचलम भी कहा जाता है। यह पहड़ी सर्पाकार प्रतीत होती हैं जिसके सात चोटियां हैं जो आदि शेष के फनों की प्रतीक मानी जाती हैं। इन सात चोटियों के नाम क्रमश: शेषाद्रि, नीलाद्रि, गरू़डाद्रि, अंजनाद्रि, वृषभाद्रि, नारायणाद्रि और वैंकटाद्रि हैं।

तदीपात्री से तिरपति तक का कुल साफर 324किमी

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