टेंट में हुई सिलसिलेवार चोरी

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हाहाकार

चारों तरफ अफरा तफरी का माहौल है। सुबह उठकर यह कैसा दृश्य देखने को मिल रहा है। रात भर में किसी शातिर चोर ने अपना काम कर दिया था।

तकरीबन आठ से दस मोबाइल लोगों की जेब से निकल चुके थे। सोते हुए उन्हें इस बात की खबर ही नहीं पड़ी। इस अफरा तफरी में मेरी आंख खुली लेकिन थोड़ी देर से।

काफी लोग अपना बिस्तर समेट चुके थे। यह सब देखने सुनने के बाद मैंने अपना स्लीपिंग बैग खंगाला। शुकर है मेरा यंत्र और कैमरा मेरे पास अभी भी है।

माहौल को भांप के मैं सोने से पहले इसकी तैयारी कर ली थी। बड़े बैग से कीमती वस्तुएं निकाल कर छोटे बैग में डाल ली थीं और अपने स्लीपिंग बैग में डाल के सोया था। कुछ भी हो सकता था।

वहीं पंडाल में गोरखपुर से आई माताजी ने खूब स्नेह दिया। रात में विश्राम से पहले उनसे थोड़ी वार्ता हुई जब एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति ने जबरन मेरा बिस्तर सरका के अपना बिस्तर लगा लिया। आपत्ति करने पर वो लड़ने पर उतारू हो गया। स्थिति को देखते हुए इन्हीं माताजी ने माहौल शांत कराया था और थोड़ा खिसक जाने का आग्रह किया। 

स्नान ध्यान के बाद सुबह सुबह माताजी अपने साथ साथ मेरे लिए भी चाय ले आईं। यह उनका बड़प्पन है। उन्होंने अपने बारे में बताया कि उनकी तीन पुत्री हैं। पुत्र ना होने का मलाल है इसलिए जब भी मुझ जैसे युवक को देखती हैं उनको अपना बेटा नजर आता है।

लेकिन यहाँ मैं उनके विचारों से सहमत नहीं हूँ। लड़का लड़की में भेदभाव कैसा। समाज जब दोनों से है, अगर ऐसा भेदभाव कल्पना चावला, गीता बबीता फोगाट या अन्य भी करते तो देश को ये रत्न कैसे मिलते?

माताजी के पतिदेव रेलवे में कार्यरत हैं। ऐसे में उन्हें आजीवन मुफ़्त पास मिलता रहेगा। इसलिए वो भी उम्र को देखते हुए तीर्थ स्थल और ऐसी जगह आती जाती रहती हैं जहाँ लोग भगवान का स्मरण करते रहते हैं।

जैसे जैसे उमर बीतने लगती है वैसे वैसे मनुष्य भगवान के प्रति आस्था बढ़ती जाती है। बताने लगीं की आज भागवत प्रवचन के 18 दिन पूरे हो गए हैं। कुछ ही देर में यज्ञ प्रारंभ होगा। इसलिए मुझे सुझाव दिया फटाफट स्नान करने का और यज्ञ के बाद साथ भोजन करने का।

स्नान ध्यान

पंडाल के सामने मुख्य गेट के बगल से कुछ दूरी पर पाखाना है। ये मुझे साथी घुमक्कड़ ने बताया। वहां तो और ज्यादा मारा मारी होगी। पर मैं गलत स्थान पर आ गया। वहां जहाँ कल रात को बैग रख कर इंतजार में था प्रवचन खत्म होने का।

सही दिशा में खुद चलने लगा और नित्य क्रिया करने की मारामारी यहाँ साफ देखी जा सकती है। मात्र दो संडास हैं यहाँ। किसी तरह से अफरातफरी के इस दौर में नित्य क्रिया करके भागा। जैसे हालात हैं उस हिसाब से यहाँ से भागना ही सही है।

अब लगे हांथ नहा भी लूं तो दिन की ट्रेन पकड़ने के लिए ज्यादा काम नहीं रहेगा। पंडाल में बाथरूम की व्यवस्था मुझे कहीं दिख नहीं रही। दूर मैदान में एक नलका जरूर बह रहा है जिसके आस पास का इलाका भीगा भीगा है।

मुझे लगा शायद सब यहीं स्नान करके गए हैं। ऐसे खुले मैदान में शायद ही छुटपन में कभी मस्ती में नहाया होगा। लेकिन आज मजबूरी में। बैग से कपड़े अगौंचा निकाल कर जाने लगा।

नल्के के पास छपरे में कुछ मजदूर रह रहे हैं। इस समय रबर की टोंटी वही लिए रखे हैं। मांगने पर टोंटी आगे बढ़ा दी। नहा धोकर शरीर को ढक कर पंडाल की ओर चल पड़ा।

इससे पहले कि मुझे कोई कन्या अर्ध नग्न अवस्था में देखे जल्दी से पंडाल में आ कर कपड़े लपेटने लगा। सुबह की दिनचर्या पूर्ण करने के पश्चात जब मैं वापस पंडाल में आया तबतक माताजी निकल गई महायज्ञ में अपना योगदान देने। मैं स्टेज पर जा कर भगवान गीता का दर्शन करने आया।

स्टेज स्पीकर और माइक से सजा हुआ है। महाराज जी जो भागवत गीता के रहे थे उनके लिए बकायदा एक ऊंचा सिंहासन रखा हुआ है जो आज के लिए खाली है।

मेरे भरोसे अपना झोला वहीं छोड गईं। मैं तैयार हो कर यज्ञ खतम होने का और अम्मा जी के वापस आने का इंतजार करने लगा। पर फिर सुबह की बात याद आई जब अम्मा जी ने बताया था की दिन का भोजन यहाँ उपलब्ध रहेगा।

आँखों के सामने चोरी

स्टेज आज खाली है। यज्ञ स्टेज के पिछले वाले हिस्से में हो रहा है। इतने दिनो से रुकी तमाम औरते यज्ञ में हिस्सा ले रही हैं। चलते यज्ञ के बीच में एक महिला बैग लेके आई। वह अपना सामान कुर्सी पर रख कर भागवत गीता के दर्शन करने स्टेज पर चढ़ गईं।

कुछ देर के लिए अंदर गई महिला जब बाहर आई तब उसकी चीख ने सबको जगा दिया। मैं बैठा बतिया रहा था की ठीक उसी क्षण जाने कब आंखो के सामने से उस महिला का रुपयों से भरा बैग चोरी हो गया। लौटीं ही हैैं कि इतनी देर में काम हो गया।

जैसे ही ज्ञात हुआ आसपास बैठे सभी लोग सकते में आ गाय। सभी भक्तजन मिलकर इधर उधर बैग ढूंढने लगे। मैंने साथी घुमक्कड़ को अपने बैग के पास ही रुकने को कहा। कहीं दूसरे का सामान ढूंढते ढूंढते मेरा सामान ही ना पार हो जाए।

चर्चा छिड़ी की कुछ लोगों का एक दल बाहर से आया था कुछ देर बैठा और निकल गया। शक की सुई अब उन्हीं लोगों के ऊपर घूम रही है।

सभी के बीच में ये तय हुआ की कुछ लोग उन्हें पंडाल में ही ढूंढे और कुछ बाहर जा कर। मैं और मेरे साथ राजस्थान से शिरकत करने आए एक सज्जन निकल पड़े चोर को ढूंढने।

पहले मंदिर परिसर के बाहर, मठ के पास कहाँ कहाँ नहीं ढूंढा उस चोर को। महाबोधि मंदिर तक पहुंच गया। परन्तु वो शातिर चोर नहीं मिला।

मैं वापस लौट आया। मुझे यकीन हो गया है कि वो अब मिलने से रहा। पीड़िता को जब ये बताया तो वो और भी दुखी हुईं। दुखी मन के साथ निकलने लगी। हद तो तब हो गई जब चोर ने उनकी चप्पल तक नहीं छोड़ी। 

ये सब देख कर काफी पीड़ा हो रही है। अगर ये मेरे साथ हुआ होता तो क्या करता मैं। यज्ञ भी विधि पूर्वक समाप्त हो गया। माता जी को जब ये बात पता चली तो वो अपना सिर पकड़ कर बैठ गईं। जैसे उन्ही का बैग चोरी हुआ हो।

पंडाल में खाना

भोजन करने का भी समय हो गया। माता जी के साथ आईं दूसरी महिला को यहीं छोड़ दिया गया बैग की तकवाही करने के लिए।  मैं, साथी घुमक्कड़ , माता जी, राजस्थानी भाऊ और उनकी पत्नी सभी इक्कट्ठे भोजन करने निकल पड़े। 

माता जी ने हमे डरी पर बैठा दिया और अपना चली गईं सोने पत्तल लेने। उत्साह ने माता जी ने खुद ही मेरा भोजन परसा। केवल कसर बाकी थी तो मूह तक निवाला देने की बस वही नहीं हुआ। ऐसा लग रहा है जैसे मैं स्वयं के घर में हूँ। खाना भी लजीज बना है और कम बना है। ज्यादा व्यंजन नहीं पकाए गए हैं।

भोजन कर के उठने लगा तो भी माता जी को चैन नहीं जो मेरी थाली उठा कर रखने चली गई। मुझे कुछ करने ही न दे रही हैं। खाने पीने के बाद माता जी से अलविदा लिया और जाने से पहले तस्वीर भी ली।

रांची रवाना होने से पहले अम्मा जी के साथ की तस्वीर

रांची को रवाना

पंडाल के बाहर निकालने के बाद पास के मैदान में लगी एक कतार से कई बसें हैं। पहली ही बस में लद गया जो स्टेशन से हरियो तक के लिए है। बस से चल पड़ा रेलवे स्टेशन की ओर जहाँ से रांची को जाने वाली ट्रेन थीं।

बस का सफर छोटा रहा और मैं हरियो पर उतर गया। स्टेशन के लिए अभी भी थोड़ा रास्ता तय करना बाकी है। हल्की हल्की बारिश भी होने लगी है। भीगते हुए टेंपो के आने का इंतजार कर रहा हूँ।

जितने भी टेंपो आ रहे हैं या तो वो आरक्षित हो कर जायेंगे अथवा जायेंगे ही नहीं। अब यहाँ से स्टेशन तक के लिए वाहन मिलना कुछ देर के लिए मुश्किल हो गया।

ऐसा लग रहा है कि आज ट्रेन बिना मुझे लिए ही निकल जाएगी। एक टेंपो वाला मसीहा बन कर आया। उसने अपनी टेंपो में बैठाया कुछ अन्य सवारियों को भी जिन्हें स्टेशन ही जाना है। सबके बैठ जाने के बाद वाहन चल पड़ा मंजिल की ओर।

स्टेशन पर पहुंचते ही ऑटोवाले ने अपना रंग दिखाया दिए। अब यहाँ पहुंचा कर मुझसे दुगना किराया वसूलने की कोशिश करने लगा। अगर यहाँ मैं इसी बहस करने में उलझ जाऊंगा तो ट्रेन छूट जाती। जितना मांगा उतना दिया और प्लेटफार्म की तरफ भागा। जाएगी।

जितने पैसे बने उससे ज्यादा पकड़ा कर बैग ले कर निकल आया स्टेशन की तरफ।

गया रेलवे स्टेशन

प्लेटफार्म पर काफी भीड़ देखने को मिल रही है।  कुछ ही देर में ट्रेन भी आ जाएगी। तब तक यहीं इंतजार करने लगा। स्टेशन पर दुकान में से खाने पीने की कुछ सामग्री सफर के लिए ले कर बैग में डाल ली।

ट्रेन अपने निरधारित समय पर आयी। ट्रेन से सवारियां भर भर कर उतर रही हैं पर चढ़ने वाली बहुत कम मात्रा में हैं। एकदम खाली दिख रही ट्रेन में मैं चढ़ गया। पर मैने पहले से ही टिकट आरक्षित करवा कर रखी हुई थी।

अपनी डिब्बा ढूढा और फिर सीट पर बैग रख कर जम गया। ट्रेन भी ज्यादा देर ना रुकी और निकल पड़ी। ऊपर की सीटें ही अराक्षिक कराता हूँ सफर में। ताकि आराम से यात्रा हो और समान भी सुरक्षित रहे।

दिन में ऐसी नींद आई की सीधा शाम को ही उठा। समय देखा तो पांच बज रहे हैं। शायद कल दिनभर की थकान आज निकल रही है।

 पिछले दो दिनों की थकान भी उतारी। बड़े बैग के साथ थोड़ी मशक्कत तो करनी पड़ती है लेकिन लंबे सफर के लिए समान भी जरूरी है।

दिन का सफर कर के रात्रि के दस बजे सकुशल रांची पहुंच गया। स्टेशन से आर्मी कैंप पहुंच गया। आप सोच रहे होंगे आर्मी कैंप क्यों, वह इसलिए क्योंकि मेरा मित्र कादिर अली सेना में निवृत्त है। अब शायद कुछ दिन मैं यहीं डेरा जमा कर रहा हूँ। हाहाहा!

बोधगया से गया से रांची तक की कुल 345km की यात्रा

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2 Comments

  1. Beautifully written.,You have adventured a lot at a very early age., Hats off to your boldness.,Touring around alone is interesting

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