टाटा का चाय संग्राहलय

केरेल | भारत | मुन्नार

नई योजना

मुन्नार में रात्रि में दिन के मुकाबले और भी अधिक ठंड का सामना करना पड़ा। नींद तो बेहतर आई पर कभी कभी ठंड से ठिठुरना भी पड़ा।

यहाँ सुबह और देर में होती है। पहाड़ी में नीचे की ओर दबे होने के कारण शायद ही कभी यहाँ सूरज की रोशनी पड़ती हो। फिर भी उजियारा देर में ही होता है।

शीउजि रफी से चर्चा में मालूम पड़ा यहाँ घूमने वाली जगह के बारे में। हालांकि कोच्चि में सरथ ने काफी जानकारी मुहैय्या करा दी थी। जिसके मुताबिक तो मुझे यहाँ तीन दिन गुजारने चाहिए।

पर उतना समय गुजारना संभव नहीं होगा। शीउजि रफी से के सामने एक दिन और ठहरने का प्रस्ताव रखा जिसको उन्होंने स्वीकार तो किया पर भुगतान के साथ।

यानी और दिन रुकता हूँ तो भुगतान करना होगा बिस्तर या कमरे का। बताने लगे की उनके छात्रावास में लोग हफ्ते भर से यहाँ रुके हुए हैं।

मैं यही सोच रहा हूँ आखिर हफ्ते भर से कर क्या रहे हैं लोग यहाँ। ऐसे वीराने में। मुझे वीराना थोड़ा कम जमता है। जब तक इंसानों की हलचल ना देख लूं मन को ठंडक नहीं पहुंचती।

कुछ पहाड़ियां ऐसी भी होती हैं जहां शायद ही कोई मानव बसेरा होता होगा। पर फिर भी लोग वहाँ जाते हैं अपनी जान गवाने।

एर्नाकुलम राष्ट्रीय उद्यान को जाने के लिए शीउजि रफी के छात्रावास से समय से निकलना बहुत जरूरी है। रफी के मुताबिक तो मुझे भोर में ही निकल जाना चाहिए था, अब काफी देर हो चुकी है। क्योंकि उद्यान काफी दूर है।

कल उम्रदराज जोड़ा आज फिर दिखा। जो शायद कहीं घूमने निकल रहे हैं। कुछ लोग सिर्फ शारीरिक रूप से उम्रदराज होते हैं। मानसिक रूप से वो हस्ट पुष्ट रहते हैं।

इसलिए कई लोगों को मैने गौर किया है की वो इस उम्र में भी घूमते फिरते है। खासतौर पर सेवानिवृत होने के बाद। इधर नौ बज चले हैं और मैं छात्रावास के बाहर निकल रहा हूँ।

यहाँ छात्रावास में कई भिन्न प्रकार के लोगो से कल रात्रि में मुलाकात हुई। कोई कहीं किसी देश के कोने से आया है। ऐसे ही एक महाशय जो पेशे से हलवाई हैं इजराइल के रहने वाले हैं। इनकी रफी से काफी घनिष्ट मित्रता जान पड़ रही है।

छात्रावास से मुख्य सड़क तक पहुंचना इतना सुगम नही है। दूसरी पहाड़ी पर मुख्य सड़क। उस तक पैदल पहूँचने में आधा घंटा का समय लगा।

इतना ऊबड़ खाबड़ और जटिल मार्ग, ऊपर से डीजल की बदबूदार गंध। हर साल लाखों इस गंध के कारण मारे जाते हैं। मुख्य सड़क तक आते आते राष्ट्रीय उद्यान जाने की योजना रद्द हो गई।

राष्ट्रीय उद्यान जाना रद्द

क्योंकि अब ना तो इतना समय है की राष्ट्रीय उद्यान जा कर वापस आ जाऊं और ना रफी साहब चाहते हैं की आज की रात उनके छात्रावास में रुकूं। सिर्फ जाना ही संभव हो सकेगा वापसी में देर रात्रि मुन्नार से बाहर जाना भी चाहूँगा तो शायद बस ना मिले।

तय किया की मुन्नार की सड़को पर घूमने के बजाय चाय संग्रहालय चला जाए। जो यहाँ से पंद्रह किमी दूर स्तिथ है। संग्रहालय तक बस से ना जाकर लिफ्ट से जाऊं ताकि चाय के बागान भी देखता चलूं।

ठीक वैसा ही किया। निजी बसें निकलती गई पर मैं बैठा नहीं। हर बार हाथ देने पर लिफ्ट मिल रही है। ऐसे करके मैं कई बागानों में रुक रुक कर उन्हें देखता जा रहा हूँ।

सबसे पहले पर्यटक क्षेत्र में उतर गया जहां पर्यटकों की भीड़ है। यहाँ तस्वीरबाजी और चाय के बगानों के बारे में जानना भी आसान है।

ऐसे ही अपने वाहन से उतरकर एक परिवार इसका लुत्फ उठा रहा है। हरियाली इतनी है जिसका कोई सानी नहीं। सड़को पर साफ सफाई तो है ही साथ में पहाड़ी की ढलान में कचरा भी।

टूरिस्ट गाड़ियों का जमावड़ा है। कई बागानों में तो गाड़ी भीतर तक जा सकती है। पर्यटक भी आज के समय इस कदर आलसी हो चले हैं की उन्हें शारीरिक गतिविधि ना करनी पड़े।

यहाँ ज्यादातर जमीन टाटा समूह द्वारा खरीदी हुई है। चाय की पत्तियां बोरियों में भरकर सड़क किनारे रखी हुई हैं कारखाने में जाने के लिए।

इच्छा तो है किसी खेत में जा कर नजदीक से देखूं इस खेती को। पर यहाँ ये संभव नहीं दिख रहा। बगानों में महिलाएं काम करती नजर आ रही हैं।

अब अगले पड़ाव की ओर बढ़ते हुए मैं निकल पड़ा यहाँ से लिफ्ट लेते हुए। हर बार लिफ्ट मिलती और चालक मेरे बारे में जानने को इच्छुक होता।

मैं कौन हूँ, क्या करता हूँ, कहाँ से आया हूँ? इन सभी प्रश्नों का उत्तर हर बार मैं बहुत ही धैर्यपूर्वक और सहजता से देता रहा। बाजार से पहले कोलुक्कुमलाई चाय बागान पर आ पहुंचा। यहाँ महिलाएं बागानों में पत्तियां तोड़ रही है।

खूबसूरत चाय बागान

चाय बागान

कुछ आगे चलने पर जगह दिखी बागान में प्रवेश करने की। दाएं बाएं नजर फिरते हुए तारो के ऊपर से लांघते हुए से मैं बागान में घुस गया।

यहाँ एकदम ही सन्नाटा पसरा हुआ है। ना कोई महिला पट्टी तोड़ने वाली दिख रही है ना कोई मानुष। हालांकि चढ़ते हुए बड़ी सावधानी से चढ़ना पड़ रहा है।

बागानों के बीच में आ कर ऊपर चोटी पर खड़े हो कर तस्वीरें लेने लगा। बागान कि चोटी पर खड़ा ही हुआ था की तभी सड़क पर कोई मानुष अपने दुपहिया वाहन पर से चिल्लाते ललकारने लगा। वाहन घूमाते हुए मेरी तरफ आने लग गया। मुझे नीचे उतरने को बोल रहा है।

समझ गया मुसीबत आ सकती है। बिना तस्वीर लिए ही निकलना पड़ा। चिकनी चट्टानों पर भागना तो संभव नहीं है। भागने पर फिसलते हुए सीधा तारों में घुसने का खतरा है जिससे चोटिल होना लाजमी है।

आहिस्ता आहिस्ता उतरते हुए नीचे आ गया। इधर मैं नीचे आ कर चिल्लाने वाले को ढूंढ रहा हूँ पर चिल्लाने वाला कहीं भी ना दिख रहा है।

कुछ दूर चलने पर और तस्वीरें खींची। मुन्नार का प्रमुख बाज़ार यहाँ से ज्यादा दूर नहीं है।

रेसिंग बाइकर्स के वाहन गुजर रहे हैं। उनमें से एक से मैंने लिफ्ट मांगी। गाड़ी रुकी और मैं सवार हो गया। वाहन चला रहे चालक ने बताया की वो कोच्चि से अपने दफ्तर में छुट्टी लगा कर यहाँ घूमने आए हुए हैं अपने मित्रों के साथ।

ये सभी कहीं दूर जा रहे हैं। शायद राष्ट्रीय उद्यान। पर मेरा अब जाने का विचार रद्द हो चला है। बाज़ार तक आ पहुंचा। चाय की दुकान पर चाय का आनंद लेने आ गया।

चाय के बाद यहाँ लगे बाजार में घूमने लगा। जो है काफी बड़ी। यहाँ ऊनी कपड़ों की अच्छी बिक्री हो रही है। साथ ही लाल मिर्च पाउडर की भी।

चाय बागान में तस्वीर खिंचवाते हुए

चाय संग्राहलय

बाजार से होते हुए पुल पार कर इडुक्की चाय संग्रहालय की तरफ बढ़ चला। थका देने वाली धूप हो रही है। दो किमी पैदल चल कर इडुक्की आ पहुंचा।

संग्रहालय के भीतर जाने की इच्छा ही नहीं हो रही। चाय बगानों की उत्पत्ति और विकास की दृष्टि से मुन्नार की अपनी अलग विरासत मानी जाती है।

यहाँ भिन्न भिन्न प्रकार की चाय मौजूद हैं। चाय संग्रहालय में प्रवेश शुल्क ₹120 है, जो थोड़ा अधिक लग रहा है। यह संग्रहालय टाटा समूह द्वारा संचालित है।

इस संग्रहालय में 1880 में मुन्नार में चाय उत्पादन की शुरुआत से जुड़ी निशानियां रखी गई हैं। इस चाय संग्रहालय में दुर्लभ कलाकृतियां, चित्र और मशीनें भी देखी जा सकती हैं।

इनमें से हर एक की अपनी कहानी है जो मुन्नार के चाय बगानों की उत्पत्ति और विकास के बारे में बताती है। यह संग्रहालय टाटा टी के नल्लथन्नी इस्टेट का एक दर्शनीय स्थल है।

यहाँ कई ऐतिहासिक तस्वीरें भी लगी हुई हैं। इसके पास ही स्थित टी प्रोसेसिंग ईकाई में चाय बनने की पूरी प्रक्रिया को करीब से देखा व समझा जा सकता है।

मैं पिछले दरवाजे की ओर चल पड़ा। जहां अलग अलग तरह की चायपत्ती है जिसे खरीद के लिए रखा गया है। सबके दाम आसमान छूते हुए।

कुछ देर वक्त गुजारने के बाद मैं निकल पड़ा वापस बाज़ार की ओर। किसी ने अवगत कराया था कि यह इको पॉइंट भी मौजूद है जो मुन्नार से पंद्रह किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

चिल्लाकर अपनी आवाज़ को पुनः सुनना यह काफी रोमांचकारी है, ये जगह बेहद खूबसूरत जान पड़ती है जो किसी का भी मन मोह सकती है। लेकिन समय सीमा से बाध्य मैं वापस अनामुचल के लिए निकल पड़ा।

अद्भुत जंगल

ठीक वैसे ही जैसे लिफ्ट लेते हुए यहाँ तक पहुंचा वापस जाते वक़्त एक अद्भुत जंगल देखने में आ रहा है यह ठीक वैसा ही है जैसे आमतौर पर फिल्मों में दिखाया जाता है।

फिल्मों वाला दृश्य

लिफ्ट से यहीं तक ही आना हुआ है। आगे जाने के लिए कोई और वाहन भी नहीं मिल रहा है। बेहतर है कुछ समय यहीं बिताया जाए। यहाँ उतरकर तस्वीरें और चलचित्र बनाने लगा।

यहाँ और भी बालक आए हुए हैं अपना समय काटने। ये ऐसी जगह है जहां पूरा दिन बिताया जा सकता है। कुछ आगे चल कर नहर भी है जो अब नाला बन चुकी है।

तरह तरह के कोण से तस्वीर ले कर मन भर लिया। बिलकुल ऐसा दृश्य है जैसा भारतीय फिल्मों में दर्शाया जाता रहा है किसी गाने में। पर्याप्त समय व्यतीत करने के बाद निकल पड़ा पुनः।

सरथ ने बताया था की अगर बेहतर चाय पत्ती लेनी हो तो टाटा समूह से ही लेना उचित रहेगा। बाकी जगह तो ठग ही बैठते है। एक मोड़ से दूसरे मोड़ होते हुए दार्शनिक स्थल पर आ कर रुक गया।

यहाँ औरों की भांति कुछ अपनी तस्वीर निकलवाई और पुनः निकल पड़ा सफर पर। पर कई जगह ढलान पर वही गंदगी देखन को मिल रही है।

लिफ्ट लेते हुए टाटा समूह तक आ गया। पर यहाँ भीतर जाने जैसा कुछ भी नहीं है। कुछ आगे दुकानें हैं जहां खुली चायपत्ती मिल रही है।

दाम पता किए जो वाजिब लग रहे हैं। पर लगा और भी दुकानों में देख लेना चाहिए। पास खड़े भाईसाहब भी इस दुकान की तारीफ करते दिखाई पड़ रहे हैं। यहीं से खरीदने का जोर देने लगे।

दो तीन दुकानों पर पता किया पर वो दाम और गुणवत्ता नहीं दिखी। साथी घुमक्कड़ ने अपने लिए आधा किलो का पैकेट ले लिया है।

पर मैं खरीद के विचार में नहीं हूँ फिलहाल। कुछ आधा किमी निकल आने के बाद लगा खरीद ही लेना चाहिए। वापस आ कर आधा किलो के दो पैकेट ले लिए।

अब जरूर बैग भारी हो जाएगा। अभी दो बज रहा है कोशिश है जल्दी पहुंच कर मुन्नार से निकल जाऊं। रास्ते में छात्रावास की ओर आते हुए इसराइली मित्र भी मिले पर वो चलते चले गए बिना रुके हंसते हुए।

बारिश का मौसम हर किसी को पसंद होता है जब तब बारिश विकराल रूप ना ले तब तक बारिश का आनंद करना अधिकतर लोगों को पसंद होता है।

तपती गर्मी से बारिश की बूंदें बहुत ही सुकून भरी होती हैं और ऐसे में अगर कोई कह दे की चलो घूमने चलते हैं तो मजा दोगुना हो जाता है।

मानसून में पहाड़ों पर सैर करना थोड़ा खतरनाक होता है क्योंकि पहाड़ों पर बादल फटने और भूस्खलन का भी खतरा होता है इससे सफर परेशानी भरा हो जाता है।

लेकिन भारत में कुछ जगह ऐसी हैं जिनकी सुंदरता को शायद भगवान ने बहुत ही फुरसत में बैठ कर बनाया है उसमें से एक है मुन्नार।

चाहे गर्मी हो या ठंड, मुन्नार की खूबसूरती हर रूप में निखरती है। लेकिन मानसून की बारिश मुन्नार की खूबसूरती और बढ़ा देती है। मुन्नार एक प्रमुख पर्वतीय स्थल है। प्रतिवर्ष हजारों पर्यटक यहाँ आते हैं।

इस पहाड़ी इलाके पर अगस्त से मई के बीच लाखों की संख्या में देशी-विदेशी पर्यटक आते हैं। जून और जुलाई में यहाँ बारिश अधिक होती है।

इस कारण इस बीच पर्यटकों की संख्या अपेक्षाकृत कम होती है। सर्दियों के मौसम में यहाँ बेहद ठंड पड़ती है, जिससे बचाव के लिए तमाम जरूरी गर्म कपड़े रखने जरूरी होते हैं।

लेकिन गर्मियों में हल्के गर्म कपड़े ठीक रहते हैं। दक्षिण भारत की अधिकतर जायकेदार चाय इन्हीं बागानों से आती हैं।

रफ़ी, अविषै और साथी घुमक्कड के साथ लेखक

वापसी

लिफ्ट लेते हुए चार बजे तक छात्रावास पहूँच गया। सीधा वाहन कर लेता तो शायद जल्दी आ जाता। रफी को खाने का भुगतान कर निकल पड़ा कोयंबटूर के लिए।

पांच बजे तक छात्रावास से रवाना हो गया कोयंबटूर के लिए। कोयंबटूर जाने के लिए भी एर्नाकुलम से हो कर ही जाना पड़ेगा। एर्नाकुलम तक जाने के लिए मुझे तीन बसें लेनी पड़ी।

पहली अनचल से कोठामंगलाम, फिर कोठामंगलाम से अलुवा और अलुवा से एर्नाकुलम आते आते मुझे रात्रि के दस बज गया।

आँचल से मुन्नार से कोठमंगलम से अलूवा से एरनाकुलम तक कुल यात्रा 160किमी

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