ताज का दीदार

आगरा | उत्तर प्रदेश | भारत

सुबह सात बजकर पैंतीस मिनट पर ट्रेन रवाना होगी। अलार्म बजने से उठा बंद कर फिर सो गया। दोबारा बजने से पहले ही उठ खड़ा हुआ।

अलार्म बजा जिसकी उम्मीद थी की कुछ देर बाद बजेगा पर अभी बज गया। बंद कर तैयारी शुरू करने लगा। दो घंटे पहले उठना सही रहता है।

स्नान ध्यान कर खाना खाने बैठ गया। ठीक घंटे भर पहले निकल गया। गायत्री अस्पताल से बारादेवी तक। मोबाइल पर ट्रेन दस मिनट की देरी दिखा रहा है।

पर ये समय कम भी ही जाता है। जिसकी मुझे आशंका कम ही है। हालांकि बारादेवी पहुंचते पहुंचते ये समय बढ़ कर बीस मिनट हो गया।

स्टेशन के निकट पहुंच कर टेंपो वाले को किराया दे कर मोबाइल की ओर देखा तो मालूम पड़ा ट्रेन अपने निर्धारित समय है और मैं उससे दस मिनट पहले।

बैग सहित मचान संख्या सात पर पहुँच गया। बाहर से परिसर की ओर आने वाली सीढी चढ़ कर ऊपर आ कर सात संख्या पर आ गया।

सात संख्या दिखने पर नीचे उतर कर बिजली की सिलेट पर निर्धारित डिब्बे के पास आ खड़ा हुआ ट्रेन के इंतजार में। बस कुछ समय और ट्रेन प्लेटफार्म पर।

जो यात्रा करने का मजा ट्रेन से है वो किसी अन्य साधन से नहीं। दाईं ओर से ट्रेन आई और ठीक निर्देशित जगह पर खड़ी हो गई। सवारियों के उतरने के बाद मैं अपनी चढ़ने की बारी का इंतजार करने लगा।

सीट भी आराम से मिल गई। सोच रहा हूँ जो कार्य कल रात में अधूरा रह गया था उसे पूरा कर लिया जाए। लिखने का कार्य। वरकला तट के बारे में।

टूंडला के लिए रवानगी

इधर ट्रेन भी चल पड़ी और आ कर किसी स्टेशन पर रुकी। एक जनाब आ कर बगल की सीट पर बैठ गई। खिड़की वाली सीट कर अपनी दावेदारी पेश करने लगे।

लिखते समय पूरा ध्यान मोबाइल पर रहता है। खिड़की की तरफ खतरा भी है। जाने कब कौन हाथ डाल कर मोबाइल ले कर फरार हो जाए।

इसलिए मैं यहाँ से हट कर बीच की सीट पर बैठ कर लिखने लगा। कुछ आधे घंटे बाद किसी अन्य स्टेशन से दूसरे भाईसाहब चढ़े। कहने लगे खिड़की वाली सीट उनकी है।

आदमी कितना भी उम्रदराज क्यों ना हो जाए खिड़की के पास बैठने की लालसा कभी नही जाती। पर मैं ये सोच रहा जो लड़का अभी तक खिड़की की सीट पर अपनी दावेदारी पेश कर रहा अब उसके लिए कोई और ही दावेदार आ गया। गजब धोखा मिला।

सीट की अदला बदली हुई। बगल में लड़का बैठा। आश्चर्य ये देख कर हुआ की पच्चीस वर्षीय बालक कार्टून देख रहा है। वाकई में कार्टू देखने की कोई उम्र नहीं।

आश्चर्य के साथ हंसी भी आ रही है पर हंस नही सकता। ग्यारह बजे तक पहुंच गया टुंडला। कानपुर से सीधी आगरा की ट्रेन ना मिलने के कारण टुंडला तक ही बेहतर समझा आना।

यहाँ से आगरा कैंट की कुल दूरी 30 किमी दिखा रहा। घर से खाना भी बांधकर लाया हूँ। निकलने लगा आगरा की ओर। स्टेशन के बाहर निकल कर सोचने लगा किसी के घर में खाना खाने से बेहतर है यहीं स्टेशन पर खा लिया जाए।

वापस परिसर में दाखिल हो कर दाहिनी ओर आ कर पंखे की नीचे वाली सीमेंट की बनी सीट पर विराजमान हो गया। बैग से टिफिन निकाल कर खाने बैठा ही हूँ की वानर सेना में से एक वानर दाहिनी ओर से। दूसरा दाईं ओर से ट्रेन की पटरियों से होते हुए मचान पर आ गया टिफिन को घूरते हुए।

खाना शुरू करने से के कर दो रोटी खाने तक के बीच ये मोटा वानर मेरे नजदीक आने की कोशिश कर रहा है। जैसे ही वानर से नजर हटती वैसे ही वो करीब आने की कोशिश में रहता।

अंत में कुछ रोटी के टुकड़े मोटे वानर के साथ सांझा किए। पर पूरा खाना खाना आफत हो रहा है। वानर और निकट आ गया है। भलाई इसी में है की इससे पहले छीना झपटी हो डब्बा बंद कर के निकल लो। बैग से बोतल निकाल हाथ धो कर पानी पिया और सामान रख निकल पड़ा परिसर के बाहर।

आगरा पहुंचना

अब तक काफी ऑटो वाले का चुके हैं। वरना सवारियों की छीना झपटी इनमे होती है। अब सिर्फ एक ऑटो दिख रहा है। दाम पूछने पर ऊंचे दाम सुनने को मिल रहे हैं। किसी भी नए शहर में ऑटो, टेंपो चालक द्वारा लूट की बू आती है। विचार था ऑटो से निकल जाऊं। पर विचार त्यागते हुए सोच रहा हूँ चौराहे तक पैदल जा कर सही स्तिथि का पता करता हूँ।

पैदल ही गूगल नक्शे की सहायता से जिस पर आगरा 32किमी दिखा रहा है, चौराहे पर आ खड़ा हुआ। यहाँ की ऑटो का रंग भी लाल है बजाय पीले के।

ऊंचे ऊंचे दाम सुन सुन कर लगने लगा क्यों खमखा जेब ढीली करी जाए। लिफ्ट मांगने शुरू करता हूँ चौराहे के आगे से। पैदल इधर ही आ खड़ा हुआ।

उत्साह में लिफ्ट भी मिल गई हाईवे तक। अब कम से कम स्टेशन से दूर हूँ। सीधा रास्ता जा रहा है आगरा के लिए। यहाँ भी बस और ऑटो वालों से दूर खड़ा हो कर लिफ्ट मांगने की शुरुआत कर रहा हूँ।

पर कमबख्त ये ऑटो वाले हर बार आ कर सामने खड़े हो जाते। जैसे इनके अलावा और कोई नहीं ले जाएगा। हर बार मैं आगे हो जाता।

किसी तरह पेड़ की छांव में पहली लिफ्ट मिली। इन भाई साहब ने मुझे पुल के ऊपर हाईवे पर छोड़ा। यहाँ से दूसरी लिफ्ट लेते हुए आगरा में प्रवेश कर गया।

तीन से चार लिफ्ट मांगते हुए एक सफेद रंग की गुरुद्वारे के ठीक सामने उतरा। जो अपने आप में ही बहुत भव्य नजर आ रही है। यहाँ से कुछ दूरी पर मैं पहुंच गया अपने सामुदायिक मित्र गौरव के घर।

आने में और घर ढूंढने में थोड़ी मुश्किल का सामना करना जरूर पड़ा इस अनजान शहर में। पर उनकी बेगम इमारत के नीचे ही आ गई लेने जो काफी सुविधाजनक रहा।

घर पर पहुंच कर गौरव से बात होने लगी। जो स्तिथि का जायजा ले रहे हैं और मेरी आगे की योजना जानने के इच्छुक हैं। योजनानुसार मैं मित्र से मिलने निकल जाऊंगा।

गौरव ने बताया की उनके यहाँ दो लड़के और आए हुए हैं दक्षिण भारत से जो ताज महल गए हैं घूमने। मैं भी वहाँ जा सकता हूँ। हालंकि ताज महल तीन दफा जा चुका हूँ इसलिए जाने की प्रबल इच्छा नहीं हो रही।

टिकट आरक्षित कराने के लिए गौरव ने वेबसाइट भी भेज दी। यहाँ इनके घर से बाहर का दृश्य मन को लुभा रहा है। फटाफट बैग से साबित निकल हाथ मुह धुलने लगा और बैठ गया खाना खाने।

पूरब से कुछ ऐसा दिखा ताज

ताज महल को कूच

घर से निकल चुका हूँ पर संशय में हूँ ताज महल जाऊं या नहीं। चौराहे से ताज महल तक के लिए सीधा ऑटो भी होता तो सहूलियत रहती।

बेहतर रहा की पहले से कोई टिकट आरक्षित नहीं कराया वरना जाने के लिए बाध्य होना पड़ता। क्या पता जब तक मैं पहुंचूं तब तक प्रवेश ही बंद हो जाए!

अभी तीन बज रहे हैं और चौराहे से लिफ्ट भी मिल गई कुछ दूरी के लिए। इन जनाब के अनुसार इस समय नहीं जाना चाहिए क्योंकि कुछ देर में बंद हो जाएगा तो जाना उतना बेहतर नहीं है।

अगले तिराहे पर उतरते ही दूसरी तरफ आ कर कुछ आगे के लिए निकल पड़ा। यहाँ एक बात जो अजीब लग रही है वो है लोगो का स्वभाव। अक्खड़ स्वभाव।

इन दूसरे जनाब को भी पता नहीं क्या सूझा और चौराहे से पहले ही उतरने का आदेश सुना दिया। उतर गया पर अजीब भावना उत्पन्न होने लगी है यहाँ के निवासियों के लिए।

सड़क पार कर नक्शे के अनुसार ताज महल की ओर बढ़ने लगा। जाम खुलते ही पाया की ये जनाब तो उसी ओर निकल जा रहे हैं जहाँ मुझे जाना था। खैर कोई बात नहीं।

लिफ्ट मांगने पर एक और सज्जन मिले। ये तो सबसे बढ़कर निकले जब एक रिक्शे वाले के पास ला कर खड़ा कर मेरे ताज महल तक जाने का प्रबंध कराने लगे।

हालंकि रिक्शा वाला ही नही राजी हुआ जाने को और उसी दिशा में इशारा करने लगा जिस दिशा में इन भाईसाहब को जाना है। इस चौराहे के बाद अगले चौराहे पर उतार दिया।

आखिरकार एक दो लिफ्ट के बाद मुझे ऑटो से निकलना पड़ रहा है। देर हो जाएगी तो अब तक का समय व्यर्थ ही चला जाएगा।

आगरा किले के सामने से होते हुए ताज महल के पश्चिमी द्वार पर उतरा। उतरना ही हुआ की दो टिकट विक्रेता, गाइड और एक मोजा पहनाने वाले ने आ कर घेर लिया।

पर इनसे में मुझे कुछ भी नहीं चाहिए। छांव में आ कर टिकट आरक्षित करा अंदर की ओर दाखिल हो चला। पहुंचते पहुंचते यहाँ आ गया जहाँ पहले जांच होगी तब ताज महल के परिसर ने प्रवेश करने को दिया जाएगा।

प्रवेश द्वार से भीतर जाती जनता

वाह ताज

टिकट और स्वयं की जांच करा कर भीतर आ गया। यहाँ खड़े लोग अपने परिजनों मित्रों का इंतजार कर रहे हैं। जो जांच में दिए छूट गए हैं।

सुरक्षा बहुत ही कड़ी और सख्त है। शाम का समय है इसलिए भीड़ कम लग रही है। अधिकांश भारतीय मौजूद हैं। विदेशी सैलानी कम ही नजर आ रहे हैं।

पर्यटक कम हैं इसलिए तस्वीर और चलचित्र अच्छे आयेंगे। हर बार की तरह प्रवेश द्वार पर भीड़ नजर आ रही है। यहाँ कभी सन्नाटा रह ही नहीं सकता।

तस्वीरें लेते हुए द्वार से अंदर प्रवेश कर देखने में आया सैलानियों का हुजूम। जो जहाँ बैठ गया है वो वहीं बैठा रह गया है। भीड़ बढ़ा रहा है।

सुरक्षाकर्मी के सिटी बजाने पर कुछ भीड़ छटने लगी है। वरना यहाँ भीड़ को ताजमहल के साथ या ताजमहल की तस्वीर लेने से ही फुर्सत नहीं।

मैं दाहिनी ओर आ कर ताजमहल को निहारने लगा। इससे पहले जब भी यहाँ आया हूँ या तो दिन या सुबह के समय। आज पहली बार शाम को पधारा हूँ।

सुबह हो या शाम पर्यटकों की संख्या में कोई कमी नहीं। आसपास तस्वीर ले रहे युवकों को मोबाइल यंत्र पकड़ा कर बेंच पर बैठ कुछ तस्वीरें निकलवाई।

कैमरा पकड़ा कर भी कुछ अच्छी तस्वीर निकलवाने की कोशिश है। तस्वीर खींच तो गई, ठीक ठाक आई हैं। मोबाइल कैमरा समेट कर ताजमहल की ओर निकल पड़ा।

विदेशी पर्यटक बहुत ही कम या यूं कह लूं की नाममात्र के दिखाई पड़ रहे हैं। परिवार से ज्यादा नए जोड़े घूमते हुए देखे जा सकते हैं। ये भारी भरकम इमारत दूर से जितनी पिद्दी सी दिखती है पास से उतनी ही विशाल।

बचपन से ही पढ़ता आया हूँ की बनाने में ही बाइस वर्ष लगे। ईरान इराक के नक्काशियों को बुलाया गया था। तथा पत्थर भी दुनिया के अलग अलग कोने से मंगाए गए थे।

प्यास मुझे सुरक्षाकर्मी की तरफ ले आई। जिनसे पता पूछने पर मालूम पड़ा की नलका कुछ ही दूर पर है। पानी के नलके पास इक्का दुक्का लोग ही हैं।

पर पानी की धार इस कदर धीमी है की घंटों लग जाएं पानी ग्रहण करने में। और भी प्यासे यहाँ अपनी प्यास बुझा रहे हैं। पानी की धीमी धार से पानी ग्रहण कर चल पड़ा ताज के दाएं हिस्से की ओर। इसी धीमी धार के कारण कोई नहीं खड़ा है पानी पीने के लिए।

ताज के पीछे माँ यमुना

ताज के अलग रंग

ताज के पीछे से पढ़ने वाली ये धूप ताज को ऐसा दिखा रही है जैसे किसी महात्मा के सिर के पीछे प्रबोधन हो गया हो। यहाँ पर्यटक नहीं है और जो हैं भी जो मग्न है अपनी तस्वीर निकलवाने में।

ऐसे ही एक जोड़ा अपने बच्चों को अपनी सास के हवाले कर तस्वीर उतरनेवाले के सामने नाचता नजर आ रहा है। पर्यटक की संख्या कम होने का फायदा है।

जैसे मैने पिछली बार किया था। एक किनारे मार्गदर्शक नए पर्यटकों को ताज महल का पूरा विवरण दे रहा है। आगे यमुना है। जिसे देखने के लिए इस्पात की कटघरा लगी है।

चूंकि दीवार से बनी कटघरा बहुत ही नीचा है। जिसके पास जाने से दुर्घटना हो सकती है। इसी को रोकने के लिए ऐसा कटघरा बनाया गया है।

कटघरे के पास खड़े कुछ लड़के तस्वीर निकलवा रहे हैं। जिनको अपना कैमरा थमा अपनी तस्वीर भी निकलवा ली। पर सही ना आई। उदाहरण के तौर पर मुझे इस लड़के की खुद से कुछ तस्वीर निकाल कर दिखानी पड़ी।

तब कहीं जा कर कुछ कायदे की तस्वीर निकली इस बालक ने। अपनी तस्वीर मांगने लगा। जिस पर मैने उसका ईमेल लिया और उसे हफ्ते भर बाद तस्वीर भेजने का वादा कर निकल पड़ा पूरब की ओर।

ताज के पीछे दाईं ओर पर नीचे जाती हुई सीढियां है जो मार्ग है मुमताज और शाहजहाँ की असली कब्र का। अंधेरे में डूबी ये सीढियां यहीं बयां कर रही है जिस पर पड़े हैं ढेरों सिक्के।

कटघरे के पास से ढलता सूरज बहुत ही मनमोहक दिख रहा है। कुछ तस्वीर निकली और पास खड़े युवक से निकलवाई भी। ताज के पिछले हिस्से में भीड़ में होड़ है दीवार से सट कर अंदर सुनने या झांकने की। जाने क्या?

पश्चिम से कुछ यूँ दिखा ताज

आगे निकल कर मस्जिद वाले हिस्से की ओर आ गया। यहाँ भी भीड़ शून्य के बराबर नजर आ रही है। पर यहाँ सूरज की किरण ताज पर ऐसी पड़ रही है जैसे की सोना पर पड़ने के बाद की चमक उठती हो

टहलते हुए ताज के बाएं हिस्से के पास आ गया। मालूम यहाँ मस्जिद है इसलिए चबूतरे पर नंगे पैर ही लोग घूम रहे हैं। सामने किसी के ना होने का फायदा उठाते हुए खाली ताज की तस्वीर निकाल ली।

पास में बैठे कुछ मुसलमान बंधु भाषा से मलयाली जान पड़ रहे हैं। जो अब यहाँ से अलविदा ले कर निकल रहे। तस्वीर निकालने वालों के दल पास में भरपूर तस्वीर ले रहा है। जो उत्तर भारत के तो नहीं मालूम पड़ते हैं।

मौके का फायदा उठा कर इनसे कुछ तस्वीरें ऐसी निकलवा ली जैसे मेरे सिवाय ताज में कोई है ही नहीं। पास के कटघरे में मकबरे में जाने के लिए भीड़ कतार में खड़ी है।

जिनका अलग से मूल्य लग रहा है। बैठ कर यहीं सोने जैसे चमक रहे ताज को निहारने लगा। तभी किसी अनजान युवक ने हाथ बढ़ाते हुए इनकी कुछ तस्वीर निकलने का आग्रह किया।

इनकी तस्वीर और मैने इनसे अपना एक चलचित्र बनवा लिया। बातों बातों में मालूम पड़ा की ये महाशय कल होने वाली परीक्षा देने आए हुए हैं।

बातों का सिलसिला चलता रहा। आज ताज को अंधेरे में देखने का मौका मिलेगा। प्यास मुझे मस्जिद के पास लगे नलके के पास के आई। उद्यान से घूमते हुए बाहर की ओर प्रस्थान करने लगा।

शाम के समय ताजमहल और भी सुंदर लग रहा है। भीड़ भी छट रही है और सायंकाल की रोशनी भी अलग छाप छोड़ रही है। तस्वीर लेते लेते बेंच के पास आ कर कुछ समय व्यतीत करने लगा।

सुरक्षाकर्मियों के बाहर भेजे जाने के इशारे के साथ उठ कर चल पड़ा। द्वार के पास जहाँ अक्सर दीदार के लिए भीड़ रहती है अभी यहाँ सन्नाटा पसरा हुआ है।

सांयकाल में कुछ ऐसा है ताज

घर वापसी

अंधकार के साए में तस्वीर ले कर बाहर निकल पड़ा सामुदायिक मित्र गौरव से भेंट करने के लिए। सुरक्षा दायरे के बाहर तंग गलियों में भूख मिटाने के लिए इडली खोजने लगा।

साथ में चल रहे उम्मीदवार की भी यही इच्छा है। पर चौराहे तक चक्कर लगाने के बाद भी ऐसी कोई दुकान नहीं मिली जहाँ इडली मिलती हो। हालांकि डोसा कुछ जगह उपलब्ध भी है।

वापस चलते हुए फलों के रस की दुकान पर केले का स्वादिष्ट रस ग्रहण किया। अब जा कर कुछ राहत और आगे चलने की ऊर्जा मिली है।

दुकान पर उम्मीदवार देवेश की दुकानदार से उनके शरीर को ले कर चर्चा होने लगी। पहलवानी से ले कर आज के समय के वर्जिशखाने तक की।

प्रोभुजीन से ले कर गलत तरीकों से बढ़ा रहे शरीर को देने वाले तत्वों की जमकर धज्जियां उड़ा रहे हैं दोनो। दोनो से ही मैं सहमत हूँ।

ऑनलाइन भुगतान कर देवेश से अलविदा ले कर गौरव से मिलने चौक की तरफ चल पड़ा। इधर फोन पर गौरव लगातार सदर बाजार पहुंचने का निर्देश दे रहे हैं जो सहायक सिद्ध हो रहा है।

सीधा रिक्शा लेने के बजाए सांझे के रिक्शे में बैठ कर निकल पड़ा। आगरा की धूल भरी सड़के बयां कर रही हैं नए शहर के निर्माण की कहानी।

हालांकि कुछ दूर होटल तक आते आते चालक ने अपने रिक्शा से उतार कर दूसरे रिक्शा में बैठा कर रवाना कर दिया। जिससे दस मिनट में सदर बाजार आ पहुंचा।

डब्बा फोन जिसमें बात करने की सुविधा है अचानक बंद हो चला। दिक्कत का सामना तो करना पड़ रहा है। चौराहे के पास लगी दुकान पर कोई भी फोन कॉल करने को तैयार नहीं।

ये अजीब सा बर्ताव थोड़ा समझ से परे है। हर कोई अपनी सुविधा अनुसार समाधान बता रहा है। किसी के मुताबिक बगल की दुकान में फोन चार्ज करने की सलाह तो कोई बगल के मोबाइल अड्डे से कॉल की सुविधा लेने को बता रहे है।

गौरव की पत्नी को व्हाट्सएप पर सारा किस्सा बता किसी शुद्ध पता पूछा। मालूम पड़ा सूरज कॉम्प्लेक्स के सामने पहुंचना है। चौराहा पार कर पहुंच तो गया। पर यहाँ भी गौरव ना मिला।

चश्मे की दुकान में दाखिल हो गौरव के बारे में पूछता पर किसी और ही शक्श के बारे में मालूम पड़ता। कॉम्प्लेक्स में ध्यान देने पर नीचे भी कुछ दुकानें दिखीं।

जहाँ पहली ही दुकान में दाखिल होते ही गौरव से मुलाकात हुई। मुलाकात और बातों का दौर चला। मालूम पड़ा केरल और तमिलनाडु से आए हुए घुम्मकड़ भी बाहर ही घूम रहे हैं।

नौ बजे की छुट्टी के बाद इन दो नए घुमक्कड़ों से भी मुलाकात हुई। जो अपनी अपनी कहानी सुनाने लगे। मिलकर बहुत ही अच्छा लगा।

यही खासियत है घुमक्कड़ी समुदाय की किसी तीसरे के यहाँ महफिल जमती है और कई नए लोगों से मुलाकात हो जाती है। ऑटो कर निकल पड़ा घर की ओर।

सिराज और डेविड ने अपने मिलन की कहानी बताई। जो अभी हाल फिलहाल में ही दोस्त बने हैं। अपने आगे आने वाले सफर और अपने पूरी की गई अब तक की यात्रा के बारे में।

घर पर पहुंच कर रात के खाने से पहले जमी महफिल में सबने अपने अपने किस्से बताए। गौरव ने यूट्यूब पर वीडियो बनाने में आने वाली अड़चनों का जिक्र किया तो सिराज ने अकेले घूमने और कोरोना काल में सहायता ना मिलने का कष्ट बताया।

हालांकि सफर में अलग अलग में गुरुद्वारे की सहायता मिलती रहती है। जैसे सोने की या लंगर छकने की सुविधा। खाने पर इतनी भीड़ कई महीनो के बाद देख रहा हूँ।

एक ही कमरे में हम तीन घुमक्कड़ बिस्तर लगा कर सोने चल पड़े।

कानपूर से टूंडला से आगरा तक का कुल सफर 297किमी

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