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आधी रात में वैष्णो देवी की चढ़ाई

पठानकोट से कटरा तीन घंटे के भीतर पठानकोट से कटरा पहुंच गया। बस में ज्यादा सवारी नहीं है, जो थी भी वो फुटकर में पहले ही उतरती गईं। लेकिन ये एक डेढ़ घंटे का सफर बड़ा मजेदार रहा। इन हरी भरी पहाड़ियों के बीच से गुजरना अच्छा अनुभव है। ऐसी पहाड़िया हो और तन्हा गाने बजते रहें तो मनुष्य एक अलग ही संसार में पहुंच जाता है। बगल में रखे बैग में छोटे बैग को जोड़ा और खुद को तैयार करने लगा आज की रात एक लंबी चढ़ाई के लिए। कंडक्टर बाबू हल्ला मचाते हुए अलार्म घड़ी का काम कर गए। जो बची कुची सवारियां सो गईं थीं वो भड़भड़ा के जाग उठीं। चलती बस में मैं डगमगाते हुए अपना बैग लेकर दरवाज़े तक आ गया। ना तो बस अभी रूकी है ना ही मैं नीचे उतरा हूं। दलालों में मची होड़ चौराहे से बस मुड़ती है और कुछ लड़के मुझे रिसिव करने के लिए दौड़ लगा देते हैं। दरवाजे का सहारा लिए मैं खड़ा सोच में पड़ गया, क्या मैं इन्हे जनता हूं? हद्द …