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विश्वप्रसिद्ध नाको झील

भगदड़ वाली सुबह रात तो मानो चुटकी बजाते बीत गई। पर सोते समय दिमाग में ये बैठा लिया था अगर समय से नहीं उठा तो बस छूटने का खतरा ज्यादा होगा। समय रहते आंख खुल गई है पर उठने का मन नहीं हो रहा है। पर घुमक्कड़ी का ये उसूल है। या तो आराम कर लो या तो घुमक्कड़ी। अभी मेरे पास दो विकल्प हैं या तो सोता रह जाऊं या फिर या फिर वाहन में सवार होकर अगली मंज़िल पर निकल जाऊं। ऐसा ना पहली मर्तबा हुआ है और ना ही आखिरी। ऐसे बहुत से मौके आयेंगे जब नींद का बलिदान देना होगा। बस छूटने के डर से दोबारा नींद कहाँ आनी थी। इतनी ठंड में रजाई फेकना अपने आप में बहुत बहादुरी का काम किया मैंने। बस को निकालने में अभी पैंतालीस मिनट हैं। वैसे भी हिमाचल प्रदेश में रोडवेज बसें अपने निर्धारित समय पर प्रस्थान करने के लिए मशहूर हैं। पर मुझे आधा घंटा लगा तैयार होने में। ना जाने क्या सूझी की समय रहते नहा भी लिया। उधर अजय बाथरूम का …

खतरनाक घाटियों में रेकोंग पियो से काज़ा तक का सफर

सुरक्षित बस अड्डा जल्दी सोया ही था जल्दी उठने के लिए। पांच बजे की बस पकड़ने के लिए चार बजे उठना सहूलियत भरा रहा। काल राते सोने से पेहले दरवाज़ा लकड़ी के लट्ठे से जाम कर दिया था। इसलिए कोई अन्दर ना आ सकता था, और ना ही आया। बस आ रहा है तो वो है शोर शराबा।  रेकोंंग पियो बस अड्डे से अधिकतर बसें सुबह सवेरे निकल लेती हैं तब जा कर कहीं २००-२५० किमी दूरी का सफर शाम तक तय कर पाती हैं। कुछ यही हाल शायद मेरा भी होने वाला है?  दरवाज़ा खोला तो पाया जितना शोर छन कर अन्दर आ रहा है उतनी भीड़ तो ना दिख रही है। मैंने चार्जिंग प्वाइंट से सारे मोबाइल और पावर बैंक समेट कर सब अन्दर लपेट दिया। इतनी देर में अजय निकल गया नहाने। इधर मैने सारा बुरिया बिस्तर समेटा। उड़के हुए दरवाज़े को देख लोग अब अन्दर आने लगे हैं। कुछ ने तो अपना मोबाइल भी जड़ दिया है चार्जिंग पे। दस मिनट में अजय तैयार हो कर आ गया। इधर अजय के …

कल्पा का सुसाइड पॉइंट जहाँ लोग जाते है मौत को गले लगाने!

बदली योजना सुबह जल्दी उठने कि बजाए आंख बहुत देर से खुली। जैसा रात में हाँथ में बैग फसा कर सोया था सुबह खुद को वैसा ही पाया। बेंच पर नींद भी सही आ गई। उसके ऊपर स्लीपिंग बैग गद्दे का कम कर गया। रात में कमरे का दरवाजा उड़का लिया था ताकि कोई अन्दर ना आ पाए। कमरे में तीन बेंच पड़ी सो तीन आदमी। नींद खुलने पर देखा कि सामने वाली एक बेंच खाली पड़ी है। बस अड्डे पर हलचल भी हल्की फुल्की दिख रही है। यात्रियों का आना जाना बरकरार है। कुछ अपना झोला झंडा लेे कर बाहर ही बैठे हैं। कमरे में वो ही आ रहे हैं जिनको अपना फोन चार्ज करना है। मोबाइल तो मेरा भी चार्ज नहीं है। सारे मोबाइल और पावर बैंक चार्जिंग पर लगा कर मैं और अजय बारी बारी से तैयार होने लगे। बस अड्डे पर ही बने दुसलखाने में। जब तक मैं तैयार हुआ तब तक बस अड्डे की भीड़ भी कम हो गई। योजना यही है कि काजा के लिए निकला जाए फिर पूरा …

बस अड्डे में किया कब्ज़ा

जल्दी उठने से तौबा आंख खुली मगर उठने का मन नहीं हो रहा है। अजय ने भी उठाने की कोशिश की पर मैंने उठने से इंकार कर दिया। कल रात में जो तय हुआ वो पूरा ना हो सका। सुबह जल्दी उठना, सूर्योदय(सनराइज) देखना। आखिरकार छह बजे आंख खुली। देखा तो टेंट में बैग और मेरे अलावा कोई भी नहीं है। सूर्योदय तो हो चुका है। शरीर में जकड़न और थकान दोनों है। टेंट के बाहर निकला तो देखा वो उपद्रवी लड़के अभी भी टेंट के अंदर सो रहे हैं। जिनकी कल रात पूरी घाटी में आग लगाने की योजना थी। आज शाम तक हर हालात में रेकोंग पियो पहुंचना है। टीले पर नजर पड़ी तो देखा वहाँ अजय वहाँ ऊपर वीडियो बना रहा है। पांच बजे उठ कर कुछ फोटो और वीडियो बनाने निकल गया था। अभी घाटी में लगभग काफी लोग टेंट के अंदर ही सो रहे हैं। शायद कुछ का रुकने का विचार हो पर मेरा नहीं। अजय के नीचे आते ही सारा सामान समेटने लगा। मूह धोने के लिए भी पानी …