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भूतिया बिरला हाउस की व्याख्या

यमनोत्री वापसी के बाद यमनोत्री धाम से लौटने के बाद सीधा बिरला हाउस ही आ पहुंचा। धूप तेज है इसलिए यहीं आगन में बैठ कर धूप की सिकाई में मस्त हो गया हूँ। थकान के कारण हालत पस्त है। लवली भैया से एक और रात की मोहल्लत मांगते हुए रुकने का प्रस्ताव रखा। जिसे उन्होंने बिना किसी शर्त के स्वीकार तो लिया। मगर शायद आज उस कमरे को भी बुकिंग के लिए उठना पड़ जाए। ऐसे में मैंने भी बोल दिया अगर बाहर टेंट लगा लिया जाए तो बेहतर होगा। हां इस स्तिथि में ये करना ही ठीक रहेगा। बिरला हाउस के ठीक बगल मे बने ढाबे में भोजन करने के लिए बाहर निकल आया। ढाबे में पहुंचा तो मालूम पड़ा ज्यादा कुछ भी नहीं है खाने को। फिर भी ये दो आदमी भर के लिए खाने की व्यवस्था करने लगे। भट्टी पर तवा चढ़ा और रोटियां सिकनी चालू हो गईं। खाना परोसा गया। खाना बेहद ही स्वादिष्ट बना है। ज्यादा ना खा कर थोड़े में ही पेट भर गया। भुगतान किया और अब योजना …

यमनोत्री की खड़ी चढाई में पस्त

सन्नाटे में सुबह कल रात बिरला हाउस में पहले टेंट और फिर बाकायदा कमरे का मिलना वरदान साबित हुआ। खाली कमरे में गद्दे और रजाई पहले से मौजूद थी। जिसे बिछाकर सो गया था। दोनों बड़े बैग बड़ी सी खिड़की के पास की मेज़ के ऊपर ही रख दिए थे। आंख खुल चुकी है। बेहतर यही रहेगा कि फटाफट तैयार हो कर निकल लिया जाए यमनोत्री मार्ग पर। दरवाज़ा खोल कर बाहर निकला ही एक सज्जन बाहर इंतजार करते मिले। दरवाज़े के पास ही रखा मोटर जैसी दिखने वाली वस्तु को चालू किया और चले भी गए। मैं हाँथ में टूथब्रश लिए खड़ा ये सब देखता रहा। दांतों को घिसते हुए बाहर निकला तो यहाँ पाया की एक माली खाली पड़े छोटे से मैदान की घास छीलने में जुटा हुआ है। अकारण ही हाँथ जोड़ कर नमस्ते करने लगा। मैंने भी सिर हिलाकर उनके नमस्ते का जवाब दिया। बाहर नल्के से कल रात वाले भैया पानी भरते नजर आए। मैं तैयार होता इससे पहले देखा कि पुलिस की वर्दी में कुछ महिला हवलदार टीप टाप …

मुश्किल हुआ जानकीचट्टी में छत मिलना

भोर हुई देहरादून में रात्रि के साढ़े आठ बजे जब बस चली तो लगा अब ये नए सफर पर निकल रहा हूँ। जो पुराने सारे यात्राओं से बिल्कुल अलग होने वाला है। थोड़ा जटिल थोड़ा कठिन। क्यूंकि चार धाम यात्रा परियोजना के नाम से मशहूर यमनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ जो चारों अलग अलग पहाड़ी पर बसे होने के कारण यात्रियों को बहुत चक्कर काटने पड़ते हैं। अगर कोई पर्वतारोही हो तो शायद वाहन के मुकाबले वो इन पहाड़ियों तक पहले है रास्ता नाप दे। देहरादून के लिए बैठा मैं सुबह आंख भी पांच बजे ही खुल गई। और ऐसी खुली की खुली की खुली रह गई। इतनी भीषण गर्मी। जब सन् २००० में आया था तब जून माह में भी बद्दर ठंड का प्रकोप झेलना पड़ता था। ये तो कहानी है मानव के प्रकोप की। कुदरत के केहर की कल्पना सोच से भी परे है। जिसका आंकलन कोई धरतीवासी नहीं कर सकता। हरिद्वार बाईपास कलमेंट टाउन के पास बस आकर रुकी। बस से उतर कर इत्मीनान से मामी जी को फोन कर इक्तल्ला कर दिया …