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ग्लास हाउस में गुज़ारी रात

बस पकड़ने की फ़िक्र सुबह के चार बजे का अलार्म बजा और तड़के ही नींद खुल गई। रात में हुए वाक्ए के बाद अब लग रहा है जितनी जल्दी हो सके भागो यहाँ से। पता नहीं लवली भाई के मुख से सुने किस्से के बाद कैसे नींद आ गई। पर आधी रात में ऐसा किसी के साथ भी ना हो। फटाफट बिस्तर समेटा और सारा बिखरा हुआ समान बैग में भरने लगा। अजय के नित्य क्रिया पर जाने के बाद मैंने कमरे में बिखरा सारा सामान इक्कठा कर के बैग में भरा। गद्दे पर बिछे चद्दर को भी तय कर के बैग में डाला। बस के निकलने का समय तो छह बजे बताया है कंडक्टर महाशय ने। मुझे पहुचनें में ही शायद आधा घंटा लग जाए। अभी साढ़े चार बज रहे हैं। हर हालत में मुझे आधे घंटे पहले पहुंच जाना है। अजय के आ जाने के बाद अंधेरी सुबह में मैं निकल पड़ा कुल्ला मंजन करने। और बमुश्किल कुछ मिनटों में सब निपटा कर आ गया कमरे में। इधर अजय एकदम तैयार बैठा है। …

भूतिया बिरला हाउस की व्याख्या

यमनोत्री वापसी के बाद यमनोत्री धाम से लौटने के बाद सीधा बिरला हाउस ही आ पहुंचा। धूप तेज है इसलिए यहीं आगन में बैठ कर धूप की सिकाई में मस्त हो गया हूँ। थकान के कारण हालत पस्त है। लवली भैया से एक और रात की मोहल्लत मांगते हुए रुकने का प्रस्ताव रखा। जिसे उन्होंने बिना किसी शर्त के स्वीकार तो लिया। मगर शायद आज उस कमरे को भी बुकिंग के लिए उठना पड़ जाए। ऐसे में मैंने भी बोल दिया अगर बाहर टेंट लगा लिया जाए तो बेहतर होगा। हां इस स्तिथि में ये करना ही ठीक रहेगा। बिरला हाउस के ठीक बगल मे बने ढाबे में भोजन करने के लिए बाहर निकल आया। ढाबे में पहुंचा तो मालूम पड़ा ज्यादा कुछ भी नहीं है खाने को। फिर भी ये दो आदमी भर के लिए खाने की व्यवस्था करने लगे। भट्टी पर तवा चढ़ा और रोटियां सिकनी चालू हो गईं। खाना परोसा गया। खाना बेहद ही स्वादिष्ट बना है। ज्यादा ना खा कर थोड़े में ही पेट भर गया। भुगतान किया और अब योजना …

मुश्किल हुआ जानकीचट्टी में छत मिलना

भोर हुई देहरादून में रात्रि के साढ़े आठ बजे जब बस चली तो लगा अब ये नए सफर पर निकल रहा हूँ। जो पुराने सारे यात्राओं से बिल्कुल अलग होने वाला है। थोड़ा जटिल थोड़ा कठिन। क्यूंकि चार धाम यात्रा परियोजना के नाम से मशहूर यमनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ जो चारों अलग अलग पहाड़ी पर बसे होने के कारण यात्रियों को बहुत चक्कर काटने पड़ते हैं। अगर कोई पर्वतारोही हो तो शायद वाहन के मुकाबले वो इन पहाड़ियों तक पहले है रास्ता नाप दे। देहरादून के लिए बैठा मैं सुबह आंख भी पांच बजे ही खुल गई। और ऐसी खुली की खुली की खुली रह गई। इतनी भीषण गर्मी। जब सन् २००० में आया था तब जून माह में भी बद्दर ठंड का प्रकोप झेलना पड़ता था। ये तो कहानी है मानव के प्रकोप की। कुदरत के केहर की कल्पना सोच से भी परे है। जिसका आंकलन कोई धरतीवासी नहीं कर सकता। हरिद्वार बाईपास कलमेंट टाउन के पास बस आकर रुकी। बस से उतर कर इत्मीनान से मामी जी को फोन कर इक्तल्ला कर दिया …