धरती से तारे के समान दिखने वाला तारागढ़ किला

बूंदी | भारत | राजस्थान

बूंदी

सवाई माधोपुर से बूंदी के लिए निकल तो दिन में एक बजे ही गया था। पर पहुँचा रात के आठ बजे। ये नतीजा था लिफ्ट मांगते हुए आने का। पर आखिर में थक कर बस से ही आना समझदारी भरा रहा।

बूंदी में किला भी है वो भी इतना विशालकाय इसका तो आभास ही नहीं था। कल बारिश में खाने की तलाश में किले पर प्रकाश हो रहा था। जिससे कुछ अंदाजा लग पाया।

यहाँ बूंदी में सामुदायिक मित्र सौरव के यहाँ रुका हुआ हूँ। जिनका खुद का गेस्ट हाउस है। ऊपर गेस्ट हाउस और नीचे घर। थकान के कारण सुबह देर से नींद खुली है।

सिर्फ पानी ही है जो नसीब हो रहा है। भूख भी जोरों पर है। पहले गेस्ट हाउस से निकलूं उसके बाद तय करता हूँ की कहाँ जाना रहेगा आज।

फटाफट स्नान कर तैयार हो गया। कमरे में बिखरा सामान जितना हो सका समेत कर बस्ते में रख दिया। कल रात बारिश में भीगने के कारण कपड़े सहित जूते भी गीले हो गए हैं।

गिले कपड़े तो बाहर ही फैला दिए। पैरों में जूते के सिवाय कुछ भी नहीं है। सौरव के घर में मांगने में भी अटपटा लग रहा है। गिले जूते पहन कर ही निकल पड़ा।

घर से कुछ दूरी पर चाय का अड्डा है। फिलहाल यहीं रुक रहा हूँ आगे की योजना तय करने के लिए। लगे हाथ चाय भी मंगा ली। घंटे भर बैठे बैठे तीन कप चाय लील गया।

अंतरजाल पर छानबीन करने पर मालूम पड़ा की यहाँ नवल सागर, किला, सुख महल, रानी की बावड़ी, 84 खंभों की छतरी और सूरज की छतरी है।

इन सभी में चयन करते हुए मैने आज के समय के अनुकूल किले जाने को ज्यादा महत्व दिया। चाय की दुकान पर भुगतान कर निकल पड़ा।

नवल सागर

मार्ग में दाहिनी ओर एक छोटे द्वार की तरफ ध्यान गया तो पाया महादेव मंदिर। करीब बारह बजने को हो रहा है। भीतर प्रवेश करते हुए मैं नवल सागर के किनारे बने महादेव मंदिर श्री मटुकेश्वर महादेव में आ गया।

मंदिर के बाहर से ही दर्शन कर आसपास टहलने लगा। यहाँ किनारे मंदिर परिसर के पास बेंच पड़ी हुई है। बेंच पर बैठ कुछ तस्वीरें निकलवाई।

पास में ही एक खंडित इमारत है। भीतर जगह खूब है। तंबू लगाने की व्यवस्था है। पर दुर्गंध भी कम नहीं है। कुछ टहलते हुए यहाँ से निकलना बेहतर लग रहा है।

पुराने काल में पानी की समस्या से निपटने के लिए बना जलाशय नवल सागर

चल पड़ा किले की ओर। मार्ग से भी किला दिख रहा है। मार्ग में घरों के बाहर खड़ी चार पहिया गाड़ियों की छत पर कांटेदार डंडल रखी हुई है। जो बंदरों को इन गाड़ियों पर चढ़ने से रोकती है। अन्यथा बंदर कार की छत पर कूद कूद कर छत पिचका देते होंगे।

करीब आधा किमी चलने के बाद बाएं मुड़ गया जहा किले का प्रवेश द्वार है। इधर किनारे एक दुकानदार से बारह घंटे में ही अच्छी जान पहचान हो गई है।

अभिनंदन स्वीकार करते हुए अपनी राह की ओर चलता रहा। प्रवेश मार्ग पर कई गाड़ियां खड़ी हैं। इससे पता चला रहा है पर्यटक आता है यहाँ।

कुछ पर्यटकों के लिए किले में दीवारों के सिवाय कुछ भी नहीं होता। कुछ के लिए यही दीवारें बोलती हैं। ठीक सामने टिकट काउंटर दिख रहा है।

चढ़ाई करते हुए प्रवेश द्वार पर टिकट काउंटर के सामने आ खड़ा हुआ। बाहर ही बैनर में टिकट के दाम लिखे हुए हैं। खिड़की पर टिकट कटाने चला तो मालूम पड़ा यहाँ सिर्फ नकदी स्वीकार करते हैं।

अन्य स्थलों की भांति यहाँ ऑनलाइन व्यवस्था है ही नहीं। देख रेख का जिम्मा निजी संस्था को है। कुछ हिस्सा सरकार के पास है।

किले के आसपास बिता वक़्त

नकदी ही ले कर नहीं आया हूँ। ऑनलाइन भुगतान पर महोदय ने हाथ खड़े कर लिए। असंभव सा कार्य करार कर दिया। पास ही बनी सीमेंट की सीट पर बैठ गया।

मुझे बैठा देख किले के द्वार के पास से एक आदमी आया जो समस्या पूछने लगा। पहचान पत्र दिखाने को बोल रहे हैं। अब ये कौन भाईसाहब है, ऐसे कैसे किसी को भी पहचान पत्र दिखा दूं!

मेरी इसी बात पर भड़क गए। दौड़ कर अपने बैग की ओर गए और अपना राजस्थान पुलिस का पहचान पत्र दिखाने लगे। पुलिस में पर बिना वर्दी के। अपने आप को सेनानिवृत बताते हुए कारगिल युद्ध का भागी बताया।

उनका इतना कहना था की मैं उठ कर खड़ा हो गया अपनी जगह से। कारगिल के योद्धा बताने लगे की कैसे शूरवीर और पराक्रम से वो तोलोलिंग पहाड़ी पर लड़े थे।

अपने मित्रो और साथियों को याद करते हुए उनकी आंखे भर आई। जो उनकी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए काफी हैं। उन्हे आज भी अपने साथियों को याद करते वक्त दर्द उठ जाता है।

कारगिल के शूरवीर का आज ड्यूटी पूरी हो गई है। अब वो बस्ता ले कर घर को निकल रहे हैं। उनके निकलने के बाद मैं भी सोच रहा हूँ की एटीएम से पैसे निकाल कर किले के प्रवेश हासिल कर लिया जाए।

बाईं ओर सीढी से उतरकर दुकान में आ पहुँचा। यहाँ बैठी एक महिला ने बताया की किले पर जाने का पहाड़ी के पीछे से रास्ता बताया। जो कुछ ही दूर है। गांव के लोग वहाँ जाते रहते हैं।

उस रास्ते पर तो जा सकता हूँ पर अंदाजा नहीं लग पा रहा है कितनी दूर है। कुछ देर बातों में वक्त बीतने लगा। इसी पर आंटी जी ने अपने घर की छत से किले को देखने का प्रस्ताव दिया।

जिसे स्वीकार करते हुए जूते उतार कर चल पड़ा। उनके घर की छत से किला देखने कमरे के भीतर से होते हुए। आंगन में बनी सीढ़ियों पर चढ़ते हुए ऊपर आ गया।

पुराने घर की छत से किला तो बहुत ही शानदार नजर आ रहा है। छत की दीवार पर बैठकर कुछ तस्वीरें निकलवाई। धोखे में दूसरे की छत पर भी पहुँच गया।

भरपूर समय बिताने के बाद नीचे उतर आया। आंटी जी को धन्यवाद दिया और एटीएम जाने का विचार कर रहा हूँ। घड़ी में एक बजने वाला है। भूख भी जोरों की लग रही है।

किले को घूमने के लिए ऊर्जा भी चाहिए। अंतरजाल पर ढूंढने पर मालूम पड़ा की यहाँ दो गुरुद्वारा भी है। आंटी जी ने भी बताया की सिर्फ हाईवे वाले गुरुद्वारे पर ही लंगर मिलेगा।

जेब में नकद की भी कमी है और इसी बहाने भगवान के दरबार में भी जाने का अवसर मिलरहा है। किले के बाहरी परिसर से निकल पड़ा गुरुद्वारा।

आंटी जी की घर की छत से किला

गलियों से होते हुए बूंदी के बाजार से होते हुए। यहाँ बाजार में जो चीज मुझे आकर्षित कर रही है वो है यहाँ की शुद्ध मेंहदी। पर क्या मालूम कितनी शुद्ध हो!

बस अड्डे के पास की बाजार से होते हुए रानी की बावड़ी तक आ पहुँचा। नजर तब पड़ी बड़ी पर जब बाहर फूल सजाए बैठे विक्रेता दिखाई पड़े।

गुरुद्वारा

अच्छे समय से यहाँ से सीधा हाईवे के लिए लिफ्ट मिल गई है। लद कर निकल पड़ा गुरुद्वारा। गुरुद्वारा के पहले मस्जिद और गुरुद्वारे के बाद मंदिर। सांप्रदायिकता का अनमोल उदाहरण है।

गुरुद्वारा में प्रवेश करने पर मालूम पड़ रहा है की दर्शन करने के लिए गुरुद्वारा बंद हो चुका है। पर लंगर अभी भी जारी है। हालांकि साफ सफाई को देख कर लग ही रहा है काफी लोग खान पान कर चुके हैं।

नीली पगड़ी बांधे बाबा जी ने मुझे भीतर बुलाया। कमरा खोला और बत्ती पंखा चालू करने लगे। बिछी हुई दरी पर मैं झाउए से थाली ले कर पलथी मारकर बैठ गया।

बाबा जी सामने तख्त पर रखे भोजन को ला कर परोसने लगे। खाने में कढ़ी और रोटी, जमकर लंगर छाका। यहाँ खाना बहुत ही स्वादिष्ट है। पेट भर कर खाने के बाद बाहर थाली धोई जैसा की गुरुद्वारे का नियम है।

जूते पहन कर निकल पड़ा किले की ओर। धूप में रखे जूते भी काफी सूख गए हैं। गुरुद्वारे से बाहर पैदल ही चलने लगा। कुछ आगे तक निकल आने पर गुरुद्वारे के ही दूसरे बाबा जी लिफ्ट मिल गई।

जो बाजार तक जा रहे हैं। गुरुद्वारे में सेवा देने आते हैं। आज की महंगाई से त्रस्त हैं। आसमान छूती कीमतों ने विवश कर दिया है आम आदमी को।

बारिश के मौसम को देखते हुए होटल से बारिश वाले ही कपड़े तान कर निकला था। पर अब इन कपड़ों में गर्मी लग रही है। बाजार से पैदल होटल की ओर निकल पड़ा।

होटल पहुँचकर बरसाती कपड़े रखे एक किनारे। सूखे कपड़े पहने और कल रात को गिले हुए जूते और कपड़े धूप में डाल दिए। होटल में ये सारा काम कर ढाई बजे तक मुक्त हो गया।

तीन बजे तक आ पहुँचा किले के फाटक पर। एटीएम जाने का तो समय नही मिला। मित्र से कुछ पैसे उधार ले लिए ताकि इस बार खिड़की से वापस ना लौटना पड़े।

तारागढ़ किला

खिड़की से टिकट प्राप्त कर किले के भीतर दाखिल हुआ पर यहाँ सन्नाटा पसरा हुआ है। भीतर निर्देश बोर्ड भी लगा है। जिसमे तमाम नियम बताए गए हैं। नियम कायदे पढ़ कर महल के पास आ खड़ा हुआ।

महल के निकट खड़े तीन लड़कों को देख कर लग रहा है की यहीं के कर्मचारी हैं। मूंह से बोल फूटे तो मालूम पड़ा बाहर से आए हुए हैं किला देखने।

कुछ आगे उद्यान है। पर जंगली है। किनारे बनी दीवारें भी जर्जर अवस्था में हैं। चमगादड़ों की भरमार है। हर किले में चमगादड़ मिलना आम बात है।

तारे के समान दीखता किला

यहीं जंगली रास्ते से हो कर किनारे आ खड़ा हुआ, तस्वीरें लेने लगा। यहाँ से किला देखने पर ऐसा लग रह है जैसे आसमान में रखा हुआ है। आसमान को छूता हुआ।

दुर्ग के अगले हिस्से की कुछ इमारत श्रतिग्रस्त हैं। कुछ बनी हुई हैं। कुछ कलाकृति बिलकुल जोधपुर के मेहरानगढ़ किले की भांति। आगे बढ़ता हूँ तभी एक खास मित्र का मुंबई से फोन आ पड़ता है।

उनसे बात भी करता जा रहा हूँ और एक निगाह क्रूर बंदरों पर भी हैं। जो आपस में ऐसा लड़ भीड़ रहे हैं जैसे मुझे भी अपनी लड़ाई में शामिल कर लेंगे।

फोन कटा और बंदर भी अपने रास्ते निकल गए। मैं चढ़ाई चढ़ते हुए हाथीपोल पर आ गया। हाथीपोल पर हाथी की कलाकृति में दो मूर्ति के बने हाथी दरवाजे पर सूड चिपकाए खड़े हैं।

अब जा कर इतनी देर किले में घूमने के बाद टिकट की जांच हो रही है। वो भी तब जब रतन दौलत महल में प्रवेश कर रहा हूँ। पतली सी आवाज में भाईसाहब ने आग्रह करते हुए रजिस्टर में नाम चढ़ाया। हकस्ताक्षर कर भीतर आ गया।

रतन दौलत

रतन दौलत चारों ओर से बंद दिख रहा है। तस्वीरबाजी करते हुए दाहिने मुड़ कर कमरे से भीतर सीढ़ियों के द्वारा पहली मंजिल पर आ गया। भीड़ ना के बराबर है। सिंहासन बैठक भी है।

1426 फीट की ऊंचाई पर स्थित नागपहाड़ी पर बना ये दुर्ग। यही कारण है की धरती से आकाश में दिखाई पड़ने वाले तारे के समान दिखने वाला ये दुर्ग तारागढ़ कहलाया।

यह भी किवदंती है की मेवाड़ के राजकुमार की पत्नी तारा के कहने पर इस किले का पुनः निर्माण हुआ था। जिस कारण इस किले का नाम तारागढ़ पड़ा।

चारो ओर पर्वतों से घिरा हुआ ये किले का निर्माण राव नरसिंह ने 1354 में कराया था। बाद में जयपुर के फौजदार बलवंत सिंह ने इसकी प्राचीर बनाई।

खिलजी ने यहाँ तीन दफा हमला किया। मुगलों के शाशनकाल में यहाँ के राजाओं ने संधि कर मुगल के साथ मिल गए। यही कारण है मुगलों का प्रभाव कम ही देखने को मिल रहा है यहाँ।

मित्र का दोबारा फोन आया। बात करते करते महल के दूसरे हिस्से छतर महल में आ गया। यहाँ से बादल महल, फूल महल और झूला चौक पर पहुँचने का रास्ता है।

यहाँ से नवल सागर अच्छे से दुख रहा है। नवल सागर का निर्माण बूंदी के पानी की कमी को देखते हुए हुआ था। जो पर्याप्त था।

हाथीपोल के भीतर रतन दौलत

फूल महल

फूल महल में प्रवेश करने पर दिख रही है दीवारों पर चित्रकारी। राजा महाराजा और उनके प्रजा दरबार की कला का अनोखा उदाहरण देख पा रहा हूँ।

चित्रकारी की तस्वीर लेना मना है। इससे चित्रकारी पर खराब असर पड़ता है। फूल महल से निकल कर बादल महल आ गया। उजड़ हुए इस महल का पुनः निर्माण हुआ है जो साफ झलक रहा है। फर्श से ले कर छत तक।

बादल महल

बादल महल पर कुछ भी नहीं है। जगह जगह दरवाजों पर ताला जड़ा हुआ है। खंडहर में चमगादड़। खंडहर कमरों से होते हुए झूला चौक के सामने आ खड़ा हुआ पर पहली मंजिल पर।

झूला चौक

धरातल पर पहुँचने के लिए नीचे उतरना होगा। यहाँ भी दो मार्ग हैं नीचे जाने के। झूला चौक कर देख कर लग रहा है रानियों के मनोरंजन का स्थान हुआ करता होगा।

आसपास इमारत भी हैं जिनमे अब सिर्फ चमगादड़ों का वास है। सारा हिस्सा बंद पड़ा है। दुर्गंध ऐसी की कुछ पल के लिए भी ठहरना मुश्किल है।

दूसरे हिस्से के बंद पड़े दरवाजे को खोल कर सीढ़ीचढ़ते हुए फिर से बदल महल आ गया। लग रहा था किसी गुप्त जगह पहुँचूंगा पर ऐसा नहीं हुआ।

घूम फिर कर फूल महल। सामने दिखे तीन बच्चे जो रतन दौलत पर तस्वीरबाजी कर रहे थे। हर दीवार पर रंगीन और बेहद खूबसूरत चित्रकारी है।

कमरे की दीवार भी कई हिस्सों में बटी हुई है। इन दीवारों पर चित्रकारी भी।

महलों से निकलते हुए रतन दौलत के बाहर हाथीपोल पर आ गया। यहाँ से अब निकल रहा हूँ दूदा महल जो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधिनियमित है।

किले की बनावट सुरक्षा कारणों से ऊंच नीच रखी गई है। बालक बालिकाएं भी साथ ही निकल आए। जिनमे से एक ग्वालियर तो दूसरी भोपाल से ये किला देखने आए हैं।

झूला चौक

दूदा महल

चढ़ाई करते हुए दूदा महल आ गया। महल की बालकनी से पूरा बूंदी दिख रहा है। वो पुराने धराशाई हिस्से भी जो कभी किले का हिस्सा हुआ करते थे। इनमे से अधिकांश मंदिर हैं।

दूदा महल की मरम्मत भी जोर शोर से चल रही है। महल के दाईं ओर मेज कुर्सी पर बैठे महोदय ने अपनी ओर बुलाया। दो हिस्सों में मिला टिकट के दूसरे हिस्से की यहाँ जांच हुई।

बताने लगे की यहाँ महज कुछ हिस्सा ही जानता के लिए खोल रखा है। बाकी का बंद पड़ा है। बंद पड़े कक्ष को ना खोलने की हिदायत भी दी।

दूदा महल से छतर महल देख पा रहा हूँ। जो छतर के ठीक ऊपर है। महल के भीतर हो कर बाहर निकल आया। यहाँ खुले में अपने घुमक्कड़ी समुदाय के मित्र को फोन घुमाया जो लेह लद्दाख में भ्रमण पर है।

महल का ये हिस्सा पिछवाड़ा मालूम पड़ रहा है। इसका अगला हिस्सा झूला चौक की ओर होगा। जो बंद पड़ा है। सभी महलों को देखने के बाद निकल पड़ा बाहर।

बाएं मुड़ते हुए तारागढ़ किले की ओर बढ़ चला। जिसकी हालत खस्ता है। यहाँ सैनिक के नाम पर तैनाती बंदरों की है। वो तीनो बालक बालिकाएं अब नजर नहीं आ रहे।

दूदा महल

मोटे मोटे बंदरों के सामने से निहत्थे निकलना सही नहीं। आसपास मोटा डंडा ढूंढने लगा। सुरक्षा के माध्यम से बेहतर। कम से कम डंडा देख कर ही नहीं हमला करेंगे वानर।

इसी बीच दो अन्य लोग का साथ मिला। जिनको हाथ में डंडा ले कर चलने की हिदायत दी। डंडा तो महोदय ने हाथ में ले लिया है पर जिगरा कहीं भीतर ही दबा है।

विकट परिस्थिति में मुझे आगे कर खुद पीछे पीछे चलने लगे। सीना ताने मैं भी आगे बढ़ रहा हूँ। खुशकिस्मती से बंदरों ने कोई भी हरकत नही की।

चढ़ाई हालत पस्त कर देने वाली है। फिर भी चढ़ते हुए भीम भुर्ज तारागढ़ से पहले पड़ी इमारत में आ गया। इमारत का काफी हिस्सा श्रतिग्रस्त है। जंगली पेड़ों के मध्य से होते हुए आगे के कमरे की बालकनी में खड़ा हो गया।

यहाँ से किले का भव्य नजारा दिख रहा है। रतन दौलत और उससे सटे छतर महल और महल का बंद पड़ा हिस्सा। यहाँ से भव्य तस्वीरें लेने के बाद और ऊपर की ओर निकल पड़ा।

भीम भुर्ज

खड़ी चढ़ाई चढ़ते हुए आगे रानी महल और दाहिनी ओर भीम भुर्ज है। समय की कमी और भीम भुर्ज को जाने वाले जंगली मार्ग को देखते हुए रानी महल जाने का चुनाव करा।

आश्चर्य है कैसे हाथी घोड़े यहाँ तक समान लाया करते होंगे बिना किसी दुर्घटना के शिकार हुए। असंभव है। पसीना पानी की तरह बह रहा है।

रानी महल

बुशर्ट पूरी तरह भीग चुकी है। रानी महल रानियों के लिए ही होगा। यहाँ बड़ा तालाब भी है जिसमे रानियों का स्नान होता होगा। फटाफट तस्वीर लेते हुए अंदर आ गया।

मुझे लग रहा है यहाँ की तो मिलेगा ही। पर यहाँ सुरक्षाकर्मी भी नदारद है। पांच बजने से पहले ही। रानी महल की छत पर आ पहुँचा।

तालाब में भरा पानी जहरीला लग रहा है। कितना गहरा है कुछ कहा नहीं जा सकता। महल के हर एक कोने में जा कर खुद ही जानने समझने की कोशिश कर रहा हूँ।

अंधेरा हो रहा है। बेहतर है इससे पहले कुछ भी ना दिखे उतरना शुरू किया जाए। अभी बहुत नीचे जाना है। बहुत ऊपर खड़ा हूँ। खड़ी चढ़ाई पर से आहिस्ता आहिस्ता उतरने लगा।

तारागढ़ किले के प्रवेश द्वार पर पहुँचा तो बंदरों के बड़े दल को खुद की ओर आता हुआ पाया। लग रहा है बिना हथियार की सेना मेरी ओर बढ़ रही है।

इनसे बचना है तो एक जगह खड़े रहना सबसे सुरक्षित रहेगा। भागते या दौड़ते हुए निकला तो कटना तय है। भारी सेना के बीच यूं खड़ा हो गया जैसे मैं यहाँ हूँ ही नहीं।

इनके जाने का इंतजार कर रहा हूँ। बंदरों के छीतर बितर होते ही धीरे धीरे रास्ते से निकल रहा हूँ। अगले द्वार पर कुछ पुछल्ले बंदर दिख रह हैं।

जिनको द्वार के पास से हटाने के लिए अद्धा फेंक कर भगाया। तब कहीं जा कर नीचे की ओर बढ़ा। उतरने में कम से कम बीस मिनट का समय लगा मुख्य द्वार तक पहुँचने में।

लौटते समय वानर की सेना से घिरा हुआ पाया खुद को
बूंदी के भीतर 15किमी

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