सुप्रसिद्ध कालीघाट मंदिर

धार्मिक स्थल | पश्चिम बंगाल | भारत | शक्तिपीठ | हावड़ा

दोपहर में हुई सुबह

राहुल सेन के घर माहौल कुछ ऐसा है कि चाह कर भी जल्दी नहीं उठ सका। उठने में ही बारह बज गए।

स्नान ध्यान और शुद्धिकरण के बाद निकलने की तैयारी करने लगा। कल की तरह आज राहुल ने खाना बना कर नहीं रखा है। क्योंकि वो खुद इतनी देर से सो कर उठा है।

जैसा कि कल रात को चर्चा हुई थी आज कालीघाट मंदिर ही जाऊंगा। उसके बाद क्या करना है ये तो मंदिर से निकलने के बाद ही पता चलेगा।

देर से ही सही लेकिन दोपहर के दो बजे तक मैं निकल पड़ा कालीघाट। प्रसिध्द काली माता मंदिर। जिसके बारे में कानपुर तक में चर्चा है। शायद पूरे भारत में!

छोटे बैग में कैमरा और अन्य महत्वपूर्ण समान डाल कर निकल रहा हूँ कल की ही तरह। आरके पुरम की इमारत में आज सन्नाटा बहुत है।

शायद दुर्गा पूजा इसका कारण हो सकता है। गली से निकलकर मुख्य सड़क तक पैदल ही आ पहुंचा।

ऑटो का इंतजार किए बिना पैदल निकलना सही है। कोई भरोसा नहीं ऑटो कितनी देर में आएगा।

सफर में अड़चने

कुछ दूरी तय करने के बाद पेंट की जेब टटोली पर उम्मीद के मुताबिक हांथ कुछ ना लगा। कान में लगा कर सुनने वाली दो तार (earphone) गायब है।

साथी घुमक्कड़ को बताया। वो मुझे हक्का बक्का देखने लगा। मैं वापस उसी रास्ते पर लौटने लगा जिस पर से चल के आया। 

नसीब से सड़क के किनारे दोनो इयरफोन(कान में खोसने वाला तार) पड़ी मिली। अगर यह वापस ना मिलती तो अगले कुछ दिन मनोरंजन ना ले पाता शायद।

इयरफोन के साथ साथ ऑटो भी यहीं मिल गई। हालांकि कुछ दूर मोड़ तक चलाना पड़ा। ये जनाब कवि नजरूल तक तो जायेंगे ही।

करीब आधा घंटे के झूलते टूटी फूटी सड़क पर सफर के बाद मेट्रो स्टेशन।

दिल्ली मेट्रो कार्ड तो किसी काम का नहीं। कतार में लग कर टोकन ही लेना होगा। कवि नजरुल से मेट्रो में चढ़कर कालीघाट मेट्रो स्टेशन से रवाना हो गया।

कालीघाट मंदिर जो अखण्ड भारत में विख्यात है। यह मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है। इसका महत्व इस बात से लगाया जा सकता है की सालाना यहाँ करोड़ों की संख्या में भक्त दर्शन करने आते हैं। अदभुत!

आज मेट्रो में भीड़ कम है। या यूं कहें दिल्ली मेट्रो के मुकाबले कुछ भी नहीं। दो चार स्टेशन के बाद कालीघाट मेट्रो।

मेट्रो स्टेशन से बाहर निकलते ही भारी भरकम भीड़ का सामना करना पड़ रहा है। एक वजह पंडाल का होना भी है।

मेट्रो से पैदल मार्ग पर ही मंदिर है। देर से सो कर उठने के कारण दिमाग ठीक से काम नहीं कर रहा है। स्टेशन से आगे चल कर चाय की टपरी ही टपरी नजर आ रही हैं।

ज्यादा आगे नहीं बल्कि फुटपाथ पर। ऐसे कई ठेले लगाए हुए हैं। भारत में एक बार शराब का व्यवसाय खतम हो सकता है चाय का नहीं।

यहाँ बालक बालिकाएं सब हांथ में प्याला लिए चुस्की ली रहे हैं। आज खुद को ठगा सा महसूस कर रहा हूँ।

भूखा प्यासा घर से निकला। सोच रहा हूँ कम से कम चाय ही सही। टपरी पर आराम से एक कप चाय मंगाई।

चाय का स्वाद बहुत उम्दा है। चाय उतारने के बाद शरीर में तारोताजगी आ गई है। अब मंदिर कि ओर स्वतः कदम बढ़ते जा रहे हैं।

तंग गलियों से गुजरते हुए जहाँ पानी पूरी वाले से ले कर मलाई वाले सबका ठेला जमा है। चौंडी सड़क के खत्म होते ही फूल माला वाले अपनी दुकान सजाए बैठे हैं।

घड़ी में चार बजने को आए हैं और मैं यहाँ मंदिर परिसर में हूँ। लोगों से पूछते पूछते तो यहाँ आ गया पर प्रवेश द्वार नहीं मिल रहा।

ना कोई रोकने वाला ना टोकने वाला। दनदनाते हुए अंदर भी घुस गया। देखने में आया की मंदिर के आंगन में भंडारा चला रहा है।

पर ये पिछले दरवाजे से अजीब ही नजारा है। थोड़ी गंदगी और मैला कुचेला। थोड़ा चक्कर मार कर वापस निकलने लगा।

बाहर आ कर सही रास्ता पूछने पर मालूम पड़ा की असल रास्ता तो आगे सड़क मार्ग से है। वैसे चार मुख्य द्वार हैं मंदिर में प्रवेश करने के। 

दर्शन करने की लालसा के चलाते बाहर फूलवाले से प्रसाद लिया। यहाँ कई मिठाई वाले और फूल वाले अपनी दुकान की तरफ बुला रहे हैं।

इन्ही भाईसाहब की दुकान पर चप्पल भी उतार दी। एक तरह का ये भी सौदा है तुम सौदा करो बदले में मैं तुम्हारे सामान की रखवाली करूंगा।

कालीघाट मंदिर

प्रवेश द्वार का रास्ता अब भी संशय में है। फूलवालों से मुख्य द्वार का रास्ता पूछते पूछते मुख्य द्वार तक आ पहुंचा।

प्रशाद वितरण का सिलसिला चल रहा है। विचार बना लिया की पहले दर्शन फिर प्रशाद। गोल गोल लगी कतार में मैं भी खड़ा हो गया।

गर्भ गृह के इर्द गिर्द भक्तों की कतार है। जो काफी देर से रुकी हुई है। रेलिंग पकड़े मेरी तरह कई लोग खड़े हैं।  अंदर जाने के इंतजार में हैं। पीछे से कतार और बढ़ती ही जा रही है।

पर फिर भी जैसी मंदिरों में खचाखच भीड़ होती है वो देखने में नहीं आ रही। सिर के ऊपर लगे पंखे कभी चालू तो कभी बंद।

धीरे धीरे अब कतार बढ़ने लगी है। मेरे आगे खड़ी मोहतरमा और उनके आगे एक परिवार। सामने वो दरवाजा जिससे मैं पहली दफा में अंदर आया था।

बगल में रसोड़ा जहाँ भी तक भोग परोसा जा रहा था। अब यहाँ सन्नाटा पसरा है।

मंदिर के सामने पहुंचते पहुंचते पता लगा अंदर उनको ही पहले जाने को मिल रहा है जिनके पास पुजारी का नंबर है।

बाहर परिसर में पंडित को कुछ रुपए पकड़ा कर कतार में आगे खिसकवा लेना आजकल का भूषाचार(फैशन) है।

मंदिर के अंदर के भी पंडित अपने पंडित भाइयों को ही तरजीह दे रहे हैं। गुत्थम गुत्थी के बीच कतार यहाँ तक आते आते छीतर गई।

कौन आगे कौन पीछे मालूम ही नहीं चला रहा। धक्का मुक्की में मैं खुद को आगे धकेलते हुए अंदर जाने का प्रयास करने लगा।

हालांकि पहली और दूसरी बार में अंदर के पंडित ने रोका पर इस मर्तबा नहीं। घंटे भर की मशक्कत के बाद अब जा कर गर्भ गृह तक पहुंचा हूँ।

पिछले दरवाजे से प्रवेश के बाद गोल चक्कर लगाने के बाद ही माता के दर्शन होंगे। चक्कर लगाने में ही जानता आगे पीछे हो रही है। जिसका अब काम ही फर्क पड़ रहा है किसी को।

दीवारों पर देवी देवताओं की मूर्तियां। जिनके चरणस्पर्श कर के आगे बढ़ रहे हैं सब। मेरी भी काली मां की मूर्ति के दर्शन करने का अवसर मिल रहा है।

पर यहाँ मंदिर के गर्भ गृह में अलग ही लीला चल रही है। मूर्ति के ठीक सामने पूजा अर्चना वाले पंडितो श्रद्धालुओं ने भेदभाव करते पाए गए। वो उसी को यहाँ खड़े होने दे रहे हैं जो दक्षिणा दे रहा है।

बाकियों को पीठ पर मुक्का मार कर बाहर का रास्ता दिखा रहे हैं। ठीक से हांथ भी नहीं जोड़ पा रहा हूँ।

पहले मुझसे तो ये पूछ कुछ चढ़ाओगे क्या? जब उनको समझ आ गया की खर्चा करने वाला व्यक्ति नहीं है तब आगे बढ़ने को मजबूर करने लगे। 

मैंने भी एक मुक्का खाया।

अगले दरवाजे से बाहर निकल आया। पास में चल रहा भंडारा समाप्त हो चुका है। मैं भोग से वंचित रह गया!

काली मंदिर के दूसरे हनुमान मंदिर में दर्शन करते लेखक

मंदिर परिसर में अन्य देवी देवताओं की प्रतिमा और छोटे छोटे मंदिर भी हैं। जिनके बारी बारी से दर्शन करने लगा।

सुरक्षा के लिहाज से मंदिर परिसर का वीडियो बनाना सख्त मना है। मंदिर के बरामदे में बड़े बड़े बर्तन जो काफी पुराने लग रहे हैं इस बात का प्रमाण हैं की यहाँ दशकों चली आ रही परंपरा का पालन होता आ रहा है।

मंदिर परिसर में बलि घर भी है। जैसा कामाख्या मंदिर में देखा था। उतना बड़ा नहीं, बल्कि छोटा सा।

छोटे मंदिरों में शादी शुदा औरतों को प्रशाद के रूप में सिंदूर और लडको को लड्डू का भोग।

सुना है यहाँ सिंदूर का प्रशाद के बड़े मायने हैं। लोग यहाँ से सिंदूर का प्रशाद ले कर देश भर में अपने परिजनों में बांटते हैं।

सब देवी देवताओं के दर्शन के बाद मंदिर से निकल कर फूल वाली दुकान पर आ गया। जहाँ अपने जूते सहेज कर रखवाए थे।

अगले स्थल पर विचार

भारत में ऐसी अनेकों परंपरा हैं जिसमे ये व्यवसाई लोगों की मदद कर देते हैं बदले में उनसे अगर छोटा सौदा भी कर लें तो।

ये सामान की हिवाजत किसी सीसीटीवी कैमरे से भी दस गुना बेहतर करेंगे। और दो प्यारे भरे शब्दों से आपका मन भी जीत लेंगे।

बैग और जूते पहनने के बाद तंग गलियों से निकल गया।

तिराहे पर गन्ने का जूस बेंच रिहा व्यक्ति जोर जोर से जूस पीने पिलाने पर जोर देकर ग्राहकों को आकर्षित कर रहा है।  

मंदिर जाते समय भी यही नजारा था। अब पी ही लेता हूँ। कुछ शरीर में ऊर्जा आएगी।

दो जूस निकालने को कहा और पास में पड़ी कुर्सी पर पैर जमा कर बैठ गया।

हलचल अब शाम के समय देखने को मिल रही है। जैसे जैसे अंधेरा होने को है। ठेले पर जूस ग्रहण किया। भुगतान कर मस्त मौला हो कर निकल पड़ा।

अब सोच रहा हूँ क्या ही करूं बाकी बचे कूचे समय में। घर जाने की कोई इच्छा नहीं है फिलहाल। जितनी देर बाहर रहूँ उतना अच्छा। 

मुख्य सड़क पर आने के बाद सड़क के उस पार एक पंडाल दिख रहा है। ये अच्छा विचार है।

बंगाल अपने दुर्गा पूजा के लिए ही जाना जाता है। समय का सद्पयोग करते हुए पूजा में शामिल होना अच्छा रहेगा।

पहला पंडाल

सड़क के इस पार आ कर इस लाल रंग की लाइट में सराबोर ये पंडाल विशेष लग रहा है।

कुछ लोग कॉपी पेन ले कर हर मूर्ति के पास खड़े हो कर जाने क्या लिख रहे हैं।

आयोजक अपने काम काज में व्यस्त हैं। सभी ने एक जैसे कपड़े भी धारण कर रखे हैं ताकि पता चले की ये आयोजक हैं। सुंदर पंडाल को देख मन द्रवित हो रहा है। 

आगे पीछे अंदर सभी ओर से देखने के बाद अब निकलने का खयाल आ रहा है। भूख भी याद दिला रही है पेट में कुछ डालने का समय आ गया है।

पिछले रास्ते से होते हुए आ पहुंचा सड़क किनारे एक कैंटीन में। जो चाइनीज खाना पका रहा है।

कुर्सियों का तो यहाँ ढेर लगा हुआ है। चाहें आदमी उस पर बैठ जाए या बैठ कर दूसरी कुर्सी पर बैठ कर खाए। तो भी कम ना पड़ेंगी।

वैसे तो बहिष्कार चाइना से द्वारा निर्मित सामान का करना चाहिए। खाने का नही क्योंकि वो हम खुद पका कर खा रहे है। नूडल्स और पराठा का शाम के समय नाश्ता हो रहा है।

यहाँ की दुर्गा पूजा देखने लोग देश विदेश से देखने एकत्रित होते हैं।

खाना पचाना करने के बाद तय हुआ अभी कुछ और बड़े पंडालों में जायेंगे घर जाने से पहले। राहुल ने भी काफी बड़े बड़े पंडालों का जिक्र किया था। उनमें से कुछ चुनिंदा ही याद हैं मुझे।

मैं भी भीड़ को पकड़ते हुए निकाल जाऊंगा उधर ही जिधर अच्छा पंडाल सजा होगा। पैदल निकल लिया कालीघाट की तरफ। जान पड़ा उसी तरफ ज्यादा अच्छे पंडाल हैं और भीड़ भी।

नियंत्रित भीड़

एकाएक कालीघाट मेट्रो स्टशन के आस पास के इलाकों में भारी तादाद में भीड़ एकत्रित हो रही है।

इतनी भीड़ की बड़े बड़े पुलिस अधिकारियों को भी मशक्कत करनी पड़ रही है। इतनी भीड़ अगर बेकाबू हो जाए तो परिणाम भयावह हो सकते हैं।

शुक्र है इस बात का कि भीड़ काबू में है। सख्ती से पालन कराया जा रहा। वाहन को नियंत्रण करने के लिए ट्रैफिक पुलिस जरूर चौराहे पर खड़े हो कर नियंत्रित करते कई बार देखा होगा।

कलकत्ता की गालिया की साजो सज्जा

आज ये पहली दफा है जब खुद पूरी पुलिस को भीड़ नियंत्रित करने पड़ रही है। ठीक उसी अंदाज में।

कभी दक्षिण से भीड़ को रोका जाता और पश्चिम के लोगों को आगे बढ़ने दिया जाता कभी पूर्व या उत्तर के। भीड़ भी पुलिस का पूरा सहयोग कर रही है।

वाहन का तो यहाँ से निकलना नामुमकिन है। अगर आ भी जाए तो अगली सुबह तक यहीं खड़ा रहेगा।

जैसे वाहनों को गलत लेन में जाने से रोक दिया जाता है। वैसे ही पुलिसकर्मी ने मुझे भी गलत लेन में जाने से रोका।

दुर्गा पूजा के लिए इतनी भारी तादाद में भीड़ मैंने शायद ही कभी देखी।

यह भी कह सकते हैं कोलकाता जनसंख्या के मामले में भारत के प्रथम दस सबसे ज्यादा जनसंख्या वाले शहर की सूची में शामिल है।

यहाँ के दूसरे सबसे बड़े पंडाल में प्रवेश करने के लिए भी भारी मशक्कत है। गीत संगीत के बीच मुख्य सड़क से अलग हो कर गलियों में आ गया।

गली से पंडाल में। भीड़ जबरदस्त है। शोर शराबा भी। पर जैसे तैसे करके यहाँ के पंडाल में दर्शन हो गए। इस दौरान मेरा और साथी घुमक्कड़ का साथ कई मर्तबा छूटा भी।

निर्णय लिया की अब सबसे बड़े पंडाल में हो आने के बाद सोनारपुर के लिए रवाना हो जाना चाहिए।

ना जाने कब यहाँ यातायात बाधित हो जाए की रात गुजारनी मुश्किल जाए।

सबसे बड़ा पंडाल

जो गलियां कभी सन्नाटे में सराबोर हुआ कृति रही होंगी आज वो भी चहक रही हैं। गलियों से होते हुए बड़े से मैदान की तरफ बढ़ा।

दूर से ही देवी के दर्शन हो रहे हैं। भीड़ को कई हिस्सों में विभाजित कर दिया गया है। बांस की रेलिंग के सहारे। जिसे चलते भीड़ नियंत्रण में है।

पुलिसकर्मी अपना शत प्रतिशत से रहे है आयोजन को सफलतापूर्वक होने में।

बारह पंद्रह रेलिंग पार करने के बाद जब मुझे पंडाल के भीतर घुसाने को मिला तो उनकी मेहनत का नतीजा देखने को भी मिल रहा है।

पंडाल में भव्य दुर्गा मूर्ति। व्यवस्था और किसी भी भक्त के साथ कोई भेदभाव नहीं।

सबको भरपूर समय भी दिया जा रहा है कुछ देर रुकने का। पर मूर्तियों के करीब जाना ना के बराबर है। कड़ी सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम।

ये भव्य पंडाल देखने के बाद मन प्रफुल्लित हो गया। सम्पूर्ण महसूस हो रहा है। पंडाल में बाहर जाने का रास्ता बहुत दूर रखा गया है।

ताकि प्रवेश द्वार से टकराव ना हो। पंडाल से निकलने के बाद अब मन बना रहा हूँ वापसी का।

नवरात्रि के इस शुभ अवसर पर जगह जगह सुसज्जित सुंदर पंडाल देखने को मिले। दो दिन बाद अष्टमी है।

वैसे यहाँ अलग अलग विषय(थीम) के पंडाल देखने को मिले जैसे की पर्यावरण संरक्षण पर आधारित, बेटी बचाओ जैसे अन्य।

कलकत्ता का सबसे बड़ा पंडाल

सोनारपुर रवानगी

कुल मिलाकर चार से पांच पंडाल देखने के बाद मैं सोनारपुर के लिए रवाना हो गया। पुलिसकर्मियों के द्वार बताए हुए रास्ते से मैं कालीघाट मंदिर मेट्रो के पास आ गया।

हालांकि और भी मेट्रो स्टेशन के पास से पैदल गुजरा पर वापसी यहीं से करनी है।

आज पूरे कलकत्ते में ऑटो की मार और जाम से जूझने वाली सड़के देखने को मिलेंगी।

इसका सीधा असर श्रद्धालुओं कि आवा जाही पर पड़ेगा। अंधेरी रात में मेट्रो से कवि नजरूल पहुंच गया।

कवि नजरूल जाने माने लेखक और गीतकार थे। जिनके नाम पार इस स्टेशन का नाम पड़ा। सच्ची श्रद्धांजलि है। लोगों के जहन में भी पुराने लोगो की छवि बरकार रहनी चाहिए।

कवि नजरुल स्टेशन पर निकलते समय जीने में काफी अंधेरा पाया। साथी घुमक्कड़ के मन में शरारत पैदा हुई की ऊपरी हिस्से में चला जाए।

जो की किसी कारण बंद पड़ा है। शायद किसी दुर्घटना या पुराने मेट्रो के चलते।

जनता की गैर मौजूदगी में ऊपर गया और वापस भी उतनी ही जल्दी आ गया। पता चला सब बंद और खंडहर पड़ा है वहां।

आरके पुरम जाने के लिए ऑटो लेने बाजार में आया। पर यहाँ तो पहले से ही मारामारी है।

विलंब से ही सही मिले लेकिन दुगने किराए पर। ऐसा इसलिए भी क्योंकि मुख्य सड़क जाम का सामना कर रही है। ये सभी ऑटो चालक घुमाते हुए ले जायेंगे।

रात के अंधेरे में अब ये चालक जैसे भी के जाए कौन सा मुझे पता चलना है। थकान और नींद के कारण बुरा हाल है। बस बिस्तर पकड़ कर सोने की तैयारी है।

ऑटोवाले ने भी सटीक जगह उतारा है। यहाँ से राहुल का घर मात्र कुछ कादमों की दूरी पर है। रात के दस बज रहे हैं सिर मैं आरके पुरम में खड़ा हूँ।

नया मित्र

घर में दाखिल होना था और इधर राहुल ने रात का खाना बना कर पहले से ही रखा हुआ है।

राहुल हमलोग के साथ रात्रि पद यात्रा की योजना बनाए बैठे हैं। उनके इस महत्वपूर्ण क्रम में अपने खास मित्र को भी आमंत्रित किया है।

उनके मित्र के आगमन करते ही थोड़ा समय परिचय में निकल गया। चार लोगों की टोली निकल पड़ी आरके पुरम की गली नुक्कड़ों में जहाँ छोटे बड़े हर तरह के पंडाल लगे हैं को देखने।

रास्ते में ऐसे भी पंडाल दिख रहे हैं जहाँ अंतिम कार्य अभी भी बाकी है। जिसके चलते पंडालों में मजदूर, कार्य को पूरा करने में जुटे हैं।

लंबा रास्ता तय करने के बाद ऐसे ही एक सन्नाटे भरे पंडाल में आ कर चारो जने बैठ कर बतियाने लगे। राहुल काफी उत्साहित और पंडालों के बारे में ज्ञान से लबरेज दिखाई पड़ रहे हैं।

साथी घुमक्कड़ के कंधों पर हांथ रखते हुए राहुल ने बताना शुरू किया।

“कलकत्ता में सालाना सर्वश्रेष्ठ पंडाल, सर्वश्रेष्ठ लाइटिंग, सर्वश्रेष्ठ दुर्गा मूर्ति, सर्वश्रेष्ठ थीम जैसी और भी अन्य प्रतियोगिता आयोजित होती हैं जिसके तहत विजेता घोषित किया जाता है।”

यहाँ ज्यादा समय ना देते हुए हम आगे के पंडालों में जाने के लिए निकल पड़े।

राहुल बताने लगे की नारी सशक्तिकरण में कलकत्ता बाकी के शहरों से कितना आगे है इसका उदाहरण है जगह देखने को मिलेगा।

जैसे बसों में पूरी एक पंक्ति महिलाओं के लिए आरक्षित होती है। यही हाल मेट्रो का भी है।

सड़क किनारे जितने भी पंडाल नजर आ रहे हैं सब में एक प्राइवेट सुरक्षाकर्मी जरूर तैनात है। ताकि कोई रात के अंधेरे का फायदा उठाकर नुकसान ना पहुंचा दे।

कलकत्ता की मशहूर पीली टैक्सी। जो एक किनारे खड़ी है। ऐसे शांत जैसे इन टैक्सी रानी को पता ही नहीं की ए कितनी मशहूर हैं।

अँधेरी रात में कलकत्ता की गलियों में पुराणी टैक्सी के साथ लेखक

टैक्सी पर चढ़कर फोटो निकलवाई। आगे अभी और पंडाल है बोल कर राहुल और आगे ले कर निकल पड़े।

यहाँ भी अलग अलग विषय के पंडाल हैं। कोई सिर्फ पे की पत्तियों। कोई बोतल, प्लास्टिक तमाम तरह के अलग अलग।

घूमते घूमते दो बज गया है और आंखो में नींद भी भर रही है।

तय किया की अब निकलना उचित है। सुरक्षा के लिहाज से नही बल्कि नींद के लिहाज से।

सुरक्षा यहाँ का कोई अहम मुद्दा नहीं है। कुछ ही क्षणों में वापस तीन किलोमीटर का रास्ता तय कर घर आ गया। 

भूतिया हलचल

घर पहुंचते ही तो राहुल ने चौंका देने वाला खुलासा किया। उन्होंने सोने से पहले बताया इस अपार्टमेंट के ठीक बगल में कब्रिस्तान है। 

यहाँ भूतिया गतिविधियां होती रहती हैं। मेरे पसीने छूूट गए यह सुनते ही। मैं बाथरूम गया और खुद को अन्दर से बंद कर किया।

क्रिया खतम होने से पहले ही कोई जोर जोर से दरवाज़ा पीटने लगा। ऐसा जब दोबारा हुआ तो मैं अन्दर से ही जोर से चिल्लाया।

तुरंत दरवाज़ा पीटने की आवाज़ बंद हो गईं। मुझे इस बात की शंका है कि शायद यह राहुल ने किया हो। 

हांथ धो कर बाहर निकला और राहुल और अन्य से इस बात की पुष्टि की तुम में से किसने दरवाज़ा पीटा।

सभी ने इंकार किया और सो गए। मैं इस कृत्य को नज़रंदाज़ नहीं सकता हूँ।

लेकिन कब्रिस्तान से लोग बाथरूम का इस्तेमाल करने आते हैं इस बात की पुष्टि हो गई है। सोते सोते सुबह के तीन बज गए।

कल मुर्शिदाबाद जाने के लिए टिकट तो बुक करा लिया है परन्तु वो कन्फर्म नहीं हैं। शायद कल शाम तक ट्रेन के रवाना होने से पहले हो जाए। 

रकपुरम से कालीघाट मंदिर और वापसी 45km

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