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ले कोबुशैर ने बसाया चंडीगढ़

कल रात दिल्ली  से नौ बजे की ट्रेन से मैं सुबह सवेरे तीन बजे मॉडर्न सिटी चंडीगढ़ आ पहुंचा। ट्रेन अपने निर्धारित समय से आधे घंटे पहले ही आ गई, ये भी मुसीबत है। अगर पहले आ गई तो ट्रेन पहले खाली करो। चैन की नींद आधे घंटे पहले ही भंग हो गई। कभी कभार समय से पहले पहुंचना भी भारी पड़ जाता है। टूटी नींद के साथ ट्रेन से उतरा। सुबह के चार बज रहे हैं। इतनी सुबह तो बचपन में पिताजी मार मार कर उठाया करते थे। स्टेशन पर भी लोग अचेत सो रहे हैं, कुछ हरकत में भी हैं। नींद तो मुझे भी आ रही है और सोने का बड़ा मन है। मैं स्टेशन पर ही जगह देखने लगा जहाँ थोड़ा आराम किया जा सके। प्लेटफार्म के बाहर और एंट्री गेट से पहले मुझे खाली जगह खाली अवसर के रूप में दिखी। अगल बगल में लेटे मुसाफिरों को आगे पीछे सरकाया। कंधे से बैग नीचे उतर कर रखा। बैग में हाँथ डाल चद्दर टटोलने लगा। पर हाँथ आयी कमीज। आँख बंद कर …