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मेघालय सड़क दुर्घटना में बाल बाल बचा

एलिफेंटा से डावकी गांव एलिफेंटा झरना मेहेज घंटे भर के अंदर ही भ्रमण हो गया। खास है तो सिर्फ वो झरना जो भारत के किसी और कोने में ना मिले। वापसी में जिस दुकान में बैग रखे हुए थे वहीं से थोड़ा नाश्ता करना बेहतर लगा। नाश्ता भी इसलिए ही किया क्योंकि दुकानदार ने हमारा बैग रखवा कर काफी बोझ हल्का कर दिया था। जिस कारण झरना इत्मीनान से देखना संभव हो पाया। आखिर इंसान ही इंसान के काम आता है। और ये इंसानियत अभी ज़िंदा है। सैलानी होने का फायदा भी यही है की दूसरे शहर में लोग अक्सर मदद के लिए हांथ आगे बढ़ा ही देते हैं। चार कोस दूर खड़ी स्कूटी को चालू करके ले आया दुकान के पास। एक बैग आगे ठूंसा और दूसरा बैग अजय ले कर बैठ गया पिछली सीट पर। फिलहाल कुछ दूरी तक गाड़ी मैं ही चलाऊंगा और उसके कुछ दूरी तक अजय। ये क्रम ऐसे ही चलता रहेगा शाम तक जबतक मंज़िल पर पहुंच ना जाऊं। गेट के पास पहुंचा तो यहाँ पार्किंग की रसीद मांगने …