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क्यों ना जाएं शिमला!

रामपुर रोड सुबह आंख खुली तो देखा अगल बगल की सवारियां जैसे कि तैसे सो रही हैं। कुछ बदला है तो पिछली सीट का नजारा। जहां अब कोई नहीं है। ड्राइवर साहब और कंडक्टर बाबू तो बस से ही नदारद हैं। उन्होंने पक्का अपनी व्यवस्था ढाबे के किसी कोने में तलाश कि होगी। वैसे भी ढाबा है ही इतना बड़ा। बगल मे सो रहे अजय को उठाया। सुबह के छह बज रहे है। अभी बस की क्या स्तिथि है ये तो ड्राइवर साहब ही बता सकते हैं। बस से उतर कर नीचे आया तो पाया ड्राइवर और कंडक्टर कुल्ला मंजन करने में व्यस्त हैं। सात बजे तक यहाँ से निकलने का समय बताया। अभी काफी समय है प्रस्थान करने में। ढाबे के पिछले बने सौंचालय का सही सदुपयोग हो रहा है। पूछने पर कंडक्टर साहब ने वहीं जाने का इशारा किया। बस में कुल मिलाकर 4-6 ही सवारियां रह गई हैं। जो मेरी तरह इसी ज़िद्द में रह गई की जाना है तो इसी बस से। सुबह की नित्य कर्म के बाद ढाबे में ही …