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मनाली के बुद्ध मंदिर में जाना आखिर क्यों घुमाते हैं चक्र?

होटल की सुबह कल के मुकाबले आज आंख जल्दी खुल गई। लेकिन सुध नहीं है करना क्या है? खिड़की पर नजर पड़ी तो देखा। कमरे के बाहर से खिली खिली धूप की किरणे खिड़कियों से आर पार होते हुए अन्दर आ रही हैं। यही किरणे जब चेहरे पर पड़ी तो फिर नींद ना आई दोबारा।  शरीर में थकान इतनी है की जी चाह रहा है मनाली में एक दिन और रुक जाऊं। हल्का हल्का बुखार भी महसूस हो रहा है। जो सुस्ती मैकलोडगंज से लगी है वो अभी तक जाने का नाम ही नहीं ले रही। कभी कभार एक गलती भी भारी पड़ जाती है। जिसका भुगतान लंबे समय तक करना पड़ता है। उठ तो गया पर कल की थकान नहीं गई। दरवाज़ा खोल कमरे के बाहर निकलने पर थोड़ी हल चल दिख रही है। कल की मुलाकात में अमित भाई कुछ इस्राइलियों के साथ वार्तालाप करते नजर आए। पहले तो मुझे आभास हुआ कि शायद इनको हीब्रू भाषा का ज्ञान होगा। ठीक से सुना तो समझ आया अंग्रेजी में बातें हो रही हैं। अगर …

मनाली में मिली जमकर भीड़

उठते ही दिखा अद्भुत दृश्य कड़ाके की शरीर गला देने वाली ठंड में सुबह चार बजे सोया था। इतनी गहरी निद्रा जिसका कोई जवाब नहीं। सारे मोबाइल, कैमरे, सेल सब चार्जिंग पर लगा कर है सोया था। ताकि जब उठुं तो खाली फोन लेके ना निकलना पड़े। धकापेल नींद से भी नाटकीय ढंग से जगा। कल जिस हिसाब से सफर में समय बिता उसका तो कोई जवाब नहीं। उसके बाद की थकान और भयंकर नींद। आलम ये रहा की नींद टूटी कुछ इस कदर की दरवाज़े पर नरेंद्र भाई को खड़ा पाया। बिस्तर से उठा तो पाया अजय खिड़कियों से पर्दे हटा रहा है। और खिड़की के बाहर बने घर के पीछे के पहाड़ लाजवाब हैं। फिर तो नींद ऐसी उड़ी जिसका कोई जवाब नहीं। सुबह दस बजे आकर नरेंद्र भाई ना खटकाते तो ना जाने और कितनी ही देर तक मैं सोता रहता। शायद अगला एक घंटा और। वो भी इसलिए आए ताकि कमरे की साफ सफाई हो सके। चमकते सूरज के बाद ठंड में भी कमी आई है। कमरे के बाहर आया तो …