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कल्पा का सुसाइड पॉइंट जहाँ लोग जाते है मौत को गले लगाने!

बदली योजना सुबह जल्दी उठने कि बजाए आंख बहुत देर से खुली। जैसा रात में हाँथ में बैग फसा कर सोया था सुबह खुद को वैसा ही पाया। बेंच पर नींद भी सही आ गई। उसके ऊपर स्लीपिंग बैग गद्दे का कम कर गया। रात में कमरे का दरवाजा उड़का लिया था ताकि कोई अन्दर ना आ पाए। कमरे में तीन बेंच पड़ी सो तीन आदमी। नींद खुलने पर देखा कि सामने वाली एक बेंच खाली पड़ी है। बस अड्डे पर हलचल भी हल्की फुल्की दिख रही है। यात्रियों का आना जाना बरकरार है। कुछ अपना झोला झंडा लेे कर बाहर ही बैठे हैं। कमरे में वो ही आ रहे हैं जिनको अपना फोन चार्ज करना है। मोबाइल तो मेरा भी चार्ज नहीं है। सारे मोबाइल और पावर बैंक चार्जिंग पर लगा कर मैं और अजय बारी बारी से तैयार होने लगे। बस अड्डे पर ही बने दुसलखाने में। जब तक मैं तैयार हुआ तब तक बस अड्डे की भीड़ भी कम हो गई। योजना यही है कि काजा के लिए निकला जाए फिर पूरा …