गुत्थी सुलझाने के प्रयास में सोनप्रयाग में बिता दिन

भारत | उत्तराखंड | सोनप्रयाग

संभावनाओं से भरी सुबह

बदहवास हालत में जैसे तैसे कल रात को केदारनाथ से उतर कर गिरते पड़ते सोनप्रयाग पहुंचा था। देर रात होने के कारण खाना खाने की इच्छा भी नही हुई। होती भी कैसे दो दिन हुए बीत गए थे सोए हुए। आंखों में सिर्फ नींद भरी हुई थी।

उत्तरकाशी से सोनप्रयाग आने के बाद जिस जगह पर तंबू लगा कर सोया था। ठीक उसी जगह पर कल भी तंबू लगा कर सो गया। पूरे छह घंटे भी नही सोया और नींद खुल चुकी है।

केदारनाथ में जूते चोरी की रिपोर्ट दर्ज कराने के बाद ये तय हुआ कि आज उसकी कार्यवाही आगे बढ़वाई जाए। आंख मसलते हुए टेंट के बाहर निकला।

पिछली बार की तरह इस बार कोई बाहर टेंट के बारे में चर्चा करने वाला नही था। सामने दिख रही है तो बस अलखनंदा नदी और उससे भी पहले जवानों के कैंप। यहां पानी की भी व्यवस्था भी जान पड़ रही है।

पानी की व्यवस्था देख कर खयाल आया की सारे मैले कुचैले कपड़े आज यही धो डालता हूं। तीन दिन हो गए नहाय हुए। आज मौका पा कर नहा भी लिया जाएगा। स्वच्छ शरीर स्वच्छ बैग से भरा स्वच्छ कपड़ा।

नित्य क्रिया के लिए एक स्थान बनाया गया है जहां सभी श्रद्धालु आते हैं। पहले साथी घुमक्कड़ उसके बाद मैं। हमने अपने अपने काम बांट लिए है। उसी के अनुसार साथी घुमक्कड़ थाने निकल गया कार्यवाही को देखने और इधर मैं बैग में से मैले कुचैले कपड़े निकाल कर धोने की व्यवस्था कर रहा हूं।

हालांकि बद्रीनाथ जाने के बाद घर वापसी होगी पर कभी न कभी तो कपड़ा धोना ही है। बेहतर है समय का सदुपयोग कर लिया जाए।

काम काज

बैग से कपड़े छांट कर एक जगह इकट्ठा किए। टेंट में ताला डाल कर सारे कपड़े ले आगे बढ़ने लगा। पानी की व्यवस्था देख आंखे जगमगा उठी हैं।

कैंप के एक जवान को पिछले दो दिन का सारा विवरण देते हुए अपनी व्यथा बताई तो उन्होंने भी इजाजत दे दी आगे जाने की। शायद ऐसा वाकया तो उन्होंने भी अपनी सेवा के दौरान नही सुना होगा। यहां कोई आम आदमी तो बिलकुल ही नहीं आ सकता।

सेना की सुरक्षा को देखते हुए यह बहुत ही उचित और अनुरूप है। पर आगे बढ़ा ही था की किसी ने आवाज दे कर रोकना चाहा। 

मुड़ के देखा तो एक दूसरा जवान रोबीले अंदाज में आगे जाने से रोक रहा है और धमकाते हुए बोला “यहां आम लोगों का आना मना है समझ नही आता क्या?”

उनके साथी कमांडर ने बात दोहराते हुए उस जवान को समझाया और उसे संक्षेप में बताया और मुझे दोबारा आगे जाने दिया। अब मैं तो यहां आ गया ढेर सारे कपड़े ले कर पर झुग्गी झोपड़ी वाले बच्चे जो नीचे से आ रहे थे उन्हे ये जवान चुन चुन कर भगा रहे हैं।

इधर मैं कपड़े धोने बैठा हूं और टोंटी से पानी की तेज धारा निरंतर बहे जा रही है। उधर जवान नहाने धोने की प्रक्रिया बनाए रखे हुए हैं।

गट्ठर भर कपड़ो में से कुछ मेरे और कुछ साथी घुमक्कड़ के। कच्ची पक्की चट्टान के ऊपर रबर की तेज धारा से सारे कपड़े गीले कर एक एक धोने लगा।

इस दरमियान बीच बीच में कपड़े छोड़ कर टेंट की ओर नजर भी मारने आ जाता। जवानों के आने का सिलसिला बरकरार है। और सभी नहाने आते। अधिकतर केदारनाथ पर ड्यूटी करके महीनो या हफ्तों बाद नीचे आए हैं।

ढेर सारे कपड़े धोने के बाद फटाफट मैने भी स्नान करने लगा। जिसके बाद मुझे बहुत ही आत्म संतुष्टि हो रही है। शरीर शुद्ध तो मन भी शुद्ध।

कपड़े इन्हीं की बनाई रस्सी पर टांग कर टेंट की ओर चल पड़ा। साथी घुमक्कड़ थाने की कार्यवाही में इतना मशगूल हो गया था की फोन लगा कर मुझे हालत की जानकारी लेनी पड़ी।

पेट में कूदते चूहे

वक्त हो चला है खाना खाने का। जब से सोनप्रयाग आया हूं मुझे एक ही रेस्त्रां किफायती लगा। और भोजन का स्वाद भी लजीज है। दिन होते होते यहीं चौराहे के पास वाले ढाबे में आने की लिए निकल पड़ा।

साथ ही जवानों से आग्रह भी किया की टेंट पर नजर बनाए रखें। ताकि झुग्गी झोपड़ी के बच्चे कोई हरकत न कर सकें। इस भीड़ में कब क्या हो जाए कुछ भरोसा नहीं।

तंग गलियों से गुजरते हुए रेस्त्रां पहुंचा जहां दिन में भीड़ बहुत ही कम है।

खाना ऑर्डर किया जिसे आने में थोड़ा वक्त लगेगा। साथी घुमक्कड़ ने थाने में हुई कार्यवाही के बारे में जिक्र किया और मुझे भी वहां साथ चलने की हिदादायत दी। ताकि मैं भी जान सकूं की आखिर पूरा मसला हुआ क्या था।

सुबह से साथी घुमक्कड़ ने कैमरामैन की मदद से कंट्रोल रूम से केदारनाथ में लगे अल्ट्रा एचडी कैमरे की मदद से वो सब देख लिया था जब हम वहां पट के सामने बैठे थे।

खाना पीना करके हम तंबू में झांकने आए ये देखने की सब कुशल मंगल तो है! रस्सी पर फैले कपड़े में से कुछ सूख चुके हैं जिन्हे उठाकर टेंट में डाल दिए। यहां चोरी होने का खतरा सिर्फ झुग्गी वालों से है। जो गलियों में अपना गुजर बसर कर रहे हैं।

एक बार फिर तंबू में ताला डालकर निकल पड़ा वीडियो क्लिप देखने और थाने में कार्यवाही आगे बढ़ाने। कंट्रोल रूम मे वीडियो देखने की आ पहुंचा। 

वीडियो क्लिप

कंट्रोल रूम और थाना ज्यादा दूर नहीं है। थाने की सरकारी गाड़ियों का आने का सिलसिला बरकरार है। वीडियो साथी घुमक्कड़ ने पहले ही देख लिया था। अब मेरी बारी है देखने की ताकि मुझे भी इस चीज की तसल्ली हो जाए की आखिर चोरी को किस तरह अंजाम दिया गया था।

हालांकि की उस घटनाक्रम की कल्पना में बखूबी कर पा रहा था। पर साथी घुमक्कड़ यहां भ्रमित था। हालांकि उसकी शंका वीडियो देखने के बाद दूर हो गई।

कैमरा कमरे में आए तो याद आया यमुनोत्री में मिले लवली सिंह के बारे में जिन्होंने बताया  था की सोनप्रयाग में उनके परिचित के मित्र मिलेंगे जिनसे काम पड़े तो मिलना।

पता नहीं था काम पड़ जाएगा वो भी इस तरह का। कैमरामैन को शुरू से ले कर अंत तक सारी कहानी साथी घुमक्कड़ के द्वारा सुन चुके थे। जिसे दोहराने की जरूरत नहीं है।

इन जनाब से जब लवली और उनके साथी के बारे में बताया तो जवाब में साथ में काम के दिनों को याद करते हुए बताया की यहां पर सारे कैमरे उनके द्वारा ही लगाए गए हैं।

खिड़की पर रजिस्ट्रेशन से ले कर पैसे की गिनती के काम को अंजाम दिया जा रहा है। सारे काम काज निपटा कर अब वीडियो चलाने लगे। जब देखने की बारी आई तो वीडियो देख कर मैं स्तब्ध रह गया।

अभी फिलहाल शाम के समय मंदिर के ठीक सामने लगे अल्ट्रा एचडी कैमरे से मंदिर का गर्भ गृह तक दिख रहा है। जब कैमरामैन ने पिछली रात की रिकॉर्डिंग निकाली तो होश फाख्ता हो गए।

जिसमे देखने में आया कि कैसे चोर आधे घंटे के भीतर दो दफा मंदिर के आसपास भटक कर दो बार में दोनो जोड़ी जूते चुराए। खैर इस बात का अंदाजा तो कल सुबह केदारनाथ में चित्रण देखने के बाद ही लग गया था।

पर साथी घुमक्कड़ को ये बात अब समझ आई है। खैर न तो जूते वापस आने की कोई गुंजाइश दिख रही है। और ना ही किसी के कोई कार्यवाही आगे बढ़ाने की ललक।

क्योंकि सब एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोपण करते हुए अपना पल्ला झाड़ रहे हैं।  अपनी तरफ से भी ज्यादा सिर खपाने की जरूरत नहीं है।

थाने में ड्यूटी

थाने में दरोगा को सारा विवरण दिया। पर उनका मानना था की हमें केदारनाथ में ही रुक कर जोर दे कर कार्यवाही करनी चाहिए थी। हम रुक कर भी चोर को कैसे पकड़ते जब दो दिन हो चले थे सोए हुए।

ऐसी स्तिथि में या तो हम भूख से या ह्रदय गति रुकने से मर जाते पर चोर का कोई अता पता न मिलता। इस स्तिथि में चोर भी सतर्क होता और शायद वो दो चार दिन तक आता ही ना।

संभावनाएं तो कई थी। मैने उन्हे वो वीडियो भी दिखाया जिसमे वो चोर चोरी करते हुए पाया गया। पर मंदिर के ठीक सामने लगे कैमरे से विवरण मिल जाता तो पूरा खेल समझ आ जाता।

तकरीबन आधे घंटे चली इस वार्ता के दौरान उनको व्हाट्सएप पर ये वीडियो भी भेजा।

भरोसा दिलाते हुए उन्होंने कार्यवाही को आगे बढ़ाने का हौसला भी दिया। पर ये भी बोल पड़े की केदारनाथ में रुकते तो थोड़ी तेजी आती।

पर केदारनाथ में कोई मदद के लिए ही नहीं तैयार था तो कैसे कार्यवाही को आगे ले जाता? आज सारा दिन इसी में निकला जा रहा है।

अब परिणाम जब पता हैं तो बेहतर है कल सुबह की बस से बद्रीनाथ निकला जाए। इसी को मद्देनजर रखते हुए हम टेंट की ओर चल पड़े।

यहां सब सकुशल दिखाई पड़ रहा है। तंबू भी जहां का तहां। रस्सी पर से कपड़े उठा लिए हालांकि कुछ गीले ही हैं। और साथी घुमक्कड़ निकल गया बस की टिकट बुक कराने।

अगर ज्यादा देर हुई तो शायद टिकट का मिलना भी मुश्किल है।

सोनप्रयाग पुलिस स्टेशन तो बायोमेट्रिक तो रेस्ट्रॉन्ट के चक्कर लगाते हुए 10km की पदयात्रा

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