सीकरी महल, जोधाबाई रसोई

उत्तर प्रदेश | फतेहपुर सीकरी | भारत

बीरबल महल

बुलंद दरवाजा बहुत ही शानदार है। यहाँ से महल कुछ आधा किमी दूरी पर है। कुछ ही घंटे में अंधेरा हो जाएगा। बहुत ही न्यूनतम समय रह गया है महलों को देखने के लिए।

निर्भर करेगा की कितने बजे तक महल खुला रहता है। द्वार पर आने के बाद यहाँ बैनर पर लगे क्यू आर संहिता को जांचा जिसके कुछ ही देर में टिकट बन कर तैयार हो गया।

कॉपी पर नाम लिख कर महल में प्रवेश कर गया। प्रवेश करते ही एक गाइड पीछे पीछे चल पड़े। अपनी रट लगाते हुए महल के बारे में बताने के लिए।

बहुत मना करने के बावजूद भी नहीं गए। अपनी कीमत पांच सौ से गिराकर सौ कर दी। पर मुझे मार्गदर्शक चाहिए ही नहीं। भीतर किसी सभाघर में प्रवेश करते हुए आंगन में आ निकला।

बनावट से ये तो कोई सभाघार लग रहा है या फिर घोड़े का अस्तबल हुआ करता होगा। आगे आगे चल रहे बड़े परिवार के पीछे भी एक मार्गदर्शक पड़ा हुआ है।

आखिरकार थक कर इन्होंने गाइड को साथ ले ही लिया ज्ञान सुनने के लिए। सामने बना है बीरबल महल और उसी के पास है बीरबल का घर।

परिवार तो बीरबल घर देख कर निकल पड़ा। मैं मशगूल हो गया तस्वीरें लेने में। अस्तबल और बीरबल महल की। पास से गुजर रहे लड़के को बुला कर भी दो तस्वीरें निकलवाई।

मन में समय भी घूम रहा है। जाने कितना बड़ा ये महल होगा और इसे घूमने में कितना समय लगेगा। किसी से भी पूछने पर सब अपने अपने अनुसार समय बता रहे हैं।

जैसे बीरबल घर के पास मिले तीन लड़कों ने से एक ने बताया व्यक्ति अनुसार निर्भर है। जो की सही भी है। ये भाईसाहब हरकतों से टिकटोक वाले लग रहे हैं। जिसपर सरकार के द्वारा ताला जड़ा जा चुका है।

पर हो भी हो यहाँ से दृश्य बहुत ही मजेदार है। ढलते सूरज में सायंकाल के समय किसी भी धरोहर को देखना बहुत ही शांति प्रदान करता है।

जैसे परसों ताजमहल को सायंकाल में देखना। पर्यटक भी कम मिलते हैं और तेज धूप का सामना भी नहीं करना पड़ता। बीरबल घर से बाहर किले की दीवारें देखी जा सकती हैं।

वैसे तो किला बहुत बड़ा है और काफी एकड़ में फैला हुआ है। पर बाहरी हिस्सा ध्वस्त है। भीतरी हिस्सा ही संजो कर रखा गया है।

बीरबल घर से निकल कर निकल पड़ा यही सोच कर जाने कितना बड़ा होगा और कितना समय लगेगा जिसका अंदाजा नहीं लग पा रहा है फिलहाल।

बीरबल महल

पंच महल

एक इमारत को पर कर पंच महल की ओर आ गया। बताया जाता है बादशाह यहाँ अपनी बेगम के साथ हवा खाने आया करते थे। पंच महल के बाईं तरफ छोटी सी इमारत है।

जिसका नाम ना तो कहीं लिखा है और ना ही मुझे ज्ञात है। पर पांच मंजिला पंच महल है। जिसका पूरा आनंद उठाते होंगे बादशाह अपने जरूरत अनुसार।

पंच महल के समकक्ष एक जोड़ा तस्वीर निकलने में व्यस्त है। जिनसे मैने भी अपनी कुछ तस्वीरें निकलवाई। पंच महल में तीसरी मंजिल पर महिलाएं भी पर्दे वाले रास्ते से आया करती थीं।

इसमें कुल 176 खंबे हैं। धरातल से सूरज की रोशनी में खंबे बलुआ चमक बिखेर रहे हैं। जो बहुत ही मनमोहक है। साथ ही एक सीध में खंबो को देखना और भी सुंदर प्रतीत हो रहा है।

पंच महल से बाहर निकल कर बड़े से आंगन में आ पहुंचा। शाम का वक्त है इसलिए गिने चुने ही लोग हैं। सर्दियों में और भी संख्या बढ़ेगी।

यहाँ है दीवान ए खास जो अकबर का सांसद हुआ करता था। यहाँ अकबर अपने नौ प्रमुख सचिव के साथ बैठक किया करते थे। इसकी खासियत है की बाहर से देखने पर दो मंजिला लगता है पर है एक ही मंजिल का।

दीवान ए खास में कोई भी सचिव जमीन पर नहीं बैठा करता था। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के बाद ऊपर जाने का मार्ग सरकार द्वारा बंद करवा दिया गया है। ताकि इमारत पर ज्यादा जोर ना पड़े।

दीवान ए खास के ही समीप तिजोरी और खजाने की छतरी है। खजाना भवन सोने चांदी के सिक्कों का राजकीय कोश हुआ करता था।

वैसे ही छतरी पर ज्योतिष के बैठने का स्थान हुआ करता था। पर ये अनुमान लगाया जाता है की खजाने की रखवाली के लिए शाही खजांची बैठा करता होगा। दोनो ही जैन मंदिरों की कार्यशैली में निर्मित है।

दीवान ए खास के बाईं ओर दरवाजे के उस तरफ कुछ और ही है। जा कर देखना पड़ेगा। पर यहाँ पिछले हिस्से में मंडप जैसा कुछ निर्मित है। इसके पीछे से किला देखा जा सकता है। जो की खंडहर है पर पास में ही बहुत बड़ी टंकी बनी हुई है। जल भरा है पर मैला।

पंच महल

चार चमन

मंडप से बाहर निकल कर उस दरवाजे की ओर निकल पड़ा जहाँ से कुछ लोग अभी दीवान ए खास की तरफ आए।

यहाँ पर है तो एक बड़ा उद्यान। यहाँ मेरा प्रवेश हुआ और साथ में एक चिंतित महिला का भी। जिसके बताने के अंदाज से लग रहा है की उसके साथ टिकट का फर्जीवाड़ा हुआ है।

कोई ऑटोवाला इनको नकली टिकट पकड़ा कर पैसे ऐंठ कर निकल गया। इंसान अपने थोड़े से आराम के लिए अपना बड़ा नुकसान करवा लेता है।

थोड़ी सी जागरूकता होती तो इनके साथ शायद ये घटित ना हुआ होता। उद्यान के दूसरी तरफ जाने की तो इच्छा है पर समय की कमी के कारण विचार त्यागते हुए बाहर निकल आया।

पास में जा रहे भाईसाहब को कैमरा थमा हवा महल, दीवान ए खास और चौसा के साथ कुछ तस्वीरें निकलवाई।

दीवान ए खास के सामने ही एक सीढ़ी चढ़ते हुए पच्चीसी या चौसठ भी है। कहा जाता है अकबर अपनी रानी के साथ इस खेल का आनंद उठाता था।

बतौर प्यांदे और गोटियों के रूप में नाचने वाली हुआ करती थीं। जो पासा फेकने के बाद नाचते हुए आगे बढ़ती थीं।

मैं अब आ खड़ा हुआ हूँ अनूप तलाव के सामने। जिसका मुख्य उपयोग तानसेन के गीत का आनंद लेने के लिए हुआ करता था। तलाव के ठीक बीचों बीच तानसेन बैठा करते थे।

सामने चार मंजिला इमारत पर अकबर दूसरी इमारत में जोधाबाई तानसेन के संगीत का लुत्फ उठाया करते थे। इस पूरे इलाके को चार चमन के नाम से जाना जाता है।

सामने रुकैया बेगम का शीश महल है। जिसमे हीरे जवाहरात और रंग बिरंगे शीशे हुआ करते थे। जिसे बाद में अंग्रेज निकाल कर ले गए।

चार मंजिला इमारत में अकबर का बिस्तर हुआ करता था। उसका बिस्तर भी देख पा रहा हूँ। जो भीतर कमरे में कुछ ही ऊंचाई पर है। यहाँ भी आगे आगे एक दक्षिणी परिवार चल रहा है।

अनूप तालाब और चार चमन

जोधाबाई रसोई

चार चमन से निकलने के बाद मैं आ पहुंचा जोधाबाई के रसोई घर के सामने। ऐसा इसलिए क्योंकि शादी के वक्त ही जोधाबाई ने दो शर्ते रखी थी।

पहली धर्म परिवर्तन ना करना दूसरा मंदिर निर्माण और अलग से रसोई बनाना। कुछ ही आगे जोधाबाई महल है जो राजस्थानी परंपरा अनुसार बना हुआ है।

जोधाबाई महल जिसमे सन्नाटा पसरा हुआ है की ओर निकल आया। बताया जाता है की रानी यहाँ मौसम अनुसार चार दिशाओं में रहती थीं। यहाँ एक मंदिर भी है शर्त अनुसार अकबर द्वारा बना कर दिया गया था।

बीचों बीच आंगन में मंदिर के सामने तुलसी का पौधा जो जोधाबाई के समय हुआ करता था। पर आज नहीं है। जो लोगों के स्पर्श से मुरझा जाता है। इसलिए पूर्णतः ही हटा दिया गया।

महल बहुत ही शानदार निर्मित है। पर्यटक कम हैं इसलिए देखने समझने में भी आनंद आ रहा है। महल देख कर बाहर निकलने लगा। देखने में आया मनमोहक दृश्य किसी इमारत की।

जोधाबाई रसोई

दीवान ए आम

इमारत देखने वापस से दीवान ए खास से होते हुए दीवान ए आम पहुंच गया। जहाँ पहली दफा आया था और उद्यान देख कर निकल गया था।

इस जगह पर अकबर के द्वारा जनता दरबार लगता था। जहाँ पर लोगों की फरियाद सुनी जाती थी और उनके साथ न्याय किया जाता था।

यह अंतिम जगह बहुत ही शानदार और हवादार है। यहीं कुछ देर बैठ कर फतेहपुर सीकरी के नजारे का आनंद लेने लगा। यहीं से कुछ दूर निकास द्वार भी है।

तीन युवा अपने कार्यालय से छुट्टी पा कर यहीं हर फिक्र को धुएं में उड़ा रहे हैं। इन तीनों को देख मुझे अपना कार्यालय याद आ गया। यहाँ से शहर बखूबी देखा जा सकता है।

इमारत भी खूब जच रही है। पर है क्या इसका कोई विवरण नहीं दिया हुआ है।

आराम फरमाने के बाद दोबारा बुलंद दरवाजे पर आ कर कुछ तस्वीरें निकाली और हाईवे की ओर रवाना हो चला। रास्ते में कुछ लोगों को सांप दिखा तो लगे मिलकर बेचारे सांप के प्राण लेने।

परिसर से बाहर निकलते हुए लिफ्ट के माध्यम से हाईवे आ पहुंचा। आज भारतपार जाने की योजना है। भरतपुर के मित्र से बातचीत के दौरान ज्ञात हुआ की आज वो अपने घर कर रुकवा नहीं पाएंगे।

समझ नहीं आ रहा है करूं तो क्या करूं। सुबह सीकरी के मित्र ने ऐसा किया अब भरतपुर। विचार में मथुरा भी आ रहा है। पर जाना कैसे है ये सोचना होगा।

फोन घूमा दिया फतेहपुर के सामुदायिक मित्र को। जिन्होंने अपने घर पर आमंत्रण दे दिया। जो सुबह मना हो चला था खराब तबियत के कारण।

सीकरी से करावली तक पहुंचने को कहा। पहले जो सफर भरतपुर की ओर होने वाला था उसकी दिशा बदल कर करावाली हो चली है।

कब किस जगह किस दाने पर नाम लिख हो ये तो सिर्फ एक ही जानता है।

आगरा से सिकरी से करौली तक की कुल यात्रा 60किमी

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