श्रीकृष्ण जन्मभूमि मथुरा

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इस्कॉन मंदिर

कल दिन में इस्कॉन गौशाला में समय व्यतीत करते हुए जब मालूम पड़ा की इस्कॉन में सुबह का निशुल्क भोजन प्राप्त होता है तो यह तय करना मुश्किल नहीं था की आज सुबह इस्कॉन ही जाना है।

स्नान कर निकल पड़ा पैदल गलियों में भोजन की खोज में। यहाँ वृंदावन की गलियों में सुबह सवेरे कीर्तन मंडली भी निकलती है जिसमे कोई भी शुद्ध व्यक्ति सम्मिलित हो सकता है।

इस्कॉन में जरा कुछ जल्द ही पहुँच गया। इस्कॉन का परिसर काफी बड़ा है। भोजन कक्ष में झांकने पर दिखा की अभी तैयारियां चल रही है। भोजन तो इतनी सुबह मिलने से रहा रहा।

यहीं बने चबूतरे पर बैठ गया। पास में बैठे सज्जन से पूछने पर सुनिश्चित हुआ की भोजन नौ बजे मिलेगा। ये महाशय कोयंबटूर से हैं जहाँ मैं दो साल पहले था।

नौ बजने में तो अभी पर्याप्त समय है। यहाँ से निकल कर एक सीमेंट की बेंच के पीछे जूते डाल कर निकल पड़ा। पर संतुष्टि नहीं मिल रही है। क्या पता चोरी हो जाए। आगे जमा कक्ष भी है।

वापस आ कर अलग अलग बेंच से जूते बटोर कर जमा कक्ष में रखवा कर टोकन प्राप्त किया। दाहिने हिस्से में जमा करने का स्थान है। पीछे इस्कॉन मंदिर में आ गया।

इधर कई विदेशी भक्ति भाव में डूबे दिखाई दे रहे हैं। प्रभुपदा जिन्होंने इस्कॉन की इस्थापना की थी उनकी हरे रंग की मूर्ति को हाथ में थामे हरे कृष्ण जपते हुए आगे के द्वार की ओर बढ़ रहे हैं। पीछे है विदेशी महिलाएं और हिंदू धर्म को अपना चुकी हैं।

मैं किनारे के ही दरवाजे से मंदिर के भीतर आ गया। यहाँ कई विदेशी महिलाएं बकायदा साड़ी में देखी जा सकती हैं। जो अद्भुत है।

राधा कृष्ण की मूर्ति के सामने दंडवृत प्रणाम करते दिख रहे हैं भक्तगण। भक्तों के अपने भजन कीर्तन चालू हैं। तस्वीर लेना यहाँ भी मना है। यहाँ से निकलते हुए मुख्य मंदिर की ओर चल पड़ा।

जहाँ प्रभुपादा का मंदिर है। इस्कॉन के संस्थापक के लिए अलग मंदिर कुछ बात समझ नही आ रही। यहाँ भक्त मूर्ति के चारो ओर नाचते हुए नजर आ रहे हैं।

महिलाएं किनारे बैठ कर ध्यान पाठ कर रही हैं। गोल चक्कर लगाने के बाद मूर्ति को मंदिर में रखकर खूब जोर शोर से नाचा जा रहा है।

प्रतिस्पर्धा हो रही है की कौन सबसे ऊपर तक उछलेगा। कुछ देर में ये नाच गाने के साथ ये भजन कीर्तन समाप्त हो चला है। अब प्रशाद वितरण की बारी है। दो कतार में भक्त लग कर मीठे पानी का प्रसाद ले रहे हैं। मैं इनमे से किसी भी कतार में नहीं हूँ।

इस्कॉन मंदिर वृंदावन

भोजन की तलाश

कुछ लोग दोना लिए खड़े है प्रसाद भरकर पीने के लिए। मंदिर से बाहर निकलते हुए दूसरे हिस्से में निकल आया। यहाँ समोसा वितरण हो रहा है शायद निशुल्क ना हो। पास जाने पर ज्ञात हुआ की निशुल्क नहीं है। अब तक इतना पता चल गया है की इस्कॉन में कुछ भी निशुल्क नहीं होता।

समोसा तैलीय पदार्थ है। जिससे हाजमा भी बिगड़ेगा और स्वस्थ भी। मंदिर बाहर से बहुत ही सुंदर और भव्य बना है। जो देखा जा सकता है। बिलकुल ही अलग शैली और वास्तुकला में। गोल घुमावदार आकर्षक सीढियां।

सुई नौ के करीब पहुँच रही है। मुझे भी भोजन कक्ष के करीब पहुँच जाना चाहिए। चल पड़ा। रास्ते में दिखा तो बड़ा कक्ष जहाँ पर किसी बड़े महाराज जी का प्रवचन चल रहा है।

भोजन कक्ष के समीप पहुँच कर देखा तो पाया की यहाँ खाने की लगभग सभी व्यवस्था हो चुकी है। जमीन पर दरी बिछ चुकी है। बर्तन भी तैयार हैं।

पर यहाँ भोजन भी निशुल्क नहीं है। एक आदमी धोती पहने मशीन लिए हर भूखे व्यक्ति की पर्ची काट रहा है। किसी ने बताया यहाँ भुगतान किया हुआ भोजन भी स्वादिष्ट नहीं होता है।

उधर एक दूसरी कतार भी है जिसमे अधिकांश धोती पहने इस्कॉन के ही लोग खड़े हैं। जिनके लिए भोजन निशुल्क है। पर उनकी भी छटाई हो रही है।

अनावश्यक लोगो को कतार से बाहर। ये सब देखने के बाद जूते वाले कक्ष से जूते ले कर बाहर आया। बैठकर पहना और चल पड़ा दूसरी जगह।

मतलब अभी तक का यहाँ बिताया समय व्यर्थ ही चला गया। अब कहीं बाहर किसी रेस्त्रां या फिर ढाबे में ही खाना बेहतर रहेगा इस्कॉन में खाने से।

भोजन के लिए ढाबे की ओर जाते हुए मुख्य सड़क पर बाएं हाथ पर नजर पड़ी। दुकान के बाहर कुछ साधु भोजन करते दिख रहे हैं। मालूम पड़ा यहाँ भंडारा वितरण हो रहा है। बिना किसी देरी के निकल आया यहीं भंडारा खाने।

भंडारा खाने का अलग ही मजा है। दुकान से दोने में प्रसाद ले कर बाहर पड़ी मेज कुर्सी की ओर आ गया। पर यहाँ वानरों की सेना खाने नहीं देगी। दुकान के मालिक ने इशारा में भीतर ही बुला लिया।

जमीन पर बिछी आसनी में ही खाना खाने लगा। पूड़ी सब्जी और केले। दक्षिण भारत में केले के पत्तों पर खाया करता था। पेट भर भोजन समाप्ति के बाद बाहर पड़ी बेंच पर कुछ देर के लिए आ बैठा।

केले बंदरों को पकड़ा दिए। भोजन की तलाश में कचूमर निकल गया। घड़ी में दस बज रहे हैं और मैं कुछ देर आराम करने के लिए घर को निकल पड़ा हूँ।

अक्टूबर का महीना चल रहा है पर ठंड का कोई अता पता ही नहीं। चुभने वाली धूप लग रही है। पिछले साल तक इसी समय अच्छी खासी ठंड पड़नी शुरू हो गई थी।

घर आ कर मोबाइल लगा दिया चार्जिंग पर और थकान के कारण सोफे पर सो गया।

नीम करोली मंदिर

बारह बजे मैरी ने उठाया और नीम करोली मंदिर चलने के संकेत दिए। दोबारा ऊर्जा भरते हुए भरी धूप में निकलने की हिम्मत कम ही पड़ रही है।

पर फिर भी घूमना है तो आलस और कष्ट त्यागने होंगे। सोफे से उठकर मोबाइल समेटते हुए चल पड़ा नीम करोली मंदिर। उसी स्थान पर जहाँ कल भटकते हुए पहुँच गया था कल कालीदेह आते हुए।

पैदल गलियों से होते हुए अट्टला आ गया। यहाँ से महज तीन सौ मीटर नीम करोली मंदिर। मंदिर के निकट आया तो फाटक बंद नजर आ रहे हैं। बंद होने का समय तो नहीं है पर ना जाने फाटक क्यों बंद हैं!

भीतर झांकने पर जनता दिख रही है मतलब प्रवेश करने का कहीं ना कहीं से रास्ता है। कुछ ही आगे से बड़ा फाटक खुला दिख रहा है। इसी से मैं भीतर आ गया। उद्यान में चप्पल एक किनारे उतारकर मंदिर की ओर चल पड़ा।

नीम करोली बाबा समाधि स्थली

नीम करोली बाबा और उनके चमत्कार जग जाहिर हैं। मैने पहली बार उनके बारे में जयपुर में एक सामुदायिक मित्र से सुना था। परिसर में यहाँ बाहर दुर्गा जी का मंदिर और दाहिने तरफ राधा कृष्ण का।

राधा कृष्ण मंदिर में मंजीरा बज रहा है। राधा कृष्ण के दर्शन कर दूसरी ओर निकल गया। यहाँ उद्यान है और बीच में नीम करोली बाबा का मंदिर।

मंदिर में हंसते हुए मूर्ति है जो नीम करोली बाबा की ही प्रतीत हो रही है। प्यास बहुत जोरों की लगी है। रास्ते से गुजरते हुए सज्जन से पानी का स्थान पूछा तो पिछले हिस्से में जाने का इशारा मिला।

पहुँच कर प्यास बुझाने के बाद यहाँ भोजन कक्ष दिख रहा है। जहाँ कुछ ही देर में खाना परोसा जाएगा। कक्ष से बाहर निकल बाबा के मंदिर के दाहिने हाथ पर बने ध्यान केंद्र में आ गया। दरवाजा खोल कर भीतर बिछी दरी पर बैठ कुछ देर आंखे मीच कर ध्यान अवस्था में चला गया।

ध्यान करने की कोशिश कर रहा हूँ पर पास में बैठे एक वृद्ध बार बार अजीब तरह की आवाज प्रकट कर रहे हैं। जिससे सन्नाटे भरे कक्ष में ध्यान उनकी ओर ही जा रहा है।

उठ कर बाहर आ गया। यहाँ तख्त पर नीम करोली बाबा की बड़ी तस्वीर रखी है। उसके बगल में भी एक कक्ष है। हाथ बांधकर बगल के कमरे में आ गया।

यहाँ करोली बाबा के चमत्कारों की सूची और उनके जीवनकाल के बारे में लिखा हुआ है बोर्ड पर। जिसे पढ़कर अधिक जानकारी प्राप्त हो रही है।

कैसे बाल्यावस्था में मोह त्याग कर सन्यासी बन चले थे। मगर उनके बापू ने उन्हें अपने कर्तव्यों को याद दिला कर उनकी बचपन की शादी को याद दिलाया। ऐसे कई किस्से!

साढ़े बारह बजते ही भोजन करने आ गया अन्य लोगों के साथ। यहाँ साधु संत, अठलाते बच्चे भी जो खूब मनोरंजन कर रहे है सभी का।

खाना पीना कर निकल तो सकता हूँ पर बहुत गर्मी पड़ रही है। यहीं उद्यान में ही बैठ कर कुछ समय बिताऊंगा। उद्यान में बेंच पर रखा मुर्दा बाघ एक पल के लिए असली लगा। मैं अंदर तक सहम गया।

कांच मंदिर

मंदिर में करीब दो घंटे सुस्ताने के बाद निकल पड़ा पास के ही कांच मंदिर। कांच मंदिर के बाद मैं मथुरा निकल जाऊंगा योजनानुसार। कांच मंदिर पहुँच कर निराशा हाथ लगी।

यहाँ पर मालूम पड़ा की फिलहाल आधा घंटा है अभी मंदिर खुलने। यहाँ इंतजार करने से बेहतर है बाहर निकला जाए। बाहर कुछ दूर चल आइस क्रीम खाने की इच्छा हुई। खोज अभियान चालू हुआ।

जिसमे गली से ढूंढते हुए भी कहीं ना आइस क्रीम मिली। आखिरकार मुख्य सड़क पर एक दुकान जैसे ठेले पर आइस क्रीम खरीदी गई।

गप्प कर आ गया मंदिर में पर चार अभी भी नहीं बजे हैं। कुछ एक मिनट और मैं मंदिर के भीतर। बगल में एक मानव निर्मित गुफा भी है जिसमे प्रवेश करने का शुल्क है। जिसमे जाने के लिए कोई रुचि ही नहीं है मेरी।

हालांकि मंदिर के भीतर तस्वीरबाज करना मना है पर सब चित्र ले रहे हैं। मंडली में बैठे महोदय से पूछने पर मालूम पड़ा की ये मंदिर पांच हजार साल से भी अधिक पुराना है।

कांच के इस मंदिर में दीवारों पर कृष्ण के बाल्याकांड से ले कर अंत तक उनके सभी रूप के चित्रण हैं। माखन चुराते हुए, बांसुरी बजाते हुए, रणभूमि में अर्जुन को गीतासार देते हुए।

हर खंबा, दीवार यहाँ तक कि छत पर भी कांच जड़ा हुआ है। दो मंजिला इस मंदिर में सिर्फ नीचे ही मंदिर है और ऊपर रहने का स्थान।

बाहर निकल कर सोच रहा हूँ अब मथुरा निकल जाऊं। लिफ्ट मांगते हुए। मैरी को भी लिफ्ट मांगना सीखा रहा हूँ पर कई कोशिशों के बाद भी उसे कामयाबी नहीं मिल रही।

काफी मशक्कत के बाद लिफ्ट मांगने पर एक सज्जन ने सुझाया बस का इंतजार करने का जो पीछे पीछे आ रही है। चार बजे तक बस भी आ गई।

बैठ कर निकल पड़ा मथुरा। बस में आगे की सीट पर विराजमान हो मथुरा का रास्ता देख रहा हूँ। बीच रास्ते में एक महोदय अपने परिवार के कुछ बीस सदस्यों के साथ बस में सवार हो चले। बस अब खचाखच भर चुकी है। शायद ही कोई सीट खाली बची हो।

कांच मंदिर

श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर

मथुरा में दाखिल हो चुका हूँ। रेलवे क्रॉसिंग पार करके मथुरा के ऑटो अड्डे पर उतर गया। गूगल नक्शे के मुताबिक बस यहाँ से कुछ एक किमी की दूरी पर द्वारकाधीश मंदिर है।

पुलिस के पहरे के बीच पैदल आ पहुँचा मंदिर के द्वार तक। भीतर प्रवेश करने से पहले मालूम पड़ा की यहाँ मोबाइल, बटुआ जैसी वस्तुएं अंदर नहीं ले जा सकते।

पास में बनी दुकान में जमाकर्ता के पास सारा सामान जमा कराना होगा। दुकान में ही आ कर बस्ते में समान भरने लगा। बस्ते को जमा करा कर तीन मोबाइल के हिसाब टोकन प्राप्त कर लिया।

पानी पीने के बाद मंदिर के द्वार पर आ खड़ा हुआ। जांच से गुजरते हुए आ गया मंदिर के भीतर। परिसर में उस सांप की गुफा बनी है जिसने कृष्ण भगवान के मित्रो को निगल लिया था।

दरअसल वो एक देवता थे जिन्होंने किसी ऋषि का उपहास किया था। क्रोधित हो कर ऋषि ने दैत्य सांप बनने का श्राप दे दिया था।

देवता के क्षमा मांगने पर श्रीकृष्ण के द्वारा मुक्ति से छुटकारा का समाधान बताया था। इस गुफा में जाने के लिए मूल्य चुकाना पड़ेगा।

कुछ आगे मंदिर के ठीक सामने मैदान में किसी बड़े परिसर का निर्माण हो रहा है। जो आगे आने वाले समय में ही पता लगेगा। मंदिर के परिसर में प्रवेश करते हुए प्रवेश द्वार खोजने लगा।

यहाँ मालूम ही नहीं पड़ रहा की आखिरकार भीतर कहाँ से जाना है। बाएं मुड़ते हुए सुरक्षाकर्मी से पूछने पर मालूम पड़ा की यहीं फूलवाले के पास में बने मंदिर से शुरुआत है।

चप्पल उतारकर यहीं से दर्शन कर आगे बढ़ने लगा। पहले मंदिर में कृष्ण भगवान की मूर्ति और दीवार पर चैतन्य महाप्रभु की तस्वीर। यहाँ खड़े इस्कॉन के अनुनाई चैतन्य महाप्रभु की तस्वीर के सामने दंडवृत प्रणाम कर रहे हैं।

आगे बढ़ते हुए जेलखाने की ओर बढ़ रहा हूँ। कहते हैं जेलखाने का अब कुछ ही हिस्सा बाकी है। बचे हिस्से पर मस्जिद बन गई है जो अब विवादित स्थान है।

मंदिर के जन्मस्थल पर अंदर आ कर मालूम पड़ा की यहीं से जेल की ओर जाने का मार्ग है। इस काल काठरी जैसे कक्ष पर ताला पड़ा हुआ है। सामने है बाल कृष्ण की मूर्ति।

मत्था टिका कर आगे बढ़ कर खुले परिसर में आ गया। यहाँ से विवादित मस्जिद को देखा जा सकता है। प्रमाण के तौर पर मस्जिद में लगे जेल के फाटक।

अनेकों भक्त इस जगह पर खड़े हो कर मस्जिद को निहार रहे हैं। मुख्य मंदिर में आगे के द्वार से ना जाते हुए पिछले दरवाजे की ओर चल पड़ा। यहाँ हर कोने पर सुरक्षाकर्मी नजर आ रहा है। मंदिर की दीवार पर जीवन के अनमोल संदेश लिखे हुए हैं।

जिन्हे रोमार्रा की शैली में ढाला जाना चाहिए। पीछे से मंदिर का भ्रमण करते हुए मंदिर में प्रवेश कर रहा हूँ। यहाँ ठीक सामने राधा कृष्ण की भव्य मूर्ति है।

पूरे मंदिर भवन में विष्णु जी के अवतारों के बारे में विस्तार से बताया गया है। देवी देवताओं की मूर्ति है साथ ने चैतन्य महाप्रभु और मीरा भी।

पोथरा कुंड

भक्तों की भारी भीड़ है जो राधा कृष्ण की एक झलक के लिए यहाँ पलकें बिछाए बैठे हुए हैं। जो पर्दाकुछ देर पहले गिरा दिया गया था पांच बजते ही पर्दा हटाया गया। जिसके बाद जोर से जयघोष हो रहा है।

सभी देवी देवताओं और भगवान विष्णु के सारे अवतारों को देख कर बाहर निकल आया। मंदिर के आंगन में जगह जगह पुलिस की चौकियां बनी हैं। कुछ समय बिताते हुए परिसर में अपनी रखी हुई चप्पल के पास आ गया।

यहाँ से निकलते हुए सीधे बाहर का रास्ता पकड़ लिया। दुकान में आ कर जमा की गई वस्तुएं उठाई और चल पड़ा गली के दूसरे और। इस लालच में की मंदिर की एक स्पष्ट तस्वीर मिल जाएगी।

गली में एक द्वार का निर्माण हो रहा है। आ पहुँचा गली के बाहर जहाँ मैं देख पर रहा हूँ एक कुंड। जिसके बारे में कहा गया है की यहाँ पर श्रीकृष्ण के शैश्वावस्था के कपड़े धोए गए थे।

किसी समय ये कुंड कच्चा हुआ करता था जिसे बाद में माधव सिंधिया ने इसे पक्का करवा दिया था। देखने में ये कुंड बहुत बड़ा प्रतीत हो रहा है।

सांयकाल का समय है। सूरज ढल रहा है। कुछ तस्वीर लेने के बाद कुंड से दाहिनी ओर गली में मुड़ते हुए जन्मभूमि मंदिर के पिछले हिस्से की ओर चल पड़ा। रास्ते में पाया एक लेटे हुए जंगली हांथी की मूर्ति। कहा जाता है इसी स्थान पर श्रीकृष्ण ने पागल हांथी को मार गिराया था।

पिछले किसी भी हिस्से से तस्वीर अच्छी नहीं आ रही। यहाँ के द्वार पर जमकर सुरक्षाकर्मी हैं। किसी भी कोण से मंदिर की झलक नहीं मिल रही है।

टहलते हुए प्राचीन मंदिर श्री केशव देव जी महाराज पर आ गया। दो मंजिला इस मंदिर में राधा कृष्ण विराजमान हैं। मंदिर के आंगन में महिलाओं की मंडली बैठी हुई है जो कीर्तन में मग्न है।

सीढी के माध्यम से ऊपर जाने की इच्छा हो रही है मगर बाहरी व्यक्तियों का जाना शायद वर्जित है। बाहर फूल वाले ने भी यही राग अलापा।

यहाँ भी पुलिस का अच्छा पहरा है। केशव जी मंदिर से निकलते हुए चल पड़ा द्वारकाधीश मंदिर। जो यहाँ से तीन किमी दूर है। पैदल चलते हुए निकल पड़ा तंग गलियों में।

मंदिर के द्वार पर नकली और असली दोनो पहरेदार खड़े हुए हैं। मंदिर की गली में भारी बाजार है। होली या दिवाली के दिन यहाँ गजब की भीड़ होती होगी।

द्वारकाधीश मंदिर

द्वारकाधीश मंदिर

मुख्य सड़क को पार करते हुए पतली सी गली में दाखिल हो चला। यहाँ चौराहे से द्वारकाधीश मंदिर तक जाने के लिए ई रिक्शा भी चल रहे हैं।

मंदिर को जाने वाली गली इतनी पतली और सकरी है जिसका कोई जवाब नहीं। इन्हीं गलियों में सोना चांदी बनाने वाले धन्ना सेठ हैं।

ऐसी बहुत सी दुकानें हैं यहाँ। जहाँ चांदी बनाई जा रही है। उस हिसाब से ये गली तो बहुत ही अमीर है भले ही सूरत से अच्छी ना दिख रही हो। जाम हर पल में लग जाता है। पर खुलना उतना ही कठिन। पैदल चलना भी दूभर हो चला है।

जाम से पार पाते हुए अंधेरा होने से पहले सवा छह बजे तक आ गया राजाधिराज श्री द्वारकाधीश मंदिर। लोगों ने खुद से ही हामी भरते हुए सुनिश्चित किया मंदिर के बारे में।

बाहर पड़ी चप्पलें इस बात की गवाह हैं। लंबी सीढ़ी चढ़कर ऊपर आ गया। यहाँ राजस्थानी महिलाएं काली और लाल साड़ी में कपाट के खुलने के इंतजार में आंगन में बैठी हैं।

साढ़े छह बजने से कुछ मिनट पहले ही एक तरफ से महिलाओं को आने दिया जा रहा है दूसरी ओर से पुरुष। महिलाओं की संख्या ज्यादा लग रही है।

कपाट के खुलते ही मंदिर में जमकर जयकारा होने लगा। प्रसाद वितरण के बाद मंदिर से भीड़ छट रही है। लंबी सीढ़ी से उतरना घातक भी सिद्ध हो सकता है।

मंदिर से निकल कर यमुना जी की ओर बढ़ चला। यहाँ पर भी अनेक छोटे बड़े मंदिर हैं। जिनमे अलग अलग पंडित बैठे इनका रख रखाव कर रहे हैं।

घाट पर नाव उतर पड़ी हैं। काली साड़ी में राजस्थानी महिलाएं यमुना के बीचों बीच जाने को अग्रसर हैं। यहाँ रोशनी की तो पर्याप्त व्यवस्था है पर सुरक्षा की नहीं।

वृंदावन पहुँचकर बांके बिहारी मंदिर भी गया। जहाँ बांके बिहारी की मूर्ति स्वताः ही निर्मित हुई थी।

वृंदावन से मथुरा तक कुल सफर 40किमी

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