श्रापित बूंदी की सच्ची घटना

बूंदी | भारत | राजस्थान

राह नहीं आसान

आज भोर में सूरज की छतरी जाने की योजना थी। जिसमे सौरव का आना भी शामिल था। ना मैं उठ सका भोर में और ना ही सौरव। रात की थकान के कारण ऐसा हुआ।

नींद खुली तो घड़ी में समय पाया सात। करीब एक घंटा देरी से उठना हो रहा है। फटाफट तैयार हो कर निकल पड़ा सूरज की छतरी।

सौरव अभी भी निद्रा अवस्था में हैं शायद। कहीं नजर नहीं आ रहे। कल रात्रि सौरव ने ही योजना बनाई थी पर आज सुबह खुद ही घोड़े बेंच कर सो रहे हैं।

घर से बाहर गली में पश्चिम दिशा की ओर चलते हुए निकल रहा हूँ। गली में खूब मंदिर भी दिखाई पड़ रहे हैं। छतरी के लिए रास्ता सुनिश्चित करने पर इसी मार्ग की पुष्टि मिली जनता द्वारा।

गली के अंतिम छोर पर आने के बाद अब समझ नही आ रहा है जाऊं तो आखिर किधर जाऊं। दातून कर रहे दद्दू से पूछा तो इन्होंने भीतर मोहल्ले में ले जाने लगे।

कसरत कर रहे युवक से साथ जाने को कहा। विचार बदलते हुए दूसरे युवक के साथ जाने का संकल्प दिया। आखिरी घर से किसी को आवाज लगाते हुए साथ में छतरी तक जाने की हिदायत दी।

घर के भीतर से जाते हुए सीढ़ी चढ़ कर छत पर आ गया। यहीं से पीछे के रास्ते से छतरी तक जाने का सफर शुरू हो चला। दद्दू ने लड़के को रास्ता समझाने को कहा।

हाथ में डंडी लिए लड़के ने बताया की छतरी जाने के दो रास्ते हैं। रास्ता तो वो अच्छे से समझा रहा है पर मैं इस जंगल में कहाँ तक जा सकूंगा इसका पता नहीं। दद्दू के आदेश पर लडका छतरी तक साथ जाने की तैयार हो चला।

साथ में चल रहे मार्गदर्शक ने बताया की यहाँ पर जंगली जानवर भी हैं। हिरण बारासिंघा दिखना तो आम बात है। पर कभी कभार भालू और चीता भी दिख जाते हैं। छतरी तक अकेले जाना संभव नहीं है।

चढ़ाई चढ़ते हुए हालात पतली हो रही है। पसीने से हालत बुरा है। ऐसी खड़ी चढ़ाई में लग रहा है धरती माता अपनी ओर खींच रही हैं।

धड़कने तेज और कपड़े पूरे भीगे हुए। पगडंडी बनी हुई है। शायद ये महाशय ना भी आते तो पगडंडी का पीछा करते करते छतरी पहुँच जाता।

सूरज की छतरी

सूरज की छतरी

घड़ी में आठ बज रहे हैं और मैं आ पहुँचा हूँ छतरी पर। जहाँ ठीक सामने गणेश मंदिर भी है। सूरज की पहली किरण इसी मंदिर पर पड़ती हैं।

मार्ग दर्शक को काफी जानकारी है। बताने लगा की तत्कालीन बूंदी राजवंश की राजमाता श्याम कंवर राठौर ने अपने पति के शाशन काल में बनवाया था।

छतरी के निर्माण में तीन वर्ष का समय लगा था। जिसकी स्थापना सूबेदार रामचंद्र की देख रेख़ में 1673 में हुआ था। पश्चिम में बूंदी शहर की सबसे ऊंची पर स्तिथ है।

शहर की सूर्योदय की पहली किरण इसी छतरी पर पड़ती है। मार्गदर्शक ने बताया की शनिवार इतवार के दिन यहाँ भारी मात्रा में भीड़ होती है।

सीढी चढ़ कर ऊपर आ गया। छतरी के गर्भ में सूर्य देवता की सात घोड़ों पर सवार मूर्ति स्थापित है। भगवान सूर्य, उनके सारथी भगवान अरुण उनके रश्मि रथ को सात घोड़ों के साथ आगे बढ़ते दिख रहे हैं।

चढ़ाई करते करते पसीने से लथपथ हो चला हूँ। इधर मार्ग दर्शक अपना राग अलाप रहा है। गर्मी से छुटकारा पाने के लिए बुशर्ट उतार कर बैठ गया। जिससे गर्मी से कुछ राहत मिल रही है।

छतरी की कला को देख कर मालूम पड़ रहा है की आखिर क्यूं तीन साल लगे इसे बनने में। मार्गदर्शक बता रहा है की यहाँ काफी सोना जमीन में गड़ा हुआ है। पर किसी को भी इसका असली ठिकाना नहीं पता।

गणेश मंदिर

श्राप का कारण

किसी काल में यहाँ का राजा देशाटन शिकार और अपने शौक पूरे करने राज्य से बाहर गए हुए थे।

अपने साथ भरपूर पैसा ले कर। शौक अधूरे रहने के बाद जब पैसे ना बचे तो दूतों को भेजकर राज्य के वित्तमंत्री से पैसा मंगवाया। चोर लुटेरों से धन की सुरक्षा को देखते हुए सिक्के बांस में भरकर बैलगाड़ी में भिजवा दिए।

दूतों ने शातिर चाल चलते हुए सारा धन निकाल लिया। जब राजा के समक्ष पहुँचे तो ये कहकर खुद को निर्दोष साबित किया की दीवान ने बैलगाड़ी में बांस भिजवाए हैं।

इस कृत्य से राजा बहुत क्रोधित हुआ। उसने राज्य में वापस आ कर दीवान को फांसी पर लटकवा दिया। उसी दिन दीवान की पत्नी भी आग में कूद कर सती हो गई।

सती होने से पहले श्राप दिया की किले पर राज करने वाले राजा की कभी संतान नहीं होगी। साथ ही ये भी श्राप दिया की बूंदी में बेईमान लोग तो सुखदाई जीवन व्यतीत करेंगे वह ईमानदार को जीवन व्यापान में कठिनाई का सामना करना पड़ेगा।

यह शिलापट्ट अभयनाथ महादेव मंदिर में रखी हुई मिलेगी। जिसमे इस घटना का विवरण है। इतनी जानकारी का स्त्रोत पूछने पर अपने पूर्वजों का हवाला देने लगा मार्गदर्शक। सूर्योदय यहाँ पर कब का हो चुका है। अब तेज धूप पड़ रही है छतरी पर।

वापसी

तस्वीरें निकलवाने के बाद बुशर्ट पहन कर चल पड़ा। यहाँ ठीक सामने गणेश मंदिर है। गणेशोत्सव में यहाँ भंडारा होता है। सारा सामान लादकर पैदल ही ऊपर लाया जाता है।

मंदिर की ओर नमन कर नीचे चल पड़ा। चढ़ाई चढ़ना इतना कठिन नहीं होता जितना उतरना। रास्ता याद होने की शर्त को देखते हुए मैं आगे आगे चलने लगा।

मार्गदर्शक इन सकरी पहाड़ी पर ऐसे चल रहा है जैसे उसके घर का आंगन। कठोर जूते पहन कर भी एक दो जगह लड़खड़ा गया। ये जूते ना होते तो धीमे धीमे नीचे उतरना पड़ता।

नीचे तक मार्ग बिलकुल सटीक रास्ते से आ गया पगडंडी पर चलते हुए। आखिर के बचे हुए रास्ते पर बाएं मुड़ चला। जहाँ कटेंदार पेड़ की टेहेनिया पड़ी हुई हैं।

मार्गदर्शक ने सुधारते हुए सही रास्ते पर लाया। हालांकि वो रास्ता भी घर की ओर ही जा रहा है पर थोड़ा विकट है। मार्गदर्शक किसी कारखाने में कार्यरत हैं।

आज मेरे भ्रमण करने के कारण थोड़ा देर से जायेंगे। अगर ये साथ ना चलते तो भटक तो जाता ही साथ ही इतनी अनमोल जानकारी से वंचित रह जाता।

घर में दाखिल हो कर चौराहा पार करते हुए कुछ आगे तक मार्गदर्शक साथ ही आया। लग रहा है पैसे मांगेगा इसलिए पर ऐसा कुछ भी नहीं होने में आया।

दो घंटे में छतरी पर घूम कर वापस घर आ पहुँचा। लौटते समय भी सौरव सोते ही पाए गए। आज तीन रातें बिताने के बाद आखिरकार बूंदी छोड़ कोटा निकल रहा हूँ।

कक्ष में समान व्यवस्थित करने और तैयार होने में कुछ समय लगा। करीब एक बजे निकल पड़ा सौरव से अलविदा लेते हुए। जोरों की भूख लग रही है।

इसलिए सबसे पहले पेट पूजा फिर काम दूजा। घर से निकलते हुए बस अड्डे के पास स्तिथ जैन भोजनालय की ओर रवाना हो चला। रास्ते में एक दफा फिर मेंहदी लेने की इच्छा हुई पर कैसी मेंहदी है ये जान में नहीं आ रहा।

भोजनालय पहुँचकर चोखा बाटी दाल का स्वाद लिया। बूंदी में आने के बाद सबसे पहले यहीं खाना गृहण किया था और आज निकलने से पहले अंतिम बार भी यहीं खाना गृहण कर रहा हूँ।

भोजन के बाद भुगतान कर निकल पड़ा रानी की बावड़ी। जो यहाँ से एक किमी की दूरी पर है।

रानी की बावड़ी

रानी की बावड़ी

रानी जी की बावडी संपूर्ण एशिया की सर्वश्रेष्‍ठ बावडियों में की श्रेणी में गिना जाता है। जिसका निर्माण राव राजा अनिरूद्व सिंह की रानी नाथावती ने करवाया था।

भारी बैग के साथ आ पहुँचा बावड़ी। प्यास से बुरा हाल है। टिकट खिड़की पर बड़ी और 84 खंभों की छतरी का टिकट कटवाया। जाने टिकट देने वाले ने अनसुना कर दिया या जान बूझकर सिर्फ बावड़ी का ही टिकट काटा है।

अब 84 खंभों की छतरी देखने जाऊं तो वहाँ अलग से टिकट लेना होगा। ये एक नया काम पकड़ा दिया है लापरवाह कर्मचारी ने। प्यास से बुरा हाल है।

मैने गेस्ट हाउस से निकलने से पहले बोतल भी नहीं भरी। यहाँ रखे फिल्टर से पानी पीने लगा और बोतल में भर भी लिया। टिकट ले कर भीतर प्रवेश करने लगा।

बावड़ी नीचे है और मैं बाएं मुड़ कर छत पर जाने के लिए सीढ़ी चढ़ा ही हूँ की पीछे से कर्मचारी ने टोकते हुए नीचे जाने को बोला। जिसका दरवाजा बीचों बीच है। ऐसा प्रतीत हो रहा है की फाटक बंद पड़ा है।

अन्य बावड़ियों से भिन्न रानीजी की बावडी में प्रवेश के लिए तीन द्वार है। भीतर मेरे सिवाय और कोई भी नही है। कुछ तस्वीरें लेने के बाद मन में विचार उठा की सीढ़ियों पर से उतरते हुए अंतिम छोर पर जाऊं।

याद आया की बावडी के जल-तल तक पहुचने के लिए सौ से भी अधिक सीढियों को पर करना होगा। कुछ कदम आगे बढ़ा और खंबे तक जाने का प्रयास किया।

कदम वापस लेते हुए पीछे हट गया। हाल ही में रानी जी की बावडी को एशिया की सर्वश्रेष्‍ठ बावडियो में शामिल किया गया है। वर्तमान में रानी जी की बावडी संरक्षण का जिम्‍मा भारतीय पुरातत्‍व सर्वेक्षण विभाग के पास है।

बाहर निकल कर यहाँ छतरी के पास आ गया। जो कुछ खास नजर नहीं आ रही। ऊपर से शहर का शोर सुनाई पड़ रहा है वो अलग।

रानी जी की बावड़ी से बाहर निकल आया। बैग से बोतल निकाली और फिल्टर से उसे भी भर लिया ताकि कोटा जाते समय मार्ग में कोई समस्या ना हो।

बाहर निकल ही रहा था की कारगिल के शूरवीर से एक दफा फिर से मुलाकात करने का अवसर प्राप्त हो रहा है। जिनसे परसों तारागढ़ किले में ही मिला था।

मुलाकात के बाद निकल पड़ा कोटा। 84 खंभों की छतरी जाने की योजना धरी की धरी रह गई। बस अड्डे से बस पकड़ी और निकल पड़ा कोटा।

रानी की बावड़ी पर छत्री
बूंदी से कोटा 57 किमी

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