शिवखोड़ी की रेहस्मई गुफाएं

शिवखोड़ी | जम्मू कश्मीर | भारत

जाने की तैयारी

कल रात जितनी देरी से सोया आज सुबह उतना विलंब उठने में भी हुआ। छोटे से कमरे में सारे इलेक्ट्रॉनिक आइटम भी रात भर में चार्ज हो गए।

बंद पड़े कूलर के ऊपर से दाईं तरफ के प्लग में अपना खुद का सॉकेट फिट किया था। जिसमे दो ट्रांसफार्मर(पावर बैंक), दो मोबाइल एक GoPro, एक चार सेट वाला सेल चार्जर खुसा है।

आज हर हाल में शिवखोड़ी की रेहस्मई गुफाएं देखने जाना है।

जितना सॉकेट के ऊपर लोड है उतना तो आम आदमी रोजमर्रा की ज़िन्दगी में चलते फिरते उठा लेता है। आंख खुली बिस्तर पर आसपास हाथ पटका लेकिन मोबाइल ना मिला कहीं।

मिलेगा भी कैसे मोबाइल तो दो गज की दूरी पर बंद कूलर के ऊपर रखा है।

अंगडाते- जम्हाई लेते हुए बिस्तर से नीचे उतरा। आंख मसलते हुए कूलर पर रखे मोबाइल में समय देखा तो नौ बज रहे हैं। सिर्फ दो घंटे में पहुंचना है बस अड्डे।

आज भारत की राजनीति के लिए बड़ा दिन है। हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव के नतीजे शाम तक घोषित होने हैं।

रात भर खुली खिड़कियों से ठंडी हवा का आगमन होता रहा और मैं खिड़की के बगल में ही लेटा कांपता रहा। कमबख्त कम्बल भी ठीक से हांथ में नहीं आया।

साथी को भी झकझोरते हुए उठाया। कल शाम को दीवार पर बांधी रस्सी बड़ी काम अाई।

हम भारतीयों की ये फितरत है घूमने जाएंगे तो कपड़ों वाली रस्सी जरूर साथ लेके जाएंगे। खासतौर पर बरसाती इलाकों में। कल वैष्णो देवी की यात्रा के बाद जम कर सोया।

सो कर उठने के बाद कपड़ा धुलाई हुई, लेकिन धुले कपड़े कमरे के बाहर फैलाना ठीक ना लगा। कमरे के बाहर रैलिंग पर जगह भी ना थी। पता नहीं कब कौन अपना कपड़ा समझ के ले जाए इस अनजान जगह।

रात में ही छोटे से कमरे में जुगाड से रस्सी बांध उसपर कपड़े ऐसे टांगे जैसे घर में नए पर्दे लगे हों। अभी हांथ लगा कर देखा तो कुछ कपड़े सूख गए हैं कुछ गीले रह गए हैं।

फिलहाल सारा ध्यान शिवखोड़ी के लिए निकलने पर है। एक डेढ़ घंटे में कमरे में बिखरा सारा सामान समेट कर निकलना है।

भाग दौड़

स्नान कर बैग पैक करने में जुट गया। गीले सूखे सब कपड़े बैग में भर लिए। देर से उठने के बावजूद साथी घुमक्कड़ का आलसी रवैय्या और विपदा में डाल सकता है।

जो काम फटाफट वाला है उसमे देर होती चली जा रही है। रस्सी समेटी, सारी इलेक्ट्रॉनिक की दुकान बैग में डाला। कमरा खाली करते करते साढ़े दस हो चला।

सारा सामान निकाल कर कमरे के बाहर रख लिया। साथी घुमक्कड़ का कुछ सामान अन्दर ही रह गया।

जब तक तो अन्दर से वो वापस आता मैं छज्जे में टेहेलनें लगा। टेहेलते हुए आगे वाले कमरे में नजर पड़ी तो देखा यहाँ एक महाशय हवा में लुंगी लहराते हुए जश्न मना रहे हैं।

अब ये किस बात का जश्न मना रहे हैं ये तो यही जाने। मुझे देख सारा जश्न मनन में तब्दील हो गया। इधर साथी घुमक्कड़ के कमरे से निकलते ही मैं नीचे उतरने लगा।

रिसेप्शन पर पेमेंट करने चला तो देखा मलिक नदारद हैं। बाहर नजर पड़ी तो मलिक अंगड़ाई लेता दिखा। बाहर खड़े मलिक का हिसाब चुकता किया। ग्यारह बजने में कुछ ही मिनट शेष हैं। भागम भाग वाला माहौल बन रहा है।

कल से आज बेहतर महसूस कर रहा हूँ। मुझे दवाई भी लेनी है। याद है मुझे वो दिन जब भारत भ्रमण पर एक दिन निकलने से पहले दवाइयों का जखीरा लिया था और आज वही साथ नहीं लाया।

दौड़ते हुए चौराहे के पास वाले मेडिकल स्टोर पहुंचा। भीड़ भड़क्के में कल वाली ही दवाएं दोबारा खरीद ली। दवा तो मिल गई पर दुकानदार के पास छुट्टे ही नहीं हैं।

भारत में एक बड़ी समस्या है। छुट्टे नहीं होंगे तो दुकानदार अमूमन टॉफी कंपट पकड़ा देंगे। यदि हम उन्हें टॉफी पकड़ाए तो ऐसे घूरेंगे जैसे कहीं से चोरी का माल लाकर थमा रहे हों।

चार टॉफी ही सही, दवा-कंपट लेे कर भागा अमानती घर की ओर। सोलह किलो का बैग लेके शिवखोड़ी तक जाऊंगा।

जब शाम तक लौटकर पहलगाम जाना ही है तो बेहतर है यहीं बैग जमा करा कर फ्री हो कर घूमा जाए। उसी अमानती घर में बिना किसी देरी के उसी प्रक्रिया के तहत बैग जमा कराया।

बैग जमा होने की पर्ची कटाई। आज जमाकर्ता बदल गया है। जमाकर्ता ने बैग सहित अन्दर बुलवा कर सही स्थान पर बैग रखवाया।

मैंने चैन-ताला निकाल जड़ दिया दोनों बड़े बैगों में। पूरी प्रक्रिया होने के बाद भागा बस अड्डे की ओर क्योंकि ग्यारह बज चुके हूँ। अन्तिम बस मिलने के भी लक्षण कम ही लग रहे हैं।

कुछ मीटर दूरी पर बसें खड़ी हैं। बस स्टैंड पहुंचा तो देखा यहाँ से एक आखिरी बस शिवखोड़ी के लिए निकल रही है। लेकिन उसमे जगह सिर्फ एक सवारी की है। खाली फोकट कटरा में रहने से बेहतर है थोड़ा कष्ट सेह कर शिवखोड़ी पहुंचना।

शिवखोड़ी तक की बस यात्रा

दौड़ते हुए चलती बस में चढ़ा। कंडक्टर ने दरवाज़ा बंद किया, धीरे से मुझे आगे बढ़ाया। बस में वाकई बैठने की कहीं भी जगह नहीं है। एक सीट सबसे पीछे खाली है।

उसमे साथी को भेज दिया। मेरे अलावा सब सवारियां विराजमान हैं। दाएं बाएं देखने पर भी ठसा ठस सीटें भरी दिखाई पड़ रही हैं।

कंडक्टर ने केबिन में झांका और मुझे केबिन में फिट कर दिया। बस केबिन में बैठ कर फ्रंट का नज़ारा ही अलग है। कभी कभी तो लगता अपुन ही ड्राइवर है।

मेरे ठीक बगल में एक फ़ैमिली विराजी है अपने शरारती बालक के साथ। खिड़की के बाहर मुंडी निकाली नहीं उसके पिता जी ने फटकार लगाई।

बच्चा अन्दर खिड़की बंद, अब तक जो हवा की आवा जाहि थीं वो भी बंद। खिड़की से एकदम सट कर बैठ गया तो ड्राइवर साहब को बाईं तरफ वाले शीशे से दिखने वाला नज़ारा ही दिखना बंद हो गया।

वैष्णो देवी से शिवखोड़ी के लिए यात्रा प्रारभ

थोड़ा सरकते सरकते बंद खिड़की खोली, ताज़ी हवा के झोंके से पूरे केबिन का माहौल बदल गया।

बगल में तशरीफ रखे फ़ैमिली भी चिड़ियों की तरह चेहचहा उठी। दवाइयां हांथ में है पर पानी नहीं है, मैंने मूह में रखी और तीन टिकिया निगल गया।

छोटा बच्चा ये देख हल्का बक्का रह गया। इससे पहले ये बेहोश हो, उसकी तसल्ली के लिए बैग से बोतल निकाल पानी पी गया।

इधर बस चालक ने मनोरंजन के लिए जमाने पुराने भूले बिसरे गाने बजाने शुरू कर दिए। बिछड़न ,जुदाई के गाने बजा ड्राइवर खुद की रोती बिलखती हुई आत्मा को सबके सामने लाने की कोशिश करते दिख रहे हैं।

उधर केबिन के उस पार गाने सुन कुछ को अपनी प्रेम कहानी याद आ गई।

एक भाईसाहब तो गहरी सोच में इतना डूब गए की उन्हें वर्तमान में लाने के लिए गाने बंद करने पड़े। पता नहीं किस दुकान से ऐसे गाने भरवाते हैं जो आम जनता तक कभी नहीं पहुंचते।

ना कभी सुने होते हैं ना कभी सब सकेंगे। घुमावदार और कटिली पहाड़ियों से बस दौड़ते दौड़ते कुछ किमी बाद एक बहुचर्चित नौ देवी मंदिर पर आ रूकी।

यहाँ पहले स्टॉप पर सभी यात्रियों से अनुरोध किया गया इस मंदिर में दर्शन करने को।

जाहिर है कोई भी बस में नहीं रुकेगा। उतरने की बारी आई तो जब पूरी बस खाली हो गई तब केबिन का दरवाज़ा चरमराते हुए खुला।

जबतक नीचे उतरा बाकी सवारियां मंदिर के कपाट से अन्दर जा चुकीं है। बखौल कंडक्टर “यहाँ वैष्णो देवी और शिवखोड़ी जाने वाले सभी यात्री जरूर आते है।

मंदिर कुछ नीचे की ओर है जहाँ जाने के लिए टीन की छाया से होते हुए गुजरना होगा।

मैं टीन शेड से नीचे जाने लगा, बीचों बीच बनी पतली सी नाली में साफ पानी की धारा बह रही है जो कोई नदी लगती है।

नीचे पहुंचा तो वास्तव में नदी बह रही है। मंदिर में भीड़ के नाम पर बस यात्री के आलावा और कोई नहीं। एक एक कर सब गुफा में भेजे जाने लगे।

जब मेरी बारी आई तो देखा छोटी सी मानव निर्मित गुफा है। इसी गुफा में नौ देवियों की मूर्ति भी स्थापित है। बड़ी आसानी से मैं भी गुजराता चला गया।

नौ देवी मंदिर

स्थापित मूर्तियों के पास थोड़ी सी जगह में पंडित जी भी विराजे हैं। बैठे बैठे ही प्रसाद वितरण और टिका लगा रहे हैं। गुफा से गुजरते हुए पीछे के रास्ते से वापस प्रांगण में आ पहुंचा।

मेरे पीछे पीछे केबिन वाली फैमिली के सिवा और कोई नहीं।

अभी तकरीबन दो घंटा लगेगा शिवखोड़ी पहुंचने में। बड़ी बड़ी सीढ़ियों से चल कर ऊपर की ओर चल पड़ा। सीढ़ियां लांघते हुए बस तक पहुंच गया।

बस चलने की बजाए जहाँ की तहाँ खड़ी है, अभी चालू तक नहीं हुई। इधर बस के बाहर सजी दुकान में सवारियां चाय पकौड़ी में जुटी है।

मैं बस में चढ़ तो गया लेकिन केबिन में जाने के बाजाए पीछे सीट पर आ धमका। केबिन में तो गर्मी से बुरा हाल हो गया था।

पीछे खिड़की के बगल में बैठ मैंने साथी घुमक्कड़ को चाय पीने का इशारा किया। खिड़की से सप्लाई चालू हुई। कुल्हड़ के गिलास में जब चाय होंठो को छूती है तब तब बहुत कड़क लगती है।

वैसा ही हुआ। अभी आधी कप चाय खतम भी ना हुई थी कि कंडक्टर ने आवाज़ लगाते हुए सबको बस में बैठने को बोला। मैं उठकर केबिन की ओर अपनी सीट पर बैठने चल दिया।

सभी सवारियां बस में बैठ गईं है। कंडक्टर बाबू सभी सवारियों की गिनती करने लग गए। कभी कभार ऐसे छूट जाती हैं सवारियां।

गिनती में दो सवारियां कम निकली हैं। इधर बस स्टार्ट हो चुकी है और चालक हॉर्न पे हॉर्न पेले पड़े हैं। चाय की दुकान पर कंडक्टर ने चार पांच चक्कर लगाए पर वो दो प्राणी ना मिले। पूरी बस में अफरा तफरी मच गई।

सीट के नीचे, डिक्की में बस के बाहर, यहाँ तक कि कंडक्टर बाबू मंदिर भी हो आए उन्हें ढूंढ़ते हुए, भगवान मिल गए पर वो ना मिले।

सब अपनी अपनी गणित लगा रहे हैं। कोई बोल रहा है नदी के रास्ते भाग गए तो किसी के मुताबिक वो मंदिर में ही सो गए। आधे घंटे की तलाश अभियान के बाद भी वो ना मिले, आखिरकार बस चल दी।

कंडक्टर बाबू केबिन में घुसे और तपाक से मुझसे पीछे खाली हुई सीटों पर जाने को बोलने लगे। जहाँ पहले घुटन हो रही थी अब इसी फैमिली और भूले बिसरे गीत में केबिन में मज़ा आने लगा था।

जैसे कंडक्टर ने मुझसे जायदाद मांग ली हो। भारी मन के साथ पीछे वाली सीट की पर जा बैठा। धर्मशाला में हुई गलती का खामियाजा बुखार के रूप में भुगतना पड़ रहा है।

कौन थे वो दो प्राणी, कहाँ से आए थे किसी को नहीं पता। जो भी हो ड्राइवर साहब तो अपने में मस्त हैं। बेधड़क लगा दिए गमगीन गाने और मस्टियाते हुए चले जा रहे हैं।

कटरा से शिवखोड़ी तक प्राइवेट टैक्सी भी जाती दिखी। कुछ अपने दुपहिया वाहन से भी जाते दिख रहे हैं। बाइक पर घूमने का अलग ही मज़ा है बशर्ते बारिश ना हो। जो नज़ारा इन घाटियों का है उन्हें शब्दों में कैसे बयां करु।

पहाड़ियों के ऊपर जमा बादलों के धुएं को मानो स्वयं देवेन्द्र उड़ा रहे हों। छुई मुई बादल एक बड़ी सी पहाड़ी पर जमा हो गए और पहाड़ी को मेरी नज़रों से बचा लिया।

शायद वो जान गए हैं कहीं इन सुंदर पहाड़ियों को मेरी नजर ना लग जाए। चेनाब नदी के ऊपर बना पुल कानपुर में गंगा पुल से भी ज्यादा लंबा निकला। खतम होने का नाम ही नहीं ले रहा। लेकिन चेनाब नदी की धार भी कम नहीं, लपेटे में कोई आ भर जाए बस।

ढाबे पर भागम भाग

ड्राइवर साहब गाने सुनते सुनाते डेढ़ बजे तक एक ढाबे पर ला खड़ी कर दिए बस। कुछ देर की मोहल्लत दी सबको भोजन की उसके बाद वापस शिवखोड़ी के लिए रवाना होंगे।

ऐसा पैग़ाम सबको सुनाया गया। हर बार की तरह बस से सबसे आखिर में ही उतरना हुआ। आखिर में उतरना मानो अब आदत बन चुकी है। यहाँ बस के आलावा दो प्राइवेट टूरिस्ट बसे और खड़ी हैं। बस वालों का भी ढाबे वालों से कमिशन बांधा होता है।

इसलिए ये वहीं रोकते हैं जहाँ फायदा ज्यादा है। इधर बस से उतरकर ढाबे के आसपास टहलने लगा। ढाबे के पीछे का नज़ारा तो मानो गहरी खाई जैसा नज़ारा है।

उधर ढाबे पर बहुतेरी सवारियां खाने में जुटी हैं। और जो ना जुट पाईं वो ऑर्डर देने के लिए काउंटर घेरे खड़ी हैं। मैंने भी लगे हाथ ऑर्डर थमा दिया और सेठ की तरह पास में पड़ी मेज़ कुर्सी पर विराजमान हो गया।

ढाबे का लज़ीज़ खाने का लुत्फ़ उठाते लेखक

खाना आया, हालांकि ऑर्डर के बाद खाना मेज़ तक आने में देर हुई जरूर हुई।

इधर मैं खाने बैठा उधर एक एक कर लोग खा कर उठने भी लगे। ये सब इसी बस की सवारियां हैं। दो बड़ी बड़ी नान को खाने में मेरे पसीने छूट गए।

मैंने खाने की रफ्तार बढ़ाई, जबतक आधा खाना खत्म किया तब तक आधा ढाबा खाली हो गया। सामने धोती कुर्ता के लिबास में बैठे दद्दू ने तो ऑर्डर ही कैंसल करवा दिया, गला गीला कर धोती उठा भागे बस की तरफ।

जो सोचा वही हुआ, बस का हॉर्न जोर ज़ोर से बजने लगा।

ये संकेत है के बेटा ढाबे पर तुम ही बचे हो बाकी सब अन्दर हैं। अब खाना है निरादर तो करूंगा नहीं। समय की बाध्यता को देखते हुए चावल कैंसल करवा दिए। फटाफट भोजन खतम किया।

उधर ड्राइवर हॉर्न पे हॉर्न दिए पड़े हैं। ऑनलाइन पेमेंट करने चला तो मोबाइल का नेटवर्क गायब। बटुआ निकाल चिल्लर थमा भागा बस की तरफ।

इंतजार कर रहे यात्री मुझे आता देख बस में बैठने लगे। बस घर्रृ घर्रृ करते बंद हो गई। अजब मनहूसियत है, लगा चालू ही नहीं होगी अब।

पांच छह दबा प्रयास के बाद दोबारा चालू हुई। अब बस चलने की देर है सो चल पड़ी। हर बार संयोग ही ऐसा बन जाता है। या तो मैं देर से निकलता हूँ या बस जल्दी निकलती है। कुछ तो गड़बड़ है।

कुछ मिलों का बचा कुचा सफर आधे घंटे में तय हो जाएगा। शिवखोड़ी पहुंचते पहुंचते ढाई बज गए।

आखिरकार शिवखोड़ी

अस्सी किमी का सफ़र तय करने में तीन घंटे लग गए। इतनी देरी की उम्मीद ना थी। शिवखोड़ी बस अड्डे पर बस से उतरते वक्त कंडक्टर महाशय सबको छह बजे तक आ जाने की याद दिला रहे हैं।

कोई सर हिलाता हुआ आगे बढ़ गया कोई इसी पर इंक्वायरी करने लगा। बहस करने का कोई फायदा नहीं है। दिमाग में बैठा लिया छह बजे से एक मिनट भी ऊपर हुआ तो भैया आज शिवखोड़ी में ही रुकना पड़ेगा।

बस अड्डे के बाहर टेंपो सजी खड़ी हैं।

इनकी सजावट देख कोई भी बता सकता है कि ये शिवखोड़ी गुफाओं को ही जाने के लिए बनी हैं। इससे पहले कि एक भी टेंपो ना बचे मैं लपकर सबसे आगे खड़ी टेंपो में पैर जमा कर बैठ गया।

पास में खड़ी दूसरी सवारी खड़ी की खड़ी रह गई। मन मसोसकर वो पीछे खड़ी खाली टेंपो में चला गया।

इधर सवारी से भरी टेंपो चल पड़ी। शुक्र है ऑटो वाले भैया ने गाने नहीं बजाए। रास्ते भर जश्न का माहौल दिखा, लोग हाथ में कमल के झंडे लेहरा रहे हैं।

इसी बीच खबर आई की देश में दोबारा भाजपा की सरकार बनने जा रही है। जगह जगह ढोल नगाड़े बजा कर लोग जश्न मना रहे है।

शिवखोड़ी के मार्ग पर पड़ा पुल

मुश्किल से दस मिनट भी ना लगा होगा शिवखोड़ी से पहले बने टेंपो स्टैंड तक पहुंचने में। टेम्पो रुका सबने दस का नोट पकड़ा निकल लिए।

हालांकि अभी एक किमी का रास्ता तय करना है। इस प्वाइंट के आगे टेम्पो का जाना मना है। यहाँ से दाएं बाएं दोनों तरफ दुकानें नजरा रही हैं।

दुकानों से सुसज्जित इस बाज़ार में किसी दुकानदार ने जबरदस्ती नहीं दिखाई उनकी दुकान में आने को। जैसा इसके विपरित कटरा में हुआ था।

वैष्णो देवी यात्रा में तो दुकानदार इतने खाली दिख रहे थे मानो बहुत समय हो उनके पास। तेज़ धूप में टेम्पो स्टैंड से शिवखोड़ी के गेट तक आने में पसीने से लथपथ हो गया।

पंजीकरण की कतार

गेट पर बंदूक ताने खाकी वर्दी में मुस्तैद जवान ने छोटी सी इमारत की तरफ इशारा करके बताया। उस इमारत से पहले रजिस्ट्रेशन करवा पड़ेगा तभी अन्दर जाने को मिलेगा।

दस कदम की दूरी पर रजिस्ट्रेशन वाला कमरेे की तरफ नजर पड़ी। राहत की बात है कि भीड़ नाम मात्र की है। इत्मीनान से गेट के पास से आकर रजिस्ट्रेशन की कतार में खड़ा हो गया।

गर्मी इतनी की सही ना जाए, फिर भी पीछे खड़ी माता जी गिरी पड़ रही हैं।

यहाँ बस की एक भी सवारियां नहीं दिख रहीं शायद मैं ही लेट हो गया। लाइन में एक लड़की बड़ी चंट निकली। वो नज़रे बचाते हुए रेलिंग फांदती और फिर खड़ी हो जाती, जब कोई ना देखता तो फिर रेलिंग फांद कर खड़ी हो जाती।

उसे ये करते और लोगों ने भी तड़ लिया, मना तो नहीं कर सकता, फिर मैं भी समय के अभाव को देखते हुए एक के बाद एक रेलिंग फांद कर आगे जाने लगा।

खड़ी भीड़ को ज्यादा फर्क नहीं पड़ा। जो लड़की मेरे पीछे खड़ी थी वो दो चार जनों के आगे लग कर पंजीकरण भी कराने लग गई।

शुक्र है यहाँ दो खिड़कियां हैं। आखिर मैं भी पंजीकरण करवाने खिड़की तक आ गया। दाहिने अंगूठे का निशान और कैमरे से खींचा गया फोटो और पांच सेकंड में आपका यात्रा पास तैयार।

शिवखोरी में स्वागतम्

एंट्री पास लेने के बाद गेट पर मुस्तैद पुलिसवालों से जांच कराने लगा। कड़ी सुरक्षा के बीच आखिरकार शिवखोड़ी गुफाओं में प्रवेश मिल ही गया।

शिवखोड़ी में स्वागत है।

इतनी जद्दोजहद इतने कम समय में शायद ही पहले कभी की हो। धूप पड़ने से हल्का फुल्का बुखार चढ़ने लगा। अन्दर घुसा ही हूँ कि सांप सांप के नाम से हड़कंप मच गया।

लोग ऐसे भागे जैसे वो सांप नहीं आस्तीन का सांप हो। बहती नदी के ऊपर बने पुल पर भीड़ जमा हो गई।

मैं पहुंचा तो जरूर लेकिन सच कहूँ तो सांप मुझे कहीं भी नज़र ना आया। वैष्णो देवी की तरह यहाँ भी घोड़े खच्चर की उपलब्धि में कोई कमी नहीं है, कमी है तो इन के ऊपर सवार होने वालों की।

क्यों भला जानवर के ऊपर लदकर इन्हें तकलीफ दी जाए। नदी के समांतर बने पक्के रास्ते पर चलने लगा। वापस आ रहे लोगों के खिले चेहरे देख ये अंदाज़ा लगाया जा सकता कि कितने आनंद के साथ वो गुफा में समय व्यतीत करके आए हैं।

मैं आगे आगे चल रहा हूँ कि अचानक साथ चल रहे साथी गायब हो गया, आगे पीछे हर जगह छान मारा। कुछ पल के लिए इंतजार भी किया, लोगों को फोटो दिखा कर पूछा पर ना मिला।

कॉल भी नहीं कर सकता कमबख्त एक ही सिम है जम्मू का वो भी मेरे पास।

खैर मैं अपनी मस्ती में आगे चलता रहा, फिक्र इसलिए भी नहीं हुई क्योंकि गुफा तक का रास्ता मात्र चार किमी तक का ही है।

कहीं ना कहीं तो मिल ही जाएगा। ना भीड़ है ज्यादा ना कुंभ का मेला जो इक्कीस साल बाद बुढ़ापे में मिले। गर्मी इतनी भीषण पड़ रही है जिसका कोई हिसाब नहीं।

लेकिन जितनी गर्मी दिन में उतनी सर्दी रात में पड़ती होगी। हरित पहाड़ियों में बने रास्ते से गुजरने में बड़ा मज़ा आ रहा है।

वैष्णो देवी की तरह टीन से ढका तो हर जगह नहीं है पर जहाँ जहाँ है वहाँ बेंच बिछी है। इन्हीं बेंचो पर थकी आत्माएं सुस्ताती हुई नजर आ रही हैं।

यहाँ तो बैंड बाजा बारात वाला सिस्टम भी है। बेंच के पीछे टपरी से पानी को सप्लाई भी हो रही है। इन वीरों को देख ऐसा लग रहा है मानो किसी युद्ध के लिए भेजे जा रहे सिपाही हों।

कुछ भक्त भोले की धुन में खो गए। आधा रास्ता तो तय हो गया। अब कुछ ही दूर का रास्ता तय करना बचा है।

हालांकि मैं अभी तक कहीं ना रुका। चलते चलते किनारे एक मस्जिद दिखीं जहाँ कुछ खुदा से बंदे नमाज़ अदा करते दिख रहे हैं।

ये आश्चर्य में डाल देने वाली चीज है। जहाँ एक तरफ शिव जी की गुफाएं वहीं मार्ग में मस्जिद। भगवान तक पहुंचने का बेजोड़ मिश्रण।

अगली टीन शेड तक पहुंचा तो देखा साथी घुमक्कड़ बैठा मेरा इंतजार कर रहा है। मैं तो समझ रहा था पीछे ही छूट गया होगा पर जनाब तो काफी आगे निकल आए। बताया पांच मिनट ही हुए हैं उसे यहाँ बैठे हुए।

शिवखोडी गुफाएं

घंटे भर की चढ़ाई के भीतर मैं पहुंचा गुफाओं के एंट्री गेट पर। समय कम है और लाइन लंबी। एक तरफ छह बजे का अलार्म बज रहा है दूसरी तरफ इतनी लंबी लाइन।

ना आव देखा ना ताव फौरन जा कर लाइन में ज्यों का त्यों खड़ा हो गया। सुगबुगाहट में पता चला मोबाइल, कैमरा वागैरह कुछ भी लेे जाने की मनाही है। अब तक मेरे पीछे अच्छी खासी जनता खड़ी हो चुकी है।

इस तरह कतार से निकल कर जाना बड़ा कष्टदाई है। फिर भी कतार से बाहर आया। अभी ना आता तो और लंबी लाइन लगने के बाद निकलता तो और कष्टदाई होता।

कतार के दाईं तरफ एक कमरे जैसा काउंटर बना है। अन्दर घुसा तो देखा हल्की फुल्की भीड़ है। काउंटर पर फ्री सर्विस के तहत सब अपना मोबाइल जमा कराने की होड़ में हैं।

शोर शराबे के बीच मैंने भी कैमरा और मोबाइल निकाल लॉकर नंबर 12 पर जमा करवा दिए।

शिवखोडी की गुफाओं तक पहुंचने का प्रारंभिक मार्ग।

मोबाइल तो सुरक्षित जमा हो गया। पर जब इन्हीं जमाकर्ता से जूतों की व्यवस्था पूछी तो मूह तेडा करके पीछे की ओर जाने का इशारा किया।

जूतों की लचर व्यवस्था देख मन कांप उठा। कहीं कोई देखरेख नहीं, बस वही अपने सामान की सुरक्षा स्वयं करें वाला हाल। इधर उधर नज़र मारने के बाद बाहर की तरफ रेलिंग के पास जूतों की रेक दिखी।

जिसको देख ये तय दिख रहा है कि वापस आऊंगा तो जादू देखने को मिले। जादू में जूते गायब। फिर भी मैंने रिक्स लेते हुए दाएं पैर का जूता बाईं रैक में और बाएं पैर का जूता दाहिने रैक में।

अब ये तो आकर ही मालूम पड़ेगा किस पैर का जूता मिलेगा और किसका नहीं।

कतार में लगने की होड़

भागते हुए लाइन में आ कर खड़ा हो गया। जो पहले मुझसे आगे खड़े थे वो अब बैरियर के भी आगे निकल गए हैं। बैरियर जिसे एक पुलिसवाला बंद किए खड़ा है।

उसके आगे गुफाओं में जाना आरंभ होता है। वहाँ तक ही पहुंचने में समय लग जाएगा। बस की ज्यादा सवारियां दिख नहीं रहीं।

जो दिख भी रही हैं वो वापस जाते हुए। इधर लाइन में खड़े भक्त भोलेनाथ का जयकारा लगाते नहीं थक रहे। कुछ बात है भोलेनाथ में की हर किसी को स्वीकार कर लेते हैं।

मेरे आगे खड़े चाचा जान एक बच्चे की जगह घेरे खड़े हैं, जैसे ही उछलता कूदता वो बच्चा आया, उसे किनारे से लाइन में फिट करने लगे।

मैं कुछ बोलता इससे पहले उन्होंने दांत दिखा दिए। हंस पड़ा मैं भी लेकिन मन ही मन गणित चल रही है। भारत में सीट पर रुमाल रखने से जैसे सीट पर कब्ज़ा करने वाली प्रथा चल रही है।

वैसे ही एक आदमी लाइन में लग के पांच को घुसेड़ने वाली परंपरा भी जमाने से चली आ रही है।

कतार थोड़ा हिली डुली और कुछ भक्तों को अन्दर कर लिया गया। बाकी बाहर ही खड़े है। जब भी दरवाज़ा खुलता तब भक्तों में उत्साह पैदा हो जाता।

अबकी बार आधे घंटे से भी ज्यादा का समय हो गया बैरियर खुलने में। मैं आगे खसकते खसकते बैरियर के अंदर आते ही फाटक बंद कर दिया। मैं इस पार साथी घुमक्कड़ फाटक के उस तरफ।

अरे मैंने पुलिस महाशय से बताया संगी साथी है इसे भी इस पाले में लेलो, तब जा कर कहीं साथी को भी इस तरफ धकेला।

कछुए की चाल के बराबर धीरे धीरे लाइन आगे बढ़ने के बाद एक बड़े से हॉल जैसे गुफा में आ कर रुक गई। काफी देर यही सिलसिला चलता रहा।

थोड़ी हिल डुल होती फिर रुक जाती। काफी देर तक कतार आगे नहीं बढ़ी तो मुआयना करने के बहाने कतार से अलग होकर पुलिस मामू से नज़रे बचाते हुए मैं आगे निकला और पंखे के सामने खड़ा हो गया।

जब लाइन नहीं बढ़ी तो अगले पंखे पर जा खड़ा हुआ। करते करते काफी आगे आ निकला।

तभी अचानक से लाइन चल पड़ी और आगे तक आने के बाद वहीं कतार में घुस अपने आप को फिट कर लिया। मेरी देखा देखीं में चाचा जान भी निकल आए थे कतार से बाहर।

मामू की नज़र पड़ते ही ऐसी जोर की फटकार लगाई कि उनकी धोती ही सरक गई। भगा दिए गए सबसे पीछे। धोती समेटते हुए लग गए इतने पीछे लगाए गए की पचास गज का फासला हो गया।

रहस्यमय गुफा में प्रवेश

अब मुख्य गुफा में एंट्री करने का समय आ गया है। जहाँ बारी बारी से सबको भेजा जा रहा है। गुफा में जाने लगा, मेरे आगे आगे आंटी जी नाज़ुक क़दमों के साथ आगे बढ रही हैं।

अन्दर जाने के लिए सुविधा के तौर पर रस्सियां भी लगाई गई है ताकि कोई मूह के बल गिरकर अपने दांत ना तुड़वा लेे। तीन मीटर की सकरी गुफा से मोटा आदमी तो नहीं निकल सकता।

निकलेगा भी तो फंस जाएगा, और फिर उसे निकालने की भरी मशक्कत सो अलग। गुफा से आगे निकला तो देखा बेहद सकरी गुफा और उसमे भी एक खिड़की के बराबर बैठने का स्थान।

एक दरी बिछी है और एक चालू हालत में पंखा लगा हुआ है। यहाँ अगर ये टेबल फैंन ना हो तो आदमी का दम घुट जाए। इतनी घुटन इस छोटी सी गुफा में।

चलते चलते और आगे आया जहाँ एक काफी बड़ी गुफा दिखी। जिसमे पंडित जी विराजे भक्तों को इस गुफा के बारे में बता रहे हैं। नज़रे उठा कर देखा तो विष्णु, पार्वती, कार्तिकेय और गणेश की आकृति बनी हुई है गुफा में।

ऊपर से टपकता पानी इसकी सुंदरता में चार चांद लगा रहा है। सुरमई सा वातावरण है जहाँ से जाने को दिल ही नहीं कर रहा।

पंडित जी को ये कहते सुना कि इस गुफा में दो दिशाएं है जिसमें से एक अमरनाथ में का के खुलती है और जो दूसरी दिशा में गए हैं वो वापस ना लौट सके आज तक।

बड़ी ही हैरतअंगेज करने वाली कहानियां है यहाँ की। जैसे भस्मासुर से बचने के लिए शिवजी ने त्रिशूल फेंक कर ये गुफा बनाई थी और अपने परिवार सहित आकर बस गए थे। इसी के साथ उनकी कथा समाप्त हुई और बैठे हुए भक्त उठ खड़े हुए।

मुझे लगा आज की शाम का ये आखिरी प्रवचन है। सो मैं भी बाहर की ओर चल दिया। लेकिन अन्दर बनी गुफा की छाप मन में छप गई।

सीढ़ियों से उतरते हुए काउंटर वाले कमरे की ओर जाने लगा। जब मैं कतार में खड़ा था तब एक बार खयाल आया भी था इसी रास्ते अन्दर जाने का।

पर सोचा ऐसे जाना भी क्या जाना। काउंटर पर आ अपना कैमरा और मोबाइल लिया और उस रैक की तरफ जाने लगा जहाँ जूते रखे थे।

देखता हूँ मिलते हैं या नहीं या फिर कोई अपना समझ कर ले गया। पहुंचा तो देखा जहाँ के तहाँ रखे हुए हैं। रैक से निकाल कर पटके और पहनने लगा।

मुझे तो इनके मिलने की उम्मीद कम ही थी जिस प्रकार की लचर व्यवस्था हैं यहाँ।

वापसी यात्रा

चल पड़ा वापस बस पकड़ने। अभी भी अंधेरा होने में समय है काफी। घोड़ों, खच्चरों और इंसानों के बीच चलते चलते उसी मस्जिद के पास से होकर गुज़रा। यहाँ कुछ लोग शाम की नमाज़ अदा करते दिखे।

मेरे मत में ऐसी जगह धर्म का टकराव नहीं होना चाहिए। जहाँ मंदिर वहाँ मस्जिद नहीं। कच्चे पक्के रास्तों से गुजरते हुए आधे घंटे में छह बजने से कुछ मिनट पहले आ गया उसी जगह जहाँ कुछ लोगो को नदी के पास सांप दिखा था।

वैसे छह बजे तक तो बस तक पहुंच जाना चाहिए लेकिन छह तो यहीं बज गए हैं। देखा तो बस की की कई सवारियां अभी भी लौट कर नहीं अाई हैं। रास्ते किनारे बने पेट पूजा की दुकानों को देख भूख उमड़ अाई।

लगा कुछ नश्ता होना चाहिए शाम के समय। भूख को देखते हुए किनारे की दुकान में घुसा। यहाँ चाय और बड़े बड़े समोसे ऑर्डर दिया।

साफ सफाई में कोई कोताही नहीं है। लेकिन बच्चों से मजदूरी कराना भी उचित नहीं है। जिन्हें पाठशाला में होना चाहिए वो चाय शाला में कप धो रहे हैं। चाय भी बाल मजदूर ही देने आया।

होगा यही दस बारह साल का। जब एक समोसे से मन नहीं भरा तब एक और मंगाया। इतना लजीज समोसा, मक्खन की तरह मूह में रखते ही घुल गया।

दस मिनट में सब निपटा, भुगतान किया और टेम्पो पकड़ने निकल पड़ा। अब किसी चीज़ की फिकर नहीं है। उम्मीद है बस कम से कम सात बजे तक तो रुकेगी ही।

बस अड्डा

पैदल पैदल मार्केट से गुजरते हुए टेम्पो स्टैंड आया। ये बाजार मुझे मैकलोडगंज की सुनहरी बाज़ारों की याद दिला रही है जहाँ प्रयेश ले गया था। पर यहाँ तो टेम्पो का अकाल पडा है।

जो जा भी रहे हैं उनको इक्का दुक्का सवारी की जरूरत है और यहाँ आदमी हैं दो। समय की बद्याता को देखते हुए मैंने खुद ही सवारियों को इक्कठा किया। जब बहुत इक्कठी हो गईं तब सबको लेके खाली टेम्पो के पास जा पहुंचा।

क्योंकि यहाँ हर टेम्पो वाले के अलग ही मीन मेख है। कोई एक तो कोई चार सवारी लेके जाएगा। खाली टेम्पो में बैठे और एक दो सवारियों के आते ही चल दी टेम्पो बस अड्डे की ओर।

टेम्पो में एक बस की सवारी दिखीं मिली तो थोड़ी ढांढस बंधी।

अन्य का इंतज़ार

बमुश्किल दस मिनट में बस अड्डे पहुंच गया। नज़र पड़ी तो देखा वो सफ़ेद रंग की बस सबसे पीछे एक किनारे खड़ी है।

और सवारियां भी नदारद हैं। पहुंचा तो कंडक्टर से कुछ पूछता इससे पहले ही उसने टेढ़ा मूह बना कर बोल पड़ा बहुत टाइम लगा दिया साहब।

समय बीतता गया और चीटी की चाल में सवारियां आती गई। मैं बस अड्डे के पीछे बने खेतों में निकल गया।

धीरे धीरे अंधेरा होने लगा है। खेत में एक बकरी और एक सांड के बीच घमासान देखने को मिला। उम्मीद थी सांड के जितने कि लेकिन बकरी ने अपनी छोटी सिंघों के दम पर सांड को खेत से बाहर का रास्ता दिखा दिया।

इधर यात्री अपने रास्ते से भटक गए हैं। साढ़े सात बजे तक सब सवारियां आ गईं सिवाय एक को छोड़ कर।

सूरज भी टिमटिमा रहा है अभी। खेत में सैर सपाटा में काफी समय ऐसे ही बीत गया। किनारे सटे ढाबे में कुछ चाय की चुस्की ले रहे हैं।

सबसे आखिर में आई सवारी आते ही बोल पड़ी। एक भाईसाहब और फैमिली का ऑटो रास्ते में खराब हो गया है इसलिए अब दूसरे ऑटो से आ रहे हैं। लेकिन आ जाएंगे।

अब तो बस चालक का सब्र भी टूटने लगा। रात के आठ बज चुके है लेकिन वो आखिरी सवारी अभी तक नहीं अाई।आखिरकार बस चल ही पड़ी।

तभी देखा एक ऑटो से दौड़ते हुए चार पांच सवारियां भागी चली आ रही हैं बस की ओर। बस रूकी ओर उनको कायदे से बैठाला गया।

समय से कटरा वापसी

अब यहाँ एक नया संकट है वो है दस के पहले पहले पहुंचना वरना अमानती घर में ताला पड़ जाएगा। समय से पहुंचना भी अब एक चुनौती नज़र सा रही है। रात के समय में तो नज़ारे के नाम पर तारे ही दिख रहे हैं।

पहाड़िया तो जैसे अंधकार में कहीं गुम हो गई हों। गाने सुनते सुनते कुछ देर के लिए झपकी लग गई। आंख खुली तो देखा आखिरकार बस कटरा पहुंच ही गई।

जहाँ सुबह तीन घंटे लगे थे शिवखोड़ी जाने में अब रफ्तार में दो घंटे में कटरा पहुंचा कर बड़ा एहसान किया है ड्राइवर साहब ने हम पर।

दस बजे तक ला कर पटक दिया कटरा। अमानती घर बंद होता इससे पहले मैं दौड़ता भागता पहुंचा अमानती घर। देखा तो ताला पड़ चुका है।

कोई उमीद नजर नहीं आ रही इसकी खुलने की। मैंने रिसेप्शन काउंटर पर पूछताछ की तो पता चला साढ़े दस तक एक बार और आयेंगे जमाकर्ता। मेरे साथ साथ कुछ और भी लोग हैं जिन्हें बैग निकलवाना है यहाँ से। इंतजार और सही।

इधर उधर घूम ही रहा था कि जमाकर्ता दस मिनट पहले ही आ गया। यहाँ पर्ची दिखाई और अन्दर से बैग निकाल चल पड़ा पहलगाम की ओर जाने वाली बस ढूढने।

मालूम पड़ा कश्मीर में अतंकवादी मारा गया है इसलिए कश्मीर बंद है। फिलहाल कोई भी बस नहीं जाएगी। शायद कल बस यहाँ से निकले। निराशा हांथ लगी। उसी ढाबे की तरफ चल पड़ा जहाँ परसो पेट पूजा की थी।

ढाबे में पहुंच कर ऑर्डर दिया। लेकिन यहाँ तनावपूर्ण माहौल बन गया है। चंडीगढ़ से शुरू हुए सफर को खत्म करना पड़ेगा या नया मोड़ देना होगा? इसी सोच विचार में खाना खाया।

ये सहमती बनी पहले यहाँ से निकाल कर जम्मू जाया जाए। वहाँ इंतजार करूंगा हालत सामान्य होने का और सुबह निकल पडूंगा कश्मीर के लिए। रात के बारह बजे की बस से जम्मू निकल पड़ा।

कटरा से शिवखोड़ी और वापसी की कुल यात्रा 174km

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