अगरतला पहुंच कर मिला सुकून

अगरतला | त्रिपुरा | भारत

शिलॉन्ग वापसी के साथ स्कूटी वापसी भी

नॉनग्रायाट, डावकी, चेरापूंजी जैसी जगहों पर अच्छा खासा समय बिताने के बाद अब मेघालय राज्य से अलविदा लेने की तैयारी है। मैं दोनो बैग ले कर पुलिस बाजार में खड़ा हूँ।

यहाँ मैं बैग ले कर खड़ा हूँ ऐसी जहाँ यातायात अच्छा खासा है। मेरे डब्बे वाले फोन पर एक आधा बार साथी घुमक्कड़ का फोन आया पर समझ नही आया। साथी घुमक्कड़ को स्कूटी जमा करने गए हुए काफी वक्त हो गया है। अब तक तो आ जाना चाहिए पर पता नहीं चल रहा कहाँ रह गया।

आया तो बहुत देर बाद तकरीबन एक घंटे बाद। पुलिस बाजार चौराहे पर हम ढनकेटी तक जाने वाली बस के इंतजार में हैं जहा। से धर्मानगर की बस मिलेगी।

अपना अपना बैग उठाया ही की आंखों के सामने चौराहे पर बस आ गई। आधी भरी बस में चढ़ा। किस्मत से सीट भी खाली मिल गई। जहाँ से स्कूटी जमा की गई है वहाँ के किस्से कहानी पर बात होने लगी।

बस की समय सारिणी दोबारा देखा तो हाल फिलहाल की एक बस है। पर पेटीएम से भुगतान का लेन देन नहीं हो पा रहा है। अब एक ही विकल्प है की प्राइवेट बस के दफ्तर में जा कर ही टिकट बुक करवानी पड़ेगी।

मोबाइल से ही दफ्तर में फोन घुमा कर मैने दो सीटें बुक कराने की जानकारी दी जिसके लिए दफ्तर से मान तो गए पर जल्दी पहुंचने की सलाह दी।

पर कहीं ऐसा ना हो की जबतक दफ्तर पहुंचूं तब तक कोई और ही सीट ले उड़े। चंद मिनटों में ढनकेटी पहुंच गया। सड़क के उस पार दो चार बसे खड़ी दिख रही हैं।

दफ्तर पहुंच कर अगरतला तक के लिए टिकट बुक कराने के लिहाज से पूछताछ करी जिसमे मालूम पड़ा की अगरतला तक कोई भी बस नहीं जाएगी। बसें केवल धर्मानगर तक के लिए ही उपलब्ध है। 

काउंटर पर ही फौरन दो टिकट बुक कराए। काउंटर पर बैठे सज्जन ने बताया की बस को निकलने में अभी समय है। तब तक के लिए सभी सवारियों को दुकान की वेटिंग रूम में ही बैठाल दिया गया।

सड़क पर बस के आगे पीछे होने के बाद सबको बस में जाने का आदेश मिला। बस में सभी सवारियां आ चुकी हैं। बिना किसी देरी के बस चल पड़ी।

कैलाश दा ढाबा

घंटा भर ही बीता होगा की अंधेरी सड़क किनारे एक ढाबे पर आ रुकी। आंखो में नींद बसाए समझ ही नही आया कहाँ हूँ। पर खाने की भी ऐसी कोई प्रबल इच्छा नहीं है। पर फिर भी उतर कर टहलने निकल आया।

खाने की इच्छा से ढाबे में आया जरूर पर खाना ऐसा कुछ लजीज लग नहीं रहा है। खाने का तो कम पर सौंचालय का लोग ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं। सभी के सभी भरे हैं। इधर साथी घुमक्कड़ भी एक खाली कमरे की तरफ भागा। 

अचानक से मेरे पेट में भी गुड़गुड़ाहट होने लगी। जिसकी वजह से मुझे भी प्रयोग करना पड़ेगा। हल्का होने के बाद अब काफी राहत है। आसपास एक दो बसें और खड़ी हैं। सड़क की तरफ परचून की दुकान है जहाँ से मैने कुछ बिस्कुट खरीद कर बैग में भर लिए।

सड़क किनारे बने ढाबों में भीड़ भाड़ होना आम बात है। दिन में सन्नाटा और रात ने जगराता वाला हिसाब है। जाहिर है ढाबा हो और ट्रक चालक ना हो। ये तो बहुत ही नाइंसाफी है। ठीक वैसे ही यहाँ दो तीन ट्रक तो लावारिस खड़े हैं जिनके चालक कहीं अंदर पड़े हैं।

जाने कब बस में आया आंख लगी और सो गया। ज्यादा देर नीचे रुका ना गया और ना ही रुकने वाला माहौल था। जब आंख खुली तो खुद को धर्मानगर में पाया।

सुबह की शुरुआत गर्मी के साथ हुई। बाकी सवारियों की या तो गर्मी लगने के कारण निद्रा भंग हुई या बड़े बड़े गड्ढों पर बस के उछलने से।

साथी घुमक्कड़ के मोबाइल में देखा तो अभी सेंचीपारा तक ही पहुंच सका हूँ। मंजिल तक पहुंचने में अभी दो घंटे का वॉट है। अब धर्मानगर तक का सफर सड़क पर धक्के खाते हुए निकाल रहा हूँ।

धर्मानगर बस अड्डा

धर्मानगर बस अड्डे पर सुबह साढ़े आठ बजे आ धमका। वीरान बस अड्डा ऐसा लग रहा है यहाँ बमुश्किल कोई बस का आना जाना होता होगा

सामने खड़ी एक भरी बस मेरे आंखों के सामने निकल गई। शायद जल्दी उतर जाता तो आराम से बैठ जाता। बस के निकलते ही हाय तौबा मचने लगी। उतरने के बाद कई सवारियों का एक ही सवाल है की आखिर अगरतला के लिए बस कब आएगी। बस से उतरने के बाद बस इसी का हल्ला मचा हुआ है।

पहली बस तो सुबह आठ बजे निकल ली। अब दूसरी का इंतजार करना पड़ेगा जो ग्यारह बजे पधारेगी। उधर रेलवे की तरफ से रोज ट्रेन नहीं चलाई जाती। इस वजह से आज के दिन कोई ट्रेन ही नहीं है अगरतला के लिए। है भी तो कल सुबह।

अब तक घड़ी में नौ बज चुके हैं यानी दो घंटे का इंतजार। ऊपर से हाय तौबा मचाने वाली ये गर्मी। दूसरी बस खड़ी है धर्मानगर जाने के लिए। इसी में अगली सीट पर बैग रख कर सीट की टिकट कटा ली।

भीषण गर्मी में बस के अंदर बैठना तो संभव ही नहीं है। नीचे उतर कर मंजन करने से पहले चाय पीने के लिए एक ठेले पर खड़ा हुआ। थोड़ा आश्चर्य हुआ ये देख कर की त्रिपुरा में दूध के बदले पाउडर मिलाकर बनाते हैं।

आज ये पहला अनुभव है बिना दूध की चाय गले के नीचे उतरेगी। पहला घूंट लेते ही समझ गया की इस पाउडर वाली चली में वो नशा नहीं जो बाकी चाय में होता है।

वीरान पड़े बस अड्डे पर दूर दूर तक न कोई घर न कोई दुकान दिखाई पड़ रही है। उफान पर सूरज भी बक्श देने वाला नही है।

बस के इंतजार में समय ऐसे ही व्यतीत हो रहा है। घुमक्कड़ी समुदाय से उत्पल के आमंत्रण पर अगरतला में उन्ही के यहाँ ठहरने और मिलने जुलने का सिलसिला होगा।

ग्यारह बज चुके हैं और सवारियां भी अच्छी खासी हो गई हैं। ड्राइवर ने बस चालू कर बाहर खड़ी सवारियों को आने का इशारा दे दिया है।

अंबासा होते हुए शाम तक अगरतला बस अड्डे पर आगमन हुआ। यहाँ उत्पल हमें अपने चार पहिया वाहन से लेने आए। सफर इतना दर्दनाक था की अब तक हालत पतली हो चुकी है।

समांतर सड़क पर तो कभी बस चली ही नहीं। गड्डे ही गड्डे जिसकी वजह से बस उछलते हुए ले कर आई है। कई मर्तबा तो ऐसा भी रहा जब बस के उछलने के कारण सीट पर से मैं उछला और सीधा बस की छत से टकराया।

बस में सबका समान तितर बितर हो चुका था। जो सीट पर बैठे थे वो धरातल पर आ गिरे जो खड़े थे उनको बैठना पड़ा। शायद इससे धीमी बस की चाल होती तो पहुंचते पहुंचते रात हो जाती।

उत्पल हमारी हालत देख कर भांप गए थे। मैने पीछे की सीट पर दोनो बैग रखे और बैठ कर निकल पड़ा जहाँ उत्पल के जा रहे हैं।

शिलॉन्ग से धर्मानगर से अगरतला का कुल सफर 465km

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