शांति का प्रतीक अशोक स्तम्भ

बिहार | भारत | वैशाली

कानपुर से पटना

आज 20 सितंबर है। हर कीमत पर पटना के लिए रवाना होना है। पिछले एक सप्ताह में दो ट्रेन रद्द करने के बाद ऐसा ही लगा। आलस की चादर सिर चड़कर बोल रही थी।

नतीजन शरीर आराम की अवस्था की ओर ढकिलता चला गया। पूर्णतः 50 दिन के विश्राम के  पश्चात् घर से निकलना मायके से निकलने जैसा होता है।

जहाँ एक ओर मंजिले आपको बुलाती हैं तो दूसरी तरफ घर की ऐशो आराम की ज़िन्दगी मन को भ्रमित करने का काम करती है। रात की ट्रेन अपने निर्धारित समय से 10 मिनट पहले ही पहुंच गई और मैं उससे भी 10 मिनट पहले। 

ट्रेन के रवाना होते ही मैं निकल पड़ा अपने नए सफर के लिए शायद अनिश्चित काल तक के लिए, कब लौटूंगा कुछ निश्चित नहीं है। लेकिन कर के बहुत कुछ आऊंगा। बहुत कुछ साथ ले कर।

सुबह सात बजे तक ट्रेन पटना पहुंचती है। मैं बिहार की धरती पर पहली बार कदम रख रहा हुं। पटना, बिहार की राजधानी। जैसा कि बिहार प्रचलित है अपने अपराधिक गतिविधियों के लिए वैसे ही विचार मेरे मन में उत्पन्न हो रहे थे।

क्योंकि अभी तक का राजनीतिक इतिहास ही बहुत भिन्न रहा है भारत के अन्य राज्यों के मुकाबले। साथी घुमक्कड़ का एक मित्र पटना का निवासी है। जिससे मैं भी किसी बहाने दिल्ली में मिल चुका हूँ।

ठहरने का प्रबंध उसी के आश्रय में होगा। इससे मन को धीरज पहुंच रहा है कि इस अनजान शहर में कोई अपना है। यह खयाल मेरे मन को ढांढस बांधने के लिए काफी है। मन सकराकमक्ता से उबल मार रहा है।

मालूम पड़ता है कि ट्रेन भी जल्दी में है जो निर्धारित समय से पहले ही पहुंच गई। उतरने की कुछ वक्त बाद कुल्ला मंजन करते ही साथी घुमक्कड़ ने सुमित को फोन मिला के पटना जंकशन पहुंचने की जानकारी दी।

सुमित से यह मेरी दूसरी मुलाकात होगी, इससे पहले उससे दिल्ली के लाजपत नगर बाज़ार में खरीदारी करते समय हुई थी जब साथी घुमक्कड़ के बुलाने पे वो बेचारा जैसे तैसे आया था।

बैग ले कर मैं प्लेटफार्म संख्या एक पर आ खड़ा हुआ जैसा सुमित ने कहा है। खंबे के बगल में बनी सीट पर बैग रख चहलकदमी करने लगा। रेलवे स्टेशन पर मानव जाति के अलावा वानर जाति भी है।

भूख के चलते कल रात को लिए केले खाने लगा। जिसमे से कुछ वानरों को भी हाथों हांथ दिए।

पटना में मिला मित्र का सहारा

पटना जंक्शन के बोर्ड पर ही निगाह है की उधर से नींद मुद्रा में सुमित आंख मसलते हुए स्टेशन के पिछले रास्ते से प्लेटफॉर्म नंबर एक पर सामने से आता दिखा।

उसके दांत अलग से ही चमक पैदा कर रहे थे जिससे उसके उत्साहित होने का भी पता चल रहा था। 

“और भाई आ गए पटना” – सुमित

“साले कितने महीनों बाद दिख रहा है तू” – साथी घुमक्कड़

मैं एकाएक केला खाते हुए एक टूक इन दोनों को देख- सुन रहा था। सुमित मेरी तरफ बढ़ा गले मिला। ऐसे ही बातचीत में जंक्शन के सिलेट के साथ फोटो खिंचाने लगा। सुमित फोटो लेने में उस्ताद है।

बगल में ही बंद पड़े सरकारी दफ्तर के अंदर तालाब पर नजर पड़ी।

ऐसे और भी तालाब देखने को मिलेंगे बोल कर सुमित बैग उठाने लगा(वो झोला 16kg का ट्रैवलिंग बैग है जिसे हर कोई लाद नहीं सकता) और वापस रख दिया।

“अरे भाई क्या लाए हो इसमें।”

बैग के ऊपर रखें केले हस्टपुस्ट सुमित की ओर बढ़ाते हुए मैं बोला तुम्हें इसकी जरूरत है बैग मेरे लिए छोड़ दो। हंसी की ठिठोली करते हुए हम सब वहाँ से घर की और प्रस्थान कर गए।

ऑटो करने से पहले सुमित ने सिगरेट के कुछ कश मारना बेहतर समझा जिससे शायद उसका सुबह का प्रेशर बने? आज की पीढ़ी अलग अलग तरीके ढूंढ लेती है हर काम को करने के। उनमें से ये एक है।

देर रात तक बारिश होने की वजह से पटना की सड़कें तालाब में तब्दील हो गई थी। शायद उसके घर तक जाने के लिए नाव का सहारा लेना पड़े?

शुक्र है ऑटो अभी भी चल रहे हैं। सड़क पार कर के सुमित ने अपने घर तक के लिए ऑटो किया। मेरा बिहार से ये पहली दफा पाला पड़ रहा है। जाहिर है आंखे फाड़ फाड़ कर ऐसे देख रहा हूँ की ना जाने कहाँ आ गया।

खैर इसमें गलती भी मेरी नहीं। जो प्राइवेट समाचार चैनल दिखाते रहे उसी की तर्ज पर धारणा बनती गई। पर स्मार्टसिटी बनने की ओर अग्रसर पटना के हालात भी कुछ खास नहीं हैं। राजधानी होने का फायदा जरूर है पर ज्यादा नहीं।

मंजिल पर पहुंच चुका हूँ। ऑटो से उतरे तो देखा कुछ गलियों में विशालकाय नाले बहते नजर आ रहे हैं। ऑटोवाले को किराया दे चलता किया। आगे आगे सुमित और पीछे पीछे मैं।

ध्यान सड़क पर दूं या सुमित पर कहना मुश्किल है। कहीं कहीं हालत ऐसे हैं की लंबी कूद लगाने की नौबत पड़ सकती है।

सकुशल बिना भीगे सुमित अपने घर तक ले आया। सकरी गली में घर के गेट के भीतर हम ऐसे खड़े हैं जैसे सुमित ही अब हमारा करता धर्ता है।

घर में मां बाबूजी के सिवाय और कोई नजर नहीं आ रहा। जबरदस्त मेहमान नवाजी से सुमित और घरवालों ने जोरदार स्वागत किया।

पहले खंड में बैग एक किनारे रख उससे साफ कपड़े निकाल कर हम दूसरे खंड में आ गए। यहाँ एक किरायदार भी है पर अभी स्कूली छात्र।

पहले साथी घुमक्कड़ स्नानघर में घुसा। पर बिना मोबाइल के। साथी घुमक्कड़ की भांति कुछ लड़के मोबाइल लेके डुसलखाने में ना जाने कौन सी मीटिंग में जातें हैं की भूल ही जाते हैं की बाहर भी निकलना है।

सुमित का उत्साह कम नही हो रहा। मेहमाननवाजी तो हम भारतीयों के लहू में है। कहावत भी है मेहमान भगवान समान होता है। मेहमान रगड़ रगड़ कर स्नान करें इसलिए सुमित साबुन की नई टिकिया भी ले आया।

दैनिक दिनचर्या के बाद हम सब पहले खंड में आ गए नाश्ता करने। नाश्ता करने में ज्यादा देर ना लगी पर देर हो रही है निकलने में। सुमित के सुझाव पर मैंने वैशाली जाने की योजना पर मुहर लगाई। जिस पर मैं और साथी घुमक्कड़ पहले ही चर्चा कर चुके थे।

सुमित हमें मीठापुर बस स्टैंड पर छोड़ने आया। कीचड़ से लबालब एक मैदान जो कहीं से भी बस अड्डा नहीं लग रहा। पहले तो यही पता करने में काफी मशक्कत करनी पड़ रही है की आखिर बस कहाँ से मिलेगी।

जब मिली तो नौ बजे की बस से वैशाली को प्रस्थान कर गया।

वैशाली का नाम रामायण काल के राजा विशाल के  नाम पर हुआ। भगवान महावीर की जन्मस्थली होने के कारण भी जैन धर्म का पवित्र स्थल है। आज जहाँ बिहार पिछड़े राज्य में गिना जाता है वहीं मौर्य और गुप्त राजवंश के समय में यह शहर व्यापार का मुख्य केंद्र हुआ करता था।

शांति स्तूप

तीन घंटे के भीतर मैं हाजीपुर वैशाली आ पहुंचा। इंटरनेट के माध्यम से पता चला यहाँ अशोक स्तंभ के अलावा शांति स्तूप भी मौजूद है जो जापानियों ने द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् बनाया गया था।

दुनिया भर में ऐसे 80 से भी ज्यादा शांति स्तूप जिसमे से भारत में सात हैं। बस से उतरने के बाद गूगल नक्शे की मदद से किनारे किनारे चलने लगा। सड़क किनारे दद्दू से मालूमात हुआ की स्तूप तक पहुंचने के लिए टेंपो भी जाते हैं।

अगले ही पल जैसे टेंपो कदमों पर आ रुका। मैं बैठ और कुछ पल के सफर में उतर गया स्तूप जाने वाले मार्ग पर। यहाँ पर को बात मुझसे विशेषकर पसंद आ रही है वो ये की लोग मदद करते हैं अगर मांगी जाए तो को आज के समय बड़े शहरों में ना के बराबर ही है।

जैसे जैसे मैं आगे बढ़ा सड़क के किनारे बाएं हांथ पर श्रीलंका, भूटान, बर्मा, वियतनाम, कोरिया जैसे देशों के आवास उनके लोगों के ठहरने और विपासना गृह बने हैं।

इससे यह दर्षत्ता है कि इस स्थान का महत्व क्या है। सड़क पर ही श्रीलंका से आए बुद्ध धर्म के लोग खड़े हुए हैं जो जाने क्यों अजीब से दिख रहे हैं।

ऐसे ही एक आवास के बाहर खड़ा हुआ अंदर जाने के लिए जो वियतनाम का आवास है। पर गेट पर ही कोई ना मिला। जिसके कारण वापस जाना पड़ रहा है।

मुख्य सड़क से कुछ दूरी पर से ही स्तूप दिखने लगा है। जिसके बाहर चौकोर आकार का बहुत बड़ा सूखा तालाब था। जिसको देख के ही पता चल रहा था इसकी देख रेख करने वाला प्रशाशन ही इस तालाब की तरह ही सूखा होगा।

तपती धूप में मैं स्तूप की और प्रवेश कर गया। प्रवेश करने का कोई टिकट नहीं लगा। स्तूप से पहले पड़े क्वार्टर की ओर बड़ा जो हरियाली से परिपूर्ण है।

एक तरह का सुरक्षा कवच भी क्योंकि कबूतरों के मल से धरातल सफेद हो गया है। कुछ देर के लिए कोई खड़ा हो भर जाए बस रहनुमा दाग ले कर ही निकलेगा। मल के इस सुरक्षाकवच में जाने से मैं कतराया और वापस चला आया।

किनारे गई पतली गली से मुड़ते ही स्तूप के दर्शन हुए। भीड़ ना के बराबर है। स्तूप के पहले काफी बड़ा चबूतरा और ऊपर चढ़ने के लिए बनी सीढियां।

स्तूप पर ही कुछ अफसर घूम घूम कर निरीक्षण कर रहे हैं। हर कोई चप्पल उतार कर ही सीढ़ियों पर चढ़ रहा है। पहले साथी घुमक्कड़ के हो आन के बाद मैं जूते उतार कर चढ़ गया ऊपर।

अंतिम समय में भगवान बुद्ध ने कुछ इस तरह धरती से विदा लिया

स्तूप में भगवान बुद्ध की प्रतिमा बैठे, लेटे और खड़े मुद्रा में थी जिसको चमकाने का कार्य चालू है। कारीगर अपने हिसाब से काम कर रहा है। जो काम 4 घंटे का है उसे ये चार दिन तक खींचते हैं।

तपती धूप में कुछ समय व्यतीत करने के बाद बाहर निकाल आया। बाहर दुकानें खूब लगी है। कोई साजो सज्जा का सामान बेंच रहा है तो कोई ढाबा खोले बैठा है। सभी आसपास के गांव के मालूम पड़ रहे हैं।

सूरज उफान पर है और भूख भी। ढाबे पर बैठी माई से एक एक समोसा बुकनू के साथ स्वाद लिया। समोसा खाने के बाद तालाब के उस पार दिख रहे म्यूजियम की ओर निकल पड़ा।

पहले तो एकाएक विचार आया कि इसी सूखे तालाब के बीच से निकाल जाऊ। दुकान लगाए विशेषज्ञों से पूछने पर पता चला बीच में जाने से दलदल में फसने का खतरा है। मैं नहीं चाहूँगा की भ्रमण का अंत आज हो जाए। 

सिर पर अंगौछा तान कर रेलिंग के किनारे किनारे चलने लगा। जगह खूब है अगर प्रशासन चाहे तो इसे काफी सुंदर भी बनाया जा सकता है।

वैशाली संग्रहालय

लगभग आधा किलोमीटर चक्कर लगाकर वैशाली संग्रहालय पहुंचा। दरवाजे को घेरे हुए दो चार लोगो से अंदर जाने का रास्ता पूछ तो टिकट घर की तरफ इशारा करने लगे।

काउंटर पर दो टिकट कटवा कर अंदर आया। सुरक्षा और जांच में कोई लापरवाही नहीं है। संग्रहालय में हजारों साल पुरानी मूर्तियां है जो काफी प्राचीन है।

इनको संरक्षण देना भी जरूरी है। क्योंकि अक्सर कुछ खुराफाती तत्व प्राचीन धरोहरों को नुकसान पहुंचाने में विश्वास रखते हैं। संग्रहालय काफी बड़ा परन्तु थोड़ा उबाऊ भी है।

कहीं विष्णु तो कहीं पुराने मिट्टी के बर्तन समेत खिलौने ये दर्शाते है की इस काल में भी मानव क्या सोच रखता था।

थोड़ा और अंदर आने पर मेरी नजर पड़ती है दीवार पर टंगे एक बड़े पर बोर्ड पर जिस पर प्राचीन भाषा अंकित है। वो भाषा जो किसी काल में लिखी और बोली जाती रही होगी आज लुप्त है।

जिसके सामने कुर्सी पर बैठा वह अधेड़ व्यक्ति मरणासन्न मुद्रा में आंखे मीचे कुर्सी पर लेटा है। ऐसा लग रहा है वह भाषा समझते पढ़ते गुजर गया हो। मैंने उससे वार्ता करने की कोशिश भी की पर सामने से कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी।

आँखें मीचे लेट गाइड

जाते जाते मैंने इसकी सूचना गार्ड को देदी है। संग्रहालय से निकलते हुए तीन बज चुके हैं और सूरज ढलने से पहले पहले अशोक स्तंब भी देखना है।

यहाँ से कुछ दूरी पर जैन धर्म के अंतिम गुरु महावीर का जन्म स्थल भी है, परन्तु समय की कमी के कारण वहाँ जाना रद्द करना पड़ रहा है। अशोक स्तंभ की स्थापना सम्राट अशोक ने भगवान बुद्ध के अंतिम सम्बोधन की याद में करवाया था।

पैदल मुख्य सड़क तक पहुंचने में बीस मिनट लग गया है। पूछने पर पास में खड़े एक बूढ़े ने इशारा करके खड़े खड़े स्तंभ की दूरी नाप दी और टेंपो से जाने की सलाह दी।

टेंपो भी आ गया दूसरी सवारी का उतरना हुआ और मेरा चढ़ना। टेंपो में बैठा कर चालक ने चौराहे पर ला खड़ा किया। हालांकि गूगल नक्शा दिखा रहा था की हम आगे बढ़ चुके हैं पर मैंने चालक पर ज्यादा भरोसा दिखाया और चालक ने चालाकी। इस चौराहे का अशोक स्तंभ के रास्ते से कोई लेना देना नहीं है। दांत दिखाते हुए तिगुना किराया मांगने लगा।

सैलानियों से वसूली करना भारत में अमूमन आम बात है। अतः मैंने पास की दुकान में बैठे दद्दू से किराया सुनिश्चित कर ऑटोवाले को किराया देकर मामला रफा दफा किया।

मुझे पता है मैं गलत जगह लाकर खड़ा कर दिया गया हूँ। यह इस बात का भी संकेत है कि सतर्कता से घूमना कितना आवश्यक है। आनन फानन में दूसरा ऑटो करके जैसे तैसे अशोक स्तंभ के उस तिराहे पर आ खड़ा हुआ जहाँ से एक और वाहन करना पड़ेगा।

अशोक स्तंभ

दूसरा वाहन करके मैं स्तंभ के मुहाने पर आ गया। स्तंभ के चौखट पर गांव के बच्चे खेलते नजर आ रहे हैं। साजो सज्जा का सामान लगाए कोई बुद्ध की मूर्ति बेंच रहा है तो कोई हांथी की जो वाकई बहुत ही आकर्षण का केंद्र हैं।

टिकट काउंटर अभी भी खुला हुआ है। जो की घंटे भर बाद यानी पांच बजे बंद हो जाएगा। दो टिकट कटवा कर मैं दाखिल हुआ। मैं उस जगह पे खड़ा हूँ जिसके बारे में बचपन में किताबो में पढ़ था। 

अविश्वसनीय लम्हा है यह मेरे लिए। यहाँ छोटे बड़े स्तूप हैं जो उस काल के बुद्ध तपस्वियों के हैं। बरसात के मौसम में यहाँ अच्छा खासा जलभराव हो जाता है।

काम कर रहे माली के अनुसार यहाँ का नवीनीकरण कुछ साल पहले ही हुआ है। वरना पहले यहाँ पर पहुंचना हर किसी के बस की बात थी और लोग ऐसा करते भी रहे हैं। जैसे अभी दो बच्चे खेलते नजर आ रहे हैं।

आंखे बड़ी बड़ी कर के बोला “आगे बने बड़े तालाब में तो सांप भी दिख जाते हैं।” उसी तलब के किनारे आ कर कुछ तस्वीरें निकलने लगा।

अशोक स्तंभ अभी तक ऐसे ही टिका खड़ा है। इसे तकरीबन 2250 साल पुराना माना जाता है। सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध जितने के बाद बौद्ध धर्म अपना लिया था। जिसके बाद उन्होंने वैशाली में उत्तर दिशा की ओर इस स्तंभ का निर्माण कराया था। वैशाली में ही भगवान बुद्ध ने अपना आखिरी उपदेश दिया था और उत्तर दिशा की ओर चल पड़े थे।

भीड़ कम थी अब तक पर अचानक से एक जत्था आया जिसने पूरा स्तूप ही घेर लिया। अशोक स्तंभ और स्तूप के सिवाय घूमने के लिए बगीचा है।

समय भी हो गया है बंद होने का और मेरा यहाँ से निकलने का भी। सुरक्षाकर्मी अपनी लाती ले कर जनता को बाहर का रास्ता दिखाने आ गया। बाहर निकलने से पहले लघुशंका करना जरूरी लग रहा है क्योंकि पटना काफी दूर है अभी।

बाहर निकलने के बाद वही साजो सज्जा का सामान लगाए बैठे हैं जो आकर्षक तो है और साथ ले जाने की भी प्रबल इच्छा है पर अफसोस घर वापसी इतनी जल्दी ना होने वाली।

अशोक स्तंभ से बाहर निकलने के बाद गली में पानी पूरी वाले को देख मुझे पानी पूरी खाने की इच्छा जाग्रत हुई। जैसे ही ठेले के पास पहुंचा मेरे बोलने से पहले ही वह दुकानदार आधा हाथ पानी में डूबो कर बोला

“हां बाबू कितने खाओगे?”

एक भी नहीं कहकर मैं वहाँ से निकल गया। उसका आधा हांथ पानी में देख कर कोई भी व्यक्ति वही करता जो मैंने किया। मुख्य सड़क पर पहुंचते ही पटना जाने वाली बस की राह देखने लगा। 

परम मित्र कोई अनोखा ही फल खाने में जुटे हुए है जिसमे मैंने उनका आहार ख़तम करने में पूरा सहयोग करने की कोशिश की। निवाला मुह तक पहुंचा ही था कि बस आ गई।

पटना वापसी

सड़क पार करके मैं बस तक पहुंचा। पर बस के अंदर जगह ना होने के कारण बाकी लोगों की तरह मैं भी बस की छत पर चढ़ गया। बकायदा छत पर चढ़ने के लिए दरवाजे के बगल से सीढी भी है। ऐसी व्यवस्था देख थोड़ी हैरानी तो हुई।

हालांकि बिहार में यह आम बात है, मेरे लिए नहीं। यह पहली बार है जब मैं बस की छत पर सफर करूंगा। काफी सतर्क रहना है छत पर। और तो और जो छत पे बैठे थे उनको भाड़े में भारी छूट भी दी गई। शायद जान जोखिम में डालने के।

खुली हवा में सफर अजब रहा। कभी पेड़ की टहनियों से खुद को बचाना तो कभी बस के असंतुलित होने पर खुद को संभालना।

बस जब महात्मा गांधी सेतु पुल पर पहुंची तब सभी यात्रियों को ऊपर से उतारकर अंदर बैठाल लिया गया। शायद कोई नदी में कूद कर आत्महत्या ना कर ले इसलिए। पुल पार करते वक्त छत पर बैठना या खड़े होने की अनुमति नहीं है।

महात्मा गांधी सेतु पुल किसी समय भारत का सबसे लंबा पुल हुआ करता था जो पटना और हाजीपुर को जोड़ता है। पुल पार करने के कुछ देर बाद जाम में बस ने किसी बाइक सवार को छुआ दिया। 

उस 18 साल के युवक की प्रतिक्रिया देखने लायक बनती है। उसे देख के लग रहा है मानो यह कंडक्टर की जान ले के ही मानेगा। लगभग हत्या तय थी आज उसकी।

मैंने अपने आप को फिर याद दिलाया मैं कहाँ हूँ। ये कांड देख थोड़ा दहशत में आ गाय। जल्द ही मैं घर पहुंच गया। काफी अच्छा लग रहा है सुमित को दोबारा देख कर।

शायद कोई अपना मिल गया हो। लेकिन अभी सुमित के साथ घूमना बाकी है। सुमित हम लोगो को चार किमी पदयात्रा कराते हुए पटना के प्रमुख कोचिंग मंडी कंकड़बग तक ले आया।

पटना की इन भीगी सड़कों और तालाबों ने मुझे बचपन की उन गलियों की याद दिलाई जहाँ से गुजर कर मैं स्कूल जाया करता था। यहाँ पर हमने चाय, चाट का स्वाद चखा।

वापसी में सुमित को कुछ कपड़े लेने का विचार आया। बंद होती दुकान की तरफ रुख करते हुए हम तीनों वहाँ गए भी। सबने एक दो टीशर्ट भी पसंद की लेकिन अंत में अड़ियल दुकानदार अपने मनमाने दाम पे टिका रहा।

निराश सुमित के साथ मैंने ने भी टीशर्ट उसी के काउंटर पर रख के बाहर निकाल आया। साथी घुमक्कड़ के साथ जब भी कोई खरीदारी के लिए जाता है उसका यही हश्र होता है, खाली हाथ लौटना। 

मैं और सुमित इस बात से भलीभांति परिचित थे। एकाएक उसकी इसी आदत पर चर्चा करते हुए घर की ओर भीगी सड़कें और कुछ नाले पार करते हुए 10 बजे तक पहुंच गए। बाते करते करते कब सो गए वक़्त का पता ही नहीं चला।

कानपूर से अबतक की कुल यात्रा 691km

Similar Posts

12 Comments

  1. सुन्दर
    सरल
    हास्य-व्यंग
    बांध के रखा आपकी कहानी ने

    धन्यवाद्

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *