सारनाथ जहाँ बुद्ध ने दिया अपना पहला उपदेश

उत्तर प्रदेश | भारत | सारनाथ

काशी से सारनाथ

कल रात्रि काशी विश्वनाथ के दर्शन के बाद आज मन बना रहा हूँ सारनाथ जाने का।

लगभग बीस साल बाद दोबारा सारनाथ जाना होगा। मुझे याद है वो सीता रसोई भी जहाँ परिवार के साथ फोटो खिंचवाई थी।

चाय पीना तो कब की छोड़ दी वरन पहले दिन की शुरुआत ही चाय से होती थी।

परिजनों के साथ कुछ समय व्यतीत करने के बाद करीब साढ़े दस बजे निकल पड़ा खाली हाथ ना झोला ना झंडा। अमूमन एक छोटा बैग तो रहता ही है पर इस बार ट्रेकिंग बैग लाया ही नहीं।

प्राप्त जानकारी के अनुसार सुबह दस से पहले तो सारनाथ के मंदिर या रसोईघर या फिर स्तूपा खुलता ही नहीं। बनारस की शांत गलियों से भदौं चुंगी तक पैदल ही निकल आया।

काशी, बनारस और सारनाथ बमुश्किल बीस किमी के दायरे में होगा। काशी से निकलने के बाद आज सोच रहा हूँ अपने पुराने तरीके से से सारनाथ पहुंचा जाए। लिफ्ट मांगते हुए।

अब जबसे पूर्णतः घुमक्कड़ी छोड़ी है तो अब लिफ्ट मांगते हुए भी शर्म आ रही है। पान की गुमटी के पास से एक गाड़ी चालू हुई और कुछ ही कदम आगे खड़ा मैं, हाथ de कर ये झिझक भी तोड़ दी।

गाड़ी रुकी और मैं चल पड़ा। ना चालक ने मंजिल पूछी ना घुम्मकड़ ने राह। आगे रेलवे फाटक तक आते आते काफी भीड़ देखने को मिल रही है।

जिसे एक तरफा बनाया गया है। इसलिए श्रीमान ने भी अपना दुपहिया वाहन मोड़ कर सीधे चल पड़े। अगले फाटक पर उतर कर आगे का रास्ता तय करने के लिए पैदल ही निकल पड़ा।

अभी आगे और मोड़ हैं इसलिए बेहतर रहेगा कुछ दूर पैदल ही चल पड़ूं। थोड़ी दूर के लिए क्या लिफ्ट मांगू। घर पर किताबों और लैपटॉप के सामने बैठे बैठे चर्बी भी जम गई है, जिसे कम करने का समय अनुकूल है।

और वैसे भी पैदल चलने की भूख भी लगी है मुझे। कितने महीने बीत गए मिलों चले हुए। पैदल में भी तेज चाल चलने में मजा भी आता है और समय की बचत भी, आलस दूर होता है सो अलग।

आलस से जैसे मेरा छत्तीस का आंकड़ा हो गया हो। पैदल चलते चलते गली के छोर तक आते ही दाएं मुड़ना सही रहेगा। सकरी मोड़ पर भला कोई अपना वाहन रोकने से रहा लिफ्ट देने के लिए।

मोड़ से मुड़ते ही चक्की के आगे आ कर खड़ा हो गया मौके की तलाश में। की काश कोई खाली दुपहिया वाहन दिखे तो बैठ जाऊं। तेज धूप में मेरे हाथ देने पर भी कोई नही रुक रहा।

अब इच्छा शक्ति जवाब दे रही है। मन कर रहा है निकल जाऊं पर दिमाग बोल रहा है कुछ देर और या कुछ गाडियां और। थोड़ी और देर खड़े होने के बाद आखिरकार एक नवयुवक ने गाड़ी रोक ही दी।

ना उसने पूछा ना मैने बताया बस चल पड़ा। गंगा नदी पार करने के बाद अचानक चौराहे पर आ कर रोक कर किसी श्रीमान से बतियाने लगे।

कभी कभार ऐसा भी हो जाता है की चालक दोहरी सोच में रहता है पर बैठा लेता है। इसी दुविधा में अक्सर किसी बहाने से उतर भी देता है। से ये जनाब भी फोन पर बतियाने का नाटक करने लगे।

इनको धन्यवाद बोल कर मैं आगे निकल आया। चौराहे पर फल मंडी और पुलिस वाले के अलावा सब आते जाते दिख रहे हैं। मेरा लिफ्ट मांगने का सिलसिला जारी है।

चौराहे के पास ऑटो के पास खड़े हो कर। अब लग रहा है यहाँ से नही मिलेगी। आगे निकल कर ही मांगना सही रहेगा। पर आगे निकल आने के बाद भी कामयाबी ना मिली।

पद यात्रा

सारनाथ है ही कितनी दूर बेहतर है पैदल निकल चलूं। करीब आधा किमी का रास्ता तय करने के बाद ऑटो अड्डा पर आ पहुंचा।

यहाँ से भी अभी गूगल नक्शे पर डेढ़ किमी दिखा रहा है। ऑटो वाले चलने को पूछ तो रहे हैं पर मेरी ऐसी कोई इच्छा नहीं है।

मन को कुछ दूर और तक चलने की तसल्ली दे कर आगे बढ़ने लगा। इस इलाके में भरपूर हरियाली है जिसका कोई मोल नहीं है।

सायं सायं गाड़ियां निकल रही है। मैं सड़क पार करके छांव में चलने लगा। विद्यालय के छूटे बच्चे वापस अपने घर को जाते हुए दिखाई पड़ रहे हैं।

तिराहे तक आ जाने के बाद लग रहा है सारनाथ आ गया। दरसल सारनाथ तो आ गया परंतु वो रसोई घर और स्तूप कहीं भी नहीं दिख रहा।

नक्शे पर सिर्फ सारनाथ मंदिर का रास्ता दिखा रहा है सो मैं मंदिर की ओर जाने के लिए दाहिने मुड़ कर बिजली के खंबे की छांव के नीचे खड़ा हो गया।

जेब से बाहर मोबाइल निकाल कर क्यूआर कोड स्कैन करने पर

खंबे की पतली छांव में बाकी का सफर दुपहिया वाहन पर जाने का विचार है। पास खड़ी कार के समीप से गुजरते एक मजदूर भाईसाहब को रोका और स्तूप, रसोईघर का पता पूछने लगा।

मालूम पड़ा सीधे ही चल कर कुछ और आगे दोनो ही मिल जाएंगे। भाईसाहब कुछ ही दूर तक चलने की संतावना से कर सड़क पार कर गए और मैं भी।

मात्र सौ कदम आगे आ कर खाली पार्क के आगे टिकट घर देखने को मिल रहा है। भीतर बड़ी सी इमारत जिसे संजो कर रखा गया है।

पर अंदर पसरा सन्नाटा। टिकट घर पर पहुंचा तो जानने में आया की टिकट केवल ऑनलाइन ही आरक्षित किया जा सकता है। सिर से पानी की तरह पसीना बह रहा है।

ऊपर से टिकट भी नही आरक्षित हो रहा है। तमाम तरह के पहचान पत्र मांग रहा है। पहली दफा में विफल हुआ इसी कारण और भुगतान के कारण भी।

एक तो पसीना ऊपर से ये एक नया झमेला ऑनलाइन आरक्षण का। पेड़ के नीचे बैठे टिकट विक्रेता ने जब बताया की सिर्फ आधार या पैन कार्ड से ही आरक्षित होगा तब जा कर जेब में वोटर कार्ड रख पैन कार्ड संख्या डालने लगा।

इस बार बिना किसी देरी के हो भी गया। विक्रेता को टिकट दिखा बकायदा रजिस्टर में नाम दाखिल करवा अंदर की ओर चलने लगा। तभी चार पहिया वाहन से भाई बहन आते हुए दिखे।

चौखंडी स्तूप रसोई घर

चौखण्डी स्तूप

अब लग रहा है वाकई यहाँ सैलानी आते हैं। हरियाली के बीच अंदर आते ही दनादन तस्वीरें लेने का सिलसिला शुरू हो गया।

किनारे ऊंची इमारत और हरित उद्यान। इमारत खंडहर जरूर है पर रखरखाव में कोई कमी नहीं। आश्चर्य होता है की इतने पुराने स्तूप और बौद्ध भिक्षुओं द्वारा बनाई गई अभी भी टिकी हैं।

प्रवेश द्वार से बाईं ओर बंद पड़ा है मार्ग दाईं ओर से है। छोटे पेड़ों के बीच रास्ते से गुजरते हुए आगे बनी सूचना दीवार पर इमारत के बारे में विस्तार से लिखा हुआ है।

हम आम भाषा में सीता रसोई बुलाते हैं और यहाँ चौखण्डी स्तूप के नाम से विवरण दिया हुआ है।

चार भुजाओं वाले आधार पर बनी यह ईंट निर्मित संरचना बौद्ध स्तूप है। लगभग चौथी पाँचवीं सदी में बना यह स्तूप संभवतः उस स्थान विशेष का द्योतक है जहाँ बोधि प्राप्ति के पश्चात् भगवान बुद्ध की भेंट सर्वप्रथम पांच भिक्षुओं से हुई थी।

इस स्तूप का उल्लेख सातवीं शताब्दी के विख्यात चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपने यात्रा विवरण में भी किया है। शायद ह्वेनसांग ना होता तो भारत का काफी इतिहास जानने से हम भारतीय वंचित रह जाते।

1835 ई0 तथा 1904-05 ई० में कराये गये पुरातात्त्विक उत्खनन् द्वारा अनावृत गये इस स्तूप की कुल ऊँचाई लगभग 93 फीट है।

इतनी बड़ी इमारत में आखिर होता क्या होगा। या पूरी इमारत सिर्फ ईंट की ही बनी होती है। जैसे यहाँ उल्लेख है उससे पता चलता है स्तूप के शिखर पर सुमोभित अश्ट पहल बुर्जी एक मुगलकालीन संरचना है।

जिसके उत्तरी द्वार पर एक अरबी शिलालेख के अनुसार इसका निर्माण इस स्थल पर हुमायूँ के आगमन को अविस्मरणीय बनाने के उद्देश्य से राजा टोडरमल के पुत्र गोवर्धन द्वारा 1588 ई० में करवाया गया था।

और मैं समझ रहा था सिर्फ बौद्ध भिक्षुओं ने ही कराया है। उद्यान में सिर्फ दो सुरक्षाकर्मी ही दिखाई पड़ रहे हैं। जो बिचारे थक हार कर सुस्ताते हुए नजर आ रहे हैं।

आगे बढ़ने पर पाता हूँ की कुछ प्रेमी युगल भी मौजूद हैं। जो अपनी ही गुटारगू में व्यस्त हैं।

मैं चौखण्डी स्तूप की तस्वीर लेते आगे बढ़ने लगा। कोशिश है चारो ओर से ठीक तरह से तस्वीर लूं ताकि फुर्सत में बैठ कर देखा जा सके कहाँ से भिन्न है।

धूप तो मानो गायब हो चुकी हो। बादलों के बीच छुप गई है इसलिए भी घूमने में मजा आ रहा है। लगता है आज मौसम ऐसा ही रहेगा।

जहाँ सामने से सपाट मैदान था इस हिस्से में काफी पेड़ हैं। जिससे डाल के पीछे पत्तों के नीचे से अच्छे से देखा जा सकता है। जिस वजह से हल्की धुंध भी नजर आ रही है।

स्तूप पर चढ़े दो मजदूर नजर आ रहे हैं जो स्तूप के निचले हिस्से की मरम्मत कर रहे हैं। थकान महसूस हो रही है इसलिए मैं सुस्ताने के लिए पेड़ की छांव में बैठने आ गया।

नजर पड़ी तो देखा वो भाई बंधु भी भीतर नजर आ रहे हैं जो मेरे प्रवेश करते ही गाड़ी से उतरे थे। शायद ये जल्दी में हैं पर मैं इत्मीनान से पूरी जांच पड़ताल के साथ घूमना बेहतर समझता हूँ।

जोर की प्यास लगी है पर आसपास पानी की कोई व्यवस्था नजर नहीं आ रही। दोनो सुरक्षाकर्मी टहलते हुए इस तरफ आ गए। भाई बहन की जोड़ी जो काफी भीतर तक जा पहुंची है उनके आने के बाद बताया कि इस क्षेत्र में जाना वर्जित है।

सुरक्षाकर्मी को गूगल से तस्वीर डाउनलोड कर के दिखाया और पूछा की ये स्तूप कहाँ पड़ेगा? तब जा कर उन्होंने कुछ हद्द तक संशय दूर किया।

बताया जिस स्तूप के सामने मैं खड़ा हूँ वो सीता रसोई है और जो तस्वीर मैं दिखा रहा हूँ वो सारनाथ स्तूप है। जो यहाँ से कुछ ही मीटर की दूरी पर है।

इसे ही मैं सुबह से खोज रहा था। यहीं जाना था मुझे। और सारनाथ स्तूप के धोखे में यहाँ आ गया। खैर कोई बात नहीं। यहाँ भी बचपन में आ चुका हूँ।

मैं भी थोड़े आराम के बाद निकलने की तैयारी करने लगा। यहाँ और अधिक समय देने जैसा कुछ भी नही है। जाते जाते कुछ तस्वीरें स्तूप के साथ भी ले ली हैं।

बाहर निकलने का वही रास्ता है जहाँ से आया हूँ। अब मुझे तलाश है उस सारनाथ स्तूप की जो काफी प्रसिद्ध है। बाहर निकल कर पूछने पर पता चला की कुछ एक किमी आगे है।

मुख्य दरवाजे के बाहर आ कर लिफ्ट देखने लगा। की काश कोई मिल जाए जो मुझे सारनाथ स्तूप तक छोड़ दे। पर आधे घंटे के इंतजार के बाद भी मुझे कोई सवारी ना मिली।

जगह भी बदल कर देखी और चेहरे का हावभाव भी पर दोनो ही विफल रहा। पैदल ही निकलना पड़ेगा अब।

बुद्ध मंदिर

कुछ आगे बढ़ा ही हूँ की देखता हूँ एक उद्यान जिसमे बुद्ध की विशाल प्रतिमा नजर आ रही है।

अंदर दाखिल होने के लिए मूह ढकना जरूरी है। सो रूमाल मोड़ कर लपेट लिया। दाईं ओर मुड़ते हुए बुद्ध के मंदिर के सामने आ खड़ा हुआ। पर यहाँ भीतर प्रवेश करना वर्जित है।

खाली मैदान में भी बुद्ध की प्रतिमा है दाएं भी और बाएं भी। हंसते हुए बुद्ध भी हैं जिन्हें हम अक्सर घरों में सजाते हैं। शांतचित ध्यान मुद्रा में बैठ बुद्ध भी।

सबकी तस्वीर कैमरे में कैद करते हुए निकल पड़ा बड़ी प्रतिमा की ओर जो हर तरफ से नजर आ रही है। प्रतिमा की सीध पर तालाब बनाया हुआ है जिस पर अनेकों कमल के फूल खिले हैं।

उनमें भी बुद्ध की सुनहरी मूर्तियां स्थापित हैं। मूर्ति के समीप तो अभी कुछ लोग तस्वीर निकलवा रहे हैं। क्यों खामखां इनकी तस्वीर खराब करना। और ना मेरी भी ठीक तस्वीर आएगी ऐसी भीड़ में।

बाएं हाथ पर किनारे बने पानी घर की तरफ निकल आया। रास्ते में मिले एक अनुवादक अलग ही भाषा बोलते हुए सुनाई पड़े। जो किन्हीं गांव के निवासियों को यहाँ की जगह का महत्व सीखा रहे हैं।

सामने खड़े कुछ लड़के अपने किसी मित्र का जन्मदिन मना रहे हैं। इस खुशी में कुछ के तो हाथ केक से सने हुए हैं। उनमें से एक पानी पी रहा है। मैं भी बहुत प्यासा हूँ। पानी खड़े खड़े एक लीटर पी गया।

घर से नाश्ता करके चला था इसलिए भूख नहीं लगी। अब मूर्ति के आसपास कोई भी नही है। अभी तक जो दो लड़के अलग अलग मुद्राओं में तस्वीर ले रहे थे वो भी निकल लिए।

बस एक नव विवाहित परिवार अपने गोद लिए बच्चे के साथ तस्वीर लेने की कोशिश में है। लगे हाथ मैने भी अपना मोबाइल पकड़ा कर तस्वीर निकलवा लीं। पर अफसोस तस्वीर संतोषजनक ना आईं।

कुछ क्षण यहीं इंतजार करते हुए दूसरे जोड़े का इंतजार करने लगा। उनके साथ उनका फोटोग्राफर भी है जो जगह जगह की तस्वीर ले रहा है।

दरख्वास्त करते हुए मैने भी अपनी तस्वीर निकलवाईं। पर ये जनाब भी कुछ खास कमाल ना कर सके। हाथ अजमाने आए भाईसाहब। पर उन्होंने और भी तजुरबाहीन तस्वीरें खींची।

बुद्ध मंदिर में लेखक

खैर मैंने यहाँ से निकलने का फैसला किया। मालूम पड़ा जो साथ साथ घूम रहा है वो सामने सड़क पार बनारसी साड़ी के स्टॉल से ग्राहक ढूंढने आया है। और ये भी इनके ग्राहक होंगे जिसका इसे कुछ भत्ता मिलेगा।

हामी तो भर दी है पर जाने का पर्याप्त समय नहीं है। आगे चल कर एक बार फिर से तस्वीर निकलवाने की कोशिश करने लगा। इस बार सख्त हिदायत के साथ बताया की कैमरा बिना हिलाए तस्वीर निकलनी है।

सो वैसा ही हुआ। तस्वीर भी बेहतर आई जैसा मैं चाह रहा था।

दलाल बाबू दाएं बाएं हुए और मैं धीरे से खिसक कर बाहर निकलने लगा। पर मुख्य द्वार से निकलते हुए पुकारने की आवाज आई जरूर पर मैने समय कम होने का जिक्र करते हुए सारनाथ स्तूप की तरफ निकल गया।

कुछ मीटर की दूरी पर चौंडी सड़क पर आगे चलते हुए सारनाथ है। नलके से पानी भर रहे भाईसाहब से पूछा तो सुनिश्चित हुआ की यही सारनाथ स्तूप है।

यहाँ एक किनारे जमकर भीड़ लगी है। जिसे देख कर लग रहा है यहाँ टिकट वितरण हो रहा है। आ कर देखा तो वैसे ही ऑनलाइन आरक्षण करने से होगा।

धामेक स्तूप

मोबाइल निकाल झटपट आरक्षित किया और अंदर जांच कराने आ गया। बाहर खड़ी भीड़ में अधिकांश कॉलेज छात्र नजर आ रहे हैं। जो सबसे अधिक हल्ला गुल्ला कर रहे हैं।

यहाँ अंदर बहुत ही बड़ा मैदान है। जहाँ छोटे बड़े हर तरह के स्तूप हैं। आगे बढ़ने से पहले सूचना दीवार को पढ़ लेना लाभकारी होगा। जिसके ठीक बगल में है सारनाथ का नक्शा।

जिसपर लिखा है की बोधगया में ज्ञान प्राप्ति के पश्चात् उन्होंने अपने प्रथम पाँच शिष्यों को यहीं पर पहला धर्मोपदेश दिया था। और भी बहुत कुछ जो शायद मेरे समझ से परे है।

इधर गाइड बाबू साथ में चलने की जिद्द पर अड़े हुए हैं। पर मैंने ही इन्हें विनती करते हुए मना कर दिया। बाएं ओर से अंदर जाते हुए बाएं हाथ पर पानी की व्यवस्था है।

जहाँ सारे विद्यालय के छात्र टूट पड़े। काफी आगे निर्माण कार्य भी जारी है। जहाँ कुछ मजदूर तोड़फोड़ करते दिख रहे हैं। रास्ते भर छोटी बड़ी समाधि नजर आ रही हैं। जिन्हे स्तूप कहा जाता है।

बिहार के वैशाली जिले में पहली दफा जब सामना हुआ था तब ज्ञात हुआ था की महात्माओं या भिक्षुओं की समाधि ही स्तूप होती है। आकर उनके पद के अनुसार छोटा बड़ा होता है। सो यहाँ है।

इससे पहले ये उपद्रवी छात्र मेरी तस्वीर बिगड़े मैं फटाफट सन्नाटे में सुंदर तस्वीरें खींचता चलूं। उसी सुंदरता के साथ इन्हे भी संजो कर रखा गया है।

पेड़ से आगे निकलते ही बड़ा स्तूप घर दिखा जिसके दीदार का इंतजार था सुबह से। धूप भी नही है, नगर पानी बरसने के आसार लग रहे हैं। जो की ना हो तो बेहतर।

अशोक स्तभ के पास स्तिथ कुआँ

अशोक स्तंभ

स्तूप से गुजरते हुए उस जगह पर आ खड़ा हुआ जहाँ मजदूर काम कर रहे हैं। सूचना दीवार पर अशोक स्तंभ का नाम लिखा है। जिसे जोड़ने का काम ये मजदूर कर रहे।

जो चार सिंह कभी मौर्य साम्राज्य के चिन्ह हुआ करते आज वो भारत सरकार का चिन्ह हैं। यहाँ चारो ओर सिर्फ छोटे छोटे स्तूप हैं। कुछ अलग आकृति के बने गोलाकार भी हैं जो कुआं मालूम पड़ रहा है।

स्तंभ से दूर आगे सीढी चढ़ कर ऊपर आ गया। यहाँ से और भी सुंदर तस्वीर आ रही है। बस कमी है तो मेरी तस्वीर लेने वाले की।

आगे एक बड़े से हरित मैदान पर दो परिवार अपने बच्चों के साथ छुट्टी में मौज मस्ती करते नजर आ रहे हैं। कुछ ही आगे जाली है। जहाँ लोगों की भीड़ है। समझ नहीं पा रहा हूँ आखिर वहाँ ऐसा क्या है? जा कर ही देखना पड़ेगा।

तेज कदमों के साथ यहाँ आया तो देखा कुछ हिरण। ये हिरण देख मुझे सलमान खान की याद आ गई। दोनो का एक दूसरे से छत्तीस का आंकड़ा है पर मेरा नहीं। बहुत ही अद्भुत और मनमोहक।

अफ्रीका प्रांत के कुछ विदेशी सैलानी भी मौजूद हैं यहाँ। चिड़ियाघर से हट कर आगे बढ़ कर देखा तो एक काफी बड़ा हिस्सा मैंने छोड़ दिया है। जिसे देखने के लिए उतर पड़ा जीने से नीचे।

इस हिस्से ने कमरे बने हुए नजर आ रहे हैं साथ ही स्नानघर भी। और आगे बढ़ने पर टूटे फूटे पत्थर और स्तंभ को एक जगह एकत्रित करके सजाया गया है। जिनकी कलाकृति देखने लायक है।

कुमारदेवी के अभिलेख की विषय वस्तु

पिछले रास्ते से होते हुए स्तंभ के समीप आ गया। पर इस बार दूसरे रास्ते पर चलते हुए बैठने वाली जगह की तरफ बढ़ने लगा। बीच में देखने को मिला कुमारदेवी की विषय वस्तु। जो संक्षेप लिखी हुई है।

एक स्तूप जगह से दूसरे। पास में पड़ी बेंच पर बैठ कर कुछ देर सुस्ताने लगा। आसपास टहल रहे लडको को जी तो कर रहा है फोटो खिंचवा लूं पर अंत में मन ही ना किया।

तिरछे छोर पर स्तूप है और मैं यहाँ आराम कर रह हूँ। जैसे थकान समा गई हो शरीर में। कुछ देर सुस्ताने के बाद निकल पड़ा स्तूप की तरफ।

यहाँ कई जने अपने परिवार के साथ लूट उठाने आए हुए हैं। ऐसे ही एक वृद्ध महिला अपने बच्चों का हाथ पकड़ कर ऊपर चढ़ने की कोशिश कर रही हैं। डर है कहीं इनका पांव साड़ी में फसकर ये गिर ना जाएं ।ऐसा हुआ भी नहीं।

पास में खड़े दो लड़के एक दूजे की तस्वीर ले रहे हैं। मौका देख कर मैंने भी अपनी तस्वीर स्तूप के साथ निकलवा ली।

आज अच्छी बात ये रही की जरा भी धूप नहीं निकली। घूमते हुए आखिरकार विशालकाय स्तूप की ओर पहुंच ही गया।

ये स्तूप प्रेम शांति का अनोखा उदाहरण है। जिसके निचले भाग में आकृति और भाषा उकेरी हुई है। आज जैसा ये स्तूप दिख रहा है किसी समय में ऐसा नहीं होगा बल्कि और भी जर्जर हालत में रहा होगा।

स्तूप को निहारते हुए गोल चक्कर तक लगा डाला। छोटे बड़े स्तूप देखते हुए निकलने लगा बाहर की ओर।

सारनाथ स्तूप के सामने लेखक
वाराणसी से सारनाथ से प्रयागराज तक का कुल सफर 166 किमी

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