संतो से ले कर क्रांतिकारियों का गढ़ प्रयागराज

उत्तर प्रदेश | प्रयागराज | भारत

संगम यात्रा

कल सारनाथ का सफर काफी अच्छा रहा। सारनाथ के बाद कुछ वक्त आसपास के मंदिरों में भी गुजारा मगर सभी बंद थे।

कल शाम काशी से प्रयागराज रवाना हो गया था। राज जिनके घर पर रुका हुआ हूँ उन्होंने मेरा जोरदार स्वागत किया। स्वादिष्ट भोजन और व्यंजन सहित।

कल रात ही सोने से पहले ये सुनिश्चित कर लिया था की सुबह सवेरे संगम निकालना होगा। सो अब उठ कर वहीं जाने का इच्छुक हूँ। संगम में ही डुबकी लगाऊंगा।

राज ने ही सुबह मुझे उठाया। अमूमन छह बजे नियमित रूप से उठ जाता हूँ। आज भी आंख खुल गई थी पर घड़ी देख कर फिर से गया।

बीस मिनट में तैयार हो कर निकल पड़ा संगम पैदल ही। घर के बाहर गली मोहल्ले से शुरुआत करते हुए पुल तक पहुंचना हुआ। इस बीच मेरे घुमक्कड़ साथी राज ने प्रयागराज से जुड़ी रोचक जानकारियां उपलब्ध कराईं।

कई जगह सरकार की पोल भी खोली कई जगह काम भी गिनाए। इनके अनुसार अभी जिस मार्ग पर चल रहा हूँ अगर वो ना हो तो शहर ही डूब जाए।

भारी बरसात में एनडीआरएफ का दस्ता यहाँ के स्थानीय निवासी को ले जाते हैं। प्रयागराज में कई जगह तालाब देखने को मिल रहे है जो अमूमन कई जगहों पर सूख चुके हैं।

बरसात कम होने के कारण या यूं कहा जाए की बरसात का मौसम बीत जाने के बाद गंगा से किनारे तक पानी का स्तर कम और कुछ दिनों बाद समाप्त हो जाता है।

सुबह सवेरे राज पैदल चलने के इच्छुक तो हैं ही पर साथ में ये भी देख रहे हैं की कही कोई रिक्शा मिल जाए तो संगम तक चल लिया है।

दूरी का अंदाजा नहीं है मुझे शायद इसलिए भी ज्यादा बेफिक्र चल रहा हूँ। पर धूप बहुत ही तेज़ है। लोग सुबह सवेरे यहाँ टहलने और दौड़ लगाते भी दिख रहे हैं।

बाईं तरफ इशारा करते हुए राज ने बताया की यहाँ पर गाड़ियों का आवाजाही पर रोक है ताकि लोग सैर सपाटे और कसरत के लिए आ सकें।

कुछ ही देर में एक रिक्शा चालक धीरे से अपनी बैटरी रिक्शा से निकला। राज साहब ने आवाज़ दे कर रोका। संगम तक की बात हुई पर सहमति ना बनी।

रिक्शा चल पड़ा, कुछ आगे रुक कर पीछे मुड़ कर इंतजार करने लगा। पहुंचा पर फिर बात ना बनी। पर न जाने इस चालक के मन में क्या चल रहा है। कुछ और आगे जा कर फिर रुक गया। पर इस बार भी बात ना बनी।

पैदल ही सही धूप में चहलकदमी हो जाएगी। राज ने यहाँ के कई राज उजागर किए। जिनमे से एक यहाँ पर गंगा के सूख जाने के बाद खेती।

गंगा के ऊपर बने दो पुल के बीच का नजारा मनमोहक है। एक अंग्रेजों द्वारा निर्मित और एक भारतीयों द्वारा। दक्षिण भारत के वास्तुकला के मुताबिक बना सूर्य मंदिर काफी मनमोहक है।

पर ये मंदिर फिलहाल बंद है और इसे सिर्फ मेले के दौरान ही खोला जाता है। कुछ आगे है बड़े हनुमान मंदिर। एकमात्र ऐसा मंदिर जहां हनुमान जी लेटे हुए अवस्था में हैं।

संगम स्नान

मंदिर से कुछ ही दूर घाट है जहां संगम में स्नान की योजना है। भीड़ काफी है। राज ने बताया की मेले के दौरान यहाँ उच्चायतम दर्ज की व्यवस्था चाक चौकसी होती है जो कुंभ मेले के साथ ही खतम हो जाती है।

भारी भरकम मात्रा में भीड़ होती है। जब अभी इतनी भीड़ दिखाई पड़ रही है तो कुंभ में जाने क्या आलम होता होगा। अब वो प्रसिद्ध कहावत समझ सकता हूँ की “कुंभ मेले में बिछड़े कई वर्षों बाद मिले”

बरसात के काल के बाद यहाँ पानी का स्तर बहुत ही नीचे चला जाता है। घाट किनारे काफी संख्या में नाव खड़ी हैं। जो भक्तों को संगम तक ले कर जाती हैं।

घाट पर पहुंच कर एक तखत पर अपने वस्त्र रखे और किनारे आ गया स्नान करने। प्रशासन की तरफ से बकायदा रस्सी से जगह निर्धारित कर दी गई है ताकि कोई गलती से भी आगे ना जा सके।

पानी साफ है पर फूल माला भी तैरती हुई नजर आ रही हैं। पानी में धीरे धीरे उतरते हुए पूरा ही समा गया। शुरुआत में ठंड लग रही थी पर अब नहीं।

कई परिवार सहित स्नान का मजा ले रहे हैं। कई वृद्ध पति पत्नी साथ में हाथ पकड़ कर डुबकी लगाते हुए देखे जा सकते है। कई लोग स्नान के बाद सूर्य की पूजा अर्चना करते भी दिख रहे हैं।

यहाँ पानी पर भी कुछ करता धरता समान बेंचते हुए देखे जा सकते हैं। ऐसे ही नाक बंद करके डुबकियां लगा रहा था। पानी से बाहर निकलते ही दो चार विक्रेताओं को से खुद को घिरा पाया।

समान लेने से अस्वीकार करने के बाद फिर डुबकी लगाई और इस बार बाहर आते समय सारे तीतर बितर हो चुके थे। तकरीबन दस मिनट टेक चले स्नान के बाद मैं निकल आया बाहर और चल पड़ा इस तख़त की ओर जहां राज जी बैठे हैं।

संगम में स्नान के बाद घाट पर लेखक

बच्चे महिलाए उत्साह के साथ संगम में डुबकी लगाते हुए देखे जा सकते हैं। कपड़े पहन कर निकल पड़ा। पर लगा यहाँ तक आया और एक भी तस्वीर ना ली। इसलिए सड़क पर से घूम कर वापस आया और घट किनारे झाउआ भर तस्वीर लेने का सिलसिला शुरू हुआ।

यहाँ लोग अपने गुजरे हुए परिवारजनों का श्राद्ध भी कराने आते है जो अमूमन देखा जा सकता है। रास्ते में पड़े गंगा किनारे मुर्दा घर भी थे जो किसी और जगह होने चाहिए।

साधु संत जन्म पत्री ले कर गंगा किनारे अपनी रोजी रोटी चला रहे हैं। जी भर के तस्वीर और चलचित्र लेने के बाद तय हुआ अक्षयवृत और बड़े हनुमान मंदिर जाने का।

प्रयागराज किला

हाथो में जूते लिए सड़क पर से रास्ता पकड़ते हुए अक्षयवृत निकल पड़ा। सामने देखने में आता है प्रयागराज किला जो अकबर ने अपने शासनकाल में बनवाया था। अक्षयवृत को भी उसे किले की चार दीवार में कैद कर लिया था।

यह किला आज के समय में भारतीय सेना संचालित कर रही है। जिसमे वो अपना कार्यालय भी खोले हुए है। कुछ वर्षों पहले तक अक्षयवृत भी सेना के ही जमीन पर था। पर आज के समय में इसे आम जनता के लिए खोल दिया गया है।

राज ने बताया की कुंभ मेले के दौरान सुरक्षा का सारा इंतजाम यहीं से किया जाता है। यहीं इसी किले से लोगों पर नजर रखी जाती है। मतलब मेले के दौरान सबसे प्रमुख गड़ यही है। किले के ऊपर अलग से एक विशेष सेल बनाया जाता है देखरेख के लिए।

किले के प्रवेश द्वार तक पहुंचते ही राज ने प्यास से उबरने के लिए पानी की बोतल खरीदी। प्यास तो मुझे भी जोरों की लगी है।

पानी पीने के बाद भीतर प्रवेश कर गया। यहाँ हर जगह चारों ओर सूखे पत्ते पड़े हुए हैं। द्वार पर महिला सुरक्षाकर्मी। पहले द्वार को पार करने के बाद दूसरे द्वार से गुजरते हुए अक्षयवृत के मैदान में आ गया।

प्रयागराज किला

अक्षयवृत

कहा जाता है की 1583 में किले में कैद होने के बाद 1950 में न्यायमूर्ति और विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष काटजू ने इसे खोजा था।

अक्षयवृत का बखान पुराण आदि ग्रंथों में भी है। इसे खोज निकलने की भी अनोखी कहानी है। चंडी पत्रिका में प्रकाशित एक लेख से प्रभावित काटजू ने इस जगह की खोज करने का निर्णय लिया।

किले के ब्रिगेडियर और कमान अधिकारी की सहायता से खोज शुरू हुई। वृक्ष के चिन्ह ना मिलने पर संतों और योगियों से पूछताछ हुई। तब ये योगी की सहायता से किले के पीछे यमुना की ओर ले गए।

किले के किसी स्थान में वृक्ष की चोटी दिखी पर वहाँ तक पहुंचना संभव ना था क्योंकि वो स्थान बंद था। वृक्ष तक पहुंचने में एक सप्ताह लग गया।

कहा जाता है कितने ही प्रलय आए और गए पर ये वृक्ष कभी नष्ट नही हुआ।वैज्ञानिकों के शोध के अनुसार इस वृक्ष की उम्र 5267 साल बताई गई है।

पूर्व के कई लेखकों ने इस वृक्ष का जिक्र अपने लेख में किया है। जिसमे बताया गया है की लोग इस वृक्ष पर चढ़कर मोक्ष की आस में यमुना में कूद कर जान दे देते थे।

मंदिर के प्रांगण में पहुंच कर तय हुआ मैं और राज बारी बारी से मंदिर में जायेंगे। मैं जूते रखकर निकल आया मंदिर में। प्रवेश द्वार पर बैठे महात्मा ने चार युगों से जुड़ा भगवान विष्णु का इतिहास बताया।

अंत में दान पुन मांगने लगे। मैं मंदिर में लगी हनुमान जी के पैर छूते निकल आया नीचे की ओर। यहाँ दरवाजे पर द्वारपाल के बाद हर भगवान की मूर्ति है। हर मूर्ति के आगे विराजे पंडित सिर्फ दक्षिणा मांग रहे हैं।

थोड़ा आगे अक्षयवृत की जड़ें देखने को मिल रही हैं। जिनके बाहर बैठे पंडित जी इसका इतिहास बता रहे हैं। धार्मिक लिहाज से इस वृक्ष का बहुत अधिक महत्व है।

पातालपानी का वो कुआं भी जिसे अकबर ने पट करवा दिया था। कहा जाता है यहाँ लोग इस कुएं में कूदकर जान दे देते थे। आगे शनि देव की मूर्ति स्थापित है जिसके सामने तेल का बहुत विशाल दिया रखा हुआ है।

सभी देवी देवताओं के दर्शन करने के बाद मैं निकल आया बाहर। नीचे जिस वृक्ष की जड़े मौजूद है बाहर है वो विशालकाय पेड़। कहा तो ऐसा भी गया है की इस वृक्ष को नष्ट करने और मिटने की कोशिश भी मुगल शासकों द्वारा की गई पर वरदान प्राप्त यह वृक्ष बार बार उगा।

मंदिर के बाहर वृक्ष के चक्कर लगाते हुए आ गया उस स्थान पर जहां राज भाई विराजमान हैं। उन्होंने मंदिर ना जाने की इच्छा जताई। कुछ तस्वीरें लेने के बाद मैं निकल पड़ा बड़े हनुमान मंदिर।

धार्मिक दृष्टि से इस वृक्ष की महत्वता बहुत अधिक है। कहा जाता है माता सीता ने इसी स्थान पर प्रार्थना की थी। ब्रम्हा जी ने धरती को बचाने के लिए इसी स्थान पर यज्ञ किया था। भगवान राम ने सीता और लक्ष्मण सहित इसी स्थान पर विश्राम किया था। तभी से ही यह अख्स्यवृत है।

अक्षयवृत के सामने लेखक

बड़े हनुमान मंदिर

टहलते हुए मैं प्रसिद्ध बड़े हनुमान मंदिर आ पहुंचा। हर वर्ष जहां गंगा यमुना और सरस्वती इस मंदिर में प्रवेश करती हैं। सुबह के विपरीत मंदिर में भीड़ कम है और दर्शन भी समय रहते हो जायेंगे।

बाहर ही राज भाई इंतजार करते रहे और मैं मंदिर में प्रवेश कर गया। जयघोष और जयकारे के बीच मैं टीन की छांव में भीतर आ गया। सुरक्षाकर्मी हर जगह तैनात हैं।

भक्तों की भारी भीड़ और धक्का मुक्की के बीच सीढ़ियों से नीचे की ओर उतरने लगा। भक्तगण प्रशाद, चढ़ावा फूल माला सब ले कर पधारे हैं।

चौकोर टुकड़े में हनुमान जी नीचे लेटी हुई हुए मुद्रा में दिखाई पड़ रहे हैं। पुष्पों से सजे हनुमान जी का मुख ही ढूंढने में मुझे समय लग रहा है।

ध्यान से देखने पर पता लगा दूसरी तरफ सिर है जहां से लगातार पंडित जी फूल हटा रहे हैं। भक्तगण अपनी फूल की टोकरी पंडित को दे रहे हैं और वो उन्हें चढ़ावे के बाद टोकरी वापस कर रहे।

सुरक्षाकर्मी भीड़ को एक जगह खड़ा होने से रोक रहे हैं। उन्हें आगे भी बढ़ते जा रहे हैं ताकि ज्यादा लोग हनुमान जी के पास एकत्रित ना हों। मंदिर में लगातार बजे द्वारा भजन कीर्तन हो रहा है जो सुनने में काफी मनमोहक है।

हनुमान जी के दर्शन के बाद बाहर निकल आया। यहाँ कुछ ऊपर सीढ़ी चढ़ कर राम जानकी मंदिर है। यहाँ पर दर्शन के बाद बाहर निकलने लगा। हवन कुंड भी यहीं स्थित है जहां कुछ पुजारी हवन करने को तैयार बैठे हैं।

इंतजार कर रहे राज भाई के साथ मैं निकल पड़ा घर की ओर। मंदिर के ठीक बाहर बट रहे प्रशाद ग्रहण किया और रिक्शा से घर को निकल गया।

लेटे हुए हनुमान मंदिर के बहार

चंद्रशेखर आजाद पार्क

घर में भोजन, स्नान और कुछ देर विश्राम के बाद ठीक बारह बजे हम निकल पड़े पैदल मशहूर चंद्रशेखर आजाद पार्क जिसे अल्फ्रेड पार्क के नाम से भी जाना जाता है।

वही पार्क जहां वीर क्रांतिकारी चंद्रशेखर तिवारी ने क्रूर अंग्रेजो से लड़ते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। तेज धूप होने के कारण ज्यादा देर पैदल चला ना जा सका। बेहतर रहा ऑटो में लदकर पार्क के प्रवेश द्वार पर उतरा।

राज ने टिकट घर से दो टिकट खरीदे और हम भीतर आ गए। प्रवेश द्वार के ठीक सामने मूर्ति स्थापित है। एक हाथ मूछों पर ताव देते हुए, दूसरे हाथ में अपनी पिस्टल लिए हुए भारत मां का ये वीर सपूत सीना ताने खड़ा है।

भीड़ ना के बराबर है। आसपास कुछ विद्वानों के मुताबिक ठीक इसी जगह पर आजाद शहीद हुए थे। सब आसपास की भीड़ ने जब तबियत से मूर्ति के साथ तस्वीरें निकलवा ली तब मैने भी कुछ तस्वीरें ली।

कहा जाता है की गद्दार विश्वेश्वर सिंह की मुखबिरी की वजह से उस दिन अंग्रेज अफसर नॉट बावर को बुलावा भेजा था। बाद में गोलीबारी के दौरान आजाद ने ही ठाकुर को गोली मारी थी जो उसके जबड़े में लगी थी। अस्पताल ले जाते समय वो मर गया था।

चंद्रशेखर आजाद पार्क

आसपास भ्रमण के बाद हम यहाँ की मशहूर पुस्तकालय के लिए पैदल ही निकल गए। रास्ते में पड़े संग्रहालय में भी जाने की इच्छा हुई पर जब आसमान छूते दाम पता चले तब विचार त्याग दिया।

अंग्रेजो के काल की पुस्तकालय में राज भाई बचपन से आ रहे है पढ़ाई लिखाई करने। जो बच्चे अंदर नहीं पद रहे वो बाहर घास के ऊपर बैठे लिखा पढ़ी कर रहे।

भवन के भीतर घुसा तो देखा सैकड़ों बच्चे पढ़ाई में व्यस्त हैं। पंजिका में नाम दर्ज कराने के बाद ही भीतर जाने दिया जाता है। बाहर लगे पानी की टंकी से अपनी प्यास बुझाई और चल पड़ा आनंद भवन की ओर।

यह पार्क बहुत ही बड़ा और हरित है। जहां नौजवान युवक युवतियां हर कोने में झुझरू पढ़ाई करते दिख रहे हैं।

पार्क से कुछ ही दूरी पर आनंद भवन है जहां से भारत के तीन प्रधानमंत्री निकले हैं। पर हम पैदल चलने के बजाए ऑटो में लदकर निकल पड़े। आज शहर की साफ सफाई पर भी बहुत ध्यान दिया जा रहा है शायद कोई बड़ा नेता आने को है।

आनंद भवन

आनंद भवन के ठीक सामने उतरकर किराया चुकाया और सड़क पार कर भवन में आ गया। दो टिकट कटने के बाद भवन में प्रवेश के लिए चेहरा ढकना भी जरूरी है।

भवन में पहली मंजिल का टिकट अलग है और धरातल का अलग। दोपहर के खाने के समय होने के कारण कुछ देर के लिए सभी दरवाजे बंद हैं।

जब खुले तो देखा भवन में मोतीलाल, जवाहर लाल की चित्रों से सुसज्जित है। नेहरू परिवार का इतिहास बकायदा अलग कमरे में मौजूद है। यहाँ तक कि इंदिरा गांधी की जीवनी से लेकर उनकी शादी तक।

ज्यादा समय ना देते हुए दिन के दो बजे तक मैं आनंद भवन से निकल कर घर को निकल गया। शाम होने से पहले ट्रेन पकड़ कर कानपुर आना भी उचित रहा।

आनंद भवन
संगम से आजाद पार्क से आनंद भवन तक कुल सफर 34किमी

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