सफर सुरम्य समुद्र तटों वाले विशाखापत्तनम में

छत्तीसगढ़ | जगदलपुर | भारत

सुस्त चालक

गाड़ी चली तो सही लेकिन बैलगाड़ी की रफ्तार से! ड्राइवर साहब इतनी धीमी रफ्तार से गाड़ी चला रहे हैं कि मुझे उन्हें कदम कदम पर टोकना पड़ रहा है।

कई कई जगह वाहन रोक कर वो खुद चल कर सवारी पकड़ पकड़ कर बैठा रहे हैं।

मुझे दुकानदार ने सचेत कर दिया था कि ट्रेन ऐप में ट्रेन का समय गलत दिखा रहा है।

उनके मुताबिक ट्रेन आज दिन में दो बजे की बजाय बारह बजे है। अन्य लोगो से पुष्टि करने पर जानकारी सही निकली।

खुद ड्राइवर बाबू ने भी यही बताया। लेकिन यह ज्ञात होते हुए भी इतना धीमे चला रहे हैं।

इनको तो अबतक इस गाड़ी को रॉकेट बना देना चाहिए। जब मैंने टोंका तो बताया कि इससे तेज चलाने पर उनकी गाड़ी के पुर्जे खुल जाएंगे और जहाँ की तहां खड़ी हो जाएगी। 

सड़क पर और कोई वाहन भी नहीं दिख रहा है जगदलपुर जाने के लिए।

मजबूरी का नाम… गिरते पड़ते इस बैलगाड़ी जीप से कटापड़ पहुंच गया। जिस रफ्तार से ले कर आए हैं उससे यही लग रहा है की शायद ही ट्रेन मिले।

पैसे चुकाए और भागकर फौरन जगदलपुर स्टेशन के लिए टेंपो में बैठ के निकल गया।

ये टेंपो वाला सही निकला। सही रफ्तार के साथ बिना किसी देरी के। या सवारी के लालच में जगह जगह गाड़ी नहीं रोक रहा।

समय रहते स्टेशन के द्वार पर छोड़ दिया। भगवान का शुक्र है ट्रेन मिल गई।

अगर यह ट्रेन धोखे से भी छूट जाती तो ना जाने आज पूरा दिन कैसे बिताया जाता यहाँ।

इस बार स्लीपर क्लास टिकट बुक नहीं कराया। जैसा कि सोचा था वैसा ही हुआ जनरल डिब्बे खाली हैं।

ऐप से जनरल डिब्बे का टिकट आरक्षित करवा लिया है। ट्रेन खाली है। मैं ट्रेन के D2 डिब्बे में आ कर बैठ गया।

टीटी साहब सबका टिकट जांचते हुए मेरी ही तरफ बढ़ रहे हैं। टिकट दिखाया पर इनको ना जाने क्यों ना समझ आ रहा है।

ऐप से शायद पहले किसी यात्री का टिकट देखा नहीं ऐसा प्रतीत हो रहा है।

लो सफर शुरू हो गया

मौसम हसीन सुहाना सफर

कुछ देर में ट्रेन चल पड़ी। मैं खिड़की के पास ताजी हवा खा राह हूँ। स्टेशन दर स्टेशन रुकते हुए चल रही है।

जगदलपुर से मुख्य स्टेशन पर आ कर खड़ी हो गई। यहाँ ट्रेन का इंजन आगे वाले डिब्बे से हटा कर पिछले डिब्बे में लगाया जा रहा है।

शायद अब ट्रेन दूसरे रूट पर चलेगी। ये स्टेशन दक्षिण छत्तीसगढ़ का प्रमुख स्टेशन जान पड़ रहा है।

जो अलग अलग दिशाओं में ट्रेन का संचालन हो रहा है।

सफ़र शानदार गुजार रहा है। चारो ओर हरियाली ही हरियाली नजर आ रही पूरे रस्ते।

ट्रेन के इस रूट पर काफी टनल हैं। कुछ लंबे कुछ छोटे।

जब भी ट्रेन टनल से गुजरती अंधेरे में लोग सिटी मारते और हुड़दंग करते हुए जताते की ट्रेन में भीड़ है।

ट्रेन के आसपास के इलाके में कुछ निर्माण कार्य चल रहा है। जिसके कारण जमीन को सपाट बनाया गया है।

शायद यहाँ पर एक और रूट बनाने की तैयारी चल रही है। ट्रेन के आगे बढ़ने पर देखने को मिलता है एक पुल का निर्माण। जिसे दूसरी तरफ रखा गया है। 

खेतों में लोग खेती करते भी देखे जा सकते हैं। जो भारतीय रेलवे की खूबसूरती कहूँगा।

की किनारे हरियाली और खेतों से ट्रेन जब गुजरती है तो मन हरा हो जाता है।

आगे छोटे से बने तालाब में भैंसों का दल पूरे परिवार सहित स्नान करते देखा जा सकता है।

तालाब की संख्या देश भर में बहुत ही कम रह गई है। छुटपन में तो दिख भी जाते थे अब वो भी दुर्लभ है।

सफर करते हुए तीन बज गए हैं। मौसम सुहाना है। बारिश होने के संकेत दिख रहे हैं।

निर्माण होगा पुल का कार्य प्रगति पर

काल्पनिक दुनिया

शाम से ही गरज के साथ बारिश चालू हो गई।

रात तक तो ये हाल हो चले हैं कि जब जब बिजली कड़कती है तब तब ट्रेन से झाकने खाई कि गहराई और चमकते पहाड़ को देख यही भय सताता है कि पता नहीं किस लोक में चल रही है ट्रेन।

ऐसी कड़कड़ाती बिजली के द्वारा उत्पन्न किया गया नजारा शायद ही पहले कभी देखा हो।

घनघोर अंधेरा में ट्रेन चले जा रही है। ना कहीं रोशनी न कहीं आदमी। बस्ती भी होगी तो बिजली नहीं।

मूसलाधार बारिश अच्छी तो लग रही है साथ ही डरावनी भी।

घुमक्कड़ी समुदाय से विशाखापटनम में हर्षा नाम के जनाब से परिचय हुआ। जिनके बुलावे पर मैं जा रहा हूँ।

रात्रि के आठ बजे तक अराकू पहुंच गया।

अराकू भी पर्यटन के लिहाज से काफी खूबसूरत जगह है। लेकिन पर्यटन के लिए मैंने यह स्थान नहीं चुना और ना ही मुझे इसके बारे में ज्यादा जानकारी है।

शायद कभी भविष्य में यहाँ घुक्कडी के लिए आऊं।

भैंस परिवार एकसाथ खुले तालाब में स्नान करती हुई

विशाखापट्टनम में विलम्ब

आराम से रात तक विशाखापट्टनम में दाखिल हो गया। सब कुछ समय से चल रहा है पर अकारण ही ट्रेन को स्टेशन के आउटर पर रोक दिया गया।

इंतजार की घड़ी लंबी होती गई। सवारियों का उतरने का सिलसिला भी चालू है। अकारण विलंब हो रहा है।

बहुत देर तक इसी इंतजार में बैठा रहा की ट्रेन अब चल पड़ेगी। ट्रेन फिर भी नहीं चली। अब जा कर घंटे भर बाद निर्णय लिया पैदल निकलने का।

बैग उठाया कमर कसी और बाएं तरफ दिख रहे शहर की गलियों की ओर चल पड़ा।

आउटर में ही ट्रेन से उतरकर पैदल चलने लगा। रोशनी और अंधेरे के बीच ट्रेन में बैठे लोगों ने चेताया संभाल कर जाने को

गली गली मुड़ते, लोगों से रास्ता पूछते हुए तकरीबन डेढ़ किमी चलने के बाद मुख्य सड़क तक आ पहुंचा।

सड़क पार करने गूगल नक्शे के सहारे टेंपो में बैठ कर संतोष नगर के लिए निकल पड़ा।

अब कहीं जा कर थोड़ी राहत की सांस ली है। अन्यथा वजनी बैग लादे लादे इतना पैदल चलने पर हालत पस्त होती दिख रही थी।

अब जब प्रदेश नया है तो लोग भी नए हैं और भाषा भी।

वार्ता करने में कुछ समस्याओं का सामना तो करना ही पड़ रहा है। ना इन्हे मेरी भाषा समझ आ रही है ना मुझे इनकी।

अंग्रेजी भाषा ही सहारा है। हालांकि कुछ लोग हिंदी समझ पा रहे हैं। पर मुझे तेलुगु का एक अक्षर भी समझ नहीं आ रहा।

मंज़िल तक पहुँचने का इंतज़ार करते ऐश्वर्य तिवारी

मददगार भारतवासी

संतोष नगर पहुंच कर पान की गुमटी पर बैठे चाचा से अगनांपुडी जाने का साधन पूछा।

खुशकिस्मती से इन्हे हिंदी आती है। बातों को ध्यान से सुनते हुए कौनसी बस पकड़नी है वो सब बताया।

बैग ले कर एक किनारे खड़ा मैं बस का इंतजार करने लगा। बस के आते ही चाचा ने भी इशारा किया और मैं भी जान चुका था।

गूगल नक्शे के भरोसे खड़ा रहता तो ना जाने कब तक खड़ा होना पड़ता।

बस गाजूवाक चौक तक जा रही है। टिकट से टिकट कटाया और खड़ा हो गया एक किनारे बैग सहित।

सीट पर बैठे लोग भी मदद करने को आतुर हैं। गाजूवाका के आते ही सबने उतरने का संकेत दिया।

गाजूवाका पहुंच कर से अगनांपुडी के लिए दो बार बस बदली। 

यहाँ पर हर्षा का फोन भी आ गया। आने में थोड़ा विलंब हो चुका है।

यहाँ से टेंपो में बैठ कर अगनांपुडी निकल लिया। अब थोड़ा सुकून है की पहुंच जाऊंगा। रात के दस बजे दूसरे शहर में इस तरह आशियाना ढूंढ रहा हूँ।

एक अलग ही किस्सा चल रहा है। रात बिरात पराए शहर में अनजान जगहों पर भारी भरकम बैग के साथ ऐसे भटक रहा हूँ।

कई कई बार मानसिक तनाव भी रहता है की आज रात क्या होगा? कहाँ गुजरेगी रात? भोजन मिलेगा या नहीं? सही सलामत पहुंच पाऊंगा या नहीं और भी कई बातें।

गूगल नक्शे की सहायता से टेंपो से बताई हुई जगह पर थोड़ा सा आगे निकल गया।

मुझे हर्षा ने टेंपो से निकलते हुए देख लिया। तुरंत फोन घुमाया और वहीं उतर जाने को बोला।

वो अपने वाहन से मुझे फ्लैट तक ले के आए। आज सामुदायिक मित्र हर्षा के घर पर ही रात गुजरेगी। कल सुबह उठ के सोचता हूँ यहाँ के बारे में।

चित्रकूट जलप्रपात से जगदलपुर से विशाखापत्तनम तक कुल यात्रा 400km

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