भारत का सबसे स्वच्छ रेलवे स्टेशन: गुवाहाटी

गुवाहाटी | असम | भारत

सफर पूर्वोत्तर भारत के लिए

परसों रात यानी 12 जुलाई को नई दिल्ली से गुवाहाटी के लिए ट्रेन पकड़ने की कवायद शुरू हो गई थी।

दिनभर बैग लगाने में ही बीत गया। रुका भी किसी दूसरे के खाली कमरे में था। और स्थाई निवासी हैं वो इस समय कानपुर में हैं।

सुबह उनका भी कॉल आया कि उनका भी सामान लेते आना जिसे वो कानपुर स्टेशन पर ले लेंगे। दिनभर की मेहनत के बाद शाम को कहीं जा कर बैग लग पाया।

एक अलग से सामान का झोला भी जिसे कानपुर में रखवाना है, और उसमें मेरा समान है। भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों में कितना समय लगेगा इसका अंदाज़ा तो नहीं लगाया है अभी।

पर कुल मिला कर महीने भर के ऊपर समय निकल जाएगा ऐसी गणना है। दिन में खाने बनाने के बाद शाम को खाने की बारी आई।

खा पी कर दिल्ली स्टेशन पर पहुंचा। स्टेशन इतना बड़ा की समझ ही ना आए की प्लेटफॉर्म कहां कहां हैं। भागते हुए प्लेटफॉर्म नंबर एक से दाखिल होने लगा।

जहां सुरक्षा जांच हुई। जिसमें कुछ ना निकला। ट्रेन निकलने के कुछ ही मिनट पहले ही ट्रेन में चढ़ कर कश्मकश खतम हुई।

कल सुबह ऐसा पहली बार हुआ जब कानपुर से गुजरना हो रहा है वो भी यहाँ बिना उतरे हुए। अगर कानपुर से गुवाहाटी के लिए बैठता तो छह घंटे तो बच ही जाते।

कानपुर में साथी घुमक्कड़ के मित्र शिवम् को कमरे की चाभी और उसका सामान थमाया और कुछ अपना भी। ये जिम्मेदारी सौंप कर शिवम् से भी अलविदा लिया।

मेरे ट्रेन के डब्बे में दो आदमी रातभर दरवाजे के पास सो कर ही बीता दी। बुरे सपने में भी मैं ऐसा ना करूं। मैंने इससे भी बुरा देखा है जब पुणे से जहानाबाद जाते समय जनरल डब्बे से सफर करना पड़ा था।

भीड़ इस कदर थी जिसका कोई हिसाब नहीं। कैसे वो नौ घंटे कटे पता नहीं चला। पर उतरने से कुछ स्टेशन पहले आंखे तब खुली की खुली रह गईं जब सीट के नीचे से एक महिला अपने बच्चे के साथ निकली।

ये देख मैं तो हतप्रभ रह गया था बाकियों के लिए कितना था कहना मुश्किल है।

सोते हुए खुली आँखों से साथ में किताब पढता मजदूर

बाढ़ से श्रतिग्रस्त बंगाल बिहार

आज ट्रेन बिहार और रात तक बंगाल के कुछ हिस्सों से गुजरेगी। बारिश के मौसम ने हाहाकार मचा रखा है चारों तरफ। हर जगह खबर है ब्रम्हपुत्र के रौद्र रूप की।

अखबार हो या फिर टीवी। चर्चा का विषय ही आसाम की बाढ़ है। इतनी विकराल बाढ़ की लोगों को पलायन करने पर मजदूर कर दिया है।

दिनभर की बारिश और बिहार बंगाल के जगह जगह हिस्सों से ट्रेन गुजर रही है। पानी हर जगह लबालब भरा हुआ है। बाढ़ जैसे हालात हैं।

जैसी खबर भी सुनने में आ रही है कि आसाम और अरुणाचल प्रदेश का बाढ़ से बुरा हाल है। जाने वहाँ तक कैसे पहुंचा जाएगा।

पर मैं तो पहले आसाम, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम होते हुए मनीपुर के रास्ते नागालैंड से अरुणाचल मे दाखिल होऊंगा। तब तक तो काफी हद तक पानी निकल जाएगा और रास्ते भी सुगम हो जाएंगे।

बिहार के कई हिस्सों से निकलना हो रहा है जैसे बक्सर, पटना और भी मुख्य स्थल। शायद कभी आना होगा यहाँ पर। और घूमने लायक जगह भी।

लोगों के खेत पानी से भरे हुए हैं। कई खेतों में परिवार के परिवार जुटे हुए हैं फसल बचाने में। कई पानी को बाहर निकालते भी दिखाई दे रहे हैं।

खेतों में जलभराव

किसान देश का स्तम्भ है। अगर किसान ना हो तो शायद हमारा कोई अस्तित्व ही ना रहे। ऐसी मुसीबतों से भी सरकार को उचित कदम उठाने चाहिए।

ट्रेन में बहुत ही अजीब से शकल वाले मानव भी दिखाई पड़ रहे हैं। कुछ लोग इनको रोहंगिया मुसलमान भी मान रहे हैं। इनके भी काफी उपद्रवी किस्से सुनते आया हूँ।

रास्ते में एक घोर काली कोयले कि फैक्ट्री भी देखने को मिली। इतनी काली जितनी आप कल्पना कर सकते हैं। शायद कोयले कि फैक्ट्री ही पहली बार देख रहा हूँ मैं।

जलपाईगुड़ी उत्तर पूर्व भारत को भारत से जोड़ने में अहम भूमिका निभाता है। यहाँ तकरीबन आधा घंटा गाड़ी खड़ी रही। इस आधे घंटे में किन्नरों कि एक टोली आईं।

जिसमे से एक किन्नर तो किसी भी कोन से किन्नर ना लगा। पैसे मांगने की बात आई तो मुझ पर ही अटक गई। अमूमन मैं भिखारी या किन्नरों को पैसे देने में हिचकता ही हूँ।

पर ये किन्नर जिद पर अड गया। उसने पैसे लेने के लिए जैसे ही हांथ आगे बढ़ाया और कटा हुआ हांथ देख मैं सकते में आ गया। पूछा तो बोला की जिसको अपना माना उसने बार बार धोखा दिया।

इनके जीवन भी कई रेहेस्य से भरे होते हैं। ऊपर से ना लड़का ना लड़की ऐसे जीवन मैं भी दिनभर मुस्कुराहट लिए घूमते रहते हैं। खैर आज जेब से चंद पैसे निकाल कर देने ही पड़े, जैसे ये जिद्द पर अड गया भले ही पांच रुपए लेके जाएगा लेकिन पैसे लेगा ही।

आज 14 जुलाई है। सफर में पूरे दो दिन और दो रातें निकल गई हैं। ट्रेन का निकलना भी 13 को रात्रि के ठीक बारह बजे हुआ।

उम्मीद है शाम के चार बजे तक पहुंच जाऊंगा। वैसे तो इस ट्रेन के पहुचनें का समय तीन बजे है पर जिस तरह से रेंगते हुए आगे बढ़ रही है उससे उम्मीद कम ही है।

पहुंचने से पहले का झटका

गुवाहाटी के नजदीक पहुचनें पर मेरे पास घुम्मकड़ समुदाय से फोन आता है। ये उन्हीं का कॉल है जिनके घर में टिकासरा डालने जा रहा हूँ। फोन करके इक्तला करते हुए उन्होंने अपना प्रस्ताव वापस ले लिया।

बताने लगे उनके घर में कुछ अनहोनी हो गई है जिसके कारण वो किसी और शहर को निकल रहे हैं। जिस चीज़ से मैं एकदम निश्चिंत था अब उसकी खोजबीन करनी होगी।

अब कुल मिलाकर गुवाहाटी में ठिकाना खोजना पड़ेगा ठहरने के लिए। इन महाशय ने समय बेसमय एक काम पकड़ा दिया। या तो स्टेशन की डोरमेट्री में रुक जाऊंगा या फिर किसी होटल में।

एक रात की ही तो बात है कल कामाख्या देवी के दर्शन करने के बाद निकल जाऊंगा मेघालय की राजधानी शिलोंग। शिलोंग को भारत का स्कॉटलैंड भी कहा जाता है।

अनजान जगह पर खड़ी ट्रेन के दरवाज़े पर सुकून की सांस लेते लेखक

वापस से समुदाय में अन्य लोगों से बात की पर कोई भी ठहराने को राज़ी ना हुआ। आखिरी समय पर बहुत ही चुनिंदा लोग दरख्वास्त स्वीकारते हैं। समुदाय की एक मोहतरमा ने तो हद्द ही कर दी जब उन्होंने पैसे मांग कर मुझे शर्मिंदा कर दिया।

कामाख्या स्टेशन के आते ही काफी हद तक ट्रेन खाली हो गई। इस ट्रेन में कई सवारियां डिब्रूगढ़ तक जाएंगी। इससे बेहतर होता ये हवाई यात्रा कर लेते तो काफी समय बच जाता। खैर सबकी अपनी जेब अपना हिसाब।

घंटे भर के भीतर मैं कामाख्या होते हुए गुवाहाटी पहुंच गया। रास्ते भर जो बारिश मिली वो कम से कम यहाँ तो नहीं है। जैसे हर स्टेशन पर स्टेशन के नाम के सामने फोटो खीचवाता आया हूँ आया ऐसी गुवाहाटी के नाम कि कोई बोर्ड दिख ही नहीं रहा।

हल्की हल्की बारिश फिर मूसलाधार बारिश होने लगी। मन बना रहा हूँ यहीं कहीं स्टेशन पर सो जाऊं। समुदाय से एक मित्र अपना पूरा जोर लगा रहे हैं ताकि हमें कहीं रहने का ठीकाना मिल जाए।

भूख तो जोरदार लगी है। साथ ही रुकने का भी ठिकाना नहीं है। गुवाहाटी स्टेशन पर लगे टीवी स्क्रीन पर देखने को मिल रहा है कि यह स्टेशन स्वच्छता के मामले के देश जा नंबर एक रेलवे स्टेशन है।

ऐसा देखने को भी मिला। जिस हिसाब से स्टेशन पर साफ सफाई का सिलसिला चला उससे कुछ आशंका हुई थी।

स्टेशन की खासियत

स्टेशन की छत पर लगे बड़े बड़े पंखे अपने आप में अलग ही नमूने हैं।

इतने बड़े की पूरे स्टेशन में सबको हवा लग रही है। इस तरह के पंखे भारत के हर बड़े स्टेशन पर तो होने ही चाहिए। गर्मी का एहसास ही ना हो।

हेलीकाप्टर के पंखे गुवाहाटी के स्टेशन की छतों पर पाए गए

स्क्रीन पर दिखा रहे हैं कि कुछ दिनों में यहाँ सोलर पैनल लगा दिया जाएगा। जिसके बाद पूरा स्टेशन सोलर ऊर्जा पर ही जगमगाएगा।

ऐसा करने वाला भी देश का यह पहला रेलवे स्टेशन होगा। खड़ा ही हूँ कि उतनी देर में एक आर्मी की एक गाड़ी आती है। जिससे एक परिवार इत्मीनान से निकलते हुए स्टेशन में दाखिल हो गया।

रुकने के वास्ते डोरमेट्री में बात करने के लिए ऊपर वाले माले पर आया। जहां से उन्होंने ने वापस नीचे भेज दिया। मालूम पड़ा कि डोरमेट्री के लिए भी सारी बुकिंग समाप्त है चूंकि हैं।

बाहर ही कहीं ठिकाना खोजना पड़ेगा।

रेहने का तो इंतजाम देख लिया जाएगा। फिलहाल खाने का देख लूं। घूम फिर कर ऊपर नीचे करते हुए प्लेटफॉर्म नंबर एक पर आ गया।

जहां रेलवे स्टेशन पर ही आईआरसीटीसी के द्वारा दी जाने वाली खाने की भी सुविधा है। अन्दर आते ही मेनू कार्ड देखा और दो डोसा ऑर्डर कर दिए।

यहाँ कैंटीन और प्रतीक्षालय एक ही छत के नीचे है। जिस वजह से यहाँ बिक्री भी ज्यादा हो रही है। बैग एक किनारे रख पॉवर बैंक को चार्जिंग पर लगा दिया।

इतने में डोसा भी परोस कर आ गया। मेरा तो इस डोसे में ही पर भर गया।

हुआ इंतज़ाम

उधर समुदाय में से एक सज्जन आदमी ने ठहराने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।

इन्होंने इससे पहले कभी नहीं ठहराया है किसी को। अन्यथा मैंने पूरा मन बना लिया था आज स्टेशन पर रात गुजारने का। वैसे उनको भी धन्यवाद दिया जिन्होंने जी जान लगा कर और सामुदायिक मित्रों से बात की।

प्रशांत जी ने अपने घर का पता देते हुए हमें बुला लिया। स्टेशन पर ही मैंने चार पहिया वाहन बुक कराया और चल पड़ा भारालुमुख की ओर।

स्टेशन से बाहर निकल कर गाड़ी का इंतजार हो रहा है। एक के बाद एक गाडियां आए रही हैं और सवारियों का उतरने का सिलसिला जारी है।

कुछ इतनी देर से आए रही हैं कि भागम भाग करते हुए अन्दर प्रवेश कर रही हैं। सफाई में कोई कोताही नहीं बरती जा रही है। जैसे हम घर की सफाई करते हैं वैसे ही यहाँ भी हो रही है।

किसी का गीले पैर का निशान भी बन जाता तो पांच सेकंड के भीतर उस साफ के दिया जाता। ऐसे ही थोड़ी भारत का नंबर एक स्टेशन है स्वच्छता के मामले में।

भारतीय सेना में होना भी गर्व की बात है। पर मैं इसका सदस्य ना हो सका कभी। वैसे स्टेशन के अंदर इतनी जगह है कि आराम से बिस्तर बिछा कर सोया जा सकता है अगर किसी कर्मचारी को ऐतराज ना हो।

हमारा भी चार पहिया वाहन आया और आज की रात के लिए छत का भी प्रबंध हो ही गया। उत्तर पूर्व का आगाज़ ही टेडे अंदाज़ में हुई है अंजाम कहां तक जाएगा देखने लायक होगा।

कानपूर से दिल्ली से गुवाहाटी तक की कुल यात्रा 2467km

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