ऐजवाल, मिजोरम, स्टोरीज ऑफ इंडिया
Leave a comment

रिएक पीक ट्रैकिंग

ऐजवाल

कल त्रिपुरा से मिजोरम की राजधानी ऐजवाल में आ तो गया था, पर न खाने का सुख ना जीने का ठिकाना। ऐसा लग रहा था मानो परदेस चला आया हूं।

बस अड्डे पर रात बिताने के बाद सुबह की दिनचर्या में व्यस्त हो गया। अजय की योजना के अनुसार आज रियक जाएंगे जो मिजोरम की सबसे सुंदर पहाड़ियों में से एक है।

बस अड्डे पर कल भी सन्नाटा पसरा था और आज भी सन्नाटा पसरा है। नित्य कर्म के बाद बैग और टेंट समेटा और आगे की योजना बनाने लगा।

बस अड्डे के कर्मचारियों से मालूम पड़ा की रियक जाने के लिए वापस एजवाल के बाजार जाना पड़ेगा। बाजार तो जाना ठीक है पर पेट में कुछ होना भी तो चाहिए।

बैग बंधा रखा है, देर है तो बस उठाने की। अजय सारी चीज़ें पता करके आ चुका है। बस अड्डे पर ऐसा सन्नाटा पसरा है जैसे शहर में कर्फ्यू लगा हो।

आखिरकार सारे काम धाम निपटा कर निकल पड़ा सुबह की चाय के लिए। बस अड्डे के सामने दिख रही इमारत में नीचे की ओर चाय कॉफी की दुकान है।

यहीं आ पहुंचा। पर यहाँ मशीन वाली ही चाय नसीब हो रही है। त्रिपुरा में बिना दूध की चाय का स्वाद लेने को मिला था। और अब ये मशीन वाली चाय ऑफिस की याद दिला रही है।

मशीन वाली चाय तो नही पर कॉफी पीने की इच्छा जरूर जाहिर हुई। सो दो कप कॉफी ले कर पीने ही वाला था की हंसी मज़ाक में अजय के हाँथ से कुछ चाय ज़मीन पर गिर गई।

उसे तो कुछ भी ना नसीब हुआ और मैंने अपनी रही सही कॉफ़ी पी और निकल पड़ा मुख्य मिजोरम जाने की ओर। बस अड्डे ढूंढने के लिए आगे बढ़ ही रहा था की लगा सिर्फ चाय कॉफी से दिन पार तो नही होगा।

चहलकदमी

बाजार जाने के लिए बस मिलने का अड्डा पूछा तो पता चला थोड़ा और आगे जा कर मिलेगी।

आ कर खड़ा ही हुआ की चंद मिनटों में एक खटारा बस आ गईं। बाजार तक का किराया ही बहुत महंगा जान पड़ रहा है। जैसा कि कल से ही देखने में आ रहा है की यहाँ महिला ज्यादा सक्रिय है पुरुषों के मुकाबले सो आज बस में भी देख पा रहा हूं।

कुछ चंद मिनटों में बाजार आ गया। अब जानना ये है की रियक तक कैसे पहुंचा जाए। किसी मॉल के सामने खड़ा यही सोच रहा हूं।

तय किया की बैग लेके यहीं खड़ा रहूं और अजय को भेज देता हूं पता करने के लिए कौन सा वाहन कहाँ से उपलब्ध होगा ताकि रियक पहुंच सकूं।

पास ही पान की गुमटी में बैठे भाई साहब से पता चला की ये बिहारी बाबू हैं। जो कई वर्षों से यहीं अपने परिवार के साथ हैं और यहीं बस चुके हैं।

ये बिहारी, हिंदी, बंगाली के साथ साथ मिजो भाषा भी बोल और समझ पा रहे हैं। इनके माध्यम से मैने काफी जानकारी जुटाई। सुबह का वक्त है इसलिए स्कूली बच्चे बहुत मात्रा में दिखाई पड़ रहे हैं।

कुछ घंटे भर के भीतर अजय आया और पता चला रियक जाने के लिए किसी एक स्थान पर पहुंचना पड़ेगा जहाँ से दिन में एक दफा गाड़ी जाती है।

बैग लेके वहीं चल पड़ा। जैसा कि Aizwal पहाड़ी पर बसा है इसलिए ऊपर नीचे चढ़ाई तो चढ़नी ही पड़ती है। इसलिए अबकी बार फिर से जीप के अड्डे तक पहुंचने के लिए नीचे की ओर चला पड़ा।

रास्ते में पड़ रही दुकानों में महिलाएं ज्यादा दिखाई पड़ रही हैं जो अपनी अपनी दुकान के संचालन करती दिख रही हैं। अभी तक जितनी भी महिलाएं दिखीं है सबको मैंने सुपाड़ी मसाला ही चबाते हुए देखा है।

जीप अड्डे आने के बाद कुछ देर इंतजार करना पड़ेगा। यहाँ एक मजदूर भाई जो हिंदी और मिजो भाषा का ज्ञान रखते है उनसे पता चला रियक जाने के लिए जीप का इंतजार करना पड़ेगा।

कुछ आधे घंटे फुटपाथ पर ही इंतजार करने के बाद एक जीप आई जो रियक जाने वाली जीप तक ले जाएगी। बैठा और बाकी सवारियों का इंतजार करने लगा।

कुछ ही देर में ये गाड़ी चल पड़ी। पहले तो मुख्य सड़क से फिर गली कूंचो से गुजरते हुए उस अड्डे पर जहाँ से रियक की जीप मिलेगी।

रिएक

जीप का इंतज़ार

यहाँ आया तो मालूम पड़ा की रियक जाने के लिए पहले अपनी जीप और उसने सीट की बुकिंग करानी पड़ेगी तभी मनचाही सीट मिल सकेगी।

फटाफट सीट तो बुक करा ली पर जीप तो बारह बजे ही आएगी और तभी निकलेगी। आगे की दो सीट हमारी हुई। दुकान में बुकिंग चालू है और बगल में ही ढाबा।

पता चला यहाँ पराठा उपलब्ध है। भूख को भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता है। इसलिए दो पराठे और चाय ऑर्डर कर दिया।

और भी लोग आ रहे हैं दुकान में और सभी यहाँ के रहने वाले जान पड़ रहे हैं। इन्हीं में से एक सज्जन आए खाना पीना किया और मुझसे आने का मकसद पूछने लगे।

जब इन जनाब को पता चला की मैं कानपुर से यहाँ इतनी दूर घूमने के मकसद से आया हूं तो बहुत खुश हुए। मिजो भाषा कब तलक सीख लेने के प्रश्न पर तीन उंगलियां दिखाते हुए तीन महीने का इशारा किया।

पर इन तीन महीनों में कुछ ही अंश सीखा जा सकता है ना की पूरा इसका भी संकेत दिया। कुछ गपशप के बाद महोदय निकल गए अपने रास्ते।

ढाबा एक परिवार के द्वारा संचालित है जिसे चलने वाले ऊपर के माले पर रहते हैं और सुबह ढाबे पर खाने पीने की शुरुआत होती है।

तकरीबन घंटे भर के इंतजार के बाद आखिरकार रियक जाने वाली गाड़ी का आगमन हुआ। जिसका दुबला पतला चालक सिगरेट पीते हुए दुकान में दाखिल हुआ।

ये जानकारी मिलते ही बैग उसे थमा दिया जिसके बाद वो अपनी गाड़ी की छत पर लादने लगा। हल्की फुल्की बूंदाबांदी हुई जिसका असर किसी पर नहीं पड़ा सिवाय मुझे।

क्यूंकि मेरा बैग भीग रहा है जीप की छत पर। चालक को सवारियों की लिस्ट सौंपी गई जिसके बाद वो चलने की राजी हो गया।

ऐजवाल से रिएक

आखिरकार साढ़े बारह बजे जीप चालू हुई और रवाना हो चली रियक के लिए। इधर चालक साहब के बगल में बैठ कर सामने के नजारे का आनंद उठाने का मौका मिल रहा है।

जीप पर सवार हो कर एजवाल से बाहर निकल रहा हूं तो पहाड़ियों का सुन्दर नजारा भी देखने को मिल रहा है। जो की बहुत ही लुभावना है।

रियक में कैसा भोजन मिलेगा ये तो वहाँ जा कर ही पता चलेगा। यहाँ भीड़ भाड़ वाले इलाके से निकल कर धीरे धीरे जंगल की ओर प्रवेश कर रहे हैं।

जंगल में शांति और प्रदूषण मुक्त का आभास हो रहा है। शहर की कीच कीच से दूर यहाँ इत्मीनान से गाड़ी में सवार हो कर पुल पार कर रहा हूं तो कभी पहाड़ियां।

ऐसे ही कुछ किमी चलने के बाद लोगों का हुजूम दिखने को मिला। ड्राइवर साहब बहुत ही उतावले हैं। गाड़ी रोक कर नीचे उतरे तो पीछे से मैं भी उतर गया।

ये देखने के लिए की आखिर माजरा क्या है। हाँथ में कैमरा लिए आगे पहुंचा तो देखा खाई में छोटी लोडर गाड़ी गिरी पड़ी है। आसपास जमा लोगों ने अपनी भाषा में बताया पर कुछ समझ ना आया।

हालत को देखते हुए घटना ज्यादा पुरानी नहीं लग रही। और मालूम पड़ा ड्राइवर नशे की हालत में था जिस कारण ये हुआ।

वापस से आकर जीप में बैठ गया। यहाँ के लोगों की देखा देखी में मैंने भी वो सुपारी की पुड़िया लेली। जो चाय से भी सस्ती है। चखा तो सिर ही घूमने लगा।

आगे बैठे बैठे सिर घूमने के बाद पूरा शरीर ही झूमने लगा। अचानक सिर दर्द भी होने लगा। और अब आलम ये है की आराम करने की जरूरत आन पड़ी है।

गाड़ी कहाँ को जा रही है कुछ समझ नही आ रहा। पर कुछ ही घंटे बाद ड्राइवर साहब ने जीप एक बेहद खूबसूरत झरने के पास रोक दी।

झरने के सामने ड्राइवर के साथ खड़े लेखक

दिखने में आम झरना लग रहा है। पर अगर यही झरना उत्तर भारत में होता तो अबतक इसे पर्यटक स्थल बनाने में देर ना लगती। पर यहाँ आसपास भी कोई नहीं मंडरा रहा है।

इतनी ऊंचाई से गिर रहा है और इतना खूबसूरत। पर बस अचंभा ये हो रहा है की कोई भी इसके आसपास नहीं है। शायद यहाँ की जनसंख्या भी इसका वजह है।

कुछ वक्त बिताने के बाद जीप आगे निकल पड़ी। रास्ते में हल्की फुल्की बारिश का भी सामना करना पड़ रहा है। जिस कारण गाड़ी के शीशे बंद करने पड़ रहे हैं।

अब शायद कुछ ही देर में मंजिल को पहुंच जाऊंगा। ड्राइवर साहब ने जितने भी लोगों का बयान उठाया था एजवाल से उसे हर दुकान तक पहुंचा रहे हैं। बिना किसी शर्त या पैसे के।

और इन जनाब की सबसे अच्छी खासी दोस्ती भी है। हर जगह हसी खुशी इनका स्वागत हो रहा है। ड्राइवर भी हैं और डाकिया भी।

कुल दो घंटे के सफर में आखिरकार आ गया रियक। ड्राइवर साहब भी हमारी तरह कल सुबह ही जायेंगे। इस गांव में भी इनको हर कोई जानता है।

भाषा से भाषा ना मिली

मैं बाहरी लग रहा हूं इस कारण यहाँ लोग आसानी से पहचान पा रहे हैं की ये पर्यटक हैं। रियक में दाखिल होने के लिए पोस्ट पर जांच पड़ताल करवानी पड़ेगी तभी बात आगे बढ़ेगी।

चौकी पर पहुंचा तो कमबख्त यहाँ किसी को हिंदी या अंग्रेजी बोलनी ही नहीं आती। जिनको आती है वो जीप से जंगल में चक्कर लगाने निकल पड़े हैं।

डमचारा से एजवाल तक के लम्बे सफर में कई लोग साथ थे। इनमे से वो एक अध्यापिका महोदया भी थीं जो चर्च में पढ़ाती हैं। इस अनजान शहर में एक वही सहारा दिख रही थीं।

कल शाम को जीप से उतरने के बाद उनका नंबर ले लिया था। ना जाने कब काम आ जाए। और शायद ये वो समय है जब उनकी मदद की जरूरत आन पड़ी है।

मारियाना को फोन लगाया और अपनी परिस्थिति से अवगत कराया और बताने लगा की मैं क्या चाहता हूं। अपने व्यस्त समय से कुछ आम निकाल कर उन्होंने अपनी भाषा में उस महिला को सारी बातें समझाईं तब जा कर उसके कुछ समझ आया।

बताया की यहाँ की देख रेख गाइड महोदय करते हैं। पास में दिख रहे रेस्त्रां में आ गया। जबतक वो गाइड महाशय नहीं आ जाते यहीं विश्राम कर लेता हूं। रेस्त्रां में सन्नाटा तो नही है पर हलचल भी नहीं है।

अब रेस्त्रां में आ ही गया हूं तो कुछ ना कुछ तो ऑर्डर करना ही पड़ेगा। पराठे और चाय फिर से मंगवा लिए। जिसे बनने में अभी समय लगेगा।

देखते ही देखते नाश्ता भी आ गया और गाइड महाशय भी आ धमके। कुछ कुछ हिंदी और टूटी फूटी अंग्रेजी के साथ हमारा स्वागत करने लगे रियक में।

सभी नियमों से अवगत कराते हुए मुझे अपनी जीप में बैठाया और अंदर ले आए। जहाँ मेहमानो का क्वार्टर बना हुआ है। क्वार्टर के मैनेजर से मुलाकात के बाद उनसे रियक पीक देखने की दरख्वास्त की।

और ऊंचाई पर रुकने की मंशा जाहिर करते हुए बताया की एक बैग यहीं रखना चाहूंगा और दूसरे में कुछ जरूरी समान के साथ ऊपर की ओर रवाना होना चाहूंगा।

रिएक की गुफा

रिएक पीक ट्रैकिंग

ठीक ऐसा ही करते हुए फटाफट एक बैग खाली किया और सारे कपड़े दूसरे बैग में ठूंस कर यहीं पास में किचन में रखवा दिया। दूसरे बैग में टेंट और कैमरा डाल कर निकल पड़ा।

रास्ते में ऐसी आवाज आ रही है जैसे कोई भरी भरकम मशीन चल रही हो। जिसका उपयोग निर्माण कार्य में किया जा रहा हो। जैसे शहरों में आती है वैसे।

पथरीले और गीले रास्ते पर जीप के निशान बने हुए हैं। जैसा कि मैनेजर ने बताया था ठीक उसी रास्ते पर चलता चला जा रहा हूं। और जीप के निशान भी सहायक साबित हो रहे हैं चलने में।

रास्ते में बारिश होने के कारण मैं भीग चुका हूं। अमूमन रियक पहुंचने के दो रास्ते हैं। इसमें से कौनसा अख्तियार करूंगा ये तो वक्त बताएगा।

फिलहाल चलते चलते किसी बहुत बड़ी सी गुफा के सामने आ खड़ा हुआ हूं। जिसकी आड़ में तंबू गाड़ कर सोया जा सकता है। पर ये उतना ही खतरनाक भी साबित हो सकता है।

पता नही यहाँ कौन कौन प्रकार के जंगली जानवर हो जिनसे अभी पाला पड़ता बाकी हो। गुफा के पास ही बहता हुआ झरना भी है जो इसमें चार चांद लगा रहा है।

गुफा के पास कुछ एक तस्वीरों के बाद निकल पड़ा मंजिल की ओर। झाड़ियों और बड़ी बड़ी घास के बीच में सारे कपड़े भीग चुके हैं।

और अब तो रास्ता भी सकरा होने के साथ साथ खतरनाक होता जा रहा है। इतनी फिसलन की अगर गिरा तो सीधा धरातल पर। आसमान अभी साफ दिख रहा है जिसके कारण दूर से ही एजवाल को देखा जा सकता है।

एजवाल बेहद ही खूबसूरत दिख रहा है इतनी ऊंचाई से। इतना खूबसूरत तो शायद शिमला भी नही होगा। कुछ ही देर का नजारा था की अचानक से बादल का जमवाड़ा आ गया।

जिसने पूरी घाटी को ढक लिया। जिस कारण रियक प्रसिद्ध है वो देखने को ही नहीं मिल रहा। भीगते हुए रियक की चोटी पर आया। जगह जगह बैठने के लिए बेंच तो ऐसे पड़ी है जैसे लोगों के लिए कोई पार्क हो।

गहराई से अनभिज्ञ होकर बेधड़क पहाड़ियों से पैर लटका कर खूब फोटो खिंचवा रहा हूं। अगर ये बदल इस कदर हावी ना होते तो शायद यहाँ बैठने की जुर्रत भी ना करता।

इतनी ऊंचाई पर मैं अकेला और मेरे साथ है तो सिर्फ घनघोर बादल। मन तो कर रहा है इन्हीं बादलों के ऊपर कूद जाऊं पर जो इतना मनमोहक दिख रहा है वो अपना नहीं है।

कूदूंगा तो इन बादलों को कोई जिम्मेदारी नहीं होगी मुझे लपकने की। यह एक छलावा है। बहुत जम कर धमाचौकड़ी मचाने के बाद अब नीचे जाने की बारी आ चुकी है।

यहां रुकने के विचार से आया जरूर था मगर माहौल रुकने लायक नही है। जिस कदर तेज हवाएं चल रही हैं। लग रहा है कहीं सोते में ही टेंट ना उड़ जाए। मौसम का भी कोई भरोसा नहीं। और ना ही मौसम बिगड़ने ने देर लगेगी।

इतने में एक जोड़ा हमारी तरफ ही आ रहा है।  नीचे जाने के दो रास्ते हैं एक तो जिससे अभी आया हूं और एक पीछे का। पर अंधेरा भी हो रहा है और ज्यादा समय भी नही हैं। ऊपर से जंगल।

इसलिए कोई खतरा मोड़ नहीं लेना चाहूंगा। बेहतर यही रहेगा जिस रास्ते से आया उसी से निकला जाए। पर कल सुबह दोबारा आऊंगा शायद बादल ना हो तो और भी मजा आए।

 निकल जाने के बाद ये शायद ये जोड़ा यहीं वक्त बिताएंगे। वापस से सकरे रास्ते से नीचे जाते हुए दिखा रोप वे। जिस पर सैलानियों को मजे के लिए रस्सी में बांधकर दूसरी पहाड़ी पर भेजा जाता है।

उसी खंबे के पास कार्य में जुटे लोगों ने इस बारे में और अधिक जानकारी मुहैय्या कराई।

रिएक की चोटी पर बैठे लेखक

Filed under: ऐजवाल, मिजोरम, स्टोरीज ऑफ इंडिया

by

नमस्ते, मैं ऐश्वर्य तिवारी हूं। ये उन दिनों की बात है जब मैं अपने जुनून का पालन करने के लिए अपने कॉर्पोरेट जीवन को पीछे छोड़ दिया।भारत को जानने के मेरे अंदर हमेशा एक जिज्ञासा थी क्योंकि इस देश में हर कुछ मील के बाद विविधता, विभिन्न संस्कृति है। हर दिन मेरे लिए एक नए शहर में एक नई प्राणी के साथ एक नया दिन है। मैं एक घुमक्कड़ हूं जो के विभिन्न हिस्सों में घूमना पसंद करता है और जल्द ही भारत से बाहर हो सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *