रहस्यों से भरा कोणार्क सूर्य मंदिर

उड़ीसा | कोणार्क | भारत

नाटक करता है

प्रीतेश के सुझाव के मुताबिक मुझे कोणार्क सूर्य मंदिर के लिए भोर में ही प्रस्थान करना सर्वोच्चतम है।

लेकिन, किन्तु, परन्तु ऐसा ना हो सका। पिछली रात कटक भ्रमण और मौज मस्ती में निकल गई।

भुभनेश्चर वापसी के उपरान्त सोते सोते रात्रि के तीन बज गए।

मैं, साथी घुमक्कड़, प्रीतेश और प्रीतेश के साथ रहने वाला उसका मित्र सुब्रत एक रेस्तरां में रात्रि भोज के बाद हम सब शहर के मध्यम भाग में नाटक देखने पहुंचे थे।

नाटक में इतना मशगूल हो गया कि वक़्त का ध्यान ही नहीं रहा। नाटक में भी स्टेज के सामने पिछले हिस्से में एक पियक्कड़ अपना प्रोग्राम प्रस्तुत कर रहा था।

स्टेज पर महिला मंडल नाच रहीं थीं और इधर ये जनाब अपना नागिन नृत्य करने में जुटा थे।

दर्शक विभाजित हो गई थी। आगे की जनता की आंखें तो स्टेज पर ही टिकी थीं।

लेकिन पीछे की जनता का यह बेवड़ा माइकल जैक्सन से कम नहीं।

सुबह आठ बजे फोन की घंटी बजती है। देखा तो घर से कॉल आ रहा है।

घर पर तो उठाते ही हैं, घर से इतनी दूर यहाँ भी घरवालों ने सुबह सुबह उठाया। घर हो या बाहर वो अपने लाडले को ज्यादा देर तक नहीं सोने देंगे।

नींद भंग हुई तो बगल में सो रहे साथी घुमक्कड़ को भी उठाया। साथी घुमक्कड़ तो घोड़े बेंच कर सो रहा है।

सुबह छह बजे नींद खुली थी तब प्रीतेश को कमरे में पाया था। शायद वो जगाने ही आया होगा।

एक स्थानीय निवासी समझ सकता है ऐसी भीड़ भाड़ वाली जगह पर देर से पहुंचने के क्या नुकसान हो सकते हैं।

कोशिश है जितनी जल्दी हो सके घर छोड़ दूं। साथी घुमक्कड़ कुछ देर के लिए और सो लेगा जब तक मैं स्नान ध्यान करूंगा।

बिना किसी देरी में झट घुसा और पट निकला। ऊपर वाले माले में भगवान की मूर्तियां भी रखी हुई हैं।

शायद यही लोग ऊपर पूजा पाठ करने आते हो। ठीक भी है कहावत भी सत्य होगी।

“ऊपरवाला सब देख रहा है”

साथी घुमक्कड़ के स्नान करते ही हम नीचे वाले माले पर आ गए। जहाँ सुब्रत और प्रीतेश रहते हैं।

प्रीतेश ने बताया कि उसने मुझे सुबह छह बजे गहरी निद्रा से जगाने का प्रयत्न किया तो मैं टस से मस नहीं हुआ।

कोणार्क रवानगी

छोटे बैग में आवश्यक सामान भरा। जैसे पानी की बोतल, कैमरा, धूप से बचने वाले चश्मे, नजर का चश्मा और एक अगौंछा जो धूप से बचाता है।

इसको पहन कर डाकू बन कर भी घूमता हूँ मैं। घड़ी में नौ बज रहे हैं। आज जगदलपुर को जाने वाली ट्रेन की सीट का आरक्षण भी करवाना है।

तत्काल खिड़की सुबह ग्यारह बजे ही खुलती हैं। तभी ये काम हो सकेगा।

जाते जाते भी प्रीतेश ने कोणार्क और पूरी से जुडी अहम जानकारियां प्रदान की।

कोणार्क के बाद वाहन  के जरिए  जगन्नाथ पुरी निकल जाना है।

प्रशांत जी की दिए गए वाहन का अच्छा उपयोग हो रहा है। इस वाहन की बदौलत ओड़ीसा में ज्यादा समय नहीं लगेगा।

सड़क सुनसान तो नहीं पर काफी खाली नजर आ रही है। बगल से गुजरती बस में भीड़ इस कदर है की लोग बाहर लटकते हुए जा रहे हैं।

जो बात आज मैं दोबारा दोहराना चाहूँगा वो ये की उड़ीसा में भाई हरियाली है। इसलिए भी क्योंकि यहाँ पर तरक्की की पीपडी नहीं बजी।

सूनासन सड़को पर धीमी रफ्तार में मंजिल की ओर बढ़ना अति रोमांचकारी है। मजा और भी दुगना हो जाता है जब सड़क से गुजरते हुए पेड़ की छांव में सफर कट जाए।

दूर दूर तक हरित जमीन। धूप तेज होने के कारण बैग से अंगौछा निकाल कर सिर से लपेट लिया।

काफी सुकून देने वाली स्तिथि में हूँ अब। पूरा मूंह ढका होने से गर्म हवा के थपेड़े नहीं पड़ रहे हैं।

ढाबा हुआ पहला पड़ाव

तेज धूप से कुछ राहत पाने के लिए घंटे भर के सफर के बाद अब कहीं रुक कर पेट पूजा कर लेनी चाहिए।

घर से खाली पेट निकला हूँ जिसकी कीमत बीमार हो कर नहीं चुकाना चाहूँगा।

हाईवे की मोड़ से पहले ढाबे खुले तौर पर यात्रियों को आमंत्रित कर रहे हैं।

यहाँ दर्जनों वाहन खड़े हैं। मैंने भी अपने ड्राइवर साथी घुमक्कड़ से मशविरा करते हुए यहाँ रुकने की योजना बन गई।

किनारे वाली दुकान से ले कर दूसरे किनारे वाली दुकान तक चाय हर जगह उपलब्ध है। सुस्ताया इस दुकान में चाय के लिए फोन पर बात करते करते आ गया दूसरी ओर।

चाय पर चर्चा तो हो रही है पर खाना या नाश्ता नहीं। साथी घुमक्कड़ ने नाश्ते में पराठे लेने जरूरी समझे क्योंकि उसी को गाड़ी चलानी है।

हर यात्री जो दुपहिया वाहन में सवार है वो यहाँ रुक कर ही आगे बढ़ रहा है। चाय के बाद मैं भी यहाँ से निकलने लगा।

अभी इस जगह से कुछ 41किमी का सफर तय करना बाकी है। जो शायद इतने ही मिनट या ज्यादा से ज्यादा घंटे भर में हो जाएगा।

वाहन चालू करके निकल पड़ा हाईवे पर। रास्ते में नारियल के पेड़ बहुत देखने को मिल रहे हैं।

गांव से हो कर भले ही गुजरना पड़ रहा हो पर सरकार और प्रशासन ने सुनिश्चित कर रखा है की सड़क पक्की है।

होनी भी चाहिए क्योंकि कोणार्क और जगन्नाथ जाने वाला मार्ग कोई आम मार्ग थोड़ी है।

वाहन में सवार और भी भक्त उसी ओर जाते हुए दिख रहे हैं या तो आते हुए।

41 km दूर कोणार्क सूर्य मंदिर

तत्काल आरक्षण

घड़ी में ग्यारह बजते ही मैंने साथी घुमक्कड़ को गाड़ी रोकने को कहा। वक्त है तत्काल खिड़की खुलने का और ट्रेन में सीट पाने के लिए आरक्षण करने का।

छपेडे के नीचे रुक कर खिड़की खुलते ही टूट पड़ा। पहली बार में नहीं हुआ। पर सीटें तेजी से कम हो चली हैं।

दूसरी दफा एक बार फिर करने की कोशिश की जिसमे सफलता हांथ लगी। जो अड़चन पहले भुगतान करने में आई थी वो अबकी नही हुई।

अमूमन ऐसा बहुत कम होता है। भुभ्नेश्वर से जगदलपुर तक जाने का एक रात और दिन का सफर होगा।

इस तेज धूप गाड़ी चलाते चलाते जोरों की प्यास लग रही है।

सरकार द्वारा डिजिटल सुविधा की बदौलत चलते फिरते काम हो जाता है। ना कहीं जाने की जरूरत ना कतार में लगने की।

इसलिए भी आज के समय में घूमना फिरना पहले से आसान हो गया है। फिर चाहें वो सड़क यात्रा हो या हवाई यात्रा।

टिकट आरक्षण का जिम्मा शुरू से ले कर अब तक मेरे ही मत्थे है। भारत भ्रमण करते करते कुछ काम स्वतः ही बंट गए हैं।

छांव में सुस्ताने के बाद चल पड़ा कोणार्क। अब जब आरक्षण हो चुका है तो जगदलपुर भी आराम से बिना किसी दिक्कत के पहुंच जाऊंगा।

लंबे सफर में आरक्षण रहता है तो सहूलियत भी बनी रहती है। पास के सफर में जनरल बोगी भी उपयोगी साबित होती है।

कोणार्क गांव

बारह बजने से कुछ दे पहले कोणार्क नाम के गांव में आ धमका। संशय है इसलिए आसपास फल लगाए ठिलिया वालो से सुनिश्चित करने लगा।

उनकी हामी और पथ प्रदर्शित करने के बाद मैं परिसर की ओर दाखिल होने लगा।

कोणार्क का अर्थ समझना भी बड़ा भारी काम है। कोना, किनारे और अर्क शब्द से बना है कोणार्क।

जो सन्नाटा मुझे सफर के दौरान देखने को मिला उतनी ही गजब की भीड़ यहाँ देखने को मिल रही है।

फल और ढाबे वाले अपना धंधे में व्यस्त हैं। पर्यटक भ्रमण और पेट पूजा में।

वाहन ले कर नारियल पानी वाले की दुकान पर आ गया। यहाँ गाड़ी खड़ी करने पर पता चला की गाड़ी खड़ी करने की भी सुविधा आगे मैदान में है।

बताए हुए मार्ग पर साथी घुमक्कड़ को वाहन खड़ा करने भेज दिया। धूप, पसीने और उमस से हाल बेहाल है।

वाहन के अपने सही जगह होने के बाद मैं भी चल पड़ा मंदिर की ओर।

टिकट घर

जांच केंद्र पर पहुंचा तो मालूम पड़ा टिकट घर पीछे छूट गया है। टिकट के लिए टिकट घर में लंबी कतार है।

जिसको भेदना संभव नहीं। अपनी बारी के इंतजार में फिर से साथी घुमक्कड़ को कतार में खड़ा कर दिया।

यहाँ लगे बोर्ड को पढ़ने पर मालूम पड़ा की ऑनलाइन टिकट की आरक्षित किया जा सकता है। जिसमे भारी छूट है।

टिकट घर से थोड़ा महंगा पड़ेगा। ऑनलाइन आरक्षण कतार को कम करने के लिए और यहाँ से बोझ हल्का करने के लिए भी है।

टिकट के नाम पर टोकन मिला है। जिसे जांच केंद्र पर मशीन में लगा कर अंदर प्रवेश करना होगा। जैसे मेट्रो में टोकन मिलता है ठीक वैसा ही।

टोकन वाला प्राप्त टिकट

गर्मी बहुत भीषण है लेकिन इन सब के बावजूद भीड़ बहुत अधिक मात्रा में है।

बिना टिकट के मंदिर परिसर में प्रवेश संभव नहीं है जबतक आप प्रशासन में ना हों तो।

मेरी समझ में यह एक मात्र मंदिर है जिसमें प्रवेश के लिए टिकट की आवश्यकता पड़ी।

कोणार्क सूर्य मंदिर चतुर कारीगिरी का नमूना

सूर्य मंदिर भारत के सात आश्चर्यों में शामिल है। मंदिर तेरहवीं शताब्दी में बना था। जिसका मुख्य भाग विनाश की कगार पर है।

जब भी परंपरा, रीति रिवाज, सभ्यता, इतिहास की बात होती है तो भारत के हर मंदिर में इसके अंश पाये जाते हैं।

भारी तादाद में लोग इस भव्य मंदिर को देखने देश विदेश से आए हुए हैं। जांच केंद्र के पहले दोनो ओर समान से लैस दुकानें हैं।

जिनमे लौटते हुए पर्यटक खीरदारी कर रहे हैं। जांच केंद्र से पहले मंदिर आधा अधूरा दिख रहा है।

जांच केंद्र में टोकन लगाते ही दरवाजा खुल गया। मंदिर के प्रवेश द्वार पर सिंह विराजमान हैं। जिसके बाद पतला गलियारा है।

पतले गलियारे से निकलते ही विशाल मैदान जिसके बीचों बीच सिंहासन। जिस पर चढ़ने के लिए सीढ़ियां।

शायद ये ऊंचाई इसलिए बनाई गई होगी ताकि मंदिर को एक सीध में निहारा जा सके।

अलग अलग राज्यों से आए लोग मदमस्त हैं। कोई बच्चा संभाल रहा है है कोई बेगम।

सिंहासन के द्वार पर स्वागत करने के लिए हांथी के ऊपर दहाड़ते मुद्रा में सिंह विराजमान हैं। जिसका मतलब ये है की ये सिंह रक्षा के लिए सदैव तत्पर हैं।

सीढी पर से गुजरते हुए ऊपर पहुंचना भी बच्चों का खेल नहीं। कोई अपनी तस्वीर निकाल रहा है तो कोई सीढ़ियों पर सुस्ता रहा है।

सिंहासन कुछ इस तरह निर्मित है की उससे सिर्फ और सिर्फ मंदिर का द्वार दिख रहा है। पास जाने पर मंदिर का आकार भी बड़ा होता दिख रहा है।

एक हम हैं जो अचरज करते हैं ताज महल की बनावट पर। जरा गौर से देखो साहब ये किस काल में बना मंदिर है।

सूर्य मंदिर अपनी भव्यता के कारण देश के सबसे बड़े दस मंदिरों में गिनती होती है। यह मंदिर पूरी तरह से सूर्य भगवान को समर्पित है।

इस सिंहासन पर भी भीड़ प्रचुर मात्रा में है। सबको होड़ है मंदिर के सामने खड़े हो कर तस्वीर लेने की।

सिंहासन पर बने खम्बो की कलाकृति उस काल के बारे में बहुत कुछ बयां कर रही हैं।

इतनी बारीक नक्काशी देखने योग्य है। काफी मूर्ति श्रतिग्रस्त हैं। किसी खंबे पर वादक लिए नृत्य करते हुई अप्सराएं।

कुछ तस्वीरें लेने के बाद मैं नीचे की ओर उतरने लगा।

कोणार्क सूर्य मंदिर के द्वार पर हाँथी को दबोचे सिंह

कमजोर होता ढांचा

मंदिर के भीतर तो प्रवेश निषेध है। जो कुछ सालों पहले तक नहीं था। हालांकि मंदिर की सीढ़ियों पर भीड़ कम नहीं।

आज यह मंदिर लोहे की रॉड पर टिका हुआ है अन्यथा रॉड हटा देने पर यह मलबे के ढेर में तब्दील होने में ज्यादा समय नहीं लेगा।

मंदिर को चारों ओर से रेलिंग से घेर रखा गया है। ताकि मंदिर की दीवारों को आम जनता की पहुंच से दूर रखा जाए।

मंदिर की संरचना इस प्रकार की गई है जैसे एक रथ में बारह विशाल पहिए लगाए गये हों। रथ को सात ताकतवर बड़े घोड़े खींच रहे हों।

ये घोड़े अब या तो टूट गए हैं या तो पूरी तरह से ही गायब हो गए हैं। किसी का सिर्फ पैर बचा है तो किसी का आधा शरीर।

रथ पर सूर्य देव को विराजमान दिखाया गया है। चंद्रभागा नदी के तट पर स्थित इस मंदिर से सीधे सूर्य भगवान के दर्शन किए जा सकते हैं।

मंदिर के बाकी के दरवाजों को पत्थर की चट्टान से बंद कर दिया गया है। आक्रमण और आपदाओं से मंदिर को बहुत नुकसान पहुंचा।

मंदिर तीन मंडपों में बंटा है। जिनमे से दो मंडप ढह चुके हैं।

एक मंडप जिसमे मूर्तियां रखी थी उसे अंग्रेजो ने रेंत भरवा कर बंद करा दिया जो आज भी बंद हैं।

खुला है तो सिर्फ सामने का द्वार। जिससे प्रवेश की अनुमति किसी को नहीं।

यहाँ खड़े एक गाइड के अनुसार तमाम भौगोलिक और प्राकृतिक घटनाओं के चलते चंद्रभागा नदी विलुप्त हो गई।

मंदिर की दीवारों पर लगे बड़े बड़े पहिए। जो मन्दिर को सुन्दरता प्रदान कर रहे हैं।

पहियो के साथ फोटो खिंचाने को ले कर होड़ मची है। एक मोहतरमा ने तो हद पार कर दी।

जबरन दूसरों के बगल में खड़े हो कर उनकी तस्वीर बिगाड़ रही हैं। आसपास लोग गुस्साए यहाँ तक की गाइड भी बेबाकी से बोल पड़ा।

पर इस जबर महिला के कानों में जूं तक नहीं रेंगी।  मैं भी खिंचाने लगा।

कोणार्क सूर्य मंदिर में टूटे रथ का टूटा फूटा घोडा

पहियों में छुपा समय

 पहियों को ध्यान से देखने पर समय का अंदाजा होता है। पहिए में बारह चक्र साल के बारह महीनों को परिभाषित कर रहे हैं।

गाइड ने बताया की प्रत्येक चक्र आठ अरों से मिल कर बना है। जो अर दिन के आठ पहरों को दर्शाते हैं। मंदिर में कुल बारह पहिए हैं।

पहियों में समय कैसे देखा जाए इसमें लोगों की सहायता गाइड कर रहे हैं। दावा किया कि यह एकदम सटीक समय बताता है।

ये पहिए मंदिर की चारो ओर दीवारों पर लगे हुए हैं। जिस वजह से सूर्योदय से सूर्यास्त तक का समय देखा जा सकता है।

मंदिर के पिछले भाग में आने आर देखता हूँ एक टूटा फूटा मंदिर। यहाँ जूते उतार कर ही अंदर जाया जा सकता है।

सो बारी बारी से जूते उतारते हुए मैं दाखिल हुआ। मंदिर में विष्णु जी की मूर्ति के अलावा भोग विलास करते हुए मर्तियां भी उकेरी हुई हैं।

ये मूर्तियां मुझे खजुराहो की याद दिलाती हैं। कोई लुभावने अंदाज में तो कोई क्रिया करते हुए।

मंदिर से निकल कर सूर्य मंदिर की परिक्रमा करने के लिए आगे बढ़ गया। सूर्य मंदिर को देख कर यही प्रतीत हो रहा है जैसे अभी चल पड़ेगा।

पहियों में छुपा समय

पौराणिक कथा

सांबा पुराण के अनुसार इस मंदिर के अलावा एक और मंदिर था। जिसे नौवीं शताब्दी के पहले देखा गया था।

इन पुराणों में कोणार्क, मथुरा और मुल्तान में सूर्य मंदिर होने का जिक्र है।

श्रीकृष्ण के बेटे सांब को एक श्राप के कारण कोढ़ रोग हो गया था। तब उसने मित्रवन में चंद्रभागा नदी के तट पर कोणार्क में सूर्यदेव की बारह वर्ष तक तपस्या की।

सूर्यदेव को सभी रोगों का नाशक माना जाता है। सांब की तपस्या से प्रसन्न होकर सूर्य देव ने उन्हें रोग मुक्त किया।

रोग से छुटकारा पाने के बाद जब सांबदेव ने चंद्रभागा नदी में स्नान किया तो नहाते समय उन्हें सूर्यदेव की एक मूर्ति नदी से प्राप्त हुई।

मूर्ति मिलने के बाद सांब ने उसी स्थान पर सूर् देव का मंदिर बनवाने का निर्णय लिया और इस तरह कोणार्क का मंदिर बना।

स्नान के समय सांब को जो सूर्यदेव की मूर्ति मिली। उस मूर्ति के बारे में कहा जाता है कि मूर्ति निर्माण विश्वकर्मा ने सूर्यदेव के शरीर के भाग से ही किया।

पास के उद्यान में निकल आया। उद्यान में भी काफी कुछ टूटा फूटा है। जैसे यहाँ बना कुआ। जिसे देखने के लिए लोग घेरे खड़े हैं।

दक्षिण हिस्से से कुछ ऐसा दिखा कोणार्क सूर्य मंदिर

रहस्यों से भरा कोणार्क सूर्य मंदिर

मंदिर पूर्णतः तो बंद नहीं होगा। पूजा तो अवश्य होती ही होगी। पास खड़े गाइड ने मुफ्त सेवा देते हुए कुछ रोचक बताने लगे

सूर्य देव की तीन मूर्तियां हैं। बाल्यावस्था, युवावस्था, और प्रौढ़ावस्था को प्रदर्शित किया गया है।

मंदिर की चोटी पर चुंबक लगा हुआ था। जिसके कारण समुद्र के तैरते पोत खींचे चले आते थे।

लगभग 112 वर्षों से इस मंदिर में रेंत भरी है। अनेकों मुगल आक्रमणकारियो ने मंदिर को नुकसान पहुंचाया।

मंदिर की एक परिक्रमा और उद्यान में कुछ वक्त गुजारने के बाद बाहर निकल आया। टोकन मेट्रो स्टेशन की तरह मशीन में ही जमा हो गए।

मंदिर के निकास के सामने कोणार्क संग्रहालय बना है। जिसमे मंदिर की कीमती मूर्तियां रखी हुई हैं।

संग्रहालय जाने की इच्छा कम ही है मेरी। समय को देखूं तो भोजन करने का वक्त हो गया है।

कोणार्क सूर्य मंदिर के सामने तस्वीर निकलवाते लेखक

अगला मंदिर जगन्नाथ पूरी

अगर भोजन करने में वक़्त दूंगा तो जगन्नाथ पूरी के लिए विलंब हो जाएगा।

पास में लगे स्टॉल में से गन्ने की जूस की दुकान पर आ खड़ा हुआ। नारियल पानी से ले कर है फल उपलब्ध है।

जैसे उड़ीसा में फल वर्षा हुई हो। जूस ही सही पर कुछ ऊर्जा तो मिलेगी। भुगतान किया और चल पड़ा पार्किंग को ओर।

मैदान में वाहन को घसीटते हुए बाहर निकलने लगा। यहाँ भी किराया थमाया और गाड़ी चालू कर के चल पड़ा।

वाहन लेकर विशालकाय समुद्र की ओर। पल भर के लिए ठहर गया।

सन् 2016 के बाद ये पहला मौका है जब में किसी समुद्री तट पर आया हूँ।

चेन्नई के मरीना तट पर बिताया समय आज भी नहीं भूला हूँ। यह समुद्र ही है जो इस मंदिर की शोभा में चार चांद लगा रहा है।

सूर्योदय, सूर्यास्त और चांद की रोशनी में यह मंदिर देखते ही बनता होगा।

मंदिर के समीप विशालकाय समुद्र का तेज़ देखने योग्य है। कोणार्क मंदिर में पर्याप्त समय बिताने के बाद समुद्र के समांतर जाती हुई रोड पर माध्यम गति में गाड़ी निकल पड़ी जगन्नाथ पुरी के दर्शन के लिए।

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