रेह दिल झील पहली विदेश यात्रा में हुई दुर्घटना

जोख्तावर | भारत | मिजोरम

चम्पई में सुबह

रात भर का ऊबड़ खाबड़ रास्तों पर सफर करने के बाद ड्राइवर ने सुबह ज्यों की त्यों गाड़ी बंद करके खड़ी कर दी। मुझे लगा की शायद थक कर नींद पूरी करने के लिए गाड़ी खड़ी करी है।

इसी उम्मीद में की ड्राइवर जब उठेगा तो बाकी का सफर भी तय करेगा। कुछ घंटों के लिए तो हम सब मिल कर गाड़ी में ही सोए। सुबह के तीन बजते ही सड़क पर हलचल होने लगी।

आखिरकार ड्राइवर को उठा कर पूछ ही डाला। तब मालूम पड़ा अब आगे जाने के लिए दूसरा वाहन पकड़ना पड़ेगा। उतर गया पर बैग अंदर ही रखे रहे।

सुबह बहुत जोर की लगी है। आसपास ना ही कोई दुसलखाना है ना ही सौंचालय। कुछ ही कदम पर जीने से साथी घुमक्कड़ को उतरते देखा। उसने सारा विवरण देते हुए वहीं जाने पर जोर दिया जहाँ से वो नित्य क्रिया करके आया है।

ऐेज़वाल राज्य का चम्पई शहर

कुछ ही देर में ड्राइवर जाग गया और उसने विनती करी समान उतारने की। समान उतरते ही चालक गाड़ी मोड़ कर वापस निकल गया। शायद अपनी नींद पूरी करने।

इधर मैं बैग बोतल छोड़ कर दनदनाते हुए जीना चढ़ कर आ गया। नित्य कर्म का ये स्थान पर जोरदार सन्नाटा पसरा हुआ है। पर सुविधा सारी उपलब्ध हैं।

सब कुछ समाप्त करके नीचे आ गया। गाड़ी से बैग निकाले। सुबह के पांच बज रहे हैं। नुक्कड़ पर चाय पूड़ी की व्यवस्था दिख रही है। हम बारी बारी से अपने लिए चाय और पूड़ी ले आए।

यही आज की सुबह का नाश्ता है। नाश्ता करने के बाद पता चला यहाँ चंपई से जोखतावर जाने के लिए सुमो हैं। जिसके बाद जोखतावार से बर्मा का कुछ किमी पैदल रास्ता तय करना होगा।

काउंटर जहाँ से सुमो की टिकट बिक्री है यहाँ आया तो मालूम पड़ा पहली गाड़ी साढ़े छह बजे निकलेगी। अभी तकरीबन एक घंटा है। जो यहाँ टहलते फिरते बीत जाएगा।

छह बजे काउंटर पर नाश्ते के बाद साथी घुमक्कड़ ने सुमो की दो सीट की  निर्धारित करा ली। सुमो के इंतजार में इधर उधर घूम ही रहा था की नजर पड़ी एक जल्लाद खाने पर जहाँ आज एक भैंसा काटा गया है। 

जिसका मांस लेने लोग दूर दूर से अपने घर से झोला ले कर आएं हैं। सब अपनी अपनी जरूरत के हिसाब से मांस का टुकड़ा लेते जा रहे हैं। ये सब पुल के नीचे दुकान में हो रहा है।

भारत का आखिरी गांव जोखतावर

कुछ ही देर में बैग उठा कर गया सुमो में बैठने की तैयारी कर ली। जरूरत है तो सिर्फ एक सवारी की। कुछ ही देर में सुमो के भरते ही हम निकल पड़े बर्मा की ओर।

एक बहुत ही खास बात जो अभी तक भारत के किसी हिस्से में देखने को नहीं मिली वो ये की यहाँ का शुद्ध वातावरण। इतना साफ और स्वच्छ की दूर दूर तक क्या है साफ नजर आ रहा है।

सड़क की हालत अच्छी है। लेकिन ये कुछ ही दूर तक बाकी का रास्ता खस्ता है। इतना खस्ता की झूलते हुए सफर आगे बढ़ रहा है। सवारियां एक दूसरे के ऊपर डोल रहीं हैं। खेतों के ऊपर दिख रहे बादल को उछाल कर हांथ से छुआ जा सकता है।

जो की बिलकुल ही सामने नजर आ रहे हैं। खेत खलिहान में बारिश का पानी जमा हुआ है। आधा सफर भी तय नहीं हुआ था की कीचड़ से लथपथ सड़क के सामने गाड़ी आ खड़ी हुई।

एक एक कर के सभी गाड़ियों के चालक रुक गए। कुछ यहाँ पहले से ही मौजूद हैं। शायद हमारे आने का इंतजार था। इन गाड़ियों में व्यापारी से ले कर शिक्षक हैं। जिन्हे हर हाल में जोखतवार पहुंचना है।

सभी सुमो के ड्राइवर उतरे और इस मुद्दे पर चर्चा करने लगे। देखा जाए तो इस कीचड़ के ऊपर से गाड़ी निकलना मौत को दावत देने जैसा है।

ये कीचड़ इतना भयानक है की कोई इसके बीच में अगर एक बार फंस जाए तो शायद दोबारा निकल भी ना पाए। कुछ चालक तो अपनी गाड़ी मोड़ कर दूसरे रास्ते से जाने की बात करने लगे।

कुछ वापस चंपई जाने को उतावले दिख रहे हैं। किसी ने बोला कीचड़ के ऊपर से ही गाड़ी खींच दो जो होगा देखा जाएगा। पर इसके लिए चालक तैयार नहीं है।

इस पर एक बोला जो दूसरा रास्ता है वो भी कम खतरनाक नहीं है। सभी चालकों ने हिम्मत जुटाई और ये तय किया की इन सभी सवारियों को जोखतावार तक तो छोड़ना ही है।

कुछ तो वापस चंपई जाने के हक में थे। पर सवारियों ने हल्ला काट दिया जिसके बाद फैसला पलटना पड़ा। सवारियां जो सारा नजारा भापने के लिए वाहनों से नीचे उतर गईं थी एक एक कर बैठने लगीं। गाडियां एक के पीछे एक चल पड़ी लंबे रास्ते से।

ये लंबा रास्ता भी कम सकरा और खतरनाक नहीं है। जो सफर महज आधे घंटे का था वो अब डेढ़ घंटे का हो चला है। जटिल रास्ते से गुजरते हुए अखिकार जोखतावर आते हुए आठ बज गए।

लंबे रास्ते से लाने के कारण चालक को सबने कुछ मुद्राएं और प्रदान करी। बेगाने शहर में कोई दीवाना नहीं है। बस नजर में आ रहा है तो एक ढाबा और एक बड़ा सा शरणार्थी गृह।

हिंदी भाषा में थाने का पता पूछा तो किसी ने दक्षिण की ओर इशारा करके बताया। झोला यहीं रख कर जब थाने आया तो ये वीरान पाया।

सोचा था थाने में बातचीत करके यहीं बैग रखवा दूंगा। पर यहाँ तो इमारत ही गिरने की कगार पर है। बैग से जरूरी सामान निकाल कर बड़े बैग को शरणार्थी घर में ही रखवा दिया। जिसमे फिलहाल एक आदमी, औरत और एक छोटा बच्चा है।

पूरे हाल में सिर्फ अंधेरा ही अंधेरा है। बैग रखवा कर चल पड़ा भारत म्यांमार बॉर्डर की तरफ। लोगों से रास्ता पूछते हुए। जिसे पार करके रह दिल झील पहुंचना है।

गांव की तंग गलियों के बीच भटकते रास्ते पर एक अनजान राहगीर मिले जिन्होंने सीढ़ी से नीचे उतर कर जाने की सलाह दी। सीढ़ी इतनी सारी हैं की खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहीं।

इतनी सीढ़ी उतरते हुए वैष्णो देवी की चढ़ाई याद आ गई। तकरीबन पंद्रह मिनट लगे ये सीढियां उतरने में। यहाँ बॉर्डर के पहले ऐसा माहौल जैसे प्राचीन भारत में आ पहुंचा हूँ।

उन्ही पुराने तौर तरीके से व्यापार होना। पुरानी बिना पेट्रोल की गाड़ियां जिसमे माल ढो कर व्यापारी बर्मा से इधर और उधर जा रहे हैं।

कुछ ताश खेलने में मशगूल हैं। कुछ खाने पीने में। नवीनीकरण तो कहीं भी नहीं है। आदिकाल में जैसा व्यापार किताबों में पढ़ा होगा आज वैसा देख पा रहा हूँ।

भारत पार बर्मा

बीएसएफ की चौकी पर पहुंच कर उनको बर्मा जाने की मंशा जाहिर की। कुछ पूछताछ के बाद हमें बर्मा की चौकी में जाने को कहा। और अपनी चौकी से उनसे बात करने की बात कही।

नदी के ऊपर बने पुल को पार करने के बाद अब जब इधर बर्मा आ पहुंचा तो सहसा मन में थोड़ा डर तो लगा ही। क्योंकि ये पहली दफा हो रहा है जब अपना देश छोड़ा हो और एक पराए देश में आया हूँ।

इधर बर्मा की चौकी में घुसा तो सैनिक अपने रौबीले अंदाज में पूछताछ करने लगे। रह दिल झील जाने की बात पर अनुमति मिली। पर उसके लिए भी सौ रुपए जमा कराए और साथ ही आधार कार्ड भी रखवा लिया। और वापसी में लेने को कहा।

चौकी पर लगी घड़ी पर नजर पड़ी तो भारत में जहाँ नौ बज रहे हैं वहीं बर्मा में दस। समय जोन जो की एक गड़ना के अनुसार भारत में एक के बजाय चार होने की बात कही गई थी वो एक ही है।

ऐसा इसलिए क्योंकि उस दौर की जनता इतनी पढ़ा लिखा नही माना गया जो यह अंतर समझ पाती। इसलिए एक ही रखा गया।

चम्पई से भारत के आखिरी गांव ज़ोखतावर के बीच का दृश्य

बिना वीजा या पासपोर्ट के दूसरे देश में घुसना वाजिब है या नही ये तो पता नही। पर किसी जमाने में बर्मा भारत का हिस्सा हुआ करता था। जो 1937 में भारत से अंग्रेज़ो ने अलग कर दिया।

कार्यवाही के बाद आगे बढ़ा तो पाया यहाँ शराब की दुकानें जगह जगह नुक्कड़ पर ऐसे खुली हैं जैसे भारत में हर मोड़ पर परचून की दुकान होती है।

धूल मिट्टी से भरा रास्ते पर से गुजर ही रहा हूँ की अचानक बिल्ली ने रास्ता काटा। कुछ देर के लिए मैं रुका पर साथी घुमक्कड़ चल पड़ा। रह दिल तक जाने का रास्ता अभी भी यहाँ से पांच किमी दूर है।

इस अनजान शहर में किसी को हिंदी तक नहीं समझ आ रही है। जिससे संवाद करने में थोड़ी तो कठिनाई हो रही है। ऐसे ही एक किनारे बन रहे मकान में कुछ मजदूरों से झील तक जाने का रास्ता पूछा।

पर यहाँ न किसी को अंग्रेजी समझ आ रही है और न ही हिंदी। शकल से सारे मजदूर भारतीय लग रहे हैं। काफी वक्त गुजरने के बाद अंदर से एक बिहारी बाबू निकले जिन्होंने पूरी बात समझी और झील तक जाने का रास्ता भी बता डाला।

झील दूर होने के कारण हमें वहाँ तक छोड़ने के लिए भी दो आदमी तैयार हो गए। पर बिना सौदे के नहीं। अपनी अपनी मोटर स्टार्ट की, और एक पर मैं और दूसरे पर साथी घुमक्कड़ को बिठाया।

ऊंच नीच पहाड़ियों से होते हुए अपने देश को देखना यादगार रहेगा। पर मुझे भाषा के अलावा कोई और फर्क नजर नहीं आ रहा। यहाँ भी यही बादल, पहाड़ और उधर भी।

कुछ दूर का सफर तय हुआ ही होगा की रास्ते में वाहन चालकों को काला सांप दिखा। जिसे मारने के लिए दोनो गाड़ी एक किनारे लगा कर उतर गए।

बहुत ढूढने के बाद भी सांप ना मिला। बात ना बनी तो वापस अपनी फतफटिया उठा कर चल पड़े। भारत में जहाँ सड़क पर बाईं ओर चलने का प्रावधान है बर्मा में इसका उल्टा दाईं और चलने का।

धूप तो मानो ना के बराबर है। बरसाती मौसम में मन कर रहा है बस ऐसे ही चलता जाऊं। गांव से होते हुए जहाँ काफी लोग हैं सैलानियों को देख प्रफुल्लित हो रहे हैं।

रह दिल झील के पहले एक नामी मंदिर है इस बारे में तो पढ़ा था और अभी जब झील के समीप हूँ तो देख भी पा रहा हूँ। जो की फिलहाल बंद है।

रह दिल झील

झूमते हुए रह दिल झील भी आ पहुंचा। वाहन चालकों को पचास पचास रुपए पकड़ा कर चलता किया। झील के पास इकलौती बहुत बड़ी दुकान है।

इस दुकान में खाने पीने के अलावा मदिरा भी उपलब्ध है। यहाँ का संविधान ऐसा करने की अनुमति देता है। साथी घुमक्कड़ ने अपने लिए कुछ खाने की सामग्री ले ली और झील के पास आ गया।

रह दिल झील को ऐसा इसलिए भी कहा जाता है क्योंकि इसका आकार एक दिल के समान है। झील किनारे बैठ घंटे भर लिफ्ट उठता रहा।

कुछ ही देर के भीतर चार पहिया वाहन से कुछ लोग आए। जो बोली भाषा से हिंदुस्तानी लग रहे हैं। झील में उतरते ही इन सबने मोटर वाली नौका से इस विशालकाय झील का चक्कर लगाया।

चक्कर लगा लेने के बाद सारे के सारे एक तरफ आ कर मेरे समीप बैठ गए। उनमें से एक जो उस दल का मुखिया लग रहा है बताने लगा रह दिल झील के बारे में।

सिगरेट का कश लेते हुए बोला की इस झील की मान्यता एक लड़की की प्रेम गाथा एक नाग से। जिसका मंदिर भी है झील के इस पार।

इस झील के गहराई आजतक कोई ना जान सका। जिसको नापने के लिए देश विदेश से लोग आते रहे। पर सफलता किसी के हांथ ना लगी।

मुझे आज स्नान भी करना बाकी है तो इस सुबह काम में देरी तनिक भी ना की और कूद गया झील के पानी में। जैसे जैसे आगे बढ़ रहा हूँ गहराई बढ़ती जा रही है।

झील के बीचों बीच ना जाने क्या हाल होगा। वैसे पराए देश में कोई अपना देशवासी मिल जाता है तो मजा दोगना हो जाता है। अगर ये भाई साहब ना होते तो शायद कुछ वक्त बिता कर निकल जाता।

बर्मा से कुछ ऐसा दिखा भारत

भारत वापसी

रह दिल झील में तकरीबन दो घंटे बिताने के बाद पीठ में जोर का दर्द हुआ। ये दर्द इतना तेज है की ठीक से खड़ा नहीं हुआ जा रहा है।

साथ में आए भारत से एसबीआई मैनेजर अपनी कार साथ लाए हैं। मैं उसी में बैठ कर कुछ देर आराम करने लगा। अब यहाँ से निकलने का भी वक्त हो चला है।

बाकी लोग भी कार में अपनी तशरीफ रखने लगे। अब मेरे अलावा बाकी लोग भी निकल पड़े देश वापसी की ओर। म्यांमार में सड़क पर दाएं ओर चलने का नियम है।

इसी भ्रम में ड्राइवर मोड़ से मुड़ते हुए सामने से आ रहे मोटर चालक को टक्कर दे मारी और वो अपना दुपहिया वाहन ले कर वहीं गिर गया।

गुस्से में चालक ने उठ कर पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराने की बात की। दूसरे देश में सैलानी के तौर पर आए ये सभी लोग घबरा गए। फौरन कार से उतर कर गिरे हुए शख्स का वाहन उठाने लगे।

जत्थे में से दूसरे आदमी ने कार एक किनारे लगाई वो भी घायल शख्स के कहने पर। क्योंकि ये शख्स अभी बहुत तिलमिलाया हुआ है और गुस्से में है।

कार से बाहर निकला तो देखा मोटर वाहन के कुछ हिस्से टूट गए थे। पुलिस की रिपोर्ट से बचने के लिए कार का मुखिया बगल के गैरेज में उसकी गाड़ी मरम्मत कराने लगा।

मामला तूल पकड़ता इससे पहले ही मैं साथी घुमक्कड़ के साथ पैदल चल पड़ा भारत की सीमा तक। सीमा तक भी पहुंचने के लिए स्थानीय निवासियों से रास्ता पूछना पड़ रहा है।

यहाँ पराए देश में ना तो मोबाइल काम कर रहा है ना ही दिमाग। छोटे बैग सहित तकरीबन एक घंटे के पैदल सफर में बर्मा की चौकी पहुंचा। यहाँ से अपना आधार कार्ड वापस लिया और भारत में दाखिल हुआ।

भारत बर्मा की सीमा ताऊ नदी के ऊपर आधारित है। पुल को पार करके भारत में आया। व्यापारी अपना काम करते जा रहे हैं। इधर आधे घंटे में जोखतावर आ गया। इंतजार है तो अब चंपई जाने का।

पीछे पीछे साथी घुमक्कड़ भी आ गया। एक ढाबे में बैठ कर चाय पीने के बाद सुमो में दो सीट निर्धारित करा लीं। शरणार्थी घर जैसे दिखने वाले घर से अपने दोनो बड़े बैग निकलवाए और सुमो का इंतजार करने लगा।

सुमो का इंतजार ही था की कार में सवार वो एसबीआई का मैनेजर अपने साथियों के साथ आ गया। कुछ देर उससे बात हुई और थोड़ी देर में वो भी चल दिया अपने रास्ते चंपई की ओर।

आधे घंटे के इंतजार के बाद सुमो आई और इंतजार कर रही सवारियां एक एक कर बैठने लगीं। मैं भी अपना बैग सुमो की छत पर रख कर अंदर बैठ गया।

मेरे एक छोर पर साथी घुमक्कड़ और दूसरे छोर पर एक सज्जन बैठे। मिजोरम में दाखिल होने के बाद से पहली दफा किसी सभ्य दिख रहे मानव से वार्ता हो रही है।

इन भाईसाहब ने मिजोरम लचर और लाचार व्यवस्था का पूरा चिट्ठा किट्ठा खोल कर प्रस्तुत कर दिया। खुद बैंक ऑफ इंडिया में कार्यरत हैं। किसी समय यहाँ यातायात की अच्छी सुविधा हुआ करती थी।

पर जनता ने बस परिवहन को सिरे से खारिज कर दिया। जिसके कारण धीरे धीरे बंद ही करनी पड़ी। मिजोरम में जनसंख्या बहुत ही नाम मात्र की है।

अंधेरा होने से पहले गाड़ी को एक जगह रोका गया जहाँ पुलिस चेकिंग कर रही है। किस चीज की जांच हो रही है तो बगल में बैठे भाई साहब ने बताया की बर्मा से भारत में घुसते वक्त यहाँ भारी मात्रा में अफीम गांजा पहुंचाया जाता है।

उसी को ले कर पुलिस चौकन्ना है। जीप से उतरने के बाद मुझसे और साथी घुमक्कड़ से अलग से पूछताछ हुई। शुरुआत में पुलिसकर्मी ने बदतमीजी करने की कोशिश की। पर जब उन्हें ज्ञात हुआ बालक अज्ञानी नहीं है तब थोड़ा संभल कर बर्ताव करने लगे।

बीस मिनट की जांच में शारीरिक जांच से लेकर सुमो के ऊपर चढ़कर बैग तक खंगालने की कोशिश भी की गई। पर हांथ नही लगा कुछ भी।

सुमो को कुछ देर में चलता किया। नजर पड़ी उस एसबीआई मैनेजर पर जो अपनी कार में सवार हो कर एक किनारे खड़ा है। शायद उसकी चोरी भी पकड़ी गई है पर पता नहीं क्यों कोई कार्यवाही नहीं हो रही?

अंधेरी रात में बस चंपई पहुंचने की देर है। सोने का ठिकाना कहाँ होगा ये कहना तो मुश्किल है। यही सवाल मुझसे बैंक वाले बाबू भी पूछने लगे पर जवाब मेरे पास नहीं है।

भारत में स्वागत

ना दर ना ठिकाना

चंपई पहुंचने की देर थी और एक झटके में गाड़ी खाली हो गई। रुकने का तो कोई ठिकाना ही नहीं नजर आ रहा। हांथ में है तो सिर्फ डब्बे वाला फोन जो चार्ज भी बमुश्किल होता है।

खुद को संभाला और फिर बैग को और सामने दिख रहे होटल में जा घुसा। पर यहाँ तो कोई बुकिंग ही चालू नहीं है। सोच में पड़ गया की अब क्या किया जाए।

सोने की मंशा से बैग लेके उस जगह पहुंच गया जहाँ आज सुबह ही नित्य क्रिया करने आया था। जगह का मुआयना किया तो मालूम पड़ा ये भी किसी का घर ही है।

जहाँ एक और मैं चद्दर बिछा कर देहरी पर सोने की व्यवस्था कर रहा था अब सब बेकार। बैग लेके वापस चौराहे पर आ गया जहाँ सुमो ने उतारा है।

चौराहे पर सामने एक गोस्त पका रही महिला अपनी सहेली के साथ सजी धजी बैठी थी। वो एक नजर मुझको ही देख रही थी। शायद यही सोच रही होगी ये लड़का कभी इधर से उधर चक्कर क्यों काट रहा है?

चौराहे के सामने दिख रही गली में घुसा और हताश मुद्रा में वापस आ गया। ठीक उसी जगह बैठ गया जहाँ सुबह चाय पूड़ी बिक रही थी। अब जब कोई भी उम्मीद नजर नहीं आ रही है तभी एक लड़के ने मुझेसे मेरा हाल जाना।

उसको घटित हुई आज की सारी घटनाएं बताई तो मुझे यहीं इंतजार करने को बोला और बात करते करते नीचे चला गया। मुझे लगा शायद सिर्फ बात ही सुननी थी इसे।

पर कुछ देर में वापस आया और मुझे अपने साथ ले जाने लगा। साथ चलते चलते उसने जितने बन पड़े उतने सवाल किए और अंतः बोला “यू विल स्टे विद मि”।

अपने घर लाया जहाँ उसकी मां हैं बस। पिता कब के गुजर गए। उस लड़के की जगह अगर मैं होता तो क्या किसी अनजान लाचार मजबूर इंसान जो अपने घर से हजारों किमी दूर है उसे अपने घर रुकवाता?

सोचने वाला प्रश्न है!

चम्पई से ज़ोखथावार से रेह दिल, वाइस वर्सा की कुल यात्रा 80km

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