खतरनाक घाटियों में रेकोंग पियो से काज़ा तक का सफर

स्पीति वैली | भारत | हिमाचल प्रदेश

सुरक्षित बस अड्डा

जल्दी सोया ही था जल्दी उठने के लिए। पांच बजे की बस पकड़ने के लिए चार बजे उठना सहूलियत भरा रहा। काल राते सोने से पेहले दरवाज़ा लकड़ी के लट्ठे से जाम कर दिया था। इसलिए कोई अन्दर ना आ सकता था, और ना ही आया। बस आ रहा है तो वो है शोर शराबा। 

रेकोंंग पियो बस अड्डे से अधिकतर बसें सुबह सवेरे निकल लेती हैं तब जा कर कहीं २००-२५० किमी दूरी का सफर शाम तक तय कर पाती हैं। कुछ यही हाल शायद मेरा भी होने वाला है? 

दरवाज़ा खोला तो पाया जितना शोर छन कर अन्दर आ रहा है उतनी भीड़ तो ना दिख रही है। मैंने चार्जिंग प्वाइंट से सारे मोबाइल और पावर बैंक समेट कर सब अन्दर लपेट दिया।

इतनी देर में साथी घुमक्कड़ निकल गया नहाने। इधर मैने सारा बुरिया बिस्तर समेटा। उड़के हुए दरवाज़े को देख लोग अब अन्दर आने लगे हैं। कुछ ने तो अपना मोबाइल भी जड़ दिया है चार्जिंग पे।

दस मिनट में साथी घुमक्कड़ तैयार हो कर आ गया। इधर साथी घुमक्कड़ के तैयार होने के बाद मैं निकल पड़ा दुसलखाने की ओर। बाहर बैठे काका को सिक्के पकड़ाए और पहुंच गया अन्दर नित्यक्रिया हेतु।

अभी बस अड्डे पर भीड़ काफी है। चूंकि सुबह सवेरे ही रेकोंंग पियो से बस अलग अलग इलाके को निकल जाती हैं। ताकि सूर्यास्त होने से पहले वो तय जगह पर पहुंच सकें।

मैं भी फटाफट तैयार हो चला। अब कमरा खाली करने को भी तैयार हूँ। उजाला भी काफी हो गया है। बस अड्डे के इस कमरे में तब तक कब्ज़ा रहा जबतक बाहर ना निकल आया। मेरे बाहर आते ही कुछ मनचले अंदर घुस गए।

टिकट की माथापच्ची

टिकट काउंटर पर लगी भीड़ देख मैं गुणा भाग कर पा रहा हूँ कितने यात्रियों का जाना रहेगा। अन्दर से बैग उठा कर मैंने बैग बाहर पड़ी बेंच पर रखा। कौन सी बस काजा के लिए रवाना होगी ये पता करने के लिए बाहर आ गया। 

मुझे लगा टिकट तो बस में चढ़ने के बाद मिल ही जाएगा जो अमूमन होता है। मेरा ये भ्रम तोडते हुए किसी ने आगाह किया कि टिकट तो आपको काउंटर से ही लेना पड़ेगा क्योंकि बस में सभी सीटें पहले से ही बुक हैं।

ये सोच के है पसीने छूट गए जब सीट नहीं है तो जाने को मिलेगा भी या नहीं? 

क्योंकि यहाँ पहाड़ों में किसी को खड़ा करके ले जाने का प्रावधान भी नहीं है ऐसा भी सामने खड़े महापुरुष बोले। वो भी 200 किमी की दूरी तक।

मतलब सारे किए धरे पर पानी फिर जाएगा! एक समय के लिए मुझे लगा शायद जिनके पास टिकट ना हो उनको चढ़ने भी ना देंगे।

काउंटर पर पहुंचा तो महिला कर्मचारी मिली। गोल काउंटर पर बनी दो खिड़कियों पर मैडम कभी इधर तो कभी उधर शक्तिमान की भांति घूमे जा रही हैं।

आगे से हटकर पीछे। जब तक दूसरी खिड़की पर पहुंचा तब तक वो बंद हो गई। इससे पहले काउंटर बंद हो, उससे पहली खिड़की पर पहुंच कर संशय दूर करने की कोशिश की। 

पर उन्होंने बिल्कुल सरकारी कर्मचारी का प्रमाण देते हुए सारा बोझ ड्राइवर और कंडक्टर के माथे मढ़ दिया। और बताया अगर सीट नहीं है तो फिर उनके ऊपर है वो की वो लेे जाएंगे या नहीं। 

बात थोड़ी अब चिंताजनक और गंभीर होती दिख रही है। अब तक कंडक्टर बाबू भी नदारद है जो उन्ही से पूछ लिया जाए। जिनकी सीट निश्चित है वो बस की छत पर चढ़ कर अपना सामान लादवाने में जुट गए हैं। 

काजा जाने की ख़ुशी

मैं एक किनारे खड़ा यही सोच रहा की जाने को मिलेगा या नहीं। तभी अचानक हीरो की तरह एंट्री लेते हुए कंडक्टर साहब आए। और मेरे साथ खड़े अन्य यात्रियों ने जिनका टिकट पहले से बुक नहीं है एक स्वर में पूछा मिलेगा या नहीं मिलेगा। 

कंडक्टर साहब सोच में पड़ गए और ड्राइवर से सलाह मशविरा करने निकल गए। कुछ देर सलाह मशविरा करके जब वापस लौटे और खुशी से सबको बस में लदने को बोला। खुशी में सभी अपना अपना सामान बस की छत पर चढ़वाने लगे। 

सो मैं भी बेंच से बैग उठा कर ले आया और साथी घुमक्कड़ को ऊपर भेज बैग बस को छत पर चढ़वाया। कस कर रस्सी से दोनों बैग बांध दिए गए हैं। मेरी तरह और भी लोग बैग बांधने में जुटे हैं।

अमूमन बसों में पीछे के दरवाजे से ही चढ़ना होता है। सो पीछे के दरवाज़े से चढ़ने की कोशिश कर रहा हूँ। यहाँ खचाखच भरे होने के कारण जगह बनाना तो दूर घुसना भी मुश्किल है। 

कंडक्टर साहब नियाती सीधे और सज्जन मानुष दिखाई पड़ते हैं वो मुझे अपने संग आगे के दरवाजे से ले आए जो अमूमन उतरने के लिए होता है। 

मैं चढ़ा और अन्य यात्रियों की तरह बिना टिकट वालों की कतार में लग गया। बस का चालक चढ़ा पूजा पाठ कर भगवान को याद करने लगे।

इंजन चालू हुआ और यात्रियों से खचाखच भरी बस निकल पड़ी अपनी मंज़िल स्पीति वैली काजा की ओर। 

शुरू हुआ सफर

कच्ची पक्की सड़क पर धूल का गुब्बार उड़ाते हुए चल रही है बस। कभी इस पग कभी उस पग। सुबह का वक़्त है इसलिए मौसम अभी सर्द है। 

रेकोंंग पियो से पांगी तक लोकल आदमी का चढ़ना उतरना लगा रहा। बस्ती इलाके से बाहर निकल, असली सफ़र की शुरुआत तो अब हुई है। 

मैं दरवाज़े से इतर उतरने और चढ़ने वालो के लिए दरवाज़ा खोलने में ही मशगूल हूँ। मेरे ठीक पीछे एक फिरंगी है। बातचीत में मालूम पड़ा कि ये जनाब फ्रांस से हैं और कुछ दिन काजा में बिताना पसंद करेंगे।

कंडक्टर साहब ने टिकट काटना चालू किया। इधर जब मेरा नंबर आया तब रेकोंग पियो से काज़ा तक का टिकट फाड़ते हुए 400 रूपये बोले।

मुझे लगा शायद मैंने ठीक से नहीं सुना पर जब टिकट देखा तो मालूम पड़ा कंडक्टर साहब मज़ाक नहीं कर रहे थे। एक किमी का दो रूपए, देखा जाए तो पहाड़ी के हिसाब से दाम वाजिब है।

सुबह की पहली क़िस्त 500 से कटी।

पांगी से कुछ दूरी पर एचपीपीसीएल का पावर हाउस देखा जा सकता है। जहाँ से पूरे आसपास के क्षेत्र और हो सकता हो पूरे रेकोंग पियो का बिजली का खर्चा चलता हो।

ठीक इसी तरह जालोरी पास से रेकोंग पियो आते वक़्त कई सरकारी और कुछ प्राइवेट बांध भी दिखे थे। जिनके द्वारा पहाड़ों पर बिजली उत्पन्न की जाती है।

पर ये लंबी लंबी सुरंग खोदने पहाड़ों को कमजोर करना भी होता है। और कईयों लोगों की जान के साथ खेलना भी।

खड़े खड़े कब पुल के ऊपर से नदी पार कर गया पता ही नहीं चला। लोकल सवारी का चढ़ना उतरना अभी भी बरकरार है। दरवाज़े के पास खड़ा हो मैं पहाड़ों की बनावट और उनके रंग में रंग चुका हूँ। 

पार्सल और अख़बार की जिम्मेदारी

बस में सबसे आगे के हिस्से में भर भर के बोरियां रखी हुई है। ठीक से देख तो वो उसमे डाक घर की मोहर लगी हुई हैं। और ऐसी तमाम बोरियां है।

किसी में कम सामान तो किसी में ज्यादा। उत्सुकतावश पूछ ही लिया। तो कंडक्टर बाबू ने बताया कि ये पार्सल है जो अलग अलग जगहों पे बस के माध्यम से पहुंचाया जाएगा।

चूंकि काजा और रेकोंंग पियो में व्यापक क्षेत्र कनेक्टिविटी बहुत ही कम है जिस वजह से बस के अलावा कोई सरकारी वाहन नहीं जाता। इसी वजह से बस से सारा सामान आता जाता है।

यही हाल अखबारों का भी है। शहरी इलाकों में तो रात के तीन बजे ही माल की ढुलाई हो जाती है। पर यहाँ पहाड़ी पर रात में आवाजाही एकदम बंद रहती है।

जिसके कारण अखबार भी जगह जगह बाटना बस ड्राइवर और कंडक्टर का ही काम है। बात ही कर रहा था कि कंडक्टर साहब ने दिन का पहला अखबार सड़क पर फेंकते हुए चल दिए। उठाने वाले उठा लेते हैं। और ये रोज ऐसे ही अखबारों का वितरण करते हैं। 

कार्य प्रगति पर है

इन पहाड़ों को कैसे काट काट कर आवाजाही के लिए सुगम बनाया है वो देखा जा सकता है। सड़क की हालत बद से बदतर है काफी जगह। कुछ जगह भारत रोड संस्थान द्वारा सड़क का निर्माण किया गया है। कुछ जगह पर सेना द्वारा भी।

काफी जगहों पर निर्माण कार्य जारी है। ऐसी ही एक जगह से बस गुजरने को आई तभी सड़क के दोनों ओर गाड़ियों को रोक दिया गया।

ड्राइवर साहब ने बताया कभी कभी ये गाडियां एक एक घंटे रोक देते है ताकि कुछ देर के लिए ही सही सड़क का काम हो सके। रोड के उस पार फिलहाल ज्यादा गाडियां दिखाई पड़ रही हैं।

इधर की तरफ तो फिर भी कम ही हैं। गाड़ी रोकने का संकेत मिलता नहीं की चालक साहब की तरह और भी अन्य लोग इंजन बंद कर देते हैं।

संदो पर सड़क निर्माण कार्य होता हुआ

पर ड्राइवर साहब तो गाडी छोड़ नीचे उतर गए मुआयना करने। जैसे उन्हें पता हो कितना समय लगने वाला है।

इधर जब तक निकलने का इशारा मिला तब तक बस के पीछे काफी गाडियां खड़ी हो चूंकि हैं और सामने तो इसका भी दोगुना। सकरी सड़क में बारी बारी से निकलने में ही समझदारी है। 

चूंकि चालक साहब की बस सबसे आगे खड़ी है इस वजह से उन्होंने सामने से आती हुई गाड़ियों को पहले निकलने दिया। जब सारा रास्ता साफ हुआ तब इधर से सफर की शुरुआत हुई।

पहाड़ काटने तोड़ने की वजह से बगल में बह रही नदी सफेद से बारूदी रंग की हो चली है। लगातार बेहेते पानी को देख ये अनुमान लगाया हा सकता है। 

रास्ते से भारी भरकम ट्रक भी गुजर रहे हैं जो या तो माल की सप्लाई के लिए जा रहे हैं या फिर अन्य सामान की सामग्री के लिए। इनके सकुशल और पहुंचने की सुनिश्चित के लिए सड़क मार्ग का ठीक होना बेहद आवश्यक हो जाता है।

घड़ी में समय हो चला है सुबह का साढ़े आठ। सूरज भी उफान पर चढ़ चुका है। अब मौसम में हल्की गर्मी उत्पन्न हो रही है। पांच बजे से नॉन स्टॉप ये बस चल रही है।

बस में भारी तादाद में मजदूर भाई भी हैं। अधिकतर बिहार, झारखंड और छत्तीगढ़ राज्य से संबंध रखते हैं। अगर ये मजदूर ना हों तो हम जितनी आराम से इन पहाड़ियों की सड़कों पर सफर कर रहे हैं वो शायद संभव ना हो। 

अभी तक सबको पर जितने भी मजदूर दिखे वो सब इन्हीं राज्यों से ताल्लुकात रखते हैं। बिहार को हम जो पिछड़ा राज्य मानते हैं।

कहीं ना कहीं बिहार के है मजदूर पूरे भारतवर्ष में जी जान से लगे पड़े। अपने कंधो पर अर्थव्यवस्था का बोझ लिए। भारत का मजबूत स्तंभ बन कर। 

स्पेलो में हुआ नाश्ता पानी

बातें हो ही रही थीं कि ड्राइवर साहब ने एक जगह ला कर गाड़ी रोक दी सुबह के चाय पानी नाश्ते के लिए। अगल बगल बनी बाजारों को देख कर तो यही लगता है।

इस इलाके का नाम है स्पेलो और अभी सुबह के नौ बज रहे हैं। बस से सभी सवारियां धीरे धीरे नीचे उतर गई। सारे मिस्त्री मजदूर भी। बस खाली हुई है तो सोचा कुछ देर बैठ कर थकान मिटा लूं। 

सामने दिख रही परचून की दुकान से सोच रहा हूँ कुछ नमकीन बिस्कुट के पैकेट लेता चलूं। रास्ते भर कुछ हल्का फुल्का जाता रहेगा तो बेहतर रहेगा।

परचून कि दुकान के ठीक बगल में समोसे, जलेबी, चाय पूड़ी की भी दुकान है। जहाँ इस समय भारी तादाद में बस की सवारियां मौजूद हैं। 

जनरल स्टोर की दुकान में ज्यादा भीड़ नहीं है। कुछ तरह तरह के बिस्कुट और नमकीन में ही अपना नाश्ता हो जाएगा। चुनिंदा पैकेट लिए और भुगतान करके बाहर निकल आया। 

सामने देखा तो वो फ्रांस का गोरा चिठ्ठा आदमी कुछ पकौड़ियां खाने में जुटा हुआ है। इधर साथी घुमक्कड़ ने अपने लिए जलेबी लेली। सबका अपना अपना हिसाब चल रहा है।

घूमते फिरते आधा घंटा गुजर गया। वैसे स्पेलो में लगभग हर सुविधा मौजूद है। चाहें फिर वो पैसे निकालना हो या खुद को। कुछ ही दूरी पर यहाँ से पूह पड़ेगा।

स्पेलो, पूह, खाब, नाको, समदो, ताबो, ढनकर कुछ ये मुख्य जगह हैं पियो से काजा के सफर के मध्य में।

इन जगहों का नाम आप अक्सर सुनेंगे अपने सफर के दौरान। ड्राइवर साहब अपना नित्य क्रिया करके आए और सबको बस में बैठने का आदेश जारी कर दिया।

जिन्होंने सुना वो तक बैठ गए। जो नहीं सुन पाए उनको हॉर्न लगा कर अपना संदेश पहुंचाया। बाकी सारे भागते हुए आए और अपनी निर्धारित सीट पर बैठ गए। खड़े होने वाली सवारियां खड़ी ही रहीं।

कैसा है ये सफ़र!

चल पड़ी बस एक बार फिर रोमांचक घाटियों में। उबड़ खाबड़ सड़क पर इस इलाके से निकलते हुए। अब अगला स्टॉप क्या होगा पता नहीं।

बस के अगले हिस्से में अभी भी काफी मात्रा में अखबार देने को रखे हुए हैं और पार्सल की बोरियां भी। इसके अलावा जो भी किसी को पार्सल आगे बढ़ाना होता तो वो कंडक्टर को अपनी पोस्टल की लगी हुई मोहर वाली बोरी पकड़ा देता।

जगह जगह सेना तैनात है। चूंकि खाब से कुछ दूरी पर ही चाइना बॉर्डर है जिसे ध्यान में रखते हुए अच्छी पलटन है यहाँ। जो रोजाना इन्हीं सड़कों पर परेड और रोजमर्रा के काम करते हैं।

उपयोग के लिए तैयार है बस उद्घाटन की देरी है।

बस में भी कुछ भारतीय जवान हैं जिन्हें कुछ दूरी तक जाना है। यहाँ अधिकतर पुल लोहे के निर्मित हैं। इनमे से कुछ काफी पुराने हैं। जिन पर से बस या ट्रक जैसे भारी भरकम वाहन गुजरने की मनाही है। 

ऐसी ही जगह पर एक पुराना पूल है। जो काफी छोटा है पर उसी के समांतर और तीन गुना लंबाई का एक ठोस पुल का निर्माण हुआ है। देख कर लगता है इस नए पुल का उदघाटन अभी नहीं हुआ है। 

इसलिए हम उस पुल से ना जाते हुए जुगाड वाली जगह से जाने पर प्रतिबद्ध हैं। जो तकरीबन एक किमी अधिक है। अभी पहाड़ी से बस नीचे की ओर जा ही रही है कि भेड़ बकरियों का एक झुंड रास्ता रोके खड़ा हो गया। इनके मलिक पता नहीं कहाँ नदारद हैं।

हॉर्न बजा कर जब आवाज़ लगाई गई तब जा कर कहीं भाई साहब ऐसे और अपनी भेड़ बकरियों को किनारे किया।

दूर से देखने पर ऐसा लगेगा कि बस पहले नीचे गई फिर एक जुगाड वाले पुल को पार किया और आगे बढ़ गई। और फिर एक नई चढ़ाई।

ठीक ऐसा ही हुआ। पर इतना सफर तय करने पर जो धूल और धुएं का गुब्बार अन्दर भर गया है उसका क्या ही कहना। आनन फानन में सारी खिड़कियां बंद करी गयी।

कपड़े से भी मूह ढक लिया फिर भी हाल बुरा है। कपडे, मुँह और सिर के बालों में अच्छे से धूल जम चुकी है।

नया पुल पर अभी सन्नाटा पसरा हुआ है, पर देखने में बहुत ही सुन्दर लग रहा है। लेकिन धूल से दम घुट गया है। मजबूरन बस में वापस से सारी खिड़कियां खोली गई हैं। अब जब बाहर से ताज़ी हवा अन्दर और धूल बाहर निकली है तब जा कर कुछ जान में जान आई है।

बुलेट राइड

रास्ते भर मुझे बुलेट सवार लोगों का झुंड दिखा और अभी भी दिख रहा है।

कोई अपने मित्र के साथ तो कोई अपनी बीवी के साथ बुलेट से स्पीति घाटी को या तो देख के वापस आ रहे हैं या फिर देखने जा रहे हैं। 

सेना के भारी भरकम ट्रक भी आस पास से गुजर रहे हैं। इसी बीच बस खाब आ पहुंची। सम्दो अभी भी यहाँ से ४८ किमी है। और एक बार फिर से सड़क निर्माण के चलते बस रोकनी पड़ी।

खाब से चाइना बॉर्डर कुछ दूरी पर है। बस चलने पर आगे कुछ दूरी से पुल से पार करने लगी। तभी एक बाइक वाले ने अपनी गाड़ी आगे लगा बस रुकवाई।

सवारी चड़ी और बस चल पड़ी। बेहद ही जल्दी में लग रहे भाई साहब ने अपना परिचय देते हुए दार्जलिंग से होने का दावा किया। अपने रोचक घुमक्कड़ी के किस्से भी सांझा करने लगे।

कैसे एक दफा वो पहाड़ों के बीच में कुछ ऐसा फसें थे कि ऊपर जीवन नीचे मौत। फिलहाल तो उबड खाबड़ सड़क से बस ऊपर नीचे हो रही है। लेकिन जैसे जैसे बस आगे बढ़ रही है वैसे वैसे बर्फीले पहाड़ नजर आ रहे हैं।

इन पहाड़ों का कद इतना ऊंचा है कि यदि कोई इन्हे ठीक से देख भर लेे तो ही इसमें समा जाए। कच्ची पक्की सड़क का खेल जारी है। इधर बस चालक अपने मनोरंजन के लिए गाने चला दिए हैं।

ना जाने किसकी मोहब्बत में। मगर हम तो डूब गए हैं इन मनमोहक पहाड़ियों के कटीली घुमावदार वादियों में। हल्की हल्की ठंड भी महसूस हो रही है।

 

बीच रास्ते में सूनसान रोड पर दो बाइक सवार लड़के खड़े हुए दिखाई पड़े। जो हाँथ में साइलेंसर लिए खड़ा है। ये भी बहुत भारी समस्या है। की आप अगर दुपहिया वाहन से आते हैं तो इस तरह की मुसीबतों का सामना अवश्य करना पड़ सकता है।

इन बुलेट सवार को देख तरस भी आ रहा है पर कर भी क्या सकते हैं। अब यही होगा इन दो में से एक आदमी कही पास की जगह पर सारा सामान ले कर जयगा मदद के लिए और दूसरा बाइक की रखवाली करेगा।

नाको में भोज

एक पहाड़ी से दूसरी पहाड़ी में पक्की सड़क बनाने के कार्य में ये मजदूर जुटे हुए हैं। इसी बीच तेज़ धूप में बस अब आ पहुंची है नाको।

वैसे भी बस में खड़े खड़े हालत खराब हो चुकी है। कहीं ना कहीं रुकना बहुत जरूरी हो गया था। धीरे धीरे कर सब सवारियां बस से उतरने लगीं।

मेरा शरीर तो पूरा टेढ़ा हो चुका है और कुछ पेट भी खराब लग रहा है। जाने क्यों? पहाड़ियों में सब छुट पुट जगह पकड़ कर स्वच्छ भारत का धड़ल्ले से उल्लघन करते हुए नजर आ रहे हैं।

ध्यान से देखने पर भी कहीं शौचालय नजर नहीं आ रहा है। बस नजर आ रहा है तो दाहिने हाँथ पर एक सरकारी इमारत और सामने की ओर एक बड़ा सा ढाबा।

आसपास के तैनात सभी जवान यहीं भोजन करते हुए नजर आ रहे हैं। बस में कुछ देर बैठने की जगह भी मिल गई थी। इसलिए भी रीड की हड्डी सही सलामत है। बगल में बैठी गणित अध्यापिका जो पांगी के आगे से चढ़ी थी उनसे भी काफी गुफ्तगू हुई स्पीति को समझने के लिए।

यहाँ रहना आसान नहीं है। और समूचे भारत से बिल्कुल अलग ही दुनिया है यहाँ। पेट हल्का होने के बाद ये तय किया कुछ ठोस भोजन हो जाए तो बेहतर रहेगा। 

आसपास टहलने के बाद जब बस पर नजर पड़ी तो देखा बस की छत से फिरंगी बाबू का बैग नीचे गिरने की हालत में है। इससे पहले वो नीचे गिरे मैंने उनको इक्तला करना जरूरी समझा।

मैं फिरंगी बाबू, गणित अध्यापिका और साथी घुमक्कड़ हम सब आ गए ढाबे में भोजन करने। 

अखिलेश यादव दार्जलिंग वाले काफी पहले ही उतर चुके हैं अब साथ नहीं हैं। वो काफी सारा सामान लेकर यहाँ घूम रहे हैं और काफी दिन स्पीति में  ठहरने की योजना है। 

ढाबे में पहुंच कर सबने अपना अपना मन पसंदीदा खाना मंगवाया। इधर ऑर्डर लेने के बाद पता नहीं कहाँ मग्न हो गया है। बस की काफी सवारियां यहाँ भोजन ग्रहण करने को आई हैं।

नाकों झील काफी प्रसिद्ध झील है और उससे भी ज्यादा प्रसिद्ध है नाकों मठ। जो सदियों पुरानी बौद्ध धर्म मठ बौद्ध भिक्षु और शरणार्थी के लिए हैं।

और इस तरह के कई मठ स्पीति में मौजूद हैं। जैसे ताबो, कीह और भी अन्य। चर्चा चल ही रही थी कि इतनी देर में खाना परसा जाने लगा।

फटाफट आसपास के लोग खाना निपटा कर निकल लिए बस के लिए। मैं थोड़ा देर से भी आया था इसलिए भी देरी हो गई। इधर मैडम और फिरंगी बाबू भी कहा पी कर निकल लिए। 

शुक्र की बात ये रही की इधर मैंने खाना खतम किया उधर बस चालक अपनी पीपडी बजने लगे। खा कर पेमेंट करने को पहुंचा ही हूँ मगर दुकान मलिक के पास सबके बड़े नोट तोड़ने की वजह से खुले पैसों की कमी हो गई है।

आखिरकार जेब से छोटे नोट निकाल कर देने पड़े। जो नहीं करना चाह रहा था। क्या पता काजा में जरूरत पास जाए? उधर ड्राइवर साहब हॉर्न पर हॉर्न बजाए पड़े हैं।

एक बार फिर पुराने इतिहास को दोहराते हुए मैं सबसे आखिरी सवारी के रूप में बस में चढ़ा। खा पी कर थॉमस ने बस के ऊपर चढ़ कर अपना बैग सही से लगा लिया है।

नाको से ताबो

अब कुछ ही घंटो में बस काजा पहुंच जाएगी ऐसी उम्मीद है। चलते चलते नाकों झील भी देखने को मिली जो बेहद छोटी। और बताया जाता है कि यहाँ का पानी किसी कारण बहुत कम हो गया है।

वरना पहले ये झील काफी बड़ी हुआ करती थी। लेकिन इसी झील के पास ही अनेक लोगों ने अपना आशियाना भी बना रखा है। शायद झील में कम पानी होने की ये भी एक वजह हो।

बस की अगली सीट पर जैसे जैसे अखबार और बोरियों का वितरण होता जा रहा है वैसे वैसे जगह खाली हो रही है। पहले एक अब दो सीटें खाली हो चुकी हैं। 

समदो तक आते आते एक बार फिर बस रूकी। यहाँ पर विदेशी टूरिस्ट का पासपोर्ट और वीजा चेक किया जाता है। पूरे बस में थॉमस के अलावा और कोई विदेशी नहीं है।

थॉमस अपना पासपोर्ट विसा दिखाने दूसरी बार उतरा है इस यात्रा के दौरान। इससे पहले उसे अकपा की चेक पोस्ट पर ऐसा करना पड़ा था।

समदो में मजदूरों के पंजीकरण के लिए भी काफी भारी इमारत खड़ी है। देश के तमाम हिस्सों से आए मजदूरों का यहाँ पंजीकरण होता है। जिसके बाद ही वो स्पीति में काम पर लगाए जाते हैं।

कुछ मजदूर पंजीकरण कराने के लिए यही पर उतर गए। उधर जैसे ही थॉमस का चिठ्ठा किट्ठा की जांच पूरी हुई नहीं की बस चल पड़ी अपनी राह। 

अभी सड़क पहले जैसी कच्ची बहुत ही कम है। इधर कविता जी ने अपने जीवन पर प्रकाश डालते हुए बताया। की कैसे वो एक अध्यापिका बनी और कैसे अब तक का इतना लंबा सफर तय किया।

कुछ दिनों की छुट्टी लेकर अपने घर को गई हुईं थीं जहाँ उनका बेटा अस्वस्थ था। जिसकी देखभाल के चलते इतने दिनों की छुट्टी लेनी पड़ी। 

पहाड़ों के सामने पड़ी खाली जमीन युद्ध भूमि की याद दिलाती है। इतनी खाली पड़ी है जिसके ऊपर लाखों लोगों को आराम से खड़ा किया जा सकता है। 

वाकई में बहुत ही सुन्दर है ये घाटी। इस तरह की घाटी ना तो मैंने पहले कहीं देखी है ना आज से पहले कभी गया हूँ। खासतौर पर ये ऊंचे ऊंचे पहाड़।

पियो से काज़ा के रस्ते सुन्दर घाटी।

बस में सिर्फ चंद सीटें ही खाली हुई है जिसके कारण काफी लोगों को अभी भी बैठने का मौका नहीं मिला है उनमें से थॉमस एक है।

हर्लिंग पर मिले बिहारी बाबू

दो बजने को आए हैं उधर ड्राइवर साहब ने हर्लिंग नाम की जगह पहुंचते पहुंचते गाड़ी को लगाम लगाया। सबको कुछ देर सुस्ताने का मौका दिया।

मौसम के लिहाज से कविता जी ने अपने लिए आईस क्रीम का डब्बा मंगा लिया। बस से उतर कर सोचा एक कप चाय हो जाए। इतने लंबे सफर में चाय को बहुत याद कर रहा हूँ।

नजर पड़ी तो थॉमस को यहाँ सड़क पर कुछ अपने फ्रांस के दोस्त मिल गए। जिनके साथ वो सिगरेट का धुआं उड़ाने में मशगूल हैं। 

बस के ठीक दाहिने तरफ सजी दुकान में घुसा तो वहाँ अंधेरे के अलावा कुछ नहीं दिख रहा है। इस दुकान का संचालन बिहारी लड़कों के द्वारा किया जा रहा है।

बिहारियों का पूरा वर्चस्व है पूरे भारत में। एक कप गरम चाय की प्याली ही सही रहेगी फिलहाल। वही लेे के पीने लगा। क्योंकि खाने पीने की ज्यादा इच्छा नहीं है, कुछ ही घंटे पहले नाश्ता किया था।

कुछ पंद्रह बीस मिनट बस रूकी और फिर चल पड़ी। अब अगला जो मुख्य स्टॉप होगा वो रहेगा ताबो मठ। जहाँ से काजा महज घंटे भर की दूरी पर है।

ताबो मठ 1000 सालों से भी ज्यादा पुरानी मठ है। जिसे संरक्षित करके रखा गया है। अनेकों आक्रमण हो चुके हैं यहाँ जिसका हिसाब नहीं और हर बार स्पीति के मठ को दोबारा खड़ा किया गया है।

पहाड़ों पर नजर पड़ी तो मानो नज़र ठहर सी जाती हैं। कुछ पहाड़ ऐसे भी हैं जो कुछ इस तरह बने हैं जैसे चीटियां अपने लिए मिट्टी के पहाड़ को खोद डालती हैं। बेहद अद्भुद दृश्य है ये। 

जैसे जैसे बस ताबो की तरफ बढ़ रही है वैसे कैसे पहाड़ों के किनारे बस्ती भी ज्यादा दिखने लगी है। बस्ती के साथ साथ पहाड़ों पर खेती भी देखने को मिल रही है। 

सूनसान क्षेत्रों में जटिलताएं

शाम हो चली है मगर ड्राइवर साहब के अखबार फेकने का सिलसिला जारी है। यहाँ ना तो मोबाइल नेटवर्क आता है ना ही इंटरनेट उपलब्ध है। तो अखबार ही एक मात्र आखिरी स्त्रोत बच जाता है खबरों का। 

इसी बीच कविता जी का स्कूल जवाहर नवोदया आ गया। बस रूकी और मैडम निकल पड़ी अपने शिक्षा के मंदिर में। ऐसे इलाकों में भी बैंक सेवा, विद्यालय का होना अपने आप में उपलब्धि है।

बच्चों की शिक्षा दीक्षा भी अच्छी चल रही है और साथ ही आम जनता के कार्य भी। और यहाँ नेशनल हाईवे 5 पर बस चलाने वाले चालकों और उनके सहयोगी कंडक्टरों को भी सलामी देते तो बनता है।

जो इतनी दुर्गम परिस्थितियों में भी कितनी सरलता से बस का संचालन करते है। और रोजाना सैकड़ों लोगों को इस तरफ से उस तरफ लेे जाते है। वरना इन्हीं पहाड़ों में अनेकों बार बस गिरने के भी हादसे ही चुके हैं। 

अबतक खाली हुई बस में थॉमस को भी बैठने की जगह मिल गई है। इधर कुछ पल के लिए मेरी आंख लग गई। आंख खुली तो नाक से खून बहता पाया।

अक्सर ऊंचाई वाली जगह पर ऐसा हो जाता है। ये आम बात है। अभी इस समय मैं 3800 m की ऊंचाई पर हूँ। 

इतनी ऊंचाई पर बसे इस इलाके पर इस बात का अंदाज़ा बड़ी आसानी से लगाया जा सकता है की बगल में बहती नदी का पानी कितना ठंडा होगा। 

जिसपर खड़ा होना तो दूर छूना भी रूह कपा सकती है। पार्सल और अखबार की डिलीवरी भी खत्म हो गई है।

स्पीति का मुख्यालय काज़ा

अभी चार बज रहे हैं और अब जाके कहीं काजा पहुंचा हूँ।

दो तीन बसें दिख रही हैं खड़ी हुई जो शायद रकोंग पियो को निकलने। पर ड्राइवर साहब ने तुरंत टांकते हुए बताया कि कोई भी बस रात के समय काजा नहीं जाएगी।

सब नीचे उतरे, सभी सवारियों में से एक सवारी बस की छत पर चढ़ कर सबके बैग देने लगा। उसमे से एक बैग मेरा भी है। इधर मैं निकल आया चिचम गांव की ओर जाने वाली बस के बारे में।

पता चला आधे घंटे में एक बस यही से चिचम गांव के लिए रवाना होगी। पियो से काजा तक के सफर में सिर्फ अभी तक थॉमस ही साथ रहे। बाकी जने तो बीच बीच में अपनी मंज़िल आने पर साथ छोड़ कर निकल लिए। 

थॉमस से भी अलविदा लिया और निकल पड़ा चिचम को जाने वाली बस में। बस में चढ़ना ही हुआ कि देखा इतनी धूल जमी है। लग रहा है मानो सालों से ये बस कहीं निकली ही ना हो।

कुछ ही देर में बस चल पड़ी। लेकिन बस आधी से भी ज्यादा खाली है और अधिकतर गांव की ओर जाने वाले लोग बैठें हुए हैं। घुमक्कड़ सिर्फ इक्का दुक्का बस। 

बस अड्डे से निकल कर कुछ दूरी तक ही चली है कि सामने पेट्रोल पम्प से दो नव युवक बस में चढ़े। और आ कर अगली सीट पर बैठ गए। 

बातचीत हुई तो मालूम पड़ा कि दोनों पेशे से डॉक्टर हैं। एक प्रोफेसर और दूसरे सर्जन हैं। इधर बस जिन पहाड़ियों के सामने से गुजर रही है वो नज़ारा इतना कमाल का है कि क्या ही कहने?

डॉक्टर कपिल ने बताया कि वो यहाँ पहले भी आ चुके हैं। और दस दिन नाकों में गुजार कर आए हैं। अक्सर कॉलेज की गर्मियों की छुट्टी में यहाँ समय गुजारने आ जाते हैं।

उनका स्पीति के लिए अटूट प्रेम होना जायज है। और हो भी क्यों ना ये जगह है ही इतनी मनमोहक की कोई भी इसके प्रेम में डूब जाए। ऐसे ही एक पहाड़ की चोटी पर इक मठ बना हुआ है जो कीह के नाम से जाना जाता है।

कीह

घूमते घूमते पहाड़ी पर चढ़ते हुए ये बस आ पहुंची किब्बर जहाँ पर डॉक्टर कपिल ने दोबारा मुलाकात होने के वायदे के साथ आज के लिए अलविदा लिया।

चिचम

किब्बर में स्थाई निवासियों और घुमक्कड़ों को उतार कर बस निकल पड़ी अंतिम गांव के लिए। अभी भी कुछ सवारियां है बस में जो बोरिया लेे के अपने घरों को वापस जा रही हैं।

दूर से ही दुनिया के सबसे ऊंचाई पर बने पुल भी दिखने लगा। जिसकी ऊंचाई लगभग 13596 ft ऊंचा है। बताते हैं इसे बनाने में पंद्रह साल लगे।

मैं हैरान हूँ कि उससे पहले लोग कितनी कठिनाइयों के बीच यहाँ रहते होंगे। और उनका गुज़रा कितना कठिन होता होगा। काजा से बिना किसी संपर्क के।

अंधेरा होने लगा है और किब्बर के बाद अब पुल पार करते हुए गांव में घुसने लगी बस। लेकिन वहाँ पड़ी कचरे के ढेर को देख मैं स्तब्ध हूँ। 

ऐसा ढेर मानो किसी शहर में ढेर लगा हो। पर बात आ कर अटक जाती है पहाड़ों पर गंदगी मचाने की। हम जाते है और गंदगी फैला कर आ जाता है। यही घर में भी सीखा है अपना घर साफ करो बाहर कचरा करो।

चिचम गांव कितनी दूरी पर होगा ये पूछने पर एक जनाब बोल पड़े अरे भाई साहब आप चिचम गांव में ही हैं। बस अपने अड्डे पर आ रूकी।

मैंने कल सुबह बस के निकलने की सारिणी पूछ लिया। पता चला कल यही एकमात्र बस जाएगी वो भी सुबह आठ बजे

होमस्टे

आज के रात का ठिकाना ढूंढने निकल पड़ा। सोच रहा हूँ कहीं सही ज़मीन मिल जाएगी तो वहाँ तम्बू गाड़ दूंगा।

मगर फिर जंगली जानवर का खतरा। बर्फीले चीते अक्सर यहाँ आते जाते रहते हैं ऐसा मैंने सुन रखा है। बेहतर होगा कहीं होमस्टे लेे लिया जाए।

सामने बने घर में होमस्टे लिखा तो है पर यहाँ ताला पड़ा हुआ है। सिर पर छत तलाशते हुए और आगे आया और इस गांव के आखिरी घर तक आ पहुंचा।

भेड़ चरा कर लाए एक सज्जन ने घूमने का कारण पूछा। जब उन्हें पता चला होमस्टे के लिए तलाश जारी है। तो भाई साहब ने अपने घर आने का आमंत्रण दिया।

मैं अनजान इस बात से और ये अंतिम घर इन्हीं महाशय का निकला। अबतक घोर अंधेरा हो चुका है और माहौल में ठंड बढ़ गई है।

अपनी भेड़ को किनारे लगा हमें अपने घर में लेे आए। भेड़ है या गाय अंधेरे में कुछ समझ नहीं आ रहा। 

अंधेरे के साथ ठंड भी बढ़ गई है। इनके छोटे से घर में दाखिल हुआ। यहाँ ऊपर एक नया ही मंजिला बन रहा है। एक लाइन में बने तीन कमरों में से पहले कमरे में हमें बैठाया।

जिस तरह के यहाँ इंतजाम है उसे देख कर लगता है कितनी पुरानी सभ्यता के लोग रहते हैं यहाँ। तेनजिंग भाई अंगीठी जला कर बाहर को निकल गए।

तेनज़िंग के घर में अंगीठी की तपिश लेते हुए लेखक

मैं कमरे को ही देख रहा हूँ कि कितनी पुरानी वस्तुएं हैं यहाँ। अधिकतर सामान लकड़ी का। की अचानक उनकी माता जी निकल आईं दूसरे कमरे से।

जिनसे तेनजिंग भाई ने परिचय कराया। उनकी माता जी हमारे लिए चाय बनाने लगीं। तब तक कमरे मेंसुर भी लोग आ गए। माहौल में समा बंध चुका है।

अपनी क्षेत्रीय बुद्ध भाषा में सब वार्तालाप करने लगे। इनकी भाषा का एक अंश भी समझ नहीं आ रहा मुझे। पर ये मेरी भाषा अच्छे से समझ सकते हैं।

चाय के सोचा बैग के रख कर बाहर हो लिया जाए तो बेहतर होगा। इधर तेनजिंग ने हमें अपना कमरा दिखाया जहाँ आज की रात गुजरेगी।

जिसे उनकी पत्नी ने साफ सुथरा कर के सोने लायक बनाया है। बैग किनारे रख कर बाहर निकल आया।

आसमान में असंख्य तारे देख मेरी तो आंखे खुली की खुली रह गईं। पर 14000 फीट की ऊंचाई पर ठंड के लपेडे जो शरीर के खुले स्थानों पर पड़ रहे हैं वो चुभ रहे हैं।

मैंने चप्पल पहनी और घर के बाहर पचास मीटर दूर बने दुसलखाने की ओर चल पड़ा। मोटी जैकेट पहनने के बावजूद ठंड बर्दाश्त के बाहर है। 

दुसलखाना भी असाधारण जिसकी जिक्र कैसे करू समझ नहीं आ रहा। फिलहाल जल रहे बल्ब की रोशनी में पूरी तरफ मिट्टी ही दिखाई पड़ रही है और एक अजीब सी महक। 

बाहर निकला तो एक बार फिर ठंड के केहर ने नहीं छोड़ा। और कहाँ मैं इतनी भीषण ठंड में तम्बू गाड़ने जा रहा था। वो तो अच्छा हुए तेनजिंग भाई मिल गए वरना पता नहीं क्या हाल होता।

ठंड और बर्फीले क्षेत्र में रहने वाले चीते के ख्याल से मैं दौड़ता हुए घर में घुस आया। पर इं सबके बीच आसमान के असंख्य तारे अतुल्यनीय हैं।

ये इतने ज्यादा है जितने तो जालोरी पास में नहीं थे। और ठंड में तीन गुना ज्यादा। शरीर का पानी निकालने के लिए इतनी मशक्कत करनी पड़ेगी सोचा नहीं था।

चपप्ल उतार कर अन्दर आ गया। इतने में माता जी ने भोजन तैयार कर लिया। खाने की ज्यादा इच्छा नहीं है पर थोड़ा बहुत खा लिया। साथ में बैठे फ़ैज़ भाई ने अपना परिचय देते हुए लद्दाख निवासी बताया।

काफी सटीक हिंदी भाषा उनके मुख से सुनने को मिल रही है। भारत के विभिन्न हिस्सों में रह चुके हैं और कारोबार के लिहाज से दिल्ली आना जाना लगा रहता है।

पर एक बात जो उनको दिल्ली आकर सबसे ज्यादा खटकती है वो ये कि वहाँ के लोगों का उनके प्रति भेदभाव। जो गौर करने वाली बात है। 

भोजन समापन के बाद सबसे अलविदा लेे अपने कमरे में आ गया। बिस्तर देख बस अब सोने को जी चाह रहा है। तेनजिंग भाई के घर पर निर्माण कार्य चालू होने के कारण सब अस्त व्यस्त पड़ा है।

रजाई में घुसते ही मानो ठंड गायब हो गई। दिनभर की थकान भरी यात्रा करने के बाद कब नींद आ गई पता ही नहीं चला।

रेकोंग पीओ से काज़ा से चिचम 234कम

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