रणथम्भोर का बख्तरबंद किला

भारत | रणथम्भोर | राजस्थान

सवाई माधोपुर से रवानगी

तय समय अनुसार सुबह उठ गया। आर्यन ने रणथंभोर किले तक जाने की पूरी योजना बना रखी है। मुझे बस तैयार हो कर निकलना है।

रात भर चली चर्चाओं के बीच आर्यन के परिवार के सदस्यों से भी बात करने का अवसर प्राप्त हुआ। इस दौरान पता चला की त्रिनेत्र गणेश मंदिर प्रमुख है।

जो एशिया का इकलौता त्रिनेत्र गणेश मंदिर है। यहाँ उनके दर्शन के लिए अच्छी खासी भीड़ उमड़ती है। इसके अलावा किला तो है ही साथ ही रणथंभोर के बाघ।

सुबह के साढ़े पांच बज रहे हैं। बारी बारी से स्नान कर निकलने की तैयारी में हैं। कल आर्यन के पिताजी ने बताया था जितनी जल्दी हो सके निकलना बेहतर होगा।

क्योंकि कल रविवार के दिन भीड़ होने की संभावना सुबह भी अत्यधिक रहेगी। करीब सवा छह बजे तक शुद्धिकरण के बाद बस्ता सहित निकल रहा हूँ।

आर्यन ये बस्ता अपने किसी खास मित्र के घर रखवा देगा। जिससे वापसी में सहूलियत हो जाएगी। बस्ता ले कर नीचे उतर आया। यहाँ आर्यन अपनी स्कूटी निकाल रहा है।

उधर आर्यन के घर में पला घरेलू जानवर घर से बाहर जाने ही नहीं दे रहा। जाने किसी तरह से दूसरे कमरे में आंटी ने अपनी तरफ ध्यान भटकाते हुए बाहर का रास्ता साफ किया।

स्कूटी चालू हुई, मैं बैठा और इस ठंडे मौसम में निकल पड़ा रणथंभोर। आर्यन ने बताया की यहाँ बाजार में बरसात के मौसम में जमकर पानी बरसता है।

पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण पहाड़ों से सारा पानी बरस कर यहाँ जमा हो जाता है। जिस कारण यहाँ दुकानों में पानी भर जाता है। यह क्षेत्र पूरा पहाड़ियों से घिरा हुआ है।

जिस कारण यहाँ एक ही ओर से आने जाने का रास्ता बचता है। सुबह के साढ़े छह बजे इक्का दुक्का लोग ही सड़क पर नजर आ रहे हैं।

आर्यन ने सवाई माधोपुर का प्रवेश द्वार भी ध्यान में लाया। जिससे हम गुजर रहे हैं। यहाँ ऊंची पहाड़ी पर मंदिर भी देखने में आ रहा है। आर्यन के मुताबिक यहाँ बाघ आता रहता है।

बाघ यहाँ की जनता तो चलता फिरता बहती इलाकों में दिख जाता है। पर अभी तक किसी को नुकसान नहीं पहुँचाया है। माधोपुर में बंद पड़े पुल के पीछे की राजनीति और आने वाले चुनाव का संकेत दे रहे हैं।

देखते ही देखते माधोपुर के बाहर निकल आया। आर्यन यहाँ अपने मित्र के घर की ओर स्कूटी घुमाते हुए आ गया। यहाँ उसने मेरा बैग रखवाया। बैग रख कर हम निकल पड़े रणथंभोर के जंगलों की ओर।

रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान

रणथंभोर राष्ट्रिय उद्यान

रणथंभोर जाने के लिए या तो जिप्सी करनी पड़ती है या फिर किसी खुली छोटी बस से जाना पड़ता है। खुद के वाहन से भी जा सकते हैं।

यहाँ रणथंभोर जाते हुए मार्ग के किनारे कई आलीशान होटल बने हुए हैं। जिसमे देश विदेश के बड़े बड़े पूंजीपति आ कर समय गुजरते है राष्ट्रीय उद्यान जाने के लिए।

कुछ होटल को किले का रूप दिया गया है। कई गुना जमीनों पर इन्ही का परचम लहरा रहा है।

रणथंभोर की ओर जाते हुए कई जिप्सी दिखाई पड़ी। सूनसान सड़क पर इक्का दुक्का वाहन ही दिख रहे हैं। रणथंभोर राष्ट्रीय उद्यान के प्रवेश द्वार पर आ पहुँचा हूँ।

पर यहाँ दुपहिया वाहन की जांच नहीं होती ना किसी प्रकार का कोई कागजी अनुमति की जरूरत है। बाकी चार पहिया वाहन जांच कराते हुए दिख रहे हैं।

मैं आर्यन के साथ स्कूटी पर सरसराते हुए भीतर दाखिल हो चला। कहते हैं रणथंभोर किले तक पहुँचने का जंगली मार्ग ही स्वर्ग है। जो की मैं अनुभव कर पा रहा हूँ।

बाघ दिखने की संभावना है और होती भी है यहाँ। स्थानीय लोगों को दस कदम की दूरी तक बाघ दिखने का सौभाग्य प्राप्त है। आर्यन भी अक्सर यहाँ आता है तो बाघ देख पाता है।

बाकी भाग्य का खेल है। फिलहाल तो मोर जगह जगह दिख रहे हैं। पर सबसे सुंदर है ये जंगल। जिसे देख कर ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो किसी फिल्म का सेट।

इतना बनावटी या कुदरती। झरना भी बहता दिख रहा है। भीतर शिवलिंग है। सड़क निर्मित है पत्थरों से। ताकि गाड़ी चलाते समय सुविधा बनी रहे।

घने जंगल में मोर के साथ हिरण भी देखने को मिल रहे हैं। ऊंची ऊंची पहाड़ियां इस जंगल की सुंदरता में चार चांद तो लगा ही रही हैं। साथ ही इसे और भी ज्यादा वीभत्स बना रही हैं।

सकरी सड़क होने के कारण यहाँ जाम भी लग ही जाता है। सुबह के सात बज रहे हैं। पर वाहन इस कदर हैं जैसे कर्मचारी दफ्तर के लिए निकले हों।

पर राष्ट्रीय उद्यान में इस कदर भीड़ इतनी सुबह अचरज भरा है। कुछ आगे एक से जिप्सी बाएं मुड़ रही हैं। जहाँ जाने के लिए जिप्सी या बस में सवार होना प्राथमिकता है।

ऊंचाई से नीचे तक सड़क पर से आने में झूले जैसा प्रतीत हो रहा है। ये कुछ मिलों का सफर सन्नाटे सड़क ने कुछ मिनटों में पूरा हो चला।

रणथंभोर किला

मैं यहाँ रणथंभोर किले के सामने आ पहुँचा। जिसे राजस्थान का दूसरा सबसे बड़ा किला कहा गया है। आर्यन अपनी स्कूटी अड्डे पर खड़ी कर चल दिया किले की ओर।

इतनी सुबह यहाँ इतनी गाडियां खड़ी हुई हैं। अभी और आएंगी। यहीं पुलिस चौकी की नजर आ रही है या शायद जंगल के सुरक्षा की पुलिस।

इधर ही किले के फाटक जैसा बना दरवाजा है जिसमे जिप्सी खड़ी हो रही हैं। किला काफी ऊंचा है और अलग अलग परतों में भी है। किले में गाड़ी पुरानी इमारतें भी।

रणथंभौर किला

किले का असली नाम गड़रणतभोर। राजा रंथम ने बनवाया था इसलिए। किले की दीवार को गड़ कहा गया है। दूसरी पहाड़ी पर युद्ध होता था इसलिए उसे रण या रणभूमि कहते थे।

पहाड़ी में बीच में नाला जो पहाड़ियों को काटते हुए आगे बढ़ता था उसे भोर या भंवर कहा गया। रणस्तंभभोर भी इसको कहा गया है। पर अंग्रेज इस नाम को ठीक से नहीं बोल पाते थे इसलिए इसका नाम रणथंभोर ही हो गया।

किले में प्रवेश करने के लिए सीढ़ियां हैं। इसी किले में त्रिनेत्र गणेश मंदिर भी है जिससे मैं अनभिज्ञ था। अभी तक मुझे लग रहा था किला अलग जगह पर होगा और मंदिर अलग। पर ये एक ही स्थान पर हैं।

आर्यन की भांति मैं भी किले की सीढ़ियां को मंदिर की सीढ़ियां साक्षी मानकर पैर छूने लगा। सीढियां पर भी मोर और कबूतर खाना खाते दिख रहे हैं।

ऊंचाई पर पहुँच कर नीचे देखने पर सिर्फ गाड़ियों का जत्था ही दिखाई पड़ रहा है। सीढियां चढ़ते हुए नवलखा दरवाजे पर आ गया।

यहाँ खड़े गाइड अपने धंधे पानी के चक्कर में सभी से गाइड लेने का अनुरोध करते दिख रहे हैं। पीछे आ रहे भाईसाहब को भी इन्होंने नहीं बक्शा। जो यहाँ पर कार्यरत हैं।

जो फटकार ये भाईसाहब गाइड को लगाते हुए आगे बढ़े हैं। जिसके बाद इस गाइड की हिम्मत ही नहीं पड़ रही किसी से पूछने की।

किले का इतिहास

महाराजा जयंत सिंह द्वारा आठवीं सदी में निर्मित यह किला आज 1200 साल से भी अधिक पुराना है। हम्मीरदेव चौहान के शाशनकाल में जलालुद्दीन खिलजी ने इस किले पर आक्रमण किया था।

चारों ओर पहाड़ों से घिरे होने के कारण इस किले को भख्तरबंद किला भी कहा गया है। इसी कारण जलालुद्दीन खिलजी को हार का सामना करना पड़ा।

जलालुद्दीन खिलजी अपनी हार स्वीकार कर वापस दिल्ली रवाना हो चला था। जलालुद्दीन की हत्या कर अलाउद्दीन दिल्ली की गद्दी पर बैठ गया।

अलाउद्दीन खिलजी की पत्नी के साथ अनैतिक रिश्तों के चलते मुहम्मद शाह और खिलजी की पत्नी चिमना ने मिलकर खिलजी को मारने की साजिश करी। जब खिलजी को पता चला तो शाह दिल्ली छोड़ कर भाग खड़ा हुआ।

साथ ही ये घोषणा कर दी की जो भी इस मंत्री को शरण देगा खिलजी उससे युद्ध करेगा। पूरे भारतवर्ष में भटकने के बाद जब मुहम्मद शाह रणथंभोर आया तब उसे हम्मीरदेव चौहान ने अपनी सिद्धांतो के चलते शरण दी।

जिसके बाद खिलजी ने रणथंभोर पर चढ़ाई कर डाली जिसका हम्मीरदेव पर कोई असर नहीं पड़ा। खिलजी ने बड़ी चालाकी से रणथंभोर के तीनों सेनापतियों रणमल, रांतिपाल, सावन भोजराज को अपने खेमे में मिला लिया।

राजा हम्मीरदेव जी ने अपनी रानियों को संदेश भिजवाया की अगर वो यह युद्ध हार जाते हैं तो रानियां जौहर कर लें। युद्ध में हम्मीरदेव जीतते हैं पर उनके तीनों सेनापति उनसे गद्दारी कर देते हैं।

जीत के बावजूद सेनापति काला ध्वज फहराते हुए खिलजी की जीत को दर्शा रहे थे। जबकि राजा का ध्वज केसरिया था। अपनी रानियों को बचाने के लिए राजा पीछे दौड़ पड़ा।

मैं भी हाथीपोल की ओर निकल रहा हूँ। जहाँ पर दूर सही एक बड़ा पत्थर रखा हुआ है। जिसमे शक्ल बनी है गद्दार की। कहा जाता है राजा ने इसी स्थान पर गद्दार भोजराज का सिर काटा था।

हाथीपोल इसलिए कहा जाता है क्योंकि यहाँ रखी हुई पत्थर की बड़ी शीला हाथी के आकार की है।

हाथीपोल को पार कर आगे बढ़ने लगा। यहाँ से रणथंभोर में बहते हुए तालाब देखे जा सकते हैं। यहाँ से रणथंभोर बहुत सुंदर प्रतीत हो रहा है।

आर्यन ने यहाँ किले की दीवार के बीच छेद दिखाई जिससे दुश्मनों पर नजर रखी जा सकती थी। पर विपरीत कोण की खिड़कियां ऊपर हैं।

कुछ आगे चल कर वो निशान भी देखने में आ रहा है जिससे राजा हम्मीरदेव अपने घोड़े पर सवार हो कर किले की दीवार फांद गए थे रानियों को जौहर से रोकने के लिए।

हाथीपोल पर ग़द्दार की कटे सिर की मूर्ती

गणेश पोल

गणेश पोल को बाकी के दो गद्दार सेनापतियो ने भीतर से बंद कर लिया था। जिस कारण राजा को दीवार चढ़ने की नौबत आ गई।

पर जौहर कर चुकी रानियों को देख राजा बहुत निराश हो गए थे। शिव मंदिर में जा कर अपने सिर की बलि चढ़ते हुए अपना भी त्याग कर दिया था। राजा हम्मीरदेव चौहान की मृत्यु के बाद अलाउद्दीन खिलजी का राज स्थापित हो गया था।

गद्दी हासिल करने के बाद खिलजी ने बचे दोनो गद्दारों रणमाल और रतिपाल को ये कहकर मरवा दिया की जो अपने राजा का नहीं हो सका वो खिलजी का क्या होगा।

घायल मुहम्मद शाह को जब खिलजी के सैनिक पकड़ कर खिलजी के समक्ष लाए। जिस पर खिलजी ने उसको प्रस्ताव देते हुए कहा की अगर उसका इलाज करा दिया जाए तो वो क्या करेगा।

इस पर मुहम्मद शाह ने हम्मीरदेव के प्रति अपनी वफादारी दिखाते हुए कहा की स्वस्थ हो कर सबसे पहले तो वो खिलजी का वध करेगा उसके बाद हम्मीदेव के वंशज को गद्दी पर बैठाएगा।

क्रोधित खिलजी ने मुहम्मद शाह को हाथी से कुचलवा कर मरवा दिया। हम्मीरदेव ने किस कदर अपने वचन को निभाने के लिए सब कुछ न्यौछावर कर दिया।

प्रसिद्ध कहावत

सिंह सुवन, सत्पुरुष वचन कदली फलै इक बार।
तिरिया तेल, हम्मीर हठ, चढ़े न दूजी बार ।।

गणेश पोल से आगे बढ़ते हुए मैं निकल रहा हूँ किले के मुख्य द्वार की ओर। अभी तक जितने तीन द्वार हैं वो दुश्मन को धोखा देने के लिए और आक्रमण से बचने के लिए बनाए गए थे।

इस फाटक को तोरण द्वार या अंधेरी पोल कहा जाता है। यहाँ पर रानी झरोखे में बैठकर राजा का स्वागत फूल बरसा कर किया करती थीं।

अभी तक जितने फाटक मिले वो तिरछे बनाए गए थे। ताकि अगर हाथी का सीधा हमला भी हो तो वो तिरछे फाटक को तोड़ ना सके। ये फाटक सीधा बनाया गया है ये मान कर की यहाँ दुश्मन नहीं आ सकता।

अंधेरी पोल पर खड़े होने पर दुश्मन को भ्रमित करने के लिए यहाँ तीन द्वार बनाए गए हैं। एक सीधा जो गणेश मंदिर के लिए जाता है। दूसरा और तीसरा दाएं बाएं।

इस समय इस फाटक पर ताला जड़ा हुआ है। गणेशोत्सव के दौरान जब यहाँ मेला लगता है तब इस द्वार को खोल दिया जाता है। जिससे प्रवेश होता है और तीसरे फाटक से निकास। तब लाखों की संख्या में भक्तों की भीड़ एकत्रित होती है।

असल रास्ता दाईं तरफ है। कुछ यात्री सामने की ओर चलते चले जा रहे हैं। उनको भी सही मार्ग दिखा कर चल पड़ा। यहीं से दुश्मन पर नजर बनाए रखने के लिए छोटी छोटी खिड़कियां हैं। जो नीचे एक दिशा में थीं। यहां अलग अलग दिशा में है।

बत्तीस खंभों की छतरी या न्याय की छतरी

बत्तीस खंभों की छतरी

जगह जगह काले बंदर खूब दिखाई पड़ रहे हैं। दाहिनी तरफ किले का नक्शा भी बना है। बाईं तरफ भी कुछ इमारत हैं जिनमे प्रवेश फिलहाल तो बंद दिखाई पड़ रहा है।

बत्तीस खंभों की छतरी के लिए दो रास्ते हैं। आर्यन ने बताया की लौटते समय किनारे दूर के मार्ग से आएंगे। पर अभी मूत्र बहुत जोर की लगी है। पर यहाँ कहीं भी उचित व्यवस्था नहीं है।

जंगल में चढ़ाई कर कोना पकड़ते हुए हल्का हो लिया। पास में टोंटी में लगी रबर से रिसते हुए पानी से हाथ धो कर चल पड़ा बत्तीस खंभों की छतरी की ओर।

राजा हम्मीरदेव के पिताजी राजा जैयत्र सिंह चौहान के बत्तीस वर्षों के शासन की याद में इस इमारत का निर्माण हुआ। इसी छतरी के नीचे शिव जी का मंदिर है।

इस छतरी को न्याय की छतरी भी कहा जाता है। राजा हम्मीरदेव सिंह इस छतरी के नीचे बैठ कर लोगों को न्याय दिलाते थे।

जहाँ आर्यन मुझे ले कर आ गया। अंधेरी गुफा में शिवलिंग काफी ऊंची है। इस शिवलिंग के बारे में बहुत ही कम लोग जानते हैं।

छतरी के नीचे लोग खड़े हो कर तस्वीर निकाल रहे हैं। छतरी के ठीक बाईं ओर एक और अधूरी इमारत है। जिसकी कहानी पता ही नहीं लग पा रही आखिर क्या है।

इस छतरी पर कुछ खास नहीं पर कुछ कला को देने की कोशिश की गई है। छतरी में प्रवेश करने से पहले इमारत के परिसर में प्रवेश करने में भी एक द्वार है।

बाहरी द्वार से छतरी को छोटी खिड़की में देखने की अच्छी कोशिश की गई है जो की लाजवाब है। छतरी के नीचे भीड़ बहुत बढ़ रही है।

इससे पहले की यही भीड़ मंदिर पहुँचे मुझे मंदिर में पहुँचकर दर्शन कर लेने चाहिए। ताकि लंबी कतार में ना खड़ा होना पड़े। निकल पड़ा मंदिर की ओर छतरी से। कुछ तस्वीरें खिंचवाते हुए।

यहाँ से देख पा रहा हूँ राज महल जो फिलहाल बंद है। अंदर से बुरी तरह से श्रतिग्रस्त होने के कारण। महल से घूमते हुए आगे निकल आया जहाँ से दिख रहा है पदमला तलाव।

जिसमे अब जहरीले जीव पाए जाते हैं। राजा की राजकुमारियों ने इसी तलाव में जल जौहर किया था। अग्नि जौहर रानियों द्वारा किया गया था।

तलाव में आज के समय ताला डाल दिया गया है। पुरानी घटनाओं से सबक लेते हुए ताकि कोई आत्महत्या ना करे।

त्रिनेत्र गणेश मंदिर

त्रिनेत्र गणेश मंदिर

मंदिर के लिए मार्ग तक रेलिंग बिछी हुई है। इससे पता लगाया जा सकता है की यहाँ कितनी भीड़ होती होगी। मंदिर परिसर में खाने पीने की तमाम दुकानें हैं। एक किनारे मंडली बैठी है जो कीर्तन कर रही है।

उसी किनारे आ कर जूते उतार चल पड़ा दर्शन करने। ये एशिया का इकलौता त्रिनेत्र गणेश मंदिर है। यहाँ पर सदियों पुराने पंडित की पीढ़ी चली आ रही है। जो मंदिर का रख रखाव करते हैं।

जांच करा कर भीतर आ गया। यहाँ लोग त्रिनेत्र गणेश भगवान की तस्वीर भी ले रहे हैं। जिसकी मनाही नहीं है। दर्शन कर प्रशाद ले कर बाहर निकल आया।

पर दर्शन अधूरे ही लगे। इसी बहाने दोबारा आ गया दर्शन करने। तस्वीरें भी एक दो खींच ली। दोबारा प्रशाद लिया और बाहर निकल आया।

अभी सुबह के आठ ही बज रहे हैं। मंदिर से दाहिनी ओर भी किले को देखने का रास्ता है और बाएं ओर भी। दुकानों में पूछते हुए चल तो पड़ा दाईं ओर पर वहां जंगली जानवर होने की आशंका से शुरू होने से पहले ही सफर खत्म कर वापस आ गया।

बाईं ओर जाते हुए मैने तीन युवकों को देखा था। मित्र आर्यन असमंजस में है। इसलिए क्योंकि वहां पर बाघ से सामना हो सकता है। अकेले जाना ठीक भी नहीं रहेगा।

कुछ लोग और गए हैं इसी तर्ज पर हम भी चाय पी कर निकल पड़े। सुबह से लगी भूख को चाय की घूंट से मारना पड़ रहा है।

झाड़ियों पतझड़ के बीच सभी लोग साथ चल रहे हैं। साथ चलने में ही सुरक्षा है। आगे बड़े चट्टान के पास तक जा कर खड़ा हो गया। अब बाघ के भय के चलते आर्यन आने जाने से कतरा रहा है।

बात भी सही है। अकेले में सामने बाघ अचानक सामने खड़ा हो जाएगा तो क्या किया जाएगा! जो करना होगा बाघ ही करेगा। यहाँ भी वही हाल है।

तय हुआ की वापस चलते हैं। चट्टान से मुड़कर वापस निकलने लगा। आधे मार्ग पर पहुँचा तो कुछ अजीब आवाज सुनने में आ रही है। पर जो भी है वो कोई जंगली जानवर तो नहीं है।

मंदिर के मार्ग के मुहाने आने पर दिखने लगा एक परिवार। जो शिव मंदिर तो जाना चाहते हैं पर गलत दिशा में जा रहे हैं। ये चार जने को मिला कर अच्छा खासा झुंड हो जाएगा।

इनको साथ में ले कर निकलना चाहिए शिव मंदिर। जिसके लिए चट्टान पर से ही तस्वीर खिंचवा कर वापस आ गया था।

घुमक्कड़ आर्यन के साथ लेखक

शिव मंदिर और शिवलिंग

अबकी चट्टान को भी पार करते हुए निकल पड़ा आगे। कुछ और आगे बढ़ने के बाद सीढियां उतरते हुए आ गया एक खंडहर पड़ी इमारत के सामने।

आर्यन ने बताया की इसी में शिवलिंग है जो भीतर जा कर है। परिवार के लोग एक एक कर अंदर जा रहे हैं। इधर मैं चबूतरे पर बैठ कर जूते उतार रहा हूँ।

इमारत ऐसी बनी है जैसे एक तरफ से भीतर जाने का रास्ता हो और दूसरी ओर से निकास। परिवार के सभी सदस्यों के दर्शन कर आने के बाद गुफानुमा इमारत में दाखिल हुआ।

यहाँ सीढी सकरी और आगे पानी से भरी हुई है। बिना टॉर्च के कुछ दिखाई भी नहीं पड़ रहा। ध्यान से ना उतरा जाए तो सिर ही दीवार पर टकरा जाए।

टेड़ी मेड़ी ऊंची सीढ़ियों से मैं अंदर आया। शिवलिंग के दर्शन कर जल से भरी गुफा की तस्वीर निकाल कर वापस निकलने लगा। आगे रखी शिवलिंग पर आंटी जी दिया जला गई हैं।

बाहर आया तो बात छिड़ी पांच फुट शिवलिंग की जिसे देखने भक्तजन आते हैं। पर उसका रास्ता मालूम नहीं पड़ रहा। इधर भी इकलौता ही रास्ता है आगे जाने का।

आर्यन के मुताबिक वो कभी इस जगह से आगे गया ही नहीं। हुआ की वापस अपने मार्ग पर चल कर किले की ओर बढ़ा जाए। निकल पड़ा जत्थे के साथ सुरक्षित बाहर।

चट्टान पर ही कुछ तस्वीर लेने के बाद बाहर की ओर निकल ही रहा था की। एक परिवार का बड़ा दल इस शिवलिंग की ओर जयकारे लगाते हुए आगे बढ़ रहे हैं।

आर्यन को हिम्मत बंधाते हुए साथ ले कर निकल पड़ा। खाली पेट थकान भी इसका प्रमुख कारण हो सकती है। एक दफा फिर से चट्टान को पार करते हुए मैं इस बार एक गर्मजोशी परिवार के सदस्यों के साथ आगे बढ़ रहा हूँ।

मेरे साथ साथ चल रहे है आर्मी के कर्नल महोदय जो अपने बेटे के संग यहाँ घूमने आए हैं। पर बार बार नजर पड़ रही है इनकी उस जैकेट पर जो वो इतनी गर्मी में भी धारण किए हैं।

मार्ग पर बांई ओर दो मूर्तियां रखी हुई हैं। मूर्ति में एक हाथ में धनुष बाण और दूसरे में सिर्फ धनुष पकड़े। यहाँ से कुछ दूरी पर एक तालाब दिख रहा है।

कहा जाता है इन्ही जगहों को खोदकर पत्थर निकाले गए थे। बाद में इसमें पानी भरकर इनको तालाब बना दिया गया था। शिव मंदिर यहाँ से कुछ ही दूरी पर है।

शिव मंदिर में पहुँचकर दर्शन कर कुछ देर यहीं समय बिताया।

पांच फुट ऊँची शिवलिंग

बादल महल और रानी तलाव

शिव मंदिर से निकल कर गणेश मंदिर होते हुए वापसी में एक और तलाव की ओर आ गया। जो रानी तलाव कहलाता है जहाँ रानियां स्नान किया करती थीं।

घूम कर तलाव के दूसरे और जाना चाहा तो रास्ते में पीर सद्दृद्दीन की दरगाह भी मिली। कहा जाता है की खिलजी के शासन में सभी मंदिरों को तुड़वा दिया गया था।

यहाँ इस पीर दरगाह पर बाबा खड़े हुए हैं जो भीतर दरगाह पर दर्शन करने के लिए बुला रहे हैं। जूते उतार कर अंदर आया तो घोर अंधेरा पाया। कबूतरों के घोसले और दरगाह के ऊपर एक बड़ी चादर जिससे दरगाह को कबूतर की पीक से बचाया जा सके।

यहाँ से निकल कर बादल महल की ओर आ गया। जिसका मरम्मत का कार्य चल रहा है। बादल महल में कुछ तस्वीरें खिंचवाई। हालांकि महल पूरा टूटा हुआ है।

महल से किले का द्वार आसानी से देखा जा सकता है। किले के बाहर बने तलाव को भी। दूल्हा महल में प्रवेश करते हुए बड़े बड़े कमरे पाए।

जर्जर पड़े इस किले की मरम्मत होनी चाहिए। ताकि इतिहास को देखने के लिए किला बरकरार रहे।

किले का बहार तलाव जहा बना है योगियों का महल
सवाई माधोपुर से रणथंभौर से बूंदी 203किमी

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One Comment

  1. THANK YOU SOO MUCH AISHWARYA ❤️ Really the words touched my heart once again, when i was reading each and every line.
    “Magical words”
    Hope in future we can travel a place together and make some more amazing stories and live them forever.

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