रांची से अलविदा ले कोलकता रवानगी

झारखण्ड | भारत | रांची

रांची में वो कुछ जगह घूम आया जो चिन्हित नहीं की थी। जो चिन्हित की थीं वो शहर के बाहर। कोई इस छोर पर तो कोई उसके एकदम विपरीत।

लेकिन जितना घूमा उतना मजेदार है। शायद एक दिन ज्यादा ही रुक गया हूँ रांची में।

आज रात की ट्रेन से कोलकात्ता निकल जाऊंगा। भारत का महानगरों में से एक। विक्टोरिया मेमोरियल, काली मंदिर और भी बहुत कुछ।

आज भी घूमने जा सकता हूँ, थोड़ा आराम करना ही बेहतर होगा। सुबह की शुरुआत ग्रीन टी के साथ हुई।

साथी घुमक्कड़ लीचड़ की तरह दस बजे तक सोया। साथी घुमक्कड़ के पास अभी फोन भी नहीं है इसलिए कानपुर से बिना फोन के घूम रहा है। बिना फोन के घूमना बहुत घातक हो सकता है। मैं तो इसका अंजाम भी भुगत चुका हूँ।

फ्लिपकार्ट की मिलियन बिलियन सेल में एक फोन ऑर्डर कर दिया गया है। जो कोलकाता में मेरे मित्र के घर पहुंच जाएगा। तब तक मैं भी।

कार्यालय की ओर निकलते हुए कादिर ने सुबह के नाश्ते पर दस बजे तक अपने कार्यालय पर बुलाया।

इधर कादिर के जाने के बाद सूखे कपड़े समेटने लगा। आज करने को कुछ नहीं है।

कोलकात्ता जाने के लिए कल ही तत्काल टिकट बुक कर लिया था। इसलिए ट्रेन में सीट को लेकर भी कोई समस्या नहीं होने वाली।

तैयार हो कर हम पहुंचे कादिर के कार्यालय के बाहर ही हम मिले। आर्मी कैंप के बाहर की दुकान पर नाश्ते में समोसे गटके।

चाय की टपरी पर कादिर के कुछ उम्रदराज कर्मचारी खड़े बतिया रहे हैं।

मेरे पर्यटन को लेकर चर्चा होने लगी। क्या क्यों कैसे ये सब किया, क्या मकसद है इसके पीछे? बहुत से सवालों के बीच मुझे एक चुटकी में कटघरे में खड़ा कर दिया।

इतमीनान से मैं उनके सवालों का जवाब देता गया। जैसे ही एक जवाब खतम करता ये महाशय दूसरा सवाल दाग देते।

ठीक से मौका ही नहीं मिल पाता उनको सब बताने का। मैंने उनको अपना how did I start का लिंक थमा दिया।

पढ़ते रहना आराम से। सारे सवालों के जवाब मिल जाएंगे। ये कह के चल दिया कादिर के साथ उसके कार्यालय।

कादिर ने अपने काम से मुझे अवगत कराया। उसका काम यहाँ पर बिजली विभाग संभालना है। कार्यालय पर यहीं चर्चा चलती रही की कैसे उसने परीक्षा उत्तीर्ण की।

कितनी तैयारी के साथ उसने आईईएस का एग्जाम निकला। कार्यालय के पिछले हिस्से में लगे बड़े बड़े जेनरेटर और बिजली उपकरण दिखाए।

जिसकी संचालन और देख रेख का जिम्मा उसी के मत्थे है। इसलिए उससे यहाँ कोई पंगा नहीं लेता। क्योंकि हर घर की बत्ती भी कादिर के हांथ में है।

इसलिए सावधान और सतर्क रहते है सब कादिर से। लेकिन ऐसा कोई नौबत नहीं आई कि किसी की बत्ती गुल करके उसे सबक सिखाया जाए।

लंच टाइम तक कादिर के पास थोड़ा ज्यादा काम आ गया। दिन दहाड़े मैं सैर के लिए शिवाजी चौक तक निकल पड़ा।

प्रदूषण भी एक समस्या है इन बड़े शहरों की। आज बारिश ना के बराबर हुई। सैर सपाटा करते कराते भूख भी लगा पड़ी। 

लेकिन कहीं भी शाकाहारी खाने की दुकान नहीं दिख रही। हर जगह बक्रों या मुर्गों की बलि चढ़ाई जा रही है।

शिवाजी चौक से भी आगे आने पर एक शाकाहारी भोजनालय मिला जहां तसल्ली से बैठ कर कुछ स्वादिष्ट भोज कर के आत्मा तृप्त की।  

दिन में जब कैंप के पास वापस आया। तब आर्मी स्कूल के जलवे देखने को मिले। लेकिन हर बच्चा यहाँ दाखिला नहीं ले सकता।

कुछ चुनिंदा, होनहार बच्चों को ही शामिल किया जाता है शहर भार से एक कठिन इम्तिहान के बाद।

बस, टेंपो और अधिकारी के बच्चों के लिए मिलिट्री ट्रक उनको घर तक छोड़ने का साधन मुहैया कराती है।

शिक्षा दीक्षा तो सभी को मिलती है पर मिलिट्री की बात ही निराली है। शाम होते होते मैं वापस क्वार्टर आ गया।

अब निकलने कि तैयारी कर लेने में ही भलाई है। अपना बोरिया बिस्तर और अन्य सामान जो कमरे भर में फैला पड़ा है उसे एक एक कर के समेटा। छह बजे तक कादिर भी अपने कार्यालय से वापस आ चुका है। 

रात की साढ़े नौ बजे की ट्रेन के लिए मैं दीपाटोली से आठ बजे तक आराम से निकल गया।

रास्ते में लगे जाम में एक बार लगा आज तो ट्रेन ना मिलने वाली। जाम खुला और जब उतरने की बारी आई तब ऑटोवाले के पास छुट्टे नहीं है।

ये और मुसीबत आस पास की दुकान से छुट्टे लेने के लिए आगे बढ़ा लेकिन कईयों ने मना इंकार कर दिया। जब एक अंतरिम दुकान में आजमाया तब उसके पास गलती से छुट्टे निकल आए।

छुट्टे लेने और ऑटो वाले को किराया देने इन सब में ही पंद्रह मिनट बीत गए। भाभा नगर से दूसरा ऑटो करके स्टेशन पहुंचा।

कादिर के क्वार्टर से निकलते निकलते इतना समय लग गया कि खाना खाने का होश ही नहीं रहा। 

जब स्टेशन पहुंचा तो वहाँ भी खाने की कुछ खास व्यवस्था नहीं दिखाई पड़ रही है। खैर ट्रेन तो स्टेशन पर आ गई है।

शुक्र इस बात का है कि ट्रेन कुछ समय कि देरी से पहुंचेगी रांची। वरना आज तय था ट्रेन का छूटना। 

ट्रेन चल पड़ी और घंटे भर बाद मुरी नाम के स्टेशन पहुंची और घंटे भर खड़ी रही। मूरी पर मूड खराब होगया।

फिर एक पुलिस कर्मी ने अवगत कराया कि यहाँ से ट्रेन डायवर्ट हो रही है जिसकी वजह से ट्रेन का इंजन आगे के डब्बे से पिछले डब्बे पर जा लगा।

जो सीट मुझे मिली है वो टॉयलेट के बहुत निकट है जो इस समय एक संकट है। टीटी से बात करी और कहीं मध्य में खाली सीट दिलाने का आग्रह किया। तब जा कर कहीं चैन कि नींद आई।

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