किस्से, स्टोरीज ऑफ इंडिया, हिमाचल प्रदेश
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रात गुज़ारी खाली बस में

चितकुल से करछम

आंटी जी से अलविदा ले भागा भागा बस अड्डे की ओर भागा। कोई ठोस बस अड्डा नहीं है। बस किसी इमारत के सामने सालों से खड़ी होती है।

तो बस ने ही इस जगह को अपना अड्डा बना लिया है। बस का अड्डा। कोने वाली दुकान से नमकीन पानी ले कर आगे बढ़ गया।

टूरिस्ट स्पॉट होने के कारण यहाँ खाने पीने के दाम आसमान छू रहे हैं। उस जगह को पार करते हुए जहां कल कार से उतरा था मोड़ से मुड़ते हुए आगे आया तो पाया सन्नाटा।

बस का कोई अता पता ही नहीं है। मुझे तो लग रहा है बस छूट गई है। इसी संशय को साफ करने के लिए स्थानीय लोगों से पूछा तो पता चला अभी आईं ही नहीं है।

कोई कह रहा है आधे घंटे तो किसी के गणित के अनुसार पैंतालीस मिनट। बस तो नहीं आसपास बहुतेरी टूरिस्ट गाड़ियां खड़ी हैं।

पर समझ नहीं आता लोग यहाँ पहाड़ी इलाके में पिकनिक मनाने क्यों आते हैं। एक शाही ढाबे में कई परिवार दिन का भोज करने में व्यस्त हैं।

पहाड़ी के नीचे पड़ी प्लास्टिक की बोतलें ढाबे की परंपरा और सभ्यता दर्शा रही है। जो कोई भी पानी पीता या तो प्लास्टिक के डिस्पोजल कहे जाने वाले ग्लास को नीचे फेंक देता या बोतल।

मैंने अति पढ़े लिखे लोगों को भी ये करते देख रहा हूँ। काफी पीड़ा दायक है। पर कितनो से कहा जाए और कितनों से लड़ा जाए।

ऐसी छोटी मोटी चीजें तो खुद से भी सीखी या करी जा सकती हैं। मुझसे ज्यादा देर देखा ना जा रहा है। इसलिए आगे बढ़ कर पहाड़ की हालत देखने निकल पड़ा।

बस आने में तो शायद काफी समय लगेगा। पहाड़ के पिछले हिस्से में देखा तो काफी बुरा हाल हो रखा है।

दो पहाड़ों को विभाजित करती नदी की धारा तेज़ है। जिस नदी में अभी हाल फिलहाल में स्नान करके आया वो नदी अब पहुंच से काफी दूर है।

दूसरी पहाड़ी पर जाने के लिए रास्ता भी है। दोनों पहाड़ी को जोड़ता एक रस्सी वाला पुल भी है। जो इतनी ऊपर से तिनके के सामान दिख रहा है।

दूसरी पहाड़ी पर हलचल दिख रही है। इसी बीच मेरे और अजय के बीच नदी में पत्थर फेंकने की प्रतिस्पर्धा होने को आई।

बारी बारी से सबने फेंका लेकिन इन पत्थरों में वो ताकत नहीं है कि नदी तक पहुंच जाएं। पास में बने लकड़ी का ऐसा घर बना है जिसकी खिड़की से शानदार नजारा दिखता होगा।

पर अफसोस घरवही बंद पड़ा है। दूर से बस आती दिखी और इस प्रतिस्पर्धा का यहीं अंत हो गया। बैग लेके जब पहुंचा तो बस हाँथ हिलाते हुए आगे निकल गई।

शायद अपने कहे जाने वाले अड्डे को छू कर आयेगी ताकि इंतजार कर रही और सवारियों को भी लेती चले। ऐसा ही होता दिख रहा है।

ख़त्म हुआ बस का इंतज़ार

बस अड्डे से कुछ सवारियां चढ़ी फिर उन्हे ले कर बस आ धमकी पूरे एक घंटे देरी के साथ। पहाड़ों में शायद ये पहली मर्तबा है कि कोई बस पांच मिनट से ज्यादा देरी से आईं हो।

बस एकदम खाली पड़ी है। जहां मर्ज़ी हो बैठो। सो मैंने एक कोना पकड़ लिया और गाने सुनने के लिए मोबाइल निकाल लिया।

तभी दो नौजवान महिलाएं चढ़ी जो भटकी हुई ज्यादा लग रही हैं। उत्सुकतावश उन्होंने पूछ ही डाला बस कहाँ तक जाएगी? जवाब में मेरे मूह से रेकोंग पियो निकला। क्यूंकि बस सांगला, करछम होते हुए रेकोंग पियो तक जाएगी

जब मंज़िल और बस एक ही ओर जाते हुए दिखी तो दोनों महिलाएं इत्मीनान से बैठ कर गप्पे मारने लगीं। इधर मैं इस उधेड़बुन में हूँ कि अगर समय रहते शिमला पहुंच गया तो वहाँ से देहरादून निकल जाऊंगा।

देहरादून से शुरू होगी चारधाम यात्रा। यमनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ। फिलहाल शिमला में ना तो रुकने की कोई योजना है ना ही कोई संगी साथी मिला है अबतक।

सिर्फ बस बदल कर कल सुबह तक शायद देहरादून पहुंच जाऊं। पहाड़ों से गुजरते हुए बस आगे बढ़ रही है। ये वही मार्ग है जिसपर से कल रात भारी बारिश के बीच चितकुल जाने में प्राण सूख गए थे।

कंडक्टर साहब अपना कार्य निर्वाहन करते हुए आ गए टिकट काटने। करछम तक कि दो टिकटें बस और पचास रुपए। पहाड़ी रास्ते के लिहाज से देखा जाएं तो बेहतर है।

आज दिन में अत्यंत ही सुगम दिखाई पड़ रहा है। लेकिन पहाड़ियां काफी गहराई रखती हैं यहाँ भी। जिससे हर किसी के लिए इतना आसान नहीं है इस मार्ग पर वाहन चलाना।

तकरीबन आधे घंटे के भीतर सांगला बस अड्डे आ पहुंची। बस अड्डे पर रुकना हुआ कि धड़ाधड़ सवारियां भरने लगीं। देखते ही देखते बस की एक भी सीट खाली नहीं बची है।

बस आगे बढ़ी पर सवारियां भरने का सिलसिला अभी भी नहीं थमा। हर मोड़ पर दनादन सवारियां चढ़ रही है। शायद ही अब खड़े होने की जगह बची है।

पहले जहां फैल कर पैर पसार कर बैठा था अब वही पैर सिकुड़ गए हैं। अलग अलग सीट के बजाए एक ही सीट पर मैं और साथी जमे हुए हैं।

आधा घंटा और आ गया करछम।

इंतज़ार दूसरी बस का

भरी बस से उतारना भी अपने आप में एक कला है। लोगों के हुजूम में पिसते हुए बाहर आना और फिर बैग के साथ। इसमें सबसे ज्यादा कठिनाई है।

बैग सहित कूद पड़ा और बस अपने रास्ते रेकोंग पियो को रवाना हो गई। करछम बस अड्डे पर पहले से ही काफी सवारियां बस के इंतजार में चाय की दुकान के पास खड़ी हैं।

किसी भी बस की समय सारिणी आसपास की दुकान वाले से ज्यादा अच्छे से कोई नहीं जानता होगा। चाय वाले दद्दू को भी बखूबी ज्ञान है।

रामपुर की मिली बस

बस आने में अभी काफी टाइम है। तब तक एक एक कप चाय और नाश्ता बेहतर रहेगा। बाकी बसें आ रहीं हैं और खड़ी हुई सवारियां एक एक कर कम होती दिख रही हैं।

तकरीबन आधे घंटे के भीतर रामपुर की ओर जाने वाली बस भी आ गई। उम्मीद है आज रात तक शिमला और सुबह देहरादून पहुंच जाऊंगा।

इसी उम्मीद के साथ बैग लेके चढ़ गया। बैठने को सीट भी मिल गई है। सफर आराम से कटेगा।

बस में अधिकांश रोजमर्रा की सवारियां यां फिर मजदूर वर्ग का आदमी ज्यादा है। बस राह चलते चलते और खाली ही होती जा रही है।

यहाँ पहाड़ियों में अधिकतर जगह डैम या बिजली उत्पादन कंपनियां हैं। जो पहाड़ों को कमजोर बनाती हैं। इधर बस चलते फिरते आ पहुंची है एक पुल पर जो सतलुज नदी पार करते ही दूसरी पहाड़ी पर आ जायगी।

कुछ ही दूर रामपुर बुशहर है। जिसका नाम पड़ा भेड़ के व्यापार करने के कारण। ये बताया बगल में बैठे दद्दू ने। सूरज ढलता की इससे पहले रामपुर बुशहर बस आ पहुंची।

रामपुर बुशहर

खाली पड़ी बस ने यहाँ कुछ देर रुकना समझा। शायद आधा घंटा रुकने के आसार हैं। पिछली बार भी रेकोंग पियो जाते समय भी यहाँ अच्छा खासा वक्त बिता था।

समोसे की दुकान के बगल में जलेबी और पकौड़ी वाले की भी दुकान है। इक्कठा खाना तो आज मिलने से रहा। बेहतर है टुकड़ों में नाश्ता करते चलो।

गरमा गरम चाय और पकौड़ी का आना हुआ। ड्राइवर साहब पता नहीं बस का इंजन बंद करके कहाँ लापता हो चले हैं। इधर चाय का खत्म होना हुआ।

उधर धड़धड़ाते हुए बस चालू हो गई। अफरा तफरी मे बाकी की सवारियां अपना अपना कुल्लहड़ छोड़ भगीं बस पकड़ने। मैंने अपना बड़ा बैग पीछे डिक्की में सहूलियत से रख दिया है।

पर बैग रखते समय अजय के बैग का कुंडे का क्रिया करम हो गया। ये एक नया झमेला।

यात्रा मंगलमय की कामना का सन्देश

बस की सबसे पिछली वाली सीट पर से आगे का नज़ारा देखने काफी सहुलियत भरा है। स्टॉप पर रुकने के कारण कुछ सवारियां बढ़ गईं हैं।

रामपुर बुशहर हिमाचल प्रदेश के मुख्य स्थलों में से एक है। जैसे मण्डी शहर वैसे ही। कभी इस स्थान पर राजा महाराजाओं का राज हुआ करता था।

अब हर कोई राजा है। दिन ढल रहा है और शरीर भी। अंधेरे के साथ समय का पता नहीं चल रहा। बस आगे बढ़ रही है और रात तक तो रामपुर आराम से पहुंच जाएगी।

रामपुर पहुंचा ही की पता लगा शिमला की ओर प्रस्थान करने वाली बस, अड्डे पर भरी खड़ी है। बैग उठा कर खड़ा हुआ और बस के रुकने का इंतज़ार करने लगा।

बस का रुकना हुआ और मैं भागा शिमला वाली बस की ओर। शिमला वाली बस चल ही पड़ी है तभी रामपुर वाली बस के ड्राइवर ने भोंपा बजा कर बस रुकवाई।

बस लबालब भरी है। चल पड़ी बस अपने मार्ग पर। शिमला की ओर प्रस्थान करते वक्त नारकंडा बस अड्डे के आगे कुछ दूरी पर बस को झटके लगने लगे। लगा अब तो काम तमाम हो गया बस का।

लड़खड़ाती बस

पर ड्राइवर के अथक प्रयास के आगे बस को घुटने टेकने पड़े। और एक बार फिर से स्टार्ट है कर दौड़ पड़ी। कुछ ही दूरी तक यह सिलसिला रहा की एक दो झटके में बस बंद होकर शहर के बाहर किसी ढाबे के सामने खड़ी हो गई।

अब मानो बस और आगे जाने लायक नहीं बची है। ड्राइवर कंडक्टर दोनों बाहर उतर कर झांकने लगे पर कुछ हो नहीं पा रहा है।

ऐसा लग रहा है बस के अलावा ड्राइवर साहब का भी मन नहीं है जाने का। एक एक कर सब सवारियां उतरती गईं। कई तो इस भ्रम में हैं कि कुछ ही देर में ठीक हो जाएगी तो दोबारा फिर से चल पड़ेगी, इसलिए वो अपना अपना झोला बस में ही छोड़ सामने ढाबे में पेट पूजा करने निकल पड़े।

इधर ड्राइवर साहब ने ऐलान कर दिया कि सभी लोग अपनी अपनी व्यवस्था देख लें। उनके कहने का तात्पर्य यही है कि पीछे से और भी बसें आ रही हैं आप सब उसमे लद लें।

जबतक मैं ये समझ पाता कि एक बस आ धमकी। और कुछ होशियार सवारियां सामान ले कर भाग दौड़ी बस की ओर। देखते ही देखते ये बस खचाखच भर गई जिसे हम अंग्रेज़ी में ओवरलोड कि संज्ञा देते हैं।

प्रतिज्ञा

मैं मूक दर्शक की तरह ये सब देखता रेह गया। मन में ठान लिया है शायद की जाना है तो इसी बस से फ़िर चाहें कितना भी समय ले।

वैसे भी रात बिरात पहुंच कर सोने का कोई ठिकाना तो होगा नहीं ना ही देहरादून के लिए बस उपलब्ध होगी। सो बेहतर यहीं रहेगा इंतजार करो।

कुछ मामलों में अजय से चर्चा भी नहीं होती है। बस एक दूसरे की मनोदशा समझ कर आकलन है जाता है अगला निर्णय क्या लेना है। कई दफा तो बेहतर रहता है कई दफा उल्टा भी पड़ जाता है।

बैग डिक्की में पड़े हैं। और भी लोगों के समान डिक्की में हैं। कंडक्टर से एक दफा बैग की सुरक्षा को ले कर एक आधे सवाल कर खुद को तसल्ली दे दी। ताकि बैग सही सलामत बना रहे।

जब बैग सुरक्षित है और बस के निकलने का कोई तय समय नहीं है तब लगने लगा एक झपकी ही ले ली जाए। वैसे भी अधिकतर सवारियों ने अपना अपना बोरिया बिस्तर समेट कर दूसरी गाड़ी पकड़ ली है।

बस में घुसा तो इक्का दुक्का सवारियां ही पैर पसारे लेटी दिख रही हैं। आधा शरीर इस सीट पर बाकी टांगे सामने वाली सीट पर।

सबसे पिछली सीट पर तो पहले से कोई पसडा हुआ है। मैं भी ये हवा में शरीर लटकाने वाली तरकीब के साथ पैर पसाड़ कर लेटने की कोशिश करने लगा।

ट्रेक्किंग पैंट की सारी जेबें बंद करके इत्मीनान से आंखे मींच ली और सो गया। जैसे कॉलेज के समय में कॉलेज की बस में सो जाया करता था ठीक वैसे।

पर अंतर सिर्फ इतना है वहाँ बस रुकती नहीं थी यहाँ बंद पड़ी है।

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नमस्ते, मैं ऐश्वर्य तिवारी हूं। ये उन दिनों की बात है जब मैं अपने जुनून का पालन करने के लिए अपने कॉर्पोरेट जीवन को पीछे छोड़ दिया।भारत को जानने के मेरे अंदर हमेशा एक जिज्ञासा थी क्योंकि इस देश में हर कुछ मील के बाद विविधता, विभिन्न संस्कृति है। हर दिन मेरे लिए एक नए शहर में एक नई प्राणी के साथ एक नया दिन है। मैं एक घुमक्कड़ हूं जो के विभिन्न हिस्सों में घूमना पसंद करता है और जल्द ही भारत से बाहर हो सकता है।

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