चेरापुंजी, मेघालय, स्टोरीज ऑफ इंडिया
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पृथ्वी का सबसे बरसाती शहर

भारत बांग्लादेश सीमा

भारत बांग्लादेश सीमा तक जा कर कुछ देर बीता कर ही अच्छा लगा। वापस जाने लगा तो सीमा पार से सैलानी भी आते दिखे। जो भारतीय चेकपोस्ट पर अपने कागज दिखा कर भारत की सीमा में दाखिल हो रहे हैं।

कुछ लोगों का मानना है कि बांग्लादेश से अभी भी घुसबैठ हो जाती है क्यूंकि भारत का काफी हिस्सा खुला हुआ है। जिसे ना किसी दीवार या कटीले तारों से बांधा गया है।

फिलहाल मुझे बांग्लादेश तो नहीं पर चेरापूंजी के लिए समय से रवाना होना है। कीचड़ और मलबे से किसी तरह रास्ता बना कर बाहर निकलना हुआ।

मावलेनोंग जाने का विचार भी है। पर जाम इतना भीषण लगा हुआ है कि मावलेनोंग को जाने वाले रास्ता खोजने पर भी नहीं मिल रहा है।

ट्रकों के जमावड़े को पार करते हुए आगे बढ़ा तो मालूम पड़ा मावलेनोंग को जाने वाला रास्ता पीछे छूट गया है। जिस पर दोबारा जाने का मतलब है जाम का सामना करो।

वैसे मेरा मानना है कि अगर हम अपने शहर और गांव को इतना स्वच्छ बना ले की हर प्रदेश में ऐसा गांव हो तो साफ सफाई को देखने के लिए अलग से किसी दूसरे के घर ना जाना पड़े।

समय और गाड़ी में तेल की मात्रा को मद्देनजर रखते हुए मैं वापसी मार्ग की ओर निकल रहा हूँ जो चेरापूंजी को जाता है।

डावकी गांव

कुछ बीस मिनट के सफर के दौरान आ पहुंचा दावकी गांव। यहाँ से उमगोट नदी के उस पार बांग्लादेशी सीमा है। यहाँ पर विभाजन नदी के आधार पर हुआ है।

भारत बांग्लादेह सीमा को विभाजित करती उमगोट नदी

ठीक वैसे ही जैसे भारत नेपाल के बॉर्डर पर हुआ है। और ऐसा विभाजन का नायाब तरीका भी अंग्रेज़ो द्वारा ही निकला गया है। स्कूटी रोक कर इस भीड़ भाड़ वाली जगह को देखने का मन बनाया।

पेड़ की टेहेनियों के के झरोखे से, नदी के उस पार भारी तादाद में नावों का जमगट दिखाई पड़ रहा है। यहाँ भी सैलानियों की मात्रा कम नहीं है।

हर कोई बांग्लादेश की इतनी दूर से दिख रही सीमा के साथ तस्वीर लेने को उतावला हो रहा है। स्कूटी किनारे लगा मैं भी निहारने लगा बांग्लादेशी सीमा को।

जहाँ ढेरों नाव खड़ी हैं और उन पर नजर रखे हुए हैं बीएसएफ के जवान जो इस पट्टी पर अपने बंकर में बैठे हुए पहरा दे रहे हैं। ताकि ना उस पार से कोई इधर आ सके और ना ही इधर से उधर।

कई सैलानी तो नीचे उतर कर भी जा रहे हैं। शायद इसी आस ने कि इनको नौका की सवारी ही करने को मिल जाएगा। और ये नीचे पहुंचे तो ऐसा मुमकिन होता भी दिख रहा है।

नाव के बहाने बड़े स्तर पर मछली पकड़ने का सिलसिला जारी है दोनों ओर। इधर सैलानी नाव के ऊपर भी मज़े से तस्वीर ले रहे हैं।

पांच दस मिनट में मैंने भी अपना कैमरा थमा एक जनाब से कुछ तस्वीरें निकलवा लीं। उमगोट नदी के ऊपर बने इस पुल अंग्रेज़ो के ज़माने को बताया जाता है।

पुराना हो चुका है इसलिए एक बार में एक तरफ ही यातायात चलता है। स्कूटी चालू करके यहाँ आ पहुंचा। गार्ड ने इशारे में ही मुझे भी कुछ पल के लिए इंतजार करने को कहा।

पुल का संचालन इस तरफ बैठा एक मोटा आदमी करता दिख रहा है। जो फिलहाल उधर से गाड़ियों को आने का इशारा कर रहा है।

पान चबाते हुए बताने लगे कि इस पुल को पचास से भी ज्यादा साल बीत चुके हैं और अभी भी ऐसा ही टिका है। इतने साल बीत गए हैं, सरकार जाने पुल के गिरने का इंतजार क्यों जाए रही है।

अब जब इन जनाब ने पुल की उम्र भी बता दी तो पुल को पार करते समय। पांव भी थरथरा रहे हैं। लग रहा है ये पुल मेरे बीच रास्ते तक पहुंचते पहुंचते ही ना गिर जाए।

ऊपर से जिस कदर ये हिल डुल रहा है उससे मन में शंशय और बढ़ रहा है। पुल पार करके जैसे ही इस पार शकुशल आया, अब जा कर राहत की सांस ली।

क्यों ना इस ऐतिहासिक पुल के साथ कुछ तस्वीरें भी निकलवा लूं। शायद अगर ये पुल ना हो तो नदी के उस पार का जीवन अस्त व्यस्त हो जाए।

लोग बेचैन हो उठेंगे। आखिर कब तक अंग्रेज़ो के जमाने का समान इस्तेमाल होता रहेगा, बड़ा प्रश्न है। कुछ एक तस्वीरें निकलवाने के बाद चल पड़ा फिर से अपनी मंज़िल की ओर।

स्कूटी में तेल कम है इसलिए जल्द से जल्द और इतने ही पेट्रोल में पास के पेट्रोल पंप तक पहुंचना है। कल शाम को दिखे भूतिया घर को भी देखना है।

पचास साल पुराने पुल के समीप लेखक

जो इतना भुताहा घर लग रहा था कि यमनोत्री के बिरला हाउस की याद आ गई। पर वहाँ इंसानी बसेरा था यहाँ वो भी नहीं है। सड़क पर आज सन्नाटा पसरा है।

धूप भी खूब खिली खिली निकली है। घुमावदार पहाड़ी में गाड़ी चलाने का अलग ही आनंद है। शायद सुबह के कारण इस कदर सन्नाटा पसरा हुआ है।

उस जगह से गुज़र रहा हूँ जहाँ कल शाम को दुर्घटना हुई थी। पर आज ऐसा कोई नामो निशान भी नहीं है दुर्घटना का जिससे पता चल सके ऐसा कुछ हुआ भी था।

भूतिया घर

फर्राटा भरते हुए आ ही पहुंचा भूतिया घर के सामने। रात में तो इस घर के इर्द गिर्द भी कोई घूम नहीं सकता, कुछ ऐसा बंद पड़ा है।

जैसा फिल्मों में दिखाया जाता है कुछ वैसा। स्कूटी किनारे लगाई और दनादन तस्वीरें निकलवाने लगा। ना तो ऐसा भूतिया घर कहीं और मिलने वाला जिसके सामने इतना बड़ा बगीचा होगा और ना ऐसा सन्नाटा।

कुछ एक तस्वीरें लेने के बाद स्कूटी स्टार्ट की और चल पड़ा। वीरान रास्तों से होते हुए। मन है कि यहाँ भी तस्वीर लेलूं जी भर कर पर बार बार गाड़ी का रोकना सही नहीं।

ऐसा वीरान रास्ता स्पीति की घाटियों में ही नजर आया था। पर यहाँ बड़ी बड़ी घास हैं वहाँ नहीं थीं। कहीं पड़ा था मैंने जी भारत में ऐसी बर्बाद जमीन कुल 40% हैं।

जिसके ऊपर ना खेती होती है और ना ही कोई फैक्ट्री है। बस खाली पड़ी है। ना सरकार काम करती है उसके ऊपर ना जनता को काम करने देती है।

खाली पड़ी इस ज़मीन पर सूर्योदय और सूर्यास्त आसानी से देखा जा सकता है। कल के मुकाबले आज गाड़ी तेज़ गति में चला रहा हूँ।

एक तो रास्ता मालूम है कैसा है और किस कदर है दूसरा समय का भी अंदाज़ा हो चला है। लेकिन हर जगह ऐसा वीरान नहीं है। सड़क से नीचे उतर कर घर और गांव भी बसे हुए हैं।

सैलानियों के ठहरने की भी उचित और उच्यत्तम व्यवस्था है। बाकायदा रिजॉर्ट है अमीरों के ठहरने के लिए।

तकरीबन घंटे भर के सफर के बाद उस जगह पर आ पहुंचा जहाँ व्यू प्वाइंट है।

और वो दो महिलाएं भी हैं जो दुकान सजाए कपड़े उधार पर से रही हैं। गाड़ी धीमी हुई फिर लगा रुकना भी चाहिए। सो वापस मोड़ कर आ गया।

रेस्त्रां में बैग रखा और चाय का ऑर्डर थमा दिया। आधे घंटे से भी कम के समय में चाय नाश्ता किया और इन मां बेटी से मिल कर निकल पड़ा वापस अपनी मंज़िल की ओर।

पीछे के व्यू प्वाइंट पर बिना पैसे के बात नहीं बनती। स्कूटी लेके निकल रहा था तो आगे भी एक व्यू प्वाइंट देखने में आया। रुक कर तस्वीरें निकालने लगा।

मेघालय का व्यू प्वाइंट

देखने के लिए सिर्फ बादल हैं। उसके सिवाय यहाँ कुछ भी नहीं। पहाड़ों में सिर्फ सफेदी छाई हुई है। अगर कोई यहाँ से कूदता भी है तो उसको ये अंदाजा ना होगा कि कब जा कर वो नीचे गिरेगा।

ऐसे नज़ारे कमाल के तो होते ही हैं साथ ही खतरनाक भी। कुछ सफेद तस्वीरें लेने के बाद निकलने लगा। रास्ते भर डीजल पेट्रोल के महक नाक में समा गई है। जिससे उलझन भी हो रही है।

हवा कम

स्कूटी के टायर की हवा शायद कम हो गई है। जिसको भरवा लेना चाहिए वरना ना जाने कम हवा और पेट्रोल में कितनी ही दूर तक चलेगी गाड़ी।

दूर दराज एक किनारे गैराज मिला जहाँ हवा भरी जाती है। यहीं स्कूटी रोक कर हवा भरवाई। कल के मुकाबले तो काफी कम हो गई है हवा। हवा का माप तो बढ़ गया पर तेल अभी भी कम है।

भाईसाहब से जब पेट्रोल पंप की दूरी पूछी तो हाँथ उठा कर आगे का इशारा करते हुए दिशा दिखाई। पैसा थमा कर निकल पड़ा। और भी एक आगे होने की बात की जाते जाते।

पेट्रोल पंप आया लेकिन से रहा हूँ आगे वाले पेट्रोल पंप से पेट्रोल भरवा लिया जाएगा। इसी सोच के साथ आगे बढ़ निकला। एक बार फिर वीरान रास्ता और दाहिने हाँथ पर बड़ा सा फुटबाल का मैदान।

जो पानी में भीगा लग रहा है। तकरीबन एक किमी आगे निकल आने के बाद जब पास दिख रही बस्ती में गाड़ी रोकी और कुछ पेट पूजा जा सामान लेने लगा। बातों बातों में पूछा तो पता चला अगला पेट्रोल पंप काफी दूर है।

सबसे नजदीक पेट्रोल पंप यही है। फिर क्या था ये सुनने की देरी थी,गाड़ी घुमाई और चल पड़ा वापस उसी पेट्रोल पंप पर। गाड़ी घासीटने से बेहतर है पेट्रोल वापस जा कर पेट्रोल भरवा लिया जाए।

आसमान को बदलो ने हर तरफ से घेर लिया है। ऐसा लग रहा है जम कर बरसने की कवायद में हैं। वापस एक किमी का सफर तय कर के आ गया पेट्रोल पंप।

सन्नाटे में पड़े इस पेट्रोल पंप के ऊपर ना तो कोई छत है ना पक्की ज़मीन। एक और वजह रही यहाँ से पेट्रोल ना भरवाने की वो ये कि यहाँ तमाम बड़े भारी भरकम ट्रक अपनी टंकी भरवा रहे हैं।

जिस कारण साफ पेट्रोल मिलने के कम ही अवसर दिखते हैं। फिर भी कुछ ना सही से कुछ ही सही। इधर स्कूटी की टंकी पूरी भरवा ली उधर अपनी टंकी खाली करने पेट्रोल पंप पर ही बने शौचालय आ गया।

पैसे थमाए और निकल पड़ा सोहरा के लिए। निकल पड़ा बस्ती की ओर।

भूख भी लगी है और जल्दी भी पहुंचना है। गाड़ी रोकी और आसपास दुकानें देखने लगा। किनारे लगी एक दुकान पर ना जाने क्या ही पका रहे हैं। लग रहा है जैसे किसी जानवर की अंतड़ियां उबल रही हों इस भागौने में।

सोच रहा हूँ कहीं आगे ही पेट पूजा कर ली जाएगी। निकल पड़ा वापस। बस्ती से होते हुए चेरापूंजी की और निकला ही था कि मूसलाधार बारिश होने लगी।

कपड़े भीगते इससे पहले बदन पाए बरसाती जैकेट टांग ली। जिससे मैं तो भीगने से बच गया। पर बैग पूरी तरह से गीला हो रहा है।

आगे सड़क पर ना कोई दुकान दिख रही है और ना ही कोई छांव जहाँ खड़े हो कर खुद को बरसते पानी से बचा सकूं। इसलिए गाड़ी घुमाई बस्ती की तरफ और आ गया एक ढाबे में।

बैग निकाले और शिलोंग में रितेश गुरुंग ने जी कुछ पन्नी दी थी उससे अपने बैग को ढकने की कोशिश करने लगा। खुद के साथ बैग को भी अन्दर ढाबे में ले आया।

शाकाहारी खाना तो नसीब होने से रहा। मांसाहारी में अलग अलग तरह का भोज है। बमुश्किल दाल और चावल नसीब हुआ और चाय भी।

चेरापूंजी भीगते हुए जाते लेखक और साथी

पर मैंने सिर्फ चाय ही लेना स्वीकारा और बैग से बिस्कुट निकाल कर खाने लगा। अजय अपनी भूख मिटाने के लिए खाने लगा। पूर्वोत्तर भारत में शाकाहारियों का गुज़ारा नहीं है। बारिश अब पहले से कम हो गई है। अब लग रहा है चेरापूंजी जा रहा हूँ।

पृथ्वी का सबसे बरसाती शहर चेरापुंजी

चेरापूंजी धरती का सबसे बारिश वाला क्षेत्र है। बचपन में पढ़ा था कि सबसे बारिश वाला क्षेत्र पर अब नहीं रहा।

दरअसल चेरापूंजी से ही सटे गांव मौसिनराम को अब ये तमगा मिल चुका है। जहाँ सालभर बारिश हुआ करती है। जो धरती पर सबसे ज्यादा बरसाती क्षेत्र माना जाता है।

11777 मिलीमीटर के बारिश दर्ज की गई है। लगातार बारिश होने के कारण यहाँ पर अक्सर पहाड़ियों पर मृदा अपरदन(soil erosion) पाया जाता है।

सालभर बारिश होने का कारण है बंगाल की खड़ी से को मॉनसून गुजरता है वो इन्हीं पहाड़ियों में फंस कर रह जाता है। जिस कारण बादल यहीं बरस जाते हैं।

बहुत भारी तादाद में बारिश होने के बाद भी यहाँ पीने के पानी की समस्या बनी रहती है। जिसको पूरा करने के लिए निवासियों को दूर दूर तक पानी लेने जाना पड़ता है।

बारिश अब कम हो गई है। सो यही सही मौका है निकलने का। फटाफट भुगतान किया और बैग के ऊपर पन्नी बिछा कर निकल लिया।

पन्नी पर्याप्त तो नहीं है बैग को गीला होने से बचाने के लिए पर कुछ ना से कुछ बेहतर है। स्कूटी स्टार्ट की और इस बार अजय को दे दी चलाने के लिए।

बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही। इसी वजह से भी सड़क पर आदमी ना के बराबर है।

रास्ते में सेवन सिस्टर झरना भी देखने को मिल रहा है जिसका नज़ारा इतना कमाल का है जिसको बयां किया नहीं जा सकता। पास में बने एक गार्डन में कुछ देर के लिए रुका और वापस चल पड़ा।

सोहरा

दिन के तीन बज रहे हैं और मैं आ पहुंचा हूँ सोहरा। भूख भी जोरों की लगी है। स्कूटी रोक कर एक किनारे लगाई और बाएं हाँथ पर दिख रहे रेस्त्रां में आ गया।

भीड़ इस कदर है की टेबल खाली होने की कतार अलग से खड़ी है। इतना समय तो नहीं है अपने पास। बेहतर होगा निकल कर नोंग्रियाट में ही भोजन किया जाए।

सोहरा बाजार

सामने दिख रहे बोर्ड पर नोंखालाई और मावमाई गुफा जाने का रास्ता भी दिखा रहा है। पूछने पर पता चला कि नोंखालाई झरना काफी ऊंचाई पर है। पता नहीं वहाँ तक स्कूटी जा पाएगी या नहीं। इसलिए चल पड़ा डबल डेकर रूट ब्रिज की तरफ।

दिन का भोज ज़रूरी हो चला है क्यूंकि थकान इस कदर है जिसका कोई हिसाब नहीं। सोहरा के बाजार से निकल कर जब आगे आने लगा तो नोंगरिआत जाने वाली मोड़ पर ही एक रेस्तरां दिखने में आ रहा है।

ये भी मुख्य बाजार ही लग रहा है पर भीड़ न के बराबर है। गाड़ी रोकी और मन बना लिया यही खाना खाने का। एक किनारे स्कूटी लगा कर चढ़ने लगा रेस्ट्रा की सीढ़ियों पर। पर यहाँ पसरा सन्नाटा कुछ और ही बयां कर रहा है।

शायद घर के ही किसी कोने में रेस्तरां खोल लिया है गृहस्ती चलने के लिए। आर्डर दिया और आर्डर देने के महज कुछ ही मिनट में थाली भी पारस के आ गई। चावल पहले नहीं दे रही थी पर चावल के लिए अलग से दरखवास्त करने पर मोहतरमा राजी हो गईं।

।पूर्वोत्तर भारत में खासतौर पर मेघालय में महिलाए ही बाहर का काम काज ही संभालती दिखी फिर चाहें वो रेस्ट्रा हो या कोई दूकान। यहां के मर्द पता नहीं क्या ही करते हैं सड़क पर घूमने के अलावा। खा पी कर भुगतान किया और निकल पड़ा डबल डेकर रूट ब्रिज।

खाना खाने के बाद बहुत अच्छा भी लग रहा है और ऊर्जा मिली है वो अलग ही है। शाम के चार बजने को आये हैं सब कुछ ठीक रहा तो शायद घंटे भर के भीतर पहुँच जाऊँगा। यहाँ घर इतने खुले हुए बने है जिसको देख कर लग रहा है चोरी चाकरी होती ही नहीं है।

सोहरा से नोंगरियाट

जगह इतनी खाली पड़ी है जिसका कोई हिसाब नहीं। पुरानी दिख रही बहुत ऊँची फैक्ट्री अंग्रेजी हुकूमत की लग रही है जो चारो और से किले में तब्दील है। पास से गुजरने पर पता लग रहा है कुछ हिस्से अभी भी चालू है। वैसे भी अंग्रेजो से सारा खेल फैक्ट्री से ही तो शुरू किया था भारत में राज करने का।

काफी दूर तक रास्ता मक्खन की तरह ही मिल रह है। और आसपास की खाली पड़ी ज़मीन और छोटी छोटी पहाड़ियां जिसपर लड़के मौज मस्ती करते नज़र आ रहे हैं। वीरान से होते हुए अब बस्ती की तरफ आ पंहुचा हूँ। अभी तक जहाँ रास्ता अच्छा और पक्का मिला था अब रास्ता गड़बड़ा गया है।

ढलान इस कदर है की कई कई जगह गाड़ी को बंद करके ही नीचे की सवारी कर रहा हूँ। तेल की भी भारी बचत हो रही है।

अचानक से गूगल नक्शा बंद हो गया। जिसके कारण नोंगरियाट तक जाने का बचा कुचा रास्ता स्थानीय लोगों से पूछना पड़ रहा है।

एक ग़लत मोड़ और कोई दूसरी मंज़िल। रास्ते में एक कार में सवार चार लोग भी जा रहे हैं। जो इतनी तेज़ गाड़ी चला रहे हैं कि उनको देख कर यही लग रहा है कहीं मैं तो धीमी गाड़ी नहीं चला रहा।

एक रास्ता ऐसा भी देखने को मिल रहा है जिसको देख कर लग रहा है पहाड़ी को काट कर बनाया गया है। थोड़ा आगे निकला तो देख रहा हूँ कि वही चार लोगों की गाड़ी पहाड़ी में ठुकी पड़ी है।

वो तो गनीमत रही कि खाई में नहीं गिरे वरना मौत निश्चित थी। मैं अपना गाड़ी बंद करके ढलान को पार करने का सिलसिला जारी रखे हूँ।

पर अब रास्ता इतना उबड़ खाबड़ है कि गाड़ी बंद करके चलना मतलब दुर्घटना को दावत देने के बराबर है।

पहाड़ी में बीच सड़क पर चल रहे मुसाफिर से पूछा तो आगे की ओर इशारा करते हुए बताने लगे कि सिर्फ कुछ दूरी पर ही प्रवेश द्वार है डबल डेकर रूट ब्रिज के लिए।

तकरीबन आठ घंटे के जटिल पहाड़ी सफर को तय करते हुआ आखिरकार अंधेरा होने से पहले पहुंच ही गया। गाड़ियों का जमावड़ा लगा हुआ है।

नीचे जाने को सिर्फ एकमात्र रास्ता नजर आ रहा है। पार्किंग का शायद अलग पैसा लगेगा। शाम के पांच बजे के बाद एंट्री बंद हो जाती है यहाँ पर।

भारत बांग्लादेश सीमा से नोंगरीअत तक का सफर 99किमी

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नमस्ते, मैं ऐश्वर्य तिवारी हूं। ये उन दिनों की बात है जब मैं अपने जुनून का पालन करने के लिए अपने कॉर्पोरेट जीवन को पीछे छोड़ दिया।भारत को जानने के मेरे अंदर हमेशा एक जिज्ञासा थी क्योंकि इस देश में हर कुछ मील के बाद विविधता, विभिन्न संस्कृति है। हर दिन मेरे लिए एक नए शहर में एक नई प्राणी के साथ एक नया दिन है। मैं एक घुमक्कड़ हूं जो के विभिन्न हिस्सों में घूमना पसंद करता है और जल्द ही भारत से बाहर हो सकता है।

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