ना मिला पूर्वोत्तर भारत के स्कॉटलैंड में खाली होटल

शिलॉन्ग | भारत | मेघालय

असम के हालात सामान्य

कामाख्या देवी मंदिर के दर्शन के बाद अब समय से शिलोंग पहुंचना भी ज़रूरी है। घुमक्कड़ी समुदाय के किसी भी सदस्य ने दरख्वास्त नहीं स्वीकारी है।

अंधेरा होने से पहले पहुंच कर होटल ढूंढने की भी चुनौती रहेगी। इसलिए टूरिस्ट इंफॉर्मेशन सेंटर से जानकारी एकत्रित करने के बाद सीधा बस अड्डे की के रवाना हो गया।

मिली जानकारी के अनुसार हालात सामान्य हैं और कई क्षेत्र संकट से बाहर उबर आए हैं। गली कूंचों से होते हुए तपती धूप में आ गया बस अड्डे।

यहाँ मेरी ही तरह पहले से ही और भी सवारियां बस के आने का इंतजार कर रही हैं। एक किनारे पकड़ कर भारी भरकम बैग लेकर बैठना ठीक लग रहा है।

पास की दुकान में पूछताछ में पता चला कि आधे घंटे के भीतर ही बस का आना संभव है। आधा घंटा तो नहीं पर कुछ ही क्षण के भीतर बस आ पहुंची।

दिन के साढ़े तीन बज रहे हैं। बस आ तो गई है लेकिन वापस जाने के लिए पहले मुड रही है। उसके बाद सवारियों के चढ़ने उतरने का सिलसिला शुरू होगा।

कंडक्टर बाबू से शिलोंग जाने वाली जीप पर उतारने को बोला तो उन्होंने पान बाज़ार तक का टिकट थमा दिया। नीलांचल पर्वत से अलविदा लेते हुए चल पड़े।

पहाड़ी पर इतना ध्यान चढ़ाई करते समय नहीं देना पड़ता जितना उतरते वक्त देना पड़ता है। सो ड्राइवर साहब भी भरी बस को आहिस्ता आहिस्ता नीचे उतार रहे हैं।

समय लग रहा है पर ये सही तरीका है इन दुर्गम पहाड़ियों में बस चलाने का। चालक पुराना और समझदार लग रहा है।

महज आधे घंटे के भीतर ही हम गुवाहाटी के उसी स्थान पर आ गए जहाँ से निकले थे बलारूमुख।

कामाख्या देवी मंदिर

ब्रम्हपुत्र का रौद्र रूप

यहाँ से ब्रम्हपुत्र को साफ तौर पर देखा जा सकता है।

ब्रह्मपुत्र का उफान इस कदर है की गार्डन और फुटपाथ को पार करके यहाँ के कुछ कुछ हिस्सों पार पानी आ रहा है। नदी इतनी विकराल दिखाई दे रही है जिसको देख कर ही ह्रदय कांप उठता है।

जितने दूर तक नजर जा सकती है उतनी चौड़ाई और लंबाई तो जलस्तर के बढ़ने से और बढ़ गई है। किसी भी नदी का इतना भयानक रूप नहीं देखा होगा कभी।

जलस्तर के साथ साथ इस नदी की गहराई सोच कर ही आत्मा सिहर उठती है। लग रहा है मानो गुवाहाटी को ले डूबेगी ब्रम्हपुत्र नदी।

नदी के उस पार दूर दूर तक कोई छोर नजर नहीं आ रहा है। कोई उस पट्टी या इस पट्टी पर फंस भी जाए तो उसकी मौत निश्चित है।

शायद इतनी चौड़ाई गंगा की भी नहीं होगी किसी भी शहर में। चौड़ाई और जलस्तर के लगातार बढ़ने से गुवाहाटी शहर पर भी खतरा मंडराने लगा है।

ब्रह्मपुत्र में चल रही है तो एक नाव। पता नहीं कौन बहादुर प्राणी इस विकराल नदी में नाव लेके निकला है। बाढ़ से शहर कैसे ग्रसित होते हैं या डूबते हैं इसका जीता जागता उदाहरण देख पा रहा हूँ।

पीठ और छाती पर बैग लादे मन में यही विचार आ रहे हैं कि जितनी जल्दी इस माहौल से निकल कर किसी सुरक्षित जगह पहुंच जाऊं उतना खुद के लिए बेहतर।

कहीं नदी में अचानक से उफान आए गया तो लाखों के साथ मैं भी नदी में ही तैरता मिलूंगा अपने बैग के साथ।

बस से उतरने के बाद भरालुमुख से पान बाज़ार तक के लिए निकल पड़ा पद यात्रा करते करते।

रौद्र रूप में ब्रम्हपुत्र

कैसा सूमो सफर?

मालूम पड़ा कि शिलोंग को जाने के लिए बस तो नहीं मिलेगी इस समय पर सुमो गाड़ी जाती रहती हैं।

सुमो से निकल जाना बेहतर होगा। सो पैदल ही निकल पड़ा हूँ बस अड्डे जहाँ से सुमो मिलेगी। कीचड़ करकट से गुजरते और रास्ता पूछते हुए आगे बढ़ रहा हूँ।

पर यहाँ कुछ लोगों को ठीक से हिंदी नहीं आती। ना तो समझ पा रहे हैं बोलना तो दूर की बात है। आसमान में काली घटा धरती पर बरसने को तैयार हैं।

पर ठंड ना के बराबर है। कभी ठेले कभी किसी चालक से पूछते हुए मालूम पड़ा जीप या सुमो हमें रेलवे स्टेशन के पास से ही मिलेगी।

अब तक कुछ डेढ़ किमी पैदल ही नाप दिया है। बचा कुचा रास्ता भी पैदल ही नापने कि सोच रहा हूँ। स्टेशन तक के लिए कोई साधन ही नहीं दिखाई पड़ रहा है जाने के लिए।

जैसे कैसे घूम फिर कर स्टेशन पर पहुंचा। फिर पूछने पर पता चला कि जीप स्टैंड पुल के उस तरफ है। सो पुल चढ़ कर पार करके इस तरफ आ गया।

यहाँ सिर्फ सुमो और लोकल बस के अलावा कुछ नहीं है। बस के लिए पूछताछ की तो पता चला एक भी नहीं जाएगी। सुमो निकास के पास लाइन से लगी खड़ी हुई हैं।

तेज़ क़दमों में आ पहुंचा, मुझे लगने लगा अब यही अंतिम सुमो है। मगर ये नहीं इसके बाद भी इक्का दुक्का सुमो और हैं जाने को।

सुमो में भी सीट की बुकिंग करनी पड़ती है। ऐसे ही मुझे यहाँ दो सीटें बुक करानी पड़ रही है। और पीछे की दो सीटें बुक करा ली।

मगर ड्राइवर साहब के पास ₹500 का छुट्टा ही नहीं है। बैग सुमो की छत पर रखवाकर पास की दुकान से समान लेने लगा। किस्मत से खुले नोट भी मिल गए।

सामान ले कर सुमो के पास आया, किराया थमाया और आगे की सीट पर बैठने लगा। पर ड्राइवर बाबू बताने लगे की आगे की दो सीटें पहले से ही बुक है।

उन दो सवारियों के आते ही गाड़ी चालू हुई और निकल पड़ी शिलोंग की ओर। कुल मिलाकर दो से ढाई घंटे के भीतर पहुंच जाना चाहिए।

शिलॉन्ग के लिए रवानगी

अपनी भाषा में ड्राइवर साहब अलविदा लेते हुए गाड़ी लेके बाहर निकल कर मुख्य सड़क पर आ गए। शहर से बाहर निकलते ही पहाड़ियों के रास्ते घने बादलों के बीच सफर का आनंद ले रहा हूँ सुमो की सबसे पिछली सीट पर बैठ कर।

आसमान एकदम साफ नजर आ रहा है। प्रदूषण का नामो निशान नहीं है। पर हाईवे होने के कारण हर जगह डीजल, पेट्रोल ही महक रहा है।

अभी तक सड़क किनारे दुकानें नजर आ रहीं थीं अब पहाड़ी के शुरू होते ही वो भी नहीं हैं। ट्रकों का जमावड़ा हर जगह देखा जा सकता है।

इस पट्टी पर ज्यादा गाडियां हैं बजाय उस सड़क पर। बारिश के मौसम के कारण सड़क गीली और किनारे कीचड़ के सिवाय कुछ नहीं दिखाई से रहा है।

पहाड़ी काट कर शायद पुल बनाने का कार्य भी जारी है। क्यूंकि बड़ी क्रेन और मजदूर जुटे हुए हैं खुदाई करने में। पहाड़ों के ऊपर खेती भी देखने को मिल रही है।

बीच से जाती हुई गली में घर भी। पेट्रोल पंप पर ट्रकों का तांता लगा हुआ है। खाई वाले हिस्से में तो बादलों का जमावड़ा लगा हुआ है।

अन्य पहाड़ की चोटियों पर ऐसे बादल जमा हो गए हैं जैसे वही इनका घर हो। कुछ ही मीटर की दूरी पर बने टोल प्लाजा पर गाड़ी का रुकना हुआ।

वसूली हुई और एक दफा फिर से चल पड़ी गाड़ी अपनी मंज़िल। तकरीबन डेढ़ घंटा चलने के बाद आकर एक ढाबे पर रूकी। जहाँ ड्राइवर साहब को लगा कि रुकना जरूरी है।

यहाँ मेरा रुक कर टंकी खाली करना जरूरी है और प्यास बुझानी भी। बाकी सवारियां चाय नाश्ता करने लगीं। मैं अपना नाश्ता साथ लेके चला था सो उसी का साथ निभा रहा हूँ।

गुवाहाटी से शिलांग

कुछ पंद्रह मिनट बीत जाने के बाद ड्राइवर साहब ने सबको एक दफा फिर से गाड़ी में लदने को बोला और चल पड़े। इस बार साथी घुमक्कड़ को अन्दर और मैं खिड़की की तरफ बैठ गया।

बदकिस्मती से खाई वाला हिस्सा देख ही नहीं सकता हूँ जिधर ज्यादा बादल और कमाल के नज़रे हैं। इधर सिर्फ चट्टान और पहाड़ी।

अंधेरा होने के साथ साथ कुछ भी नहीं दिख रहा सिवाय गाड़ियों के वो भी तब जब उसपे रोशनी पड़ती।

अंधेरा होने के साथ साथ आलस भी परवान चढ़ रहा है। जी तो चाह रहा है यूं ही गाड़ी ऐसे ही चलती रहे। और ऐसे धीरे धीरे खिसकते हुए यहीं सीट पर सो जाऊं।

पूर्वोत्तर भारत का स्कॉटलैंड

शोर शराबे के बीच वाहन पहुंचा। गाड़ी से सवारियों के उतरने का सिलसिला शुरू हो चुका है। शायद शिलोंग भी आ गया। इतनी जल्दी क्यों आ गया।

मुझे छोटे सफर कतई पसंद नहीं है। या सफर हो जिसमे गाड़ी बस चलती ही जाए बिना कहीं रुके। जबतक ड्राइवर साहब ने खुद अपने मूह से नहीं कबूला तब तक मुझे यकीन ही नहीं हुआ की शिलोंग आ गया हूँ।

उतरा और ड्राइवर साहब भी बाहर निकल कर सुमो की छत से सामान उतारने लगे। शिलोंग की खूबसूरती मुझे उस शिमला की याद दिला रही है जिसके बारे में मैं बचपन में पढ़ा करता था।

बैग के हाँथ में आते ही शुरू हो गई खोजबीन होटल की। पास में ही रोड के दूसरी तरफ जगमगाता हुआ दिख रहा है। लग तो गार्डन जैसा रहा है।

मालूम पड़ता है हाल फिलहाल में कोई दावत खतम हुई है। पहुंचा तो देखा सारे कामकाजी लोग सामान समेट कर पिछले हिस्से में भर रहे थे।

सूमो की पिछली सीट पर ख़ामोशी से बैठे लेखक

एक मंज़िल इमारत में अंडरग्राउंड वाली जगह पर कुछ कमरे भी हैं जो शायद खाली हैं। पर मुझे खाली कमरे नहीं सिर्फ जगह चाहिए सोने के लिए।

सो काम कर रहे मजदूरों से बातचीत में पता चला कि संचालक से पूछना पड़ेगा। संचालक को बुलाया गया, उनसे बातचीत में मालूम पड़ा ये स्कूली जमीन है।।

और यहाँ वो इजाज़त नहीं से सकते तंबू गाड़ने की। पहली ही मुलाकात में असफलता हाँथ लगी। ये अब तक के सफ़र मे शायद पहली बार हो रहा है जब बात करी हो और बात ना बनी हो।

बैग लेके उसी सड़क पर थोड़ा आगे की और चलने लगा। पर अब वो स्कूल भी नजर आने लगा और उसके आसपास की खाली जमीन भी।

जमीन देखने भर की देर थी और यहाँ तंबू नहीं लगाना है यह भी समझ आ गया था। पूछताछ करते हुए मालूम पड़ा की होटल लेने के लिए गोरिखाना जाना पड़ेगा।

सड़क पार करके इस तरफ आ गया ताकि गोरिखाना पहुंच सकूं। पर कमबख्त गोरिखाना ना कोई बस ना कोई ऑटो या टेंपो है रहा है।

सो पैदल ही निकल पड़ा। शिलोंग कोई मामूली या आम शहर नहीं है। ये अबतक समझ आ चुका है। सुंदरता में तो इसका कोई भी सानी नहीं है।

सेंट्रल सेक्रेटेरिएट, विधान सभा और भी बड़ी बड़ी मुख्य इमारतों के सामने से गुजरते हुए लग रहा है इसके अलावा कोई और अच्छी जगह हो ही नहीं सकती।

पोस्ट ऑफिस की आलीशान इमारत और उसके बगल में एलआईसी की इमारत और भी अन्य इस इलाके को रोशन कर रही हैं अपनी गरिमा से।

बंद पड़ी पान की गुमटी को पार करते हुए आ गया गोरिखाना। जहाँ जनता का सैलाब उम्दा हुआ है। उसमें में अधिकतर उत्तर भारत के नागरिक ज्यादा हैं।

इतनी भीड़ के बीच चौराहे से निकलते इतने सारे रास्ते की कुछ समझ ही नहीं आ रहा की जाऊं तो किस ओर। होटल बाद में खोजा जाएगा पहले पेट पूजा हो जाए।

आ गए हम एक रेस्त्रां जो बंद होने से पहले कुछ सैलानियों की सेवा में लगा था। सो मैंने भी ऑर्डर थमा दिया।

होटल ढूंढने की प्रक्रिया तेज

भोजन के बाद होटल ढूंढने का सिलसिला एक बार फिर से शुरू हो गया। और इस बार अन्दर गली के मुहाने से घुसा जहाँ सबसे अधिक रोशनी है।

गली के मुहाने पर ही पहला होटल मिला। चढ़ कर पहले माले पर पहुंचा तो मलिक ने देखते ही मना कर दिया। जो खाली भी था उसके दाम कमरे के मुताबिक वाजिब नहीं थे।

उतर कर बाहर निकला और अगले होटल की तरफ बढ़ने लगा। ये ना सिर्फ होटल है बल्कि रेस्त्रां भी है। पर रिसेप्शन कि मेज़ पर बैठे मलिक ने भी कमरा खाली होने से इंकार कर दिया।

ठीक बगल के होटल में भी यही सुनने को मिला जिसने रेस्त्रां भी है। अब तक मैं बाहर फुटपाथ पर जगह तलाश करने लगा सोने के लिए।

सड़क पार करके दुसरे होटल पहुंचा तो यहाँ भी यही स्तिथि पाई। सोचा शुरुआत ना सही गली के अंत में तो मिल ही जाएगा होटल।

अब तक बत्तियां बुझने लगी हैं। और होटल भी बंद हो रहे हैं। हर होटल से एक ही बात सुनने को मिल रही है। कि कमरा खाली नहीं है।

घूम फिर कर वापस से गोरिखाना चौराहे पर ही आ गया। साथी घुमक्कड़ का मन है कि अन्दर गोदाम है और बाहर खाली सड़क जहाँ पर तंबू लगा कर सो सकते हैं।

रोबिन हुड

तभी अपनी बुलेट से एक सज्जन आए। आते ही उनका सवाल किया “होटल नहीं मिल रहा क्या?” और मेरा जवाब हां है।

इस पर वो यहाँ की हालत के बारे में बताने लगे और जब साथी घुमक्कड़ ने अपने फुटपाथ पर ही तंबू लगाने की योजना बताई तो इसका बिल्कुल भी समर्थन नहीं किया।

वो यहीं के ही रहने वाले हैं और रोजाना यहाँ के गरीब बच्चों को खाना खिलाते हैं। अंग्रेज़ी भाषा में इन्हीं बच्चों की तरफ इशारा करते हुए बताया कि रात में यही काम लगाएंगे।

अपना फोन निकाला और दो चार लोगों को कॉल करके किसी खाली होटल में व्यवस्था कराने को कहा। उनका इतना बोलना हुआ ही कि एक लड़का भागते हुए चौराहे तक आ गया।

आते ही मेरे बगल मे खड़े सज्जन रितेश जी जो सीपीसीबी बोर्ड में डायरेक्टर के ओहदे पर हैं उनको सर कह कर संबोधित किया।

किनारे खड़ा मैं ये सब देख रहा था, तभी उसने हाँथ आगे बढ़ाते हुए अपना परिचय गोविंद के नाम से दिया। रितेश जी को पास के होटल में जगह खाली होने की बात कही।

मैं अपना बैग उठा चल पड़ा इन दोनों के पीछे इसी आस में कि अब तो होटल मिल ही जाएगा। होटल की तलाश में एक नुक्कड़ से होते हुए गली में आया।

इस अंधेरी गली में ऊंची इमारत के पल्ले पर गोविंद ने खटकाया और कमरा खाली होने के बारे में पूछा। पर मालूम पड़ा की सिर्फ एक ही आदमी के लिए बहुत छोटा कमरा खाली है।

अब तक मैं रितेश जी से अलविदा ले चुका था, और फिर कभी भविष्य में मिलने की बात भी कर ली थी। इधर गोविंद ने रितेश जी को कॉल पर सारी व्याख्या बताई।

इस पर गोरिखाना चौराहे पर रितेश जी ने अपने मित्र आशुतोष की गाड़ी भिजवा कर हमें अपने घर आने का निमंत्रण दिया।

अगर आज रितेश जी ना होते तो पता नहीं सुबह तक हमारा क्या हश्र होता।

मां कामाख्या देवी मंदिर से उप्पेर माउप्रेम 115 किमी

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