पटना संग्रहालय में हुआ इतिहास से रूबरू

पटना | बिहार | भारत

गाँधी मैदान

आज भ्रमण का दूसरा दिन है। उठने में थोड़ी देरी हुई जिसका कारण रहा कल रात तक हुई बातें। स्नान और नाश्ते के बाद भी कोई विचार विमर्श नहीं हुआ की घूमने कहाँ जायेंगे।

पटना में घूमने लायक जगहें भी कम नहीं हैं। गोलघर,ऐतिहासिक गांधी मैदान, पटना संग्रहालय, पटना साहिब, बुद्धा स्मृति पार्क। घुमाने का जिम्मा सुमित ने अपने हांथ ले लिया है।

सुबह साढ़े दस तक घर से निकला। सुमित ने बताया की पटना शहर दो भागों में बटा हुआ है। एक हिस्सा स्टेशन के दाईं ओर जो थोड़ा पिछड़ा है और दूसरा बाईं ओर जहाँ विकास की पीपड़ी बजती है। ऑटो से निकलने कर गांधी मैदान के पास वाले चौराहे पर उतर गया।

गांधी मैदान इतना बड़ा है की इसके इर्द गिर्द यातायात भी प्रभावित है। वाहन से भी और पैदल एक छोर से दूसरे छोर जाने में आदमी के पसीने छूट जाएं। फिर भी लोग पैदल जाते हैं।

ग्यारह बज चुके हैं और हम मैदान के सामने खड़े हैं। भीतर प्रवेश करने के लिए भी तमाम गेट हैं। पहले गेट के आगे कीचड़ होने के कारण पिछले गेट की तरफ रुख करना पड़ रहा है।

मैदान में घुसने से पहले देखता हूँ की चारो ओर पुलिसकर्मी भी मौजूद हैं। मानो कोई बड़ा नेता आ रहा हो। ऑटो वाले से पता चला कि मुरली मनोहर जोशी किसी कार्यक्रम में शिरकत करने आए रहे हैं। मैदान के आसपास ही एसपी कार्यालय, लाइसेंस, पुलिस मुख्यालय, आरबीआई मुख्यालय हैं।

इसलिए लोग इस मैदान को ही चुनते हैं धरना प्रदर्शन करने के लिए। मैदान को आम जनता रास्ते के रूप में ज्यादा इस्तेमाल करती है। एक छोर से दूसरे छोर तक पहुंचने के लिए यह आसान माध्यम है।

बात करते करते मैं मैदान के बीच में बने टीले के ऊपर आ कर बैठ गया। टीले की दीवार गेंद के निशान से छपी पड़ी हैं। आस पास इतने क्रिकेट के मैच खेले जा रहे है। पता ही नहीं चल रहा किसकी गेंद कहाँ जा रही है।

मुझे बहुत सतर्कता से बैठना पड़ रहा है। जब कोई बल्लेबाज बल्ला चलता, गेंद मानो स्वयं की ओर आते दिखती है। गेंद का क्या भरोसा, कभी भी किसी के भी चेहरे पर अपनी छाप छोड़ सकती है।

मैदान के एक कोने जहाँ गांधी प्रतिमा स्थापित है वहाँ कुछ क्रांतिकारी शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन कर रहे है। वह ऐसा इसलिए कर रहे है ताकि मनोहर जोशी का पूरे गर्म जोशी के साथ उनकी बात सुने और माने भी। लगातार वर्षा के कारण मैदान में थोड़ा कीचड़ हो चुका है और मैदान के बाहर मैदान का खुद का अपना तालाब बन चुका है।

काफी देर वक्त बिताने के बाद अब यहाँ से निकलना होगा। मौसम आज बहुत ही सुहाना है इसलिए भी इतनी देर तक यहाँ समय दे पाया।

प्रतियोगिता दर्पण

गोलघर के लिए मैंने मैदान पीछे छोड़ दिया। लेकिन रास्ते में यह मैं क्या देखता हूँ। एक विशाल इमारत में फोटोग्राफी प्रतियोगिता जैसा कुछ घटित हो रहा है। यह देख कर मैं खुद को रोक ना पाया।

दोनों को ले कर दाखिल होने लगा। सबसे अच्छी बात ये है कि दाखिले का कोई शुल्क नहीं है। बाहर एक कॉपी में पंजीकरण कर के अंदर जाने को दिया गया।

बहुत बड़े से हॉल में प्रवेश करने पर देखता हूँ की यहाँ अलग ही प्रतियोगिता चल रही है। चार सुंदरियां अप्सरा बना कर अलग अलग कोने में बैठाई गई है।

चुनौती यह है कि जो इन सबमें से सबसे बेहतरीन तस्वीर लेगा उसे विजेता घोषित किया जाएगा। पर जनता बहुत ही नाइंसाफी करती नजर आ रही है जो सिर्फ एक ही सुंदरी की तस्वीर खींच रही है।

बाकी तीन मक्खी तो नही मार रही पर उबाऊ जरूर महसूस कर रही हैं। भेदभाव ना सिर्फ जनता ने किया बल्कि प्रतियोगिता करानेवाले ने भी किया।

जो किसी एक को बड़ा स्टेज और बाकी 4*4 के स्टेज में फिर कर दिया। इसीलिए बड़े स्टेज वाली मोहतरमा थोड़ा भावनाओ में बह गई हैं। बाकी धरातल पर ही हैं।

हालांकि मेरी ऐसी कोई लालसा नहीं है की सबकी तस्वीर लूं। पर जब हांथ में कैमरा है तो उसका सही जगह उपयोग करने में क्या ही जाता है। फिर भी बारी बारी से चारों की एक एक तस्वीर मैंने अपने कैमरे ने कैद कर ली।

धरती पर प्रकट हुई अप्सराए

तस्वीर खींचते खींचते देखने को मिलते हैं भांति भांति प्रकार के उच्यताम दर्जे के कैमरे। फिल्मी शूटिंग के लाखों रुपए के कैमरे, ड्रोन कैमरे इत्यादि इत्यादि। जिनके आसपास भी कोई नहीं भटक रहा।

दरवाजे के बगल में ही निकोन का रिपेयरिंग सेंटर है। पर यहाँ इतनी भीड़ क्यों जमा है इसका कारण नहीं समझ आ रहा। सामने खड़े बोर्ड पर नजर पड़ी तो पता चला की आज के लिए कमरे की मुफ्त रिपेयरिंग चालू है।

मेरे कैमरे में ऐसी कोई समस्या नहीं है जिसे मैं कैमरे के डॉक्टर को दिखाऊं। घेरा बना कर मैं सुमित और साथी घुमक्कड़ खड़े यही चर्चा कर रहे है की अब निकलना चाहिए। एक बज चुका है और गोलघर के लिए भी रवाना होना है।

गोलघर

हॉल से बाहर निकलने के पैदल ही गोलघर के लिए निकल आया जो नजदीक ही है। पर अब जब धूप तेज है तो ये रास्ता भी लंबा नजर आ रहा है।

गोलघर किसी ज़माने में पटना की सबसे ऊंची इमारत हुआ करती थी। आज ये सुनने में थोड़ा अटपटा लग रहा है। किसी जमाने में यहाँ एक साथ टनो का अनाज भंडारण हुआ करता था।

 गोलघर में अंदर जाने का मामूली किराया है जो संरक्षण के लिए भी अच्छा है। सिर्फ एक इमारत और उसे घेरे बगीचा। गोलघर की छत पर पहुंच कर गंगा नदी को देखा जा सकता है। पर गोलघर की सीढ़ियां ही इतनी नाजुक हो चली हैं की इसे बंद कर दिया गया है।

गोलघर में अब अनाज भंडारण की जगह बिजली और ध्वनि का शो होता है। सुमित जन्मा तो पटना में है पर वह यहाँ पहली बार आया है वो भी हमारा आना हुआ।

बूढ़े गोलघर के साथ कुछ तस्वीरें लेने के बाद ठीक सामने लगे बरगद के पेड़ के नीचे कुछ क्षण बिताना अच्छा लग रहा है। यहाँ ज्यादा समय ना देते हुए पटना संग्रहालय की ओर रुखसत होने से पहले लघुशंका के लिए सब पास के ही टॉयलेट में आना पड़ा।

 सुमित न खुद पैदल चलने में कतराता है न चलवाने में। पैदल ही ले चलने लगा पटना संग्रहालय की ओर। सुमित का कोई विचार नहीं है ऑटो से आने जाने का। अच्छी शारीरिक कसरत हो रही है।

गोलघर से ले कर संग्रहालय तक पटना की गलियां रंग बिरंगी कलाकृति से सुसज्जित हैं। जो देखने में अच्छी लग रही हैं। संग्रहालय तो पहुंच गया हूँ पर भीतर जाने के लिए मुख्य गेट ही नहीं मिल रहा।

गोलघर जहाँ कभी टनों टन अनाज का भण्डारण हुआ करता था आज है जर्जर

पटना संग्रहालय 

काफी देर संग्रहालय के इर्द गिर्द घूमने के बाद भी मुख्य द्वार नहीं मिला। कुछ देर भीतने के बाद उद्यान जैसा दिखने वाला कॉम्प्लेक्स में बाहर की ओर एक छोटी सी दुकान दिखी। ये इतना छोटा है जैसे चावल में घुन जिसे ढूंढना पड़ता है। शायद यही टिकट काउंटर है। 

काउंटर पर ही बैग जमा करा दिया और संग्रहालय के मुख्य गेट की ओर आने लगा। यहाँ बगीचे के पास बड़ी विशालकाय बुद्ध प्रतिमा है। जो तकरीबन दो हजार साल पुरानी लग रही है। जिसके पीछे अशोक स्तंभ है।

कुछ फोटो खिंचवाने के बाद ढाई बजे तक हम टिकट दिखा कर अखिकार दाखिल ही हो गए। इतने देर धूप में खड़े होने के कारण प्यास भी जोर की लग आई है। इससे पहले की संग्रहालय देखने का कार्यक्रम शुरू किया जाए प्यास बुझा लो जाए।

भूखंड में दो बड़े कमरे हैं जहाँ मरे हुए जानवरों के डमी रखे हुए हैं। मरे हुए जानवरों और पक्षियों की खाल से बने डमी है। बस कमी है तो इसमें जान फूकने की वरना शीशे के अंदर बंद ये जानवर कम डरावने नहीं हैं।

मॉडर्न जमाने की कलाकृतियां भी काफी संख्या में प्रदर्शनी में लगाई गई हैं। जो की दूसरे हॉल में मौजूद हैं जिनके आज के कलाकारों द्वारा बनाया गया है जिसमे उन कलाकारों ने चित्रकारी के माध्यम से अपने विचारों को जनता के सामने प्रस्तुत किया है।

संग्रहालय में दुर्लभ संग्रह का भंडार है। संग्रहालय के अवशेष और चित्रों, दुर्लभ सिक्कों, पांडुलिपियों, पत्थर और खनिज, तोप और शीशा की कलाकृतियों से समृद्ध है।

मुझे भूखंड का सामान देखने में ही काफी वक्त गुजर गया। सुमित तो थक कर बाहर पड़ी कुर्सी पर बैठ कर हमारा इंतजार कर रहा था। किसी राजभवन से कम नहीं है ये संग्रहालय। 

सीढियां चढ़ कर ऊपर निकल आया। पहले दाईं तरफ मुड़ा जहाँ चित्रकारी मौजूद है। यहाँ कुछ नौजवान फोटोग्राफर बनने के चक्कर में बिना मूल्य चुकाए ही धड़ल्ले से खचा खच तस्वीरें लेने में जुटे हैं। पकड़े गए तो ना सिर्फ भारी मूल्य चुकाना पड़ेगा बल्कि बेशर्मी अलग।

वैशाली में भगवान बुद्ध की मृत्यु के बाद बनवाए गए प्राचीनतम मिट्टी के स्तूप से प्राप्त बुद्ध के दुर्लभ अस्थि अवशेष वाली कलश मंजूषा है। जो एक विशेष कमरे में बंद है। जिसे देखने का अतिरिक्त मूल्य चुकाना पड़ता है।

मेरे सामने ही एक दंपति वो मंजूषा देखने गई है। जिसे एक लामा ने विशेष कमरे का दरवाजा खोल कर उन्हें अंदर ले गया है।

वृक्ष का जीवाश्म संग्रहालय में काफी पुराने चीड़ के एक वृक्ष का जीवाश्म भी यहाँ रखा हुआ है, जिसे देखने के लिए विदेश से भी लोग आते हैं। ये सब पहले खंड में मौजूद हैं।

तोप के साथ साथ पुरानी बंदूके, तलवारें सैनिकों की पोशाकें और भी बहुत कुछ। यह सब देखने और उनके विषय में पढ़ने में काफी समय व्यतीत हो रहा है। ये रोमांचित कर देने वाला भी है। अब जब समय कम है तो बाकी का संग्रहालय निपटने वाली स्तिथि में देख रहा हूँ।

सुमित फिर से कुर्सी पकड़ कर बैठ गया है। मैं भी यहीं आ कर बैठ गया सैनिकों की पोशाक के आगे और अब हम दोनो मिल कर साथी घुमक्कड़ का इंतजार कर रहे हैं।

कुछ लोग किसी भी संग्रहालय को इतनी शिद्दत से देखते समझते हैं जैसे सब याद ही कर लेंगे या कल इसी की परीक्षा होगी।

आमतौर पर संग्रहालय में दो तरह के लोग आते हैं एक वो जो सिर्फ तस्वीर देखते हैं दूसरे तस्वीर के नीचे लिखा हुआ भी पढ़ते हैं। अगर ये दोनो एक साथ संग्रहालय देखने निकल जाएं तो शायद पहले वर्ग के व्यक्ति की दो तीन चक्कर तो ऐसे ही लग जाएं और दूसरे वर्ग का व्यक्ति तब भी खतम ना कर पाए।

साथी घुमक्कड़ को फोन लगा कर बुलाना पड़ रहा है। पर कमबख्त फोन भी नहीं लग रहा। उसी रास्ते से उसे ढूंढने निकल पड़ा और खींचते हुए ले कर निकला।

संग्रहालय में तो काफी अच्छा लगा और मजा भी आया। एक अच्छा खासा समय गुजर गया यहाँ लगभग ढाई घंटे। शाम के पांच बज रहे हैं अब संग्रहालय से किधर को जाना है यह तो सुमित पर ही निर्भर करता है। काउंटर से बैग ले कर निकल पड़े चौराहे की तरफ।

पटना संग्रहालय पर सुमित के साथ लेखक

रास्ते में सुमित ने बताया की हम पटना तराघर के लिए रवाना हुए हैं। रास्ते में भारी यातायात के कारण गाड़ियों के बीच से ही गुजरना पड़ रहा है।

ताराघर के बाहर आइस क्रीम की दुकान पर सबसे पहले तो आइस क्रीम गपकी फिर कोई और काम किया। अंदर काउंटर पर टिकट के लिए पैसे निकाले पर अभी चल रहे शो के घंटे भर बाद ही दूसरा शो चालू होगा। इतनी देर तक तो प्रतीक्षा ना हो सकेगी।

आपस में ही सलाह मशविरा करके सुमित हमें ले आया फिल्म दिखाने। फिर से पैदल ही रास्ता तय कर सुमित बाबू लेके आए हमें मोना टॉकीज। पर इतनी भीड़ देख अंदाजा लगाया जा सकता है की टिकट का मिलना मुश्किल हो। हुआ भी कुछ ऐसा ही मोना टाकीज तो हाऊसफुल निकली।

सुमित माथा पकड़ के बैठ गया। पर यहाँ एक और सिनेमा हॉल है। मोना के ठीक बगल में रीजेंट फन सिनेमा में सुमित बड़े आस के साथ टिकट लेने पहुंचा। पर यहाँ भी सब सीट बुक हो चुकी हैं।

कुछ देर ऐसे ही वक्त बीत गया। पेट को कुछ खाने पिलाने के वास्ते पास के ठेले पर चाउमीन का ऑर्डर दिया। जिसे परस कर आने में समय ना लगा। आसपास की शुद्धता देख यहाँ और ज्यादा देर रुकने का मन नहीं हुआ।

हनुमान मंदिर

हीरो हीरोइन के दर्शन ना हो सके तो हम निकल पड़े हनुमान मंदिर जो स्टेशन के नजदीक है। मंदिर जाने से पहले चौराहे की किनारे सैकड़ों वर्ष पुरानी दुकान में गरम गरम समोसे और चाय का स्वाद लिया। कुल्हड़ के गिलास में चाय और भी मीठी लागने लगती है।

बहुचर्चित हनुमान मंदिर भगवान के दर्शन के लिए। सुमित नास्तिक है पर फिर भी मंदिर में प्रवेश से पहले प्रसाद लिया। जूते काउंटर पर जमा करवा कर हांथ मूह धोया। कड़ी सुरक्षा के बीच अंदर प्रवेश हुआ।

तीन मंजिला मंदिर में पहली मंज़िल पर प्रभु श्री राम, सीता, लक्ष्मण, हनुमान जी विराजे हैं। यहाँ भीड़ काफी है और जगह भी कम है। दर्शन के बाद दूसरे खंड की तरफ बढ़ा।

दूसरी मंज़िल पर प्रमुख देवियां विराजमान हैं। नौ देवी के अलावा यहाँ रामेश्वरम के धनुषकोडी से लाया गया तैरता पत्थर भी है। जो एक कांच के डिब्बे में भरे पानी में रखा गया है। बंद कांच के बाहर लाल टीके से सजा अंदर तैरता पत्थर। यहाँ काफी वक्त गुजारने के बाद ऊपर आया।

तीसरी और अंतिम मंज़िल पर अर्ध खुला हॉल है जिसमें शाम के वक़्त भजन कीर्तन का आयोजन होता है। यहाँ बड़ी शांति है। मैं, सुमित और साथी घुमक्कड़ अब तक तितर बितर हो चुके हैं। हॉल में भजन कीर्तन की तैयारी हो रही है। स्टेज पर एक महाराज अपना हरमोनियम ले कर प्रवचन शुरू करने वाले हैं।

बाकी के भक्तो की तरह सुमित माला पहने कीर्तन सुन रहा है। छज्जे से रात के वक्त पटना भी अच्छा लग रहा है। खासतौर पर स्टेशन जहाँ बिहार की संस्कृति और इतिहास का प्रदर्शन हो रहा है। ये एक बहुत अच्छा कदम है लोगों को जागरूक करने का। फर्क भी पड़ेगा। अच्छा प्रभाव भी। लोगों पर इतिहास की छाप भी पड़नी जरूरी है।

समय के अभाव के चलते पटना साहिब और बुद्ध शांति पार्क नहीं जा सक। शायद पटना में एक और दिन रुकना चाहिए। स्टेशन की कुछ रंग बिरंगी तस्वीरें लेने के बाद मैं भी प्रवचन सुनने के लिए हॉल में बैठ गया। यहाँ काफी शांति महसूस हो रही है। भजन चालू हो चुका है और मैं उसके कब लीन हो गया। पता ही नहीं चला। 

तीसरे खंड पर ज्यादा समय बिता दिया है। बेहतर होगा अब निकला जाए क्योंकि कल नालंदा जाने की योजना है जिसे अमल में लाना है।

पटना भ्रमण के दौरान की कुल 18km की यात्रा

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