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पानी पर बसा भारत का सबसे बड़ा महल

उज्ज्यांता महल से नीर महल

उज्ज्यांता महल में कुछ दो ढाई घंटे का समय बीत गया है। कुछ ही देर में उत्पल जी का फोन आता है और वो हमें बाहर मिलने को बुला रहे हैं।

इतनी देर राजभवन में समय बिता कर अनछुए पहलुओं को जानने को मिला। खासतौर पर पूर्वोत्तर क्षेत्र के आदिवासियों के बारे में। यहां के रीति रिवाज और इतिहास। जिसका जिक्र बहुत कम ही देखने को मिलता है।

पिछले दरवाजे से बाहर निकल कर हम चल पड़े मुख्य द्वार पर जहां उत्पल जी हमारा इंतजार कर रहे हैं। अब शायद हम अगरतला के उस महल में जायेंगे जो पानी के ऊपर बसा है।

गेट पर पहुंच कर बैग वापस लिए और बाहर ही इंतजार कर रहे उत्पल जी के साथ उनके चार पहिया वाहन में लद कर निकल पड़े नीर महल जो अगरतला से पचास किमी की दूरी पर स्थित है।

सफर शुरू हुआ पर नाजी महफूज ने बीच रास्ते में उतरने का संकेत दे दिया। जहां से वो बांग्लादेश अपने नाते रिश्तेदारों से मिलने जाएंगे। तकरीब आधे घंटे में हम अगरतला की तंग गलियों से बाहर निकल कर किसी गांव से गुजर रहे हैं।

साथ ही इस कदर हरियाली है की मन कर रहा है इसी दिशा पर चलता चला जाऊं। स्कूली किताबों में रबर के आविष्कार और इसकी खेती के बारे में विस्तार से पढ़ा था।

तब पढ़ा था अब देख रहा हूं।

बीर बिक्रम द्वारा निर्मित

उत्पल ने बताया की इस महल का निर्माण त्रिपुरा साम्राज्य के महाराज बीर बिक्रम माणिक्य बहादुर द्वारा करवाया गया था। जिसे अंग्रेजों ने आठ साल में बना कर खड़ा किया था।

इसका निर्माण कार्य 1930 में शुरू हुआ और पूरी तरह से 1938 में बन कर खड़ा हुआ। ये अद्भुत महल भारत में इकलौता इतना बड़ा महल है। वैसे इसके अलावा दूसरा जो महल है वो राजस्थान का जल महल पर इसके जितना बड़ा नही है।

मुख्य उद्देश्य था गर्मियों में रहने के लिहाज से इसका निर्माण कराया गया था। पानी के बीचों बीच इस तरह से महल बनाने की सोच भी महाराज बीर बिक्रम माणिक्य बहादुर की ही थी। जब सन 1921 में ये अजीबो गरीब खयाल उनके दिमाग में आया।

ब्रिटिश सरकार को इस अजीबो गरीब महल बनाने का प्रस्ताव रखा। तब जा कर मार्टिन और बर्न्स नाम के इंजीनियर ने इसको आठ साल का समय ले कर निर्माण कार्य शुरू किया।

नीर महल बालकनी

नाव का इंतज़ार

बातो ही बातो में हम नीर महल के पास पहुंच गए। पास में खाली पड़े मैदान में उत्पल ने गाड़ी किनारे लगाई और आ निकले टिकट घर के सामने।

नीर महल तक पहुंचने के लिए मोटर वाली नाव का सहारा लेना पड़ेगा। या फिर चप्पू वाली नाव से उस पार जाना होगा। और अगर आप कुशल तैराक हैं तो इसकी भी क्या जरूरत।

पानी में कूदिए और पहुंच जाइए महल के छोर तक। पर ना हम तैराकी जाने ना चप्पू वाली नाव में जाने का खतरा उठाए। इसलिए मोटर वाली नाव और महल का टिकट ले कर आ गए एक किनारे इंतजार करने।

जबतक सामने से दूसरी नाव नही आ जाती तब तक यहां से दूसरी नाव नही निकलेगी। ऐसा इसलिए भी ताकि झील पर दबाव कम ही रहे तो बेहतर है।

दूर से दिख रही उस नाव का आना हुआ जो भारी मात्रा में भीड़ को ले कर आई और साथ में तेज झोंका भी ले कर आई। जिससे पानी सीढ़ियों के ऊपर तक आ पहुंचा।

एक एक कर सवारियां उतर कर बाहर निकली और नीर महल की ओर जाने वाली जनता दूसरी नाव पर लगी। नाव में पहले से ही बड़ा सा जेनरेटर रखा है जिससे नाव चलेगी।

नाव को भरने में ज्यादा देर ना लगी और देखते ही देखते एक जत्था आ कर बैठा और इधर नाव का चलना प्रारंभ हुआ। नाव के चलने से झील में इस तरह कंपन पैदा हो रहा है की उसकी लहर दूर तक जा रही है।

वापस आ रही छोटी नाव को इससे खतरा रहता है। इसलिए चप्पू वाली नाव दूर ही चलती हैं। क्योंकि बड़ी नाव से निकलने वाली तरंगे छोटी नाव को झटका दे कर दूर कर देती हैं। अगर संतुलन बिगड़ जाए तो इनके डूबने का खतरा भी रहता है।

नाव से नीर महल ही तैरता हुआ दिखाई पड़ रहा है। कुछ धुंधला। पर काफी बड़ा, इतना बड़ा की कैमरे में भी कैद करना मुश्किल जान पड़ रहा है।

हैरानी इस बात की हो रही है इतने सालों के बाद भी ये महल अब तक पानी में कैसे टीका हुआ है। इसी पर चर्चा छिड़ी थी की आ पहुंची हमारी नाव महल के छोर पर।

एक छोर से दूसरे छोर तक आने में दस मिनट का समय लग गया। उतरते वक्त नाविक ने हम सबको घंटे भर का समय दिया और दूसरी सवारियों का इंतजार करने लगा।

नीर महल

महल के बाहर बैठे सुरक्षाकर्मियों को टिकट दिखाया और चल पड़ा अंदर। महल दो भागो में बटा हुआ है। पश्चिम हिस्सा अंदर महल कहा गया है जो महाराज के परिवार के लिए है।

पूर्वी हिस्सा नाटक, रंगारंग कार्यक्रमों के लिए है। महल काफी बड़ा है। पानी के ऊपर बने होने के बावजूद इतना बड़ा है की दो चार खेल आराम से खेले जा सके हैं।

यानी की जो आज दुबई में होता है भारत ने 80 साल पहले ही हो चुका है। किसी तकनीक से इस झील के ऊपर ये महल बना है वो कबीले तारीफ है।

आज इस महल में रहने के लिए कोई भी नहीं है। कानूनी तौर पर भी इस महल के मालिकाना हक के लिए लड़ाई जारी है।

मजेदार बात ये है की इस महल में बालकनी, भारी भरकम इमारतें, गुम्बद, पैदल पुल सभी कुछ है। जिसका भार लिए ये महल सीना ताने खड़ा है। बालकनी में आकर खड़ा हुआ तो दूर दिख रहे बादलों का गुब्बार दिखाई पड़ रहा है।

जो एक जगह वर्षा कर रहे हैं। इस तरह दूर किसी क्षेत्र में बादलों को बरसता देखना ये मेरा पहला अनुभव है।

नीर महल गार्डन

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